शल्य पर्व

शल्य पर्व

शल्य का संक्षिप्त सेनापतित्व और उनका वध, तथा भीम और दुर्योधन के बीच गदा-युद्ध जिसमें दुर्योधन की जंघा पर प्रहार से युद्ध का निर्णय हुआ।

अध्याय 1

शल्य का सेनापति-पद ग्रहण

कर्ण के उस असाधारण, हृदयविदारक अंत के पश्चात्, सम्पूर्ण कौरव-सेना में गहन शोक और निराशा व्याप्त हो गई, तथा दुर्योधन, इस भीषण संकट के मध्य भी, युद्ध जारी रखने के अपने अटल संकल्प पर दृढ़ बना रहा।

अब सेनापति-पद हेतु उपयुक्त योद्धा के चयन का प्रश्न पुनः खड़ा हुआ, तथा दुर्योधन ने, अपने मामा और मद्रराज शल्य की ओर देखा, जो अपनी अद्वितीय युद्ध-कुशलता तथा अनुभव के लिए सम्पूर्ण भारतवर्ष में विख्यात थे।

शल्य ने, अपने भांजे दुर्योधन के इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए, यह वचन दिया कि वे अपने सम्पूर्ण पराक्रम और अनुभव के साथ, इस युद्ध के अंतिम, सर्वाधिक निर्णायक चरण का नेतृत्व करेंगे, चाहे परिणाम कुछ भी क्यों न हो।

दुर्योधन, अपने इस नए सेनापति के साथ, एक अंतिम, सर्वशक्ति-सम्पन्न प्रयास द्वारा, युद्ध का पासा अपने पक्ष में मोड़ने की आशा संजोए हुए था, यद्यपि सम्पूर्ण कौरव-सेना में यह गहन आशंका भी व्याप्त थी कि अब विजय की सम्भावना अत्यंत क्षीण हो चुकी है।

इस प्रकार, इस भीषण महासंग्राम के अठारहवें, अंतिम दिवस की पृष्ठभूमि रची गई, जिसमें दोनों पक्षों की शेष सेनाएँ, एक अंतिम, सर्वनाशकारी संघर्ष के लिए पूर्णतः तैयार हो गईं।

इस अध्याय की शिक्षा

जब अंत निकट प्रतीत हो, तब भी अपने कर्तव्य का पूर्ण निर्वहन करना ही एक सच्चे योद्धा की पहचान है।

अध्याय 2

युद्ध के अठारहवें दिन की भीषणता

अठारहवें दिन का यह युद्ध, इस सम्पूर्ण महासंग्राम के सर्वाधिक भीषण, सर्वनाशकारी चरणों में से एक सिद्ध हुआ, दोनों ही सेनाओं ने अपनी समस्त शेष शक्ति और साहस के साथ, एक-दूसरे पर टूट पड़ने का निश्चय किया।

शल्य ने, अपने सेनापतित्व के इस प्रथम एवं अंतिम दिवस पर, अत्यंत असाधारण पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए, पांडव-सेना के अनेक भागों में भारी विनाश उत्पन्न किया, तथा अनेक महारथियों को चुनौती देते हुए, स्वयं युधिष्ठिर की ओर भी बढ़ चले।

इसी मध्य, सहदेव का सामना अपने चिरशत्रु शकुनि से हुआ, जिसने द्यूत-क्रीड़ा के उस छलपूर्ण खेल द्वारा, सम्पूर्ण पांडवों के जीवन में इतनी विपत्तियाँ ला दी थीं, सहदेव, अपने हृदय में संचित उस दीर्घकालिक क्रोध के साथ, शकुनि पर टूट पड़े।

सहदेव ने, अत्यंत भीषण द्वंद्व-युद्ध के पश्चात्, अंततः शकुनि का वध कर, उस छलपूर्ण द्यूत-क्रीड़ा का, तथा उसके परिणामस्वरूप हुए पांडवों के तेरह वर्षों के वनवास और अपमान का, अंतिम प्रतिशोध पूर्ण किया।

शकुनि के इस अंत के साथ ही, कौरव-सेना के मनोबल को एक और गहरा आघात लगा, तथा यह स्पष्ट होने लगा कि इस युद्ध का अंतिम परिणाम, अब पूर्णतः पांडवों के पक्ष में झुक चुका है।

इस अध्याय की शिक्षा

छल और कपट से रचा गया प्रत्येक षड्यंत्र, चाहे कितने भी वर्षों पश्चात् क्यों न हो, अंततः अपने कर्ता के लिए विनाश ही लेकर आता है।

