सभा पर्व
सभा पर्व
इंद्रप्रस्थ की मयसभा, युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ, शिशुपाल वध, तथा शकुनि के छल से हुआ चौसर का वह भीषण जुआ जिसने द्रौपदी के चीरहरण और पांडवों के वनवास को जन्म दिया।
मय दानव द्वारा सभा-निर्माण का प्रस्ताव
खांडव-दहन से प्राणों की रक्षा पाने के पश्चात्, मय दानव, जो स्वयं देवताओं का भी शिल्पकार माना जाता था, अत्यंत कृतज्ञ हृदय से अर्जुन के समक्ष उपस्थित हुआ, और विनम्रतापूर्वक निवेदन किया कि वह अपने प्राण-दान के प्रतिदान में कुछ असाधारण अवश्य करना चाहता है।
अर्जुन ने प्रारम्भ में विनम्रतापूर्वक कोई प्रतिदान लेने से इनकार किया, यह कहते हुए कि प्राण-रक्षा किसी बदले की अपेक्षा से नहीं की गई थी। किंतु मय, अपनी कृतज्ञता को किसी न किसी रूप में व्यक्त करने पर अड़ा रहा, और अंततः श्रीकृष्ण ने ही सुझाव दिया कि यदि मय वास्तव में कुछ करना चाहता है, तो वह युधिष्ठिर के लिए एक ऐसी अद्वितीय सभा-भवन का निर्माण करे जो त्रिलोक में अन्यत्र कहीं भी न हो।
मय ने अत्यंत हर्षपूर्वक यह प्रस्ताव स्वीकार किया, और बताया कि उसने पूर्वकाल में, जब वृषपर्वा दानव-राज के लिए एक सभा का निर्माण किया था, तब कैलाश पर्वत के निकट, बिंदुसरोवर के तट पर, अपनी दिव्य सामग्री और स्वर्ण-रत्न एकत्रित कर रखे थे, जो अब किसी काम में नहीं आ रहे थे।
उसने यह भी बताया कि उसके पास कौमुदी नामक एक असाधारण गदा भी सुरक्षित थी, जो पहले वरुण देव की थी, तथा एक दिव्य शंख जो देवगणों की सभा में प्रयुक्त होता था — ये दोनों अमूल्य वस्तुएँ भी वह भीम और युधिष्ठिर को भेंट स्वरूप अर्पित करना चाहता था।
युधिष्ठिर ने, मय के इस असाधारण प्रस्ताव को अत्यंत विनम्रता और श्रद्धा के साथ स्वीकार किया, यह पहचानते हुए कि यह केवल एक भवन-निर्माण नहीं, अपितु स्वयं दैवीय शिल्प-कौशल का इंद्रप्रस्थ को प्राप्त होने वाला असाधारण वरदान है, जो आगे चलकर उनकी नवस्थापित राजधानी के गौरव को अभूतपूर्व ऊँचाइयों तक ले जाएगा।
इस अध्याय की शिक्षा
कृतज्ञता को व्यक्त करने का सच्चा अवसर कभी नहीं टलना चाहिए, यह न केवल देने वाले के हृदय को हल्का करता है, अपितु प्राप्त करने वाले के जीवन को भी समृद्ध कर सकता है।
मयसभा का अद्भुत वर्णन
मय दानव ने अपने असाधारण शिल्प-कौशल से चौदह मास के अथक परिश्रम में एक ऐसी अद्भुत, विशाल सभा का निर्माण किया जो दस सहस्र हाथ लंबी-चौड़ी थी, जिसमें स्फटिक, स्वर्ण, रत्न और चाँदी का ऐसा अद्भुत सम्मिश्रण था कि साधारण मनुष्य की दृष्टि इसकी वास्तविकता और भ्रम में भेद नहीं कर पाती थी।
इस सभा में कहीं ऐसे स्फटिक-निर्मित फर्श थे जो देखने में जल के समान प्रतीत होते थे, तो कहीं वास्तविक जल के सरोवर ऐसे बनाए गए थे जो दूर से स्फटिक-फर्श के समान दिखाई पड़ते थे, इसी माया-पूर्ण निर्माण-शैली ने आगे चलकर दुर्योधन के उस प्रसिद्ध, अपमानजनक भ्रम की पृष्ठभूमि रची जिसकी कथा इसी पर्व में आगे वर्णित है।
सभा के मध्य में एक विशाल, रत्नजड़ित सिंहासन-कक्ष था, जिसके चारों ओर आठ हजार से भी अधिक कक्ष विभिन्न प्रयोजनों हेतु निर्मित थे, उद्यान, जलक्रीड़ा-स्थल, विश्राम-कक्ष तथा अतिथि-सत्कार हेतु सुसज्जित मंडप, प्रत्येक अपने आप में स्थापत्य कला का एक अद्भुत नमूना था।
मय ने इस सभा-निर्माण के साथ-साथ, अपनी कृतज्ञता के अतिरिक्त प्रमाण स्वरूप, भीमसेन को कौमुदी गदा भेंट की, जिसकी ध्वनि युद्धभूमि में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न कर देती थी, तथा युधिष्ठिर को देवदत्त नामक वह दिव्य शंख भी अर्पित किया जो अर्जुन के गांडीव धनुष के समान ही असाधारण गुणों से युक्त था।
जब यह अलौकिक सभा पूर्ण रूप से निर्मित हो गई, युधिष्ठिर ने इसमें दस सहस्र ब्राह्मणों को आमंत्रित कर एक भव्य भोज का आयोजन किया, और स्वयं देवर्षि नारद सहित अनेक ऋषिगण इस अद्भुत निर्माण को देखने तथा नवस्थापित राज्य को आशीर्वाद देने हेतु इंद्रप्रस्थ पधारे।
इस अध्याय की शिक्षा
जो निर्माण सच्चे कौशल और कृतज्ञता से रचा जाए, वह केवल एक भवन नहीं रहता, अपितु आने वाली पीढ़ियों की कथाओं का साक्षी बन जाता है।
नारद जी का आगमन एवं राजधर्म का उपदेश
देवर्षि नारद, इस अद्भुत मयसभा को देखकर स्वयं भी विस्मित हुए, और युधिष्ठिर के समक्ष बैठकर उन्होंने एक राजा के कर्तव्यों, न्याय-व्यवस्था, कर-प्रणाली, गुप्तचर-तंत्र तथा शत्रु-मित्र की उचित पहचान के विषय में अत्यंत विस्तृत, गहन प्रश्नों की एक शृंखला पूछी, यह परखते हुए कि युधिष्ठिर अपने राजधर्म के प्रति कितने सजग और उत्तरदायी हैं।
युधिष्ठिर ने अत्यंत विनम्रता से प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दिया, यह प्रकट करते हुए कि वे अपनी प्रजा के कल्याण, न्यायपूर्ण कर-व्यवस्था, तथा धर्मानुसार शासन के प्रति पूर्णतः समर्पित हैं, नारद इन उत्तरों से अत्यंत संतुष्ट और प्रसन्न हुए।