अध्याय 3

युधिष्ठिर-शल्य द्वंद्व एवं शल्य का अंत

शल्य, अपने असाधारण पराक्रम के साथ, अंततः स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर के सम्मुख आ पहुँचे, तथा दोनों के मध्य एक अत्यंत भीषण, ऐतिहासिक द्वंद्व-युद्ध आरम्भ हुआ, यह एक ऐसा युद्ध था जिसमें स्वयं युधिष्ठिर को अपने शस्त्र-कौशल का सर्वोच्च प्रदर्शन करना था।

युधिष्ठिर, जो सामान्यतः धर्म और शांति के प्रतीक माने जाते थे, इस अंतिम, निर्णायक क्षण में, अपने भीतर छिपे उस असाधारण क्षत्रिय-तेज को प्रकट करते हुए, शल्य के प्रत्येक आक्रमण का अत्यंत कुशलतापूर्वक प्रत्युत्तर देने लगे।

दोनों महारथियों के मध्य बाणों की एक भीषण वर्षा हुई, तथा युधिष्ठिर ने, अपने सम्पूर्ण संचित क्रोध, धैर्य और कौशल का प्रयोग करते हुए, अंततः एक अत्यंत शक्तिशाली शक्ति-अस्त्र का संधान कर, शल्य के हृदय को छेदते हुए उनका अंत कर दिया।

सम्पूर्ण रणभूमि, इस अप्रत्याशित घटना को देखकर स्तब्ध रह गई — कि जो युधिष्ठिर सदैव युद्ध से विमुख और शांतिप्रिय स्वभाव के माने जाते थे, उन्होंने ही स्वयं इस युद्ध के एक अन्य महान सेनापति का अंत किया था।

शल्य के इस अंत के साथ, कौरव-सेना अब पूर्णतः नेतृत्वविहीन और असंगठित हो गई, तथा उसके अवशिष्ट सैनिकों में भय और निराशा की एक ऐसी लहर दौड़ गई, जिसने उनके पलायन को ही एकमात्र विकल्प बना दिया।

इस अध्याय की शिक्षा

धैर्य और शांति का प्रतीक व्यक्ति भी, जब धर्म-रक्षा हेतु आवश्यक हो, अपने भीतर के असाधारण साहस को प्रकट कर सकता है।

अध्याय 4

कौरव-सेना का सम्पूर्ण विनाश

शल्य और शकुनि, दोनों ही प्रमुख सेनापतियों के अंत के पश्चात्, कौरव-सेना में सम्पूर्ण अव्यवस्था और भगदड़ फैल गई, अनेक सैनिक, अपने प्राणों की रक्षा हेतु, युद्धभूमि से भागने का प्रयास करने लगे।

पांडव-सेना, इस अवसर का लाभ उठाते हुए, शेष कौरव-सेना पर एक भीषण, अंतिम आक्रमण करते हुए, उसका लगभग सम्पूर्ण विनाश कर डाला, केवल गिने-चुने योद्धा ही इस भीषण संहार से बच पाए।

अश्वत्थामा, कृपाचार्य तथा कृतवर्मा जैसे कुछ महारथी, इस भीषण विनाश से किसी प्रकार बचकर, दुर्योधन के साथ युद्धभूमि से दूर हटने का प्रयास करने लगे, यह भलीभाँति जानते हुए कि अब आगे की स्थिति अत्यंत विकट है।

दुर्योधन, अपनी सम्पूर्ण सेना, अपने समस्त भाइयों तथा अपने प्रिय मित्रों और सेनापतियों को इस प्रकार युद्धभूमि में खोते हुए, गहन शोक, क्रोध और असहनीय पीड़ा का अनुभव करने लगा, फिर भी उसने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया।

इस प्रकार, अठारह दिनों तक चला यह भीषण महासंग्राम, अपने अंतिम, सर्वाधिक विनाशकारी चरण में पहुँच गया, जिसमें कौरव-पक्ष की सम्पूर्ण सेना का, प्रायः पूर्ण रूप से, विनाश हो चुका था।

इस अध्याय की शिक्षा

अहंकार और द्वेष से उपजा युद्ध, अंततः दोनों पक्षों के लिए ही अपार विनाश और शोक लेकर आता है।

अध्याय 5

दुर्योधन का पलायन — द्वैपायन सरोवर में छिपना

दुर्योधन, अपनी सम्पूर्ण सेना के इस विनाश और अपने समस्त प्रियजनों की मृत्यु से गहन शोक में डूबा हुआ, अकेला ही युद्धभूमि से दूर, वन की ओर भाग निकला, यह न जानते हुए कि आगे कहाँ शरण ले।

भटकते-भटकते, दुर्योधन अंततः द्वैपायन नामक एक सरोवर के निकट पहुँचा, तथा अपनी योग-शक्ति और मायावी विद्या का प्रयोग करते हुए, उस सरोवर के जल को स्तम्भित कर, उसके भीतर ही जाकर छिप गया, यह आशा करते हुए कि वहाँ वह कुछ काल के लिए सुरक्षित रह सकेगा।

इसी मध्य, कुछ भागे हुए, थके-हारे कौरव सैनिक, वन में विश्राम कर रहे कुछ शिकारियों को यह भेद बता बैठे कि दुर्योधन कहाँ छिपा हुआ है, तथा यह समाचार शीघ्र ही, विभिन्न स्रोतों से, पांडवों तक भी जा पहुँचा।

युधिष्ठिर, यह समाचार सुनकर, अपने भाइयों तथा श्रीकृष्ण के साथ, उस द्वैपायन सरोवर की ओर प्रस्थान किया, यह दृढ़ संकल्प लेते हुए कि इस दीर्घकालिक, भीषण शत्रुता का अंतिम, निर्णायक अंत अब अवश्य ही होना चाहिए।

इस प्रकार, इस महासंग्राम का अंतिम अध्याय, अब एक सरोवर के तट पर, दुर्योधन और पांडवों के मध्य उस अंतिम, नियति-निर्धारित संघर्ष की प्रतीक्षा में था।

इस अध्याय की शिक्षा

जब अहंकार और अन्याय का अंत निकट आता है, तो पलायन और छिपना भी अंततः कोई स्थायी शरण नहीं दे पाता।

अध्याय 6

पांडवों द्वारा दुर्योधन को ललकारना

पांडव, श्रीकृष्ण सहित, उस द्वैपायन सरोवर के तट पर जा पहुँचे, तथा युधिष्ठिर ने, अत्यंत उच्च, दृढ़ स्वर में, सरोवर के भीतर छिपे दुर्योधन को ललकारते हुए, उसे इस प्रकार जल में छिपकर अपने कायरता का परिचय न देने की चुनौती दी।

युधिष्ठिर ने दुर्योधन को यह स्मरण कराया कि एक सच्चा क्षत्रिय कभी भी युद्धभूमि से इस प्रकार पलायन कर, जल में छिपकर अपने प्राणों की रक्षा नहीं करता, तथा उसे बाहर आकर, सम्मानपूर्वक युद्ध का सामना करने के लिए ललकारा।

दुर्योधन, अपने भीतर संचित उस अपार क्रोध और अपमान की पीड़ा के साथ, सरोवर के भीतर से ही उत्तर देते हुए, यह कहने लगा कि उसने कोई भी शस्त्र नहीं खोया है, अपितु वह केवल अपनी थकान मिटाने हेतु ही कुछ काल विश्राम कर रहा था।

युधिष्ठिर ने, दुर्योधन के इस उत्तर पर, उसे एक अंतिम, अत्यंत सम्मानजनक प्रस्ताव दिया — कि वह बाहर आकर, पांडवों में से किसी भी एक योद्धा को चुनकर, उसके साथ केवल गदा-युद्ध द्वारा, इस सम्पूर्ण युद्ध का अंतिम निर्णय करे।

दुर्योधन, इस प्रस्ताव को सुनकर, अपने भीतर की उस अंतिम, हताश आशा के साथ, अंततः सरोवर से बाहर आने का निश्चय किया, यह मानते हुए कि गदा-युद्ध में उसे कोई भी पांडव सरलता से पराजित नहीं कर सकता।

इस अध्याय की शिक्षा

छिपकर अपने प्राणों की रक्षा करने की अपेक्षा, सम्मानपूर्वक अपनी नियति का सामना करना ही सच्चे साहस की पहचान है।

अध्याय 7

गदा-युद्ध की चुनौती — भीम का चयन

दुर्योधन, अपनी सम्पूर्ण गरिमा और शेष आत्मविश्वास के साथ, उस द्वैपायन सरोवर से बाहर निकला, तथा उसने पांडवों के समक्ष यह घोषणा की कि वह गदा-युद्ध में, पांडवों में से किसी भी एक योद्धा को चुनौती देने के लिए तैयार है।