इसी वार्तालाप के मध्य, नारद ने युधिष्ठिर को स्वर्गलोक की उस दिव्य सभा का वर्णन सुनाया जहाँ स्वयं इंद्र, वरुण, यम और कुबेर अपनी-अपनी अलौकिक सभाओं में विराजमान होकर धर्मपूर्वक शासन करते हैं, प्रत्येक सभा अपने स्वामी के विशिष्ट गुणों और शक्तियों का प्रतिबिंब थी।
नारद ने विशेष रूप से यह उल्लेख किया कि इन दिव्य सभाओं में एक और असाधारण सभा है, जो स्वयं राजा हरिश्चंद्र की है, जिन्होंने अपनी अटूट सत्यनिष्ठा के बल पर स्वर्ग में यह असाधारण सम्मान अर्जित किया, यह सुनकर युधिष्ठिर के मन में भी एक ऐसे यज्ञ के आयोजन की गहन इच्छा जागृत हुई जो उन्हें भी समान गौरव प्रदान कर सके।
नारद ने युधिष्ठिर को बताया कि केवल राजसूय यज्ञ ही ऐसा एकमात्र यज्ञ है जो एक धर्मपरायण, चक्रवर्ती सम्राट को यह असाधारण सम्मान दिला सकता है, किंतु उन्होंने यह भी गंभीरतापूर्वक चेतावनी दी कि इस यज्ञ को सम्पन्न करने के मार्ग में अनेक शक्तिशाली राजाओं की अधीनता आवश्यक होगी, विशेष रूप से मगध-नरेश जरासंध, जिनका पराभव किए बिना यह यज्ञ सम्पूर्ण नहीं हो सकता।
इस अध्याय की शिक्षा
एक सच्चे शासक के लिए आत्म-मूल्यांकन और ज्ञानी जनों के प्रश्नों का सामना करना, अपनी शक्ति को छिपाने से कहीं अधिक मूल्यवान है, क्योंकि यही सच्चे आत्मविश्वास की नींव रखता है।
राजसूय यज्ञ का संकल्प
नारद के प्रस्थान के पश्चात्, युधिष्ठिर गहन चिंतन में डूब गए। राजसूय यज्ञ की महिमा और उसके माध्यम से प्राप्त होने वाले असाधारण गौरव की कल्पना उन्हें आकर्षित कर रही थी, किंतु साथ ही वे यह भी भलीभाँति जानते थे कि इस यज्ञ हेतु आवश्यक विजय-अभियान अत्यंत कठिन, दीर्घकालिक और जोखिमपूर्ण सिद्ध होगा।
उन्होंने अपने पुरोहित धौम्य, भाइयों तथा राज्य के वरिष्ठ मंत्रियों के साथ इस विषय पर गहन परामर्श किया, यह जानने का प्रयास करते हुए कि क्या यह महत्त्वाकांक्षी यज्ञ वास्तव में उचित समय पर, उचित परिस्थितियों में आयोजित किया जा रहा है, अथवा यह मात्र व्यक्तिगत गौरव की कामना से प्रेरित एक अनुचित साहस है।
अंततः, युधिष्ठिर ने यह निश्चय किया कि इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण निर्णय के लिए वे स्वयं द्वारकाधीश श्रीकृष्ण से परामर्श लेंगे, जिन्हें वे न केवल एक घनिष्ठ मित्र, अपितु सम्पूर्ण भूमंडल की राजनीतिक परिस्थितियों के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता के रूप में भी आदर देते थे।
श्रीकृष्ण को इंद्रप्रस्थ आमंत्रित किया गया, और वे तत्काल इस निमंत्रण को स्वीकार करते हुए अपने प्रिय मित्र युधिष्ठिर के समक्ष उपस्थित हुए, उनका भव्य स्वागत सम्पूर्ण इंद्रप्रस्थ नगरी में हर्षोल्लास के साथ किया गया, प्रजा में यह विश्वास व्याप्त था कि स्वयं भगवान के आगमन से उनकी नगरी और अधिक पावन हो उठी है।
युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण के समक्ष अपने मन की सम्पूर्ण दुविधा प्रकट की — क्या उन्हें वास्तव में राजसूय यज्ञ का साहस करना चाहिए, और यदि हाँ, तो इस मार्ग में आने वाली सबसे बड़ी बाधा, मगध-नरेश जरासंध, से किस प्रकार निपटा जाए, जिनकी शक्ति और अत्याचार से सम्पूर्ण भूमंडल भयभीत था।
इस अध्याय की शिक्षा
एक महान लक्ष्य की ओर बढ़ने से पूर्व, ज्ञानी और विश्वसनीय मित्रों से परामर्श लेना दुर्बलता नहीं, अपितु सच्ची बुद्धिमत्ता का प्रमाण है।
श्रीकृष्ण द्वारा जरासंध के अत्याचार का वर्णन
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को अत्यंत गंभीरता से समझाया कि जरासंध केवल एक शक्तिशाली राजा ही नहीं, अपितु एक ऐसा अत्याचारी सम्राट है जिसने अपने बल के मद में अठासी राजाओं को बंदी बनाकर अपने शिव-मंदिर में कैद कर रखा है, इस भयंकर संकल्प के साथ कि जब बंदियों की संख्या सौ पूर्ण हो जाएगी, वह उन सबकी बलि चढ़ाकर भगवान शिव को प्रसन्न करेगा।
उन्होंने यह भी स्मरण कराया कि किस प्रकार जरासंध ने ही कंस को अपनी दो पुत्रियाँ ब्याही थीं, और कंस-वध के पश्चात् उसने प्रतिशोधवश मथुरा पर सत्रह बार आक्रमण किया था, जिसके कारण अंततः स्वयं यदुवंश को मथुरा त्यागकर समुद्र के मध्य द्वारका नामक सुरक्षित नगरी बसानी पड़ी थी।
श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि जरासंध का बल इतना असाधारण है कि उसे प्रत्यक्ष युद्ध में परास्त करना अत्यंत कठिन है, क्योंकि उसकी सेना विशाल तथा उसके संधि-राजा असंख्य हैं, किंतु उन्होंने एक गूढ़ रहस्य भी प्रकट किया — कि जरासंध का जन्म ही एक विचित्र, द्वि-खंडित शरीर के रूप में हुआ था, जिसे एक राक्षसी जरा ने जोड़कर एकीकृत किया, इसीलिए उसका यह नाम पड़ा।
इसी रहस्य के कारण, श्रीकृष्ण ने सुझाव दिया कि जरासंध को विशाल सेना से नहीं, अपितु एक अकेले, द्वंद्व-युद्ध में कुशल, असाधारण बलशाली योद्धा द्वारा ही पराजित किया जा सकता है, क्योंकि जरासंध स्वयं भी एक कुशल, धर्मनिष्ठ मल्ल-योद्धा था, जो कभी किसी ब्राह्मण या द्वंद्व-याचक को निराश नहीं करता था।
यह सुनकर भीमसेन, जिनकी असाधारण गदा-कुशलता सम्पूर्ण भूमंडल में विख्यात थी, ने स्वयं इस दुष्कर कार्य के लिए आगे बढ़ने की इच्छा प्रकट की, श्रीकृष्ण ने उनके इस साहस की प्रशंसा करते हुए यह भी सुझाव दिया कि इस अभियान में स्वयं वे तथा अर्जुन भी भीम के साथ चलेंगे, ताकि आवश्यकता पड़ने पर उचित रणनीति और सहायता उपलब्ध हो सके।
इस अध्याय की शिक्षा
किसी भी विशाल, अजेय प्रतीत होने वाली शक्ति में भी कोई न कोई सूक्ष्म दुर्बलता अवश्य छिपी होती है, जिसे पहचानने के लिए गहन ज्ञान और धैर्य आवश्यक है।
भीम, अर्जुन और कृष्ण का मगध की ओर प्रस्थान
श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन, तीनों ने ब्राह्मणों का वेश धारण किया और गुप्त रूप से मगध की राजधानी गिरिव्रज की ओर प्रस्थान किया, यह वेश इसलिए चुना गया क्योंकि जरासंध अपने राज्य में किसी भी ब्राह्मण अतिथि का सम्मानपूर्वक स्वागत करने के लिए प्रतिबद्ध था, चाहे उसका वास्तविक उद्देश्य कुछ भी क्यों न हो।
गिरिव्रज नगरी, चार विशाल पर्वतों से घिरी हुई, अत्यंत सुरक्षित और दुर्गम थी, इन्हीं पर्वतों में से एक पर स्थित पवित्र चैत्यक स्थल को तीनों ने भेदते हुए, बलपूर्वक नगर में प्रवेश किया, यह इस बात का प्रतीकात्मक संकेत था कि वे साधारण अतिथि नहीं, अपितु किसी विशेष, दृढ़ प्रयोजन से आए हैं।
जरासंध के दरबार में पहुँचकर, तीनों ने स्वयं को ब्राह्मण के रूप में प्रस्तुत किया, किंतु राजा ने उनके बाहुओं पर धनुष की प्रत्यंचा के चिह्न तथा उनकी तेजस्वी, क्षत्रिय-सुलभ मुखाकृति देखकर तत्काल पहचान लिया कि ये कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, अपितु छद्मवेशधारी क्षत्रिय-वीर हैं।
जरासंध के पूछने पर, श्रीकृष्ण ने स्वयं को यदुवंशी, तथा भीम और अर्जुन को कुरुवंशी राजकुमार के रूप में प्रकट किया, और स्पष्ट शब्दों में जरासंध के समक्ष यह आरोप रखा कि उसने अनेक निर्दोष राजाओं को बंदी बनाकर अधर्मपूर्ण कार्य किया है, अतः उन्हें तत्काल मुक्त करना उसका कर्तव्य है, अन्यथा उसे द्वंद्व-युद्ध का सामना करना होगा।
जरासंध, इस चुनौती से तनिक भी विचलित न होकर, गर्वपूर्वक उत्तर दिया कि उसने इन राजाओं को बल से जीता है, और बल से ही वह उन्हें अपने अधीन रखेगा, उसने घोषणा की कि वह अवश्य ही द्वंद्व-युद्ध स्वीकार करेगा, किंतु यह विकल्प भीम, अर्जुन अथवा स्वयं कृष्ण में से किसी एक को चुनने का अधिकार उसे स्वयं दिया जाए।
इस अध्याय की शिक्षा
अधर्म का सामना करने के लिए कभी-कभी अपनी वास्तविक पहचान को छिपाकर, धैर्यपूर्वक शत्रु के गढ़ में प्रवेश करना ही सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण रणनीति सिद्ध होती है।
भीम-जरासंध द्वंद्व-युद्ध एवं वध
जरासंध ने अपने अतिथि-धर्म तथा क्षत्रिय-गौरव का सम्मान करते हुए भीमसेन को द्वंद्व-युद्ध हेतु चुना, यह जानते हुए भी कि यह द्वंद्व अत्यंत भीषण और दीर्घकालिक सिद्ध हो सकता है, क्योंकि भीम की गदा-कुशलता और शारीरिक बल की ख्याति उस तक भी पहुँच चुकी थी।
दोनों महाबली योद्धा, बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के, केवल अपनी भुजाओं के बल पर, तेरह दिनों और रात्रियों तक निरंतर मल्ल-युद्ध करते रहे, एक-दूसरे को भूमि पर पटकते, उठाते और पुनः प्रहार करते हुए, यह युद्ध इतना भीषण था कि सम्पूर्ण गिरिव्रज नगरी की भूमि भी इसके प्रकंपन से काँप उठी।
चौदहवें दिन, भीम, जरासंध के उस गूढ़ रहस्य को स्मरण करते हुए जो श्रीकृष्ण ने उन्हें पूर्व में ही बताया था — कि जरासंध का शरीर वास्तव में दो पृथक् भागों को जोड़कर बना था — कृष्ण की ओर सहायता की दृष्टि से देखा।
श्रीकृष्ण ने, बिना एक शब्द बोले, एक तिनके को अपने हाथों में उठाया और उसे बीच से चीरकर दो विपरीत दिशाओं में फेंक दिया, यह एक गुप्त संकेत था जिसे भीम ने तत्काल समझ लिया।
भीम ने अपने अंतिम, निर्णायक प्रहार में जरासंध के शरीर को कमर से पकड़कर बीच से चीर डाला, और उसके दोनों भागों को विपरीत दिशाओं में फेंक दिया, इस प्रकार जरासंध, जो एक बार दो भागों से जुड़कर जीवित हुआ था, अब उसी विधि से सदा के लिए पराजित होकर प्राणहीन हो गया, इस असाधारण विजय ने सम्पूर्ण भूमंडल में भीमसेन के पराक्रम की गूँज फैला दी।
इस अध्याय की शिक्षा
जिस शत्रु की शक्ति उसके जन्म के ही किसी रहस्य में निहित हो, उसे साधारण शक्ति-प्रदर्शन से नहीं, अपितु उसी गूढ़ सत्य के ज्ञान से ही पराजित किया जा सकता है।