दुर्योधन, अपनी गदा-युद्ध की असाधारण निपुणता पर पूर्ण विश्वास रखते हुए, यह भलीभाँति जानता था कि इस विशिष्ट युद्ध-कला में, स्वयं भीम को छोड़कर, अन्य कोई भी पांडव उसका सामना करने में सक्षम नहीं है।

भीम, बिना किसी विलम्ब के, दुर्योधन की इस चुनौती को स्वीकार करते हुए आगे बढ़े, यह स्मरण करते हुए कि यह वही दुर्योधन है जिसने द्रौपदी को भरी सभा में अपमानित किया था, तथा जिसने अपनी जंघा दिखाकर उसका घोर अपमान किया था।

युधिष्ठिर, यद्यपि गदा-युद्ध में स्वयं भीम की श्रेष्ठता पर पूर्ण विश्वास रखते थे, फिर भी वे कुछ हद तक चिंतित थे, क्योंकि दुर्योधन ने वर्षों तक बलराम जी से गदा-युद्ध की शिक्षा प्राप्त की थी, तथा वह भी इस कला में असाधारण रूप से निपुण था।

इस प्रकार, इस दीर्घकालिक, भीषण महासंग्राम का अंतिम निर्णय, अब भीम और दुर्योधन के मध्य होने वाले उस अंतिम, निर्णायक गदा-युद्ध पर निर्भर हो गया, जिसे देखने हेतु स्वयं श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा शेष पांडव भी उपस्थित हुए।

इस अध्याय की शिक्षा

पुराने अपमानों का प्रतिशोध, नियति द्वारा निर्धारित उचित समय पर ही, उचित माध्यम से पूर्ण होता है।

अध्याय 8

भीम-दुर्योधन गदा-युद्ध का आरम्भ

भीम और दुर्योधन, दोनों ही अपनी-अपनी विशाल, भारी गदाएँ लेकर, एक विस्तृत, समतल भूमि पर आमने-सामने आ खड़े हुए, तथा उनके मध्य आरम्भ हुआ यह गदा-युद्ध, सम्पूर्ण महाभारत के सर्वाधिक भीषण, रोमांचकारी द्वंद्वों में से एक सिद्ध हुआ।

दोनों महारथी, अत्यंत कुशलतापूर्वक, एक-दूसरे के प्रहारों से बचते हुए, तथा अपनी-अपनी गदाओं से भीषण प्रहार करते हुए, दीर्घकाल तक इस युद्ध में संलग्न रहे, तथा दोनों में से कोई भी स्पष्ट रूप से हावी नहीं हो पा रहा था।

दुर्योधन, अपने असाधारण कौशल और बल का प्रदर्शन करते हुए, कई बार भीम को गम्भीर आघात पहुँचाने में सफल रहा, तथा यह देखकर, स्वयं श्रीकृष्ण सहित सभी उपस्थित पांडव, गहन चिंता का अनुभव करने लगे।

भीम, अपने भीतर द्रौपदी के उस भीषण अपमान, तथा अपने वर्षों के संचित क्रोध और प्रतिज्ञा को स्मरण करते हुए, अपने सम्पूर्ण बल और साहस के साथ, दुर्योधन पर निरंतर प्रहार करते रहे, किंतु दुर्योधन का कवच और कौशल, उन्हें सरलता से पराजित नहीं होने दे रहा था।

यह युद्ध, दीर्घकाल तक चलता रहा, तथा दोनों ओर की सेनाओं के शेष सैनिक, तथा स्वयं पांडव और श्रीकृष्ण भी, इस अत्यंत रोमांचक, अनिश्चित परिणाम वाले युद्ध को अत्यंत उत्सुकता और चिंता के साथ देखते रहे।

इस अध्याय की शिक्षा

समान रूप से कुशल, दृढ़ प्रतिद्वंद्वियों के मध्य का संघर्ष, अंततः किसी अत्यंत सूक्ष्म, निर्णायक क्षण पर ही जाकर टिकता है।