बंदी राजाओं की मुक्ति एवं सहदेव का राज्याभिषेक
जरासंध के वध के तत्काल पश्चात्, श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन ने उस शिव-मंदिर के कारागार में जाकर, वहाँ बंदी बनाए गए सभी अठासी राजाओं को, जो दीर्घकाल से अपनी असहनीय दुर्दशा में शोकाकुल बैठे थे, तत्काल मुक्त किया, यह देखकर वे सभी हर्ष और कृतज्ञता से अभिभूत हो उठे।
इन मुक्त राजाओं ने श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन को अपने उद्धारकर्ता के रूप में भावविह्वल होकर धन्यवाद दिया, और यह घोषणा की कि वे सदैव के लिए युधिष्ठिर के प्रति अपनी कृतज्ञता और निष्ठा से बँधे रहेंगे, इस प्रकार, राजसूय यज्ञ के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा दूर हो गई।
श्रीकृष्ण ने जरासंध के पुत्र सहदेव को, उसके पिता की मृत्यु पर आवश्यक शोक-संस्कार सम्पन्न कराकर, मगध के सिंहासन पर विराजमान किया, यह दर्शाते हुए कि यह विजय व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं, अपितु अधर्म का अंत मात्र थी, नए राजा ने भी तत्काल पांडवों के प्रति अपनी अधीनता स्वीकार की।
मुक्त हुए समस्त राजाओं ने स्वेच्छा से युधिष्ठिर के आगामी राजसूय यज्ञ में सम्मिलित होने तथा अपनी-अपनी ओर से समुचित भेंट और सहयोग देने का वचन दिया, यह पांडवों के लिए एक अभूतपूर्व राजनीतिक और नैतिक विजय सिद्ध हुई।
श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन, इस असाधारण सफलता के साथ इंद्रप्रस्थ लौटे, जहाँ युधिष्ठिर ने अपने भाई और मित्र का हर्षोल्लास के साथ स्वागत किया, अब राजसूय यज्ञ के मार्ग में केवल एक ही कार्य शेष रह गया था — सम्पूर्ण भूमंडल के अन्य राजाओं से भी अधीनता और भेंट प्राप्त करने हेतु दिग्विजय अभियान।
इस अध्याय की शिक्षा
जब अत्याचार का अंत सच्चे न्याय की भावना से किया जाए, न कि व्यक्तिगत प्रतिशोध से, तो वह विजय स्थायी मित्रता और सम्मान में परिणत होती है।
चारों दिशाओं में दिग्विजय का आरम्भ
जरासंध-वध के पश्चात्, युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ की अंतिम, अनिवार्य शर्त पूर्ण करने हेतु — सम्पूर्ण भूमंडल के राजाओं से अधीनता और कर प्राप्त करना — अपने चारों भाइयों को चारों दिशाओं में विजय-अभियान पर भेजने का निश्चय किया, प्रत्येक भाई को एक विशाल, सुसज्जित सेना के साथ प्रस्थान करने का आदेश दिया गया।
अर्जुन को उत्तर दिशा, भीम को पूर्व दिशा, सहदेव को दक्षिण दिशा, तथा नकुल को पश्चिम दिशा की विजय का दायित्व सौंपा गया, यह विभाजन प्रत्येक भाई की विशिष्ट क्षमता और उस दिशा की भौगोलिक-राजनीतिक चुनौतियों को ध्यान में रखकर अत्यंत सोच-समझकर किया गया था।
युधिष्ठिर ने प्रत्येक भाई को यह स्पष्ट निर्देश दिया कि उनका उद्देश्य विनाश या अनावश्यक रक्तपात नहीं, अपितु धर्मपूर्वक अधीनता प्राप्त करना है — जो राजा स्वेच्छा से अधीनता स्वीकार करें, उनके साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार किया जाए, तथा केवल वे ही राजा युद्ध का सामना करें जो अहंकारवश विरोध करें।
इस प्रकार, सम्पूर्ण भूमंडल में एक साथ चार दिशाओं से विजय-अभियान आरम्भ हुआ, प्रत्येक भाई अपने साथ अनुभवी सेनापतियों, कुशल मंत्रियों तथा पर्याप्त सैन्य-बल के साथ प्रस्थित हुआ, यह अभियान महीनों तक चलने वाला था, और इसकी सफलता पर ही राजसूय यज्ञ की सम्पूर्ण भव्यता निर्भर करती थी।
इंद्रप्रस्थ में शेष रह गए युधिष्ठिर, द्रौपदी तथा राजपरिवार के अन्य सदस्य, इस दीर्घकालिक प्रतीक्षा के दौरान, यज्ञ की अन्य आवश्यक तैयारियों में व्यस्त हो गए — विशाल भंडार-गृहों का निर्माण, ऋषियों और ब्राह्मणों को आमंत्रण, तथा आवश्यक सामग्री का संचयन।
इस अध्याय की शिक्षा
एक विशाल लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उत्तरदायित्वों का सुव्यवस्थित, क्षमता-अनुरूप विभाजन ही सफलता की सबसे सुदृढ़ नींव रखता है।
सहदेव की दक्षिण-दिग्विजय
सहदेव, अपनी सेना सहित दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करते हुए, सर्वप्रथम शूरसेन देश के राजाओं को अधीन किया, इसके पश्चात् उन्होंने मत्स्य देश के राजा विराट को, जो पहले से ही पांडवों के प्रति मैत्रीपूर्ण थे, सहज ही अपने पक्ष में सम्मिलित कर लिया।
आगे बढ़ते हुए, सहदेव ने दक्षिणापथ के अनेक शक्तिशाली राज्यों — चेदि, कुंतल, दक्षिण-कोसल, आंध्र, तथा द्रविड़ प्रदेश के राजाओं को क्रमिक रूप से पराजित या मैत्रीपूर्ण संधि द्वारा अधीन किया, प्रत्येक विजय के पश्चात् वे तत्काल विजित राजाओं के प्रति उदारता और सम्मान का व्यवहार करते।
सहदेव को इस अभियान में सर्वाधिक कठिन चुनौती पांड्य और चोल राज्यों के अत्यंत पराक्रमी, समुद्री शक्ति से सम्पन्न राजाओं से मिली, किंतु अपनी असाधारण रणनीति और अटूट धैर्य से उन्होंने इन्हें भी अंततः पराजित कर अपनी अधीनता स्वीकार कराई।
उन्होंने कन्याकुमारी के दक्षिणतम छोर तक पहुँचकर, वहाँ के द्वीपवासी राजाओं से भी भेंट और अधीनता प्राप्त की, यह असाधारण उपलब्धि थी कि उन्होंने बिना किसी अनावश्यक विनाश के, केवल अपने पराक्रम और कूटनीतिक कौशल से सम्पूर्ण दक्षिण भारत को पांडवों के अधीन ला दिया।
अपने इस दीर्घकालिक, सफल अभियान से प्रचुर धन, रत्न, हाथी, तथा अन्य बहुमूल्य भेंटों सहित, सहदेव विजयी होकर इंद्रप्रस्थ लौटे, उनकी यह विजय दक्षिण भारत के भूगोल और राजनीतिक संरचना की गहन समझ का भी प्रमाण थी।
इस अध्याय की शिक्षा
दूरस्थ, अपरिचित प्रदेशों में भी विजय प्राप्त करने के लिए बल से अधिक आवश्यक है भूगोल, संस्कृति और कूटनीति की गहन समझ।
नकुल की पश्चिम-दिग्विजय
नकुल ने पश्चिम दिशा की ओर प्रस्थान करते हुए, सर्वप्रथम मरुभूमि के समीपवर्ती क्षेत्रों तथा शूरसेन के पश्चिमी भागों पर विजय प्राप्त की, उनकी सेना ने अत्यंत कठिन, मरुस्थलीय भूभाग को पार करते हुए भी अपने अनुशासन और साहस को बनाए रखा।
उन्होंने मत्स्य देश के पश्चिमी भाग, तथा वहाँ से आगे सिंधु-सौवीर प्रदेश के शक्तिशाली राजाओं को, जो अपनी युद्ध-कुशलता के लिए विख्यात थे, पराजित कर अपने अधीन किया, यह विजय विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण थी क्योंकि इन प्रदेशों के योद्धा अत्यंत निपुण अश्वारोही थे।
आगे बढ़ते हुए, नकुल ने पंचनद (पंजाब) प्रदेश के अनेक छोटे-बड़े राज्यों को क्रमिक रूप से अधीन किया, तथा अंततः सुदूर पश्चिम में स्थित शक, यवन और पह्लव जैसी विदेशी मूल की जातियों के शासकों से भी भेंट और अधीनता प्राप्त की।
नकुल की इस विजय-यात्रा की विशेषता यह रही कि उन्होंने अपनी असाधारण कूटनीतिक चतुराई से अनेक राज्यों को बिना युद्ध के ही, केवल संधि-प्रस्तावों और पारस्परिक व्यापारिक लाभ के आश्वासन से ही, पांडवों के पक्ष में सम्मिलित कर लिया।
समुद्र-तटीय पश्चिमी प्रदेशों तक पहुँचकर, नकुल ने वहाँ के व्यापारी-प्रधान राज्यों से भी प्रचुर धन और बहुमूल्य वस्तुएँ भेंट स्वरूप प्राप्त कीं, और अपने इस सफल, सुव्यवस्थित अभियान के साथ इंद्रप्रस्थ लौटकर युधिष्ठिर के समक्ष अपनी विजय का विस्तृत वृत्तांत प्रस्तुत किया।
इस अध्याय की शिक्षा
कूटनीति और पारस्परिक लाभ की दृष्टि से की गई विजय, केवल बल-प्रयोग से कहीं अधिक स्थायी और मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करती है।
अर्जुन की उत्तर-दिग्विजय
अर्जुन, अपनी विशाल सेना सहित उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान करते हुए, सर्वप्रथम कुलिंद देश के पर्वतीय राजाओं को पराजित किया, इसके पश्चात् उन्होंने हिमालय की तलहटी में स्थित अनेक छोटे-बड़े राज्यों पर क्रमिक विजय प्राप्त की।
अर्जुन को इस अभियान में सर्वाधिक कठिन युद्ध कश्मीर-प्रदेश तथा पर्वतीय जनजातियों से करना पड़ा, जो अपने दुर्गम भूभाग और असाधारण युद्ध-कौशल के कारण अत्यंत दुर्जेय माने जाते थे, किंतु अर्जुन ने अपने गांडीव धनुष की असाधारण शक्ति से इन्हें भी अंततः पराजित कर दिया।
आगे बढ़ते हुए, उन्होंने त्रिगर्त, दरद तथा कंबोज जैसे शक्तिशाली, युद्धप्रिय राज्यों को भी पराजित किया, इन युद्धों में अनेक अवसरों पर अर्जुन को स्वयं भीषण संकट का सामना करना पड़ा, किंतु उनकी असाधारण धैर्य, कौशल और साहस ने उन्हें प्रत्येक बार विजयी बनाया।
अर्जुन ने अपनी इस दिग्विजय-यात्रा में विशेष रूप से यह ध्यान रखा कि पराजित राजाओं के साथ सदैव सम्मानजनक व्यवहार किया जाए, अनेक अवसरों पर उन्होंने पराजित राजाओं को उनका राज्य वापस लौटाते हुए, केवल भविष्य में युधिष्ठिर की अधीनता स्वीकार करने की शर्त रखी।
सुदूर उत्तर के पर्वतीय क्षेत्रों तक पहुँचकर, अर्जुन ने वहाँ से भी प्रचुर स्वर्ण, अश्व तथा बहुमूल्य रत्न भेंट स्वरूप प्राप्त किए, और अपनी इस असाधारण, गौरवशाली विजय-यात्रा के साथ इंद्रप्रस्थ लौटे, उनकी यह विजय राजसूय यज्ञ की सफलता की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आधारशिलाओं में से एक सिद्ध हुई।
इस अध्याय की शिक्षा
सर्वाधिक दुर्गम और चुनौतीपूर्ण मार्गों पर भी विजय सम्भव है, यदि योद्धा अपने कौशल के साथ-साथ पराजित के प्रति सम्मान भी बनाए रखे।
भीम की पूर्व-दिग्विजय
भीमसेन, पूर्व दिशा की ओर प्रस्थान करते हुए, सर्वप्रथम पंचाल देश के निकटवर्ती क्षेत्रों, तथा वहाँ से आगे गंडक और कोसल प्रदेश के राजाओं को अपने असाधारण बल से पराजित किया, उनकी गदा की गर्जना मात्र से ही अनेक छोटे राज्यों ने बिना युद्ध के ही अधीनता स्वीकार कर ली।