अध्याय 9

श्रीकृष्ण का संकेत — जंघा पर प्रहार

जब यह गदा-युद्ध दीर्घकाल तक चलता रहा, तथा भीम, दुर्योधन के असाधारण कौशल के समक्ष स्पष्ट विजय प्राप्त करने में असमर्थ प्रतीत होने लगे, तो श्रीकृष्ण ने अत्यंत सूक्ष्म, गूढ़ संकेत द्वारा, अर्जुन को कुछ स्मरण कराया।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भीम की उस पुरानी, दीर्घकालिक प्रतिज्ञा का स्मरण कराया, जिसमें उन्होंने वचन दिया था कि वे दुर्योधन की उसी जंघा को अपनी गदा से चूर-चूर करेंगे, जिसे दिखाकर दुर्योधन ने द्रौपदी का भरी सभा में घोर अपमान किया था।

अर्जुन ने, श्रीकृष्ण के इस संकेत को समझते हुए, अपनी जंघा पर हाथ रखकर, भीम को यह गूढ़ इशारा किया, यद्यपि यह गदा-युद्ध के स्थापित नियमों के सर्वथा विपरीत था, क्योंकि इन नियमों के अनुसार, कमर के नीचे प्रहार करना वर्जित माना जाता था।

भीम, अर्जुन के इस संकेत को तत्काल समझते हुए, तथा अपनी उस दीर्घकालिक प्रतिज्ञा और द्रौपदी के उस भीषण अपमान को पुनः स्मरण करते हुए, अत्यंत तीव्र गति से छलांग लगाकर, अपनी विशाल गदा को सीधे दुर्योधन की जंघा पर दे मारा।

यह प्रहार इतना भीषण और शक्तिशाली था कि दुर्योधन की दोनों जंघाएँ चूर-चूर हो गईं, तथा वह विशाल, पराक्रमी योद्धा, चीत्कार करते हुए, रक्त से लथपथ होकर भूमि पर गिर पड़ा।

इस अध्याय की शिक्षा

दीर्घकाल से ली गई प्रतिज्ञा, चाहे उसे पूर्ण करने के लिए कैसा भी असाधारण मार्ग क्यों न अपनाना पड़े, अंततः पूर्ण होकर ही रहती है।

अध्याय 10

दुर्योधन का पतन एवं बलराम का क्रोध

दुर्योधन के इस अत्यंत भीषण, नियम-विरुद्ध पतन को देखकर, ठीक उसी समय वहाँ पहुँचे बलराम जी, जो दीर्घकाल की तीर्थयात्रा से लौटे थे, तथा जो स्वयं भीम और दुर्योधन, दोनों के ही गदा-युद्ध गुरु रहे थे, अत्यंत क्रोधित हो उठे।

बलराम जी ने, इस नियम-विरुद्ध, अधर्मपूर्ण प्रहार पर घोर आपत्ति व्यक्त करते हुए, भीम को कठोर शब्दों में धिक्कारा, तथा अपना हल उठाकर, स्वयं भीम पर आक्रमण करने हेतु आगे बढ़े, यह घोषणा करते हुए कि उन्हें इस अधर्म का दंड अवश्य मिलना चाहिए।

श्रीकृष्ण, इस अत्यंत विकट परिस्थिति को तत्काल समझते हुए, बलराम जी के समक्ष आगे बढ़े, तथा उन्हें अत्यंत विनम्रता और युक्तिपूर्वक यह स्मरण कराया कि दुर्योधन और उसके साथियों ने, इस सम्पूर्ण युद्ध में, इससे भी कहीं अधिक अधर्मपूर्ण कृत्य किए हैं।

श्रीकृष्ण ने बलराम जी को यह भी स्मरण कराया कि भीम की यह प्रतिज्ञा, स्वयं द्रौपदी के उस भीषण अपमान का ही प्रतिशोध है, तथा नियति ने स्वयं ही यह निर्णय किया है कि दुर्योधन का अंत, उसी अंग द्वारा हो जिसके द्वारा उसने वह घोर अपराध किया था।

बलराम जी, श्रीकृष्ण के इन युक्तिपूर्ण वचनों से कुछ हद तक शांत होते हुए भी, अत्यंत क्षुब्ध मनोदशा में, इस स्थान से हस्तिनापुर की ओर लौट गए, तथा यह घटना, इस विजय के साथ भी एक विवादास्पद, नैतिक प्रश्नचिन्ह सदा के लिए जोड़ गई।

इस अध्याय की शिक्षा

विजय का मार्ग, चाहे कितना भी न्यायोचित प्रतीत हो, यदि स्थापित नियमों के विरुद्ध जाए, तो वह सदा ही नैतिक प्रश्नों से घिरा रहता है।