आगे बढ़ते हुए, भीम ने मिथिला, मगध के शेष प्रभावित क्षेत्रों, तथा अंग और वंग देश के शक्तिशाली राजाओं को भी क्रमिक रूप से पराजित किया, इन युद्धों में उनकी असाधारण शारीरिक शक्ति और अजेय गदा-कौशल का पूर्ण प्रदर्शन हुआ।
भीम को इस अभियान में सबसे कठिन युद्ध कर्ण के मित्र, अंग-देश के कुछ शक्तिशाली सामंतों से करना पड़ा, जिन्होंने कर्ण के प्रति अपनी निष्ठा के कारण दीर्घकाल तक प्रतिरोध किया, किंतु अंततः भीम के अजेय बल के समक्ष उन्हें भी झुकना पड़ा।
आगे बढ़ते हुए, भीम ने पुंड्र, ताम्रलिप्ति तथा सुदूर पूर्वी समुद्र-तट के अनेक द्वीपीय राज्यों से भी भेंट और अधीनता प्राप्त की, इन विजयों ने पूर्वी भारत के विशाल भूभाग को पांडवों के प्रभाव-क्षेत्र में ला दिया।
अपनी इस दीर्घकालिक, अत्यंत सफल विजय-यात्रा से प्रचुर धन, गजराज तथा बहुमूल्य वस्तुएँ लेकर, भीमसेन इंद्रप्रस्थ लौटे, इस प्रकार चारों दिशाओं की विजय पूर्ण होने पर, सम्पूर्ण भूमंडल में युधिष्ठिर की सर्वोच्चता निर्विवाद रूप से स्थापित हो गई, अब राजसूय यज्ञ के आयोजन में कोई बाधा शेष नहीं रह गई थी।
इस अध्याय की शिक्षा
जब चारों दिशाओं से अर्जित विजय एक ही धर्मपूर्ण उद्देश्य की सेवा करे, तो वह केवल भूमि का नहीं, अपितु धर्म और न्याय का भी विस्तार बन जाती है।
राजसूय यज्ञ का भव्य आरम्भ
चारों दिशाओं की विजय पूर्ण होने तथा अपार धन-सम्पदा एकत्रित हो जाने पर, युधिष्ठिर ने अपने पुरोहित धौम्य तथा कुलगुरु के परामर्श से राजसूय यज्ञ के शुभ मुहूर्त का निर्धारण किया, और सम्पूर्ण भूमंडल के राजाओं, ऋषियों तथा अपने समस्त कुटुंबीजनों को आमंत्रण भेजा गया।
हस्तिनापुर से धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोणाचार्य, विदुर, दुर्योधन सहित समस्त कौरव-राजकुमार भी इस भव्य यज्ञ में सम्मिलित होने हेतु इंद्रप्रस्थ पधारे, बाह्य रूप से यह एक पारिवारिक उत्सव प्रतीत होता था, किंतु दुर्योधन के हृदय में इस असाधारण वैभव को देखकर ईर्ष्या की अग्नि सुलगने लगी।
यज्ञ के आयोजन की समुचित व्यवस्था हेतु, युधिष्ठिर ने अपने भाइयों और आमंत्रित राजकुमारों को विभिन्न उत्तरदायित्व सौंपे — दुःशासन को भोजन-व्यवस्था, अश्वत्थामा को ब्राह्मणों के सत्कार, संजय को कोष-प्रबंधन, तथा स्वयं भीष्म और द्रोणाचार्य को यज्ञ की समग्र देखरेख का दायित्व दिया गया।
श्रीकृष्ण, जिन्हें स्वयं युधिष्ठिर ने इस भव्य आयोजन का सर्वप्रथम, सर्वोच्च अतिथि माना, इस यज्ञ में द्वारका से पधारे, तथा उनकी उपस्थिति मात्र से सम्पूर्ण वातावरण एक असाधारण दिव्यता से परिपूर्ण हो उठा, यज्ञशाला में यज्ञाग्नि प्रज्वलित होते ही, वेदमंत्रों की गूँज सम्पूर्ण इंद्रप्रस्थ में व्याप्त हो गई।
अनेक दिनों तक चलने वाले इस विशाल यज्ञ में, विधिवत् अभिषेक, दान तथा वैदिक अनुष्ठानों का क्रम अत्यंत सुव्यवस्थित रूप से आगे बढ़ता रहा, प्रत्येक उपस्थित राजा और ऋषि युधिष्ठिर की इस असाधारण उपलब्धि की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उन्हें आशीर्वाद देते रहे।
इस अध्याय की शिक्षा
एक महान उपलब्धि का उत्सव भी, यदि सावधानी न बरती जाए, तो निकटतम सम्बन्धियों के हृदय में भी ईर्ष्या का बीज बो सकता है।
अग्रपूजा हेतु श्रीकृष्ण का चयन
यज्ञ के अंतिम, सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण चरण में, यह निर्णय लिया जाना था कि उपस्थित समस्त राजाओं, ऋषियों और अतिथियों में से किसे सर्वप्रथम, सर्वोच्च पूजा (अग्रपूजा) अर्पित की जाए, यह उस युग की एक अत्यंत सम्मानजनक परम्परा थी, जो प्राप्तकर्ता की सर्वोच्च श्रेष्ठता को मान्यता देती थी।
युधिष्ठिर ने यह उत्तरदायित्व अपने पितामह भीष्म को सौंपा, यह विश्वास करते हुए कि उनकी वयोवृद्धता, अनुभव और निष्पक्षता इस निर्णय को सर्वाधिक उपयुक्त बनाएगी, भीष्म ने गहन विचार के पश्चात् यह घोषणा की कि इस सर्वोच्च सम्मान के सर्वाधिक योग्य पात्र स्वयं श्रीकृष्ण ही हैं।
उन्होंने अपने इस निर्णय का औचित्य समझाते हुए कहा कि श्रीकृष्ण न केवल परम बुद्धिमान, पराक्रमी और यशस्वी हैं, अपितु वे स्वयं सृष्टि, स्थिति और संहार के मूल कारण, साक्षात् परमात्मा हैं, जिनकी कृपा से ही इस यज्ञ सहित सम्पूर्ण भूमंडल की व्यवस्था सुचारु रूप से चल रही है।
समस्त सभा ने भीष्म के इस निर्णय का हर्षपूर्वक समर्थन किया, और सहदेव ने विधिवत् रूप से श्रीकृष्ण के चरण धोकर, उन्हें अर्घ्य और सर्वोच्च पूजा अर्पित की, यह दृश्य देखकर अधिकांश उपस्थित राजा अत्यंत प्रसन्न और श्रद्धानत हुए।
किंतु इसी क्षण, चेदि-नरेश शिशुपाल, जो कृष्ण से पूर्व से ही गहरा, व्यक्तिगत द्वेष रखते थे, इस निर्णय पर क्रोध से आगबबूला हो उठे, और सम्पूर्ण सभा के समक्ष खड़े होकर, इस चयन को खुले शब्दों में अनुचित और अपमानजनक घोषित करने लगे, इसी घटना ने आगे उस भीषण, चौंका देने वाले प्रसंग की पृष्ठभूमि रची जो अगले अध्याय में वर्णित है।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्ची श्रेष्ठता का सम्मान सदैव गुण, चरित्र और कृपा से निर्धारित होना चाहिए, न कि सामाजिक पद या राजनीतिक शक्ति से, भले ही कुछ लोग इससे असहमत हों।
शिशुपाल का घोर अपमान एवं उसका वध
शिशुपाल ने खड़े होकर सम्पूर्ण सभा के समक्ष श्रीकृष्ण की घोर निंदा आरम्भ की, उन्हें एक साधारण ग्वाला, कुल-भ्रष्ट तथा इस सर्वोच्च सम्मान के सर्वथा अयोग्य बताते हुए, उन्होंने भीष्म के निर्णय पर भी कटु आक्षेप लगाए, यह कहते हुए कि एक वृद्ध व्यक्ति की बुद्धि भी कभी-कभी भ्रमित हो सकती है।
समस्त सभा इस अशोभनीय, अपमानजनक वाक्-प्रहार को सुनकर स्तब्ध रह गई, अनेक राजा क्रोधित होकर शिशुपाल का विरोध करने को उद्यत हुए, किंतु स्वयं श्रीकृष्ण ने अत्यंत शांत, धैर्यपूर्ण मुद्रा में उन सबको रोका, यह प्रकट करते हुए कि वे स्वयं इस अपमान से तनिक भी विचलित नहीं हैं।
भीष्म ने सभा को यह गूढ़ रहस्य बताया कि उन्होंने कृष्ण को अपनी बुआ (शिशुपाल की माता) को यह वचन दिया था कि वे उनके पुत्र के एक सौ अपराध क्षमा करेंगे, और शिशुपाल अब तक अपने अनगिनत अपराधों में से अधिकांश पूर्ण कर चुका था, अतः सभा को धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करने का परामर्श दिया गया।
शिशुपाल, अपने अपमानजनक वचनों में और भी अधिक उग्र होता गया, यहाँ तक कि उसने द्रौपदी और युधिष्ठिर के विषय में भी अत्यंत अशोभनीय टिप्पणियाँ कर डालीं, यह देखकर उपस्थित समस्त सभा में एक असहनीय तनाव व्याप्त हो गया।
जैसे ही शिशुपाल ने अपना एक सौ एकवाँ अपमानजनक अपराध पूर्ण किया, श्रीकृष्ण ने, अपना वचन पूर्ण करते हुए, बिना क्रोध या आवेश के, अपने दिव्य सुदर्शन चक्र का आवाहन किया, जिसने क्षण भर में शिशुपाल का शिरच्छेद कर दिया, उसका शरीर भूमि पर गिरते ही, समस्त सभा भय और विस्मय से स्तब्ध रह गई, किंतु सभी ने यह भी माना कि यह न्याय ही था, अन्याय नहीं।
इस अध्याय की शिक्षा
क्षमाशीलता की भी एक सीमा होती है, जब अपमान बार-बार, बिना किसी पश्चाताप के दोहराया जाए, तो न्याय का प्रवर्तन ही एकमात्र, अनिवार्य मार्ग शेष रहता है।
यज्ञ की पूर्णता एवं दुर्योधन का मयसभा-भ्रमण
शिशुपाल-वध की इस चौंका देने वाली घटना के पश्चात्, सभा शांत हुई और राजसूय यज्ञ अपने शेष अनुष्ठानों के साथ अत्यंत सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ, युधिष्ठिर औपचारिक रूप से चक्रवर्ती सम्राट घोषित किए गए, और उन्हें अवभृथ-स्नान द्वारा यज्ञ की पूर्णता का पावन आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
यज्ञ की समाप्ति के पश्चात्, आमंत्रित राजा और अतिथि धीरे-धीरे अपने-अपने राज्यों को विदा होने लगे, किंतु दुर्योधन तथा उनके मामा शकुनि ने इंद्रप्रस्थ में कुछ और दिन रुकने का निश्चय किया, यह अवसर उन्हें उस अद्भुत मयसभा को विस्तार से देखने का भी मिला जिसकी ख्याति सम्पूर्ण भूमंडल में फैल चुकी थी।
दुर्योधन, जो पहले से ही पांडवों के इस असाधारण वैभव, समृद्धि और यश से भीतर-ही-भीतर जल रहे थे, जब मयसभा के उन माया-पूर्ण स्फटिक-फर्शों और जल-सरोवरों के मध्य विचरण करने लगे, उनकी यह ईर्ष्या और भी अधिक तीव्र होती गई, प्रत्येक कक्ष, प्रत्येक अलंकरण उन्हें अपनी तुलना में हस्तिनापुर की अल्पता का आभास कराता रहा।
इसी भ्रमण के दौरान, एक ऐसा स्थान आया जहाँ स्फटिक-निर्मित फर्श इतना पारदर्शी और जल के समान चमकीला था कि दुर्योधन ने, इसे वास्तविक जल समझकर, अपने वस्त्रों को ऊपर उठा लिया, यह सोचते हुए कि वे जल में प्रवेश करने वाले हैं।
ठीक इसके विपरीत, कुछ ही दूरी पर, एक वास्तविक जल-सरोवर स्फटिक-फर्श के समान प्रतीत हो रहा था, और दुर्योधन, इसे ठोस भूमि समझकर आगे बढ़े, इस भ्रम में वे सीधे उस जल-सरोवर में जा गिरे, अपने वस्त्रों सहित पूर्णतः भीगकर, यह दृश्य देखकर सभा में उपस्थित द्रौपदी और अन्य लोग हँसी रोक न सके।
इस अध्याय की शिक्षा
जो हृदय पहले से ही ईर्ष्या की अग्नि में जल रहा हो, उसके लिए एक साधारण, अनजाने में हुई भूल भी असहनीय अपमान का रूप ले सकती है।
दुर्योधन का घोर अपमान एवं द्रौपदी की हँसी
दुर्योधन, जल में भीगकर, अपने वस्त्रों सहित उठते हुए, अत्यंत लज्जित और अपमानित अनुभव कर रहे थे, इसी क्षण, भीमसेन तथा उपस्थित अन्य सेवकगण भी अपनी हँसी को नियंत्रित नहीं कर सके, उनकी यह हँसी दुर्योधन के हृदय में एक असहनीय, चुभने वाली शूल के समान चुभ गई।
इस पूरे प्रसंग में सबसे अधिक पीड़ादायक था द्रौपदी का वह उपहासपूर्ण स्वर, जिसने, कुछ अन्य दासियों के साथ मिलकर, दुर्योधन की इस भूल पर खुलकर हँसते हुए यह कटाक्ष किया कि "अंधे का पुत्र भी अंधा ही होता है" — यह टिप्पणी सीधे तौर पर धृतराष्ट्र के दृष्टिहीन होने पर एक क्रूर व्यंग्य थी।
दुर्योधन, इस अपमान से भीतर तक आहत होकर, तत्काल मौन होकर वहाँ से प्रस्थान कर गए, बाह्य रूप से उन्होंने कुछ नहीं कहा, किंतु उनके हृदय में यह अपमान, पांडवों के प्रति उनकी पूर्व-स्थापित ईर्ष्या के साथ मिलकर, एक ऐसी असहनीय, विषैली अग्नि में परिवर्तित हो गया जो अब किसी भी मूल्य पर शांत होने वाली नहीं थी।
मार्ग में, शकुनि ने अपने भांजे की इस पीड़ा को भाँपते हुए, उससे इसका कारण पूछा, दुर्योधन ने अत्यंत क्षोभ और वेदना के साथ अपने इस अपमान तथा पांडवों की असाधारण समृद्धि से उत्पन्न अपनी गहन ईर्ष्या का सम्पूर्ण वृत्तांत सुनाया, यह स्वीकार करते हुए कि वे अब रात्रि में शांति से सो भी नहीं पा रहे।
इसी क्षण से, दुर्योधन के मन में पांडवों को किसी भी मूल्य पर नष्ट करने अथवा उनकी सम्पूर्ण सम्पदा छीन लेने का दृढ़, अटल संकल्प जन्म ले चुका था, यह वही निर्णायक क्षण था जिसने आगे चलकर उस भीषण द्यूत-क्रीड़ा की पृष्ठभूमि रची जो सम्पूर्ण भरतवंश को महाविनाश की ओर ले जाएगी।
इस अध्याय की शिक्षा
एक क्षणिक उपहास, चाहे वह कितना भी सहज या अनजाने में क्यों न किया गया हो, किसी पहले से घायल हृदय में ऐसी स्थायी विषाक्तता उत्पन्न कर सकता है जिसके परिणाम पीढ़ियों तक भुगतने पड़ते हैं।
शकुनि की द्यूत-योजना
हस्तिनापुर लौटने पर, दुर्योधन इतने गहन विषाद और ईर्ष्या में डूब गए कि उन्होंने भोजन और निद्रा तक त्याग दी, धृतराष्ट्र, अपने पुत्र की इस असामान्य दशा से चिंतित होकर, उनसे इसका कारण पूछने लगे, यद्यपि वे स्वयं भी भलीभाँति जानते थे कि यह पांडवों की समृद्धि से उत्पन्न ईर्ष्या का ही परिणाम है।
दुर्योधन ने अपने पिता के समक्ष खुलकर स्वीकार किया कि वे युधिष्ठिर के उस असाधारण वैभव, मयसभा के दिव्य सौंदर्य, तथा राजसूय यज्ञ में प्राप्त उनके सर्वोच्च सम्मान को सहन नहीं कर पा रहे, उन्होंने यहाँ तक कह डाला कि इस असहनीय ईर्ष्या से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय या तो पांडवों का सम्पूर्ण विनाश है, अथवा स्वयं का प्राणोत्सर्ग।
शकुनि, जो स्वयं भी गांधार-नरेश की पराजय और अपमान का पांडवों तथा कुरुवंश से गहरा प्रतिशोध रखते थे, इस अवसर का लाभ उठाते हुए, दुर्योधन के समक्ष एक कुटिल किंतु प्रभावी योजना प्रस्तुत की — प्रत्यक्ष युद्ध में पांडवों को पराजित करना असम्भव है, क्योंकि भीम और अर्जुन जैसे अजेय योद्धा उनके पक्ष में हैं, किंतु द्यूत-क्रीड़ा (पासों का जुआ) में युधिष्ठिर को पराजित करना अत्यंत सरल है।
शकुनि ने प्रकट किया कि वे स्वयं पासों के खेल में असाधारण निपुण हैं, तथा उनके पास एक ऐसे विशेष पासे भी हैं जो उनकी इच्छानुसार ही परिणाम देते हैं, उन्होंने यह भी बताया कि युधिष्ठिर, यद्यपि परम धर्मात्मा हैं, फिर भी द्यूत-क्रीड़ा के प्रति उनकी एक सहज, दुर्बल आसक्ति है, जिसे कुशलता से उपयोग में लाया जा सकता है।
धृतराष्ट्र, यद्यपि आरम्भ में इस कुटिल योजना पर संकोच व्यक्त करते रहे, अपने पुत्र-मोह में अंधे होकर, अंततः विदुर की गंभीर आपत्तियों की अनदेखी करते हुए, इस षड्यंत्र को स्वीकृति दे बैठे, तथा युधिष्ठिर को द्यूत-क्रीड़ा हेतु हस्तिनापुर आमंत्रित करने का आदेश दिया गया।
इस अध्याय की शिक्षा
जब पितृ-स्नेह विवेक पर हावी हो जाता है, तो वह अपने ही पुत्र को विनाशकारी मार्ग पर बढ़ने से रोकने के बजाय, स्वयं उस विनाश का साधन बन जाता है।
युधिष्ठिर को द्यूत-निमंत्रण
विदुर को यह अत्यंत अप्रिय दायित्व सौंपा गया कि वे स्वयं इंद्रप्रस्थ जाकर युधिष्ठिर को धृतराष्ट्र की ओर से द्यूत-क्रीड़ा हेतु हस्तिनापुर आने का निमंत्रण दें, विदुर, इस समस्त षड्यंत्र से पूर्णतः अवगत होते हुए भी, राजाज्ञा का उल्लंघन करने में असमर्थ थे।
इंद्रप्रस्थ पहुँचकर, विदुर ने अत्यंत भारी हृदय से युधिष्ठिर को यह निमंत्रण सुनाया, साथ ही अपनी गहन चिंता और आशंका भी स्पष्ट शब्दों में व्यक्त की, यह चेतावनी देते हुए कि यह द्यूत-क्रीड़ा निश्चय ही किसी अशुभ, विनाशकारी उद्देश्य से आयोजित की जा रही है।
युधिष्ठिर, यद्यपि विदुर की इस चेतावनी की गंभीरता को भलीभाँति समझते थे, फिर भी उन्होंने यह उत्तर दिया कि एक वयोवृद्ध, सम्मानित कुल-गुरु के आमंत्रण को अस्वीकार करना धर्म-विरुद्ध होगा, तथा साथ ही उन्होंने द्यूत-क्रीड़ा को स्वयं में एक क्षत्रिय के लिए स्वीकार्य, पारम्परिक क्रीड़ा भी माना, यद्यपि वे स्वयं इसमें अत्यंत अनाड़ी थे।
युधिष्ठिर ने यह भी स्वीकार किया कि विधाता की इच्छा के समक्ष मनुष्य असहाय है, तथा यदि यह द्यूत-क्रीड़ा नियति का ही कोई अंश है, तो इससे बचना असम्भव है, इसी भाग्यवादी, किंतु धर्मसम्मत तर्क के साथ, उन्होंने हस्तिनापुर जाने का निश्चय किया