अध्याय 11

दुर्योधन का अंतिम समय

दुर्योधन, अपनी दोनों जंघाओं के चूर-चूर हो जाने के पश्चात्, अत्यंत असहनीय पीड़ा और रक्त-स्राव के मध्य, भूमि पर पड़ा हुआ, अपने अंतिम क्षणों की प्रतीक्षा करने लगा, यह जानते हुए कि अब उसका अंत निकट है।

युधिष्ठिर तथा शेष पांडव, दुर्योधन की इस अत्यंत दयनीय, पीड़ादायक अवस्था को देखकर, कुछ क्षणों के लिए गहन करुणा का अनुभव करने लगे, यद्यपि उन्हें अपनी इस दीर्घकालिक, अंतिम विजय पर भी गहन संतोष था।

इसी मध्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य तथा कृतवर्मा, जो इस युद्ध से किसी प्रकार बचकर वहाँ पहुँचे थे, अपने पड़े हुए, मरणासन्न मित्र और राजा दुर्योधन को देखकर, गहन शोक और क्रोध से भर उठे।

दुर्योधन ने, अपनी उस असहनीय पीड़ा के मध्य भी, अश्वत्थामा को अपने पास बुलाकर, उसे कौरव-सेना का अंतिम सेनापति नियुक्त किया, तथा उससे यह अनुरोध किया कि वह किसी भी प्रकार, पांडवों से इस अपमानजनक पराजय का प्रतिशोध अवश्य ले।

अश्वत्थामा, अपने राजा और मित्र की इस अंतिम इच्छा को शिरोधार्य करते हुए, अत्यंत भीषण प्रतिशोध की अग्नि में जलते हुए, वहाँ से एक ऐसी योजना के साथ प्रस्थान किया, जो आगामी सौप्तिक पर्व की उस अत्यंत भीषण, रात्रिकालीन घटना को जन्म देने वाली थी।

इस अध्याय की शिक्षा

पराजय के अंतिम क्षणों में भी, प्रतिशोध की अग्नि, आगे की और भी अधिक विनाशकारी घटनाओं को जन्म दे सकती है।

अध्याय 12

शल्य पर्व का समापन

दुर्योधन के इस अत्यंत भीषण, दयनीय पतन के साथ ही, इस अठारह दिनों तक चले भीषण महासंग्राम का, युद्धभूमि पर होने वाला मुख्य संघर्ष, प्रभावी रूप से समाप्त हो गया, तथा कौरव-पक्ष का कोई भी प्रमुख योद्धा अब जीवित युद्धरत नहीं रहा।

युधिष्ठिर तथा शेष पांडव, इस दीर्घकालिक, अत्यंत कष्टप्रद युद्ध की इस अंतिम विजय पर, मिश्रित भावनाओं के साथ, अपने शिविर की ओर लौट गए — एक ओर विजय की संतुष्टि, तो दूसरी ओर अपने असंख्य प्रियजनों की क्षति का गहन शोक।

श्रीकृष्ण, इस सम्पूर्ण घटनाक्रम के मध्य, यह भलीभाँति जानते थे कि यद्यपि युद्धभूमि पर मुख्य संघर्ष समाप्त हो चुका है, किंतु अश्वत्थामा के हृदय में जल रही प्रतिशोध की वह अग्नि, अभी भी एक अत्यंत भीषण, अप्रत्याशित संकट को जन्म दे सकती है।

सम्पूर्ण कुरुक्षेत्र की रणभूमि, इस अठारह दिनों के भीषण संहार के पश्चात्, असंख्य वीरों के शवों, टूटे हुए रथों तथा रक्त से सनी हुई भूमि के साथ, एक अत्यंत करुण, त्रासद दृश्य प्रस्तुत कर रही थी।

इस प्रकार शल्य पर्व, शल्य के संक्षिप्त सेनापतित्व, शकुनि के अंत, स्वयं युधिष्ठिर द्वारा शल्य का अंत, तथा अंततः भीम-दुर्योधन के उस अत्यंत भीषण, विवादास्पद गदा-युद्ध के साथ अपने समापन पर पहुँचता है, अगले सौप्तिक पर्व में, इस रात्रि में घटित होने वाली एक अत्यंत भीषण, हृदयविदारक घटना की कथा वर्णित की जाएगी।

इस अध्याय की शिक्षा

युद्धभूमि पर विजय प्राप्त होने के पश्चात् भी, प्रतिशोध की अतृप्त अग्नि, शांति की स्थापना में सबसे बड़ी बाधा बनी रह सकती है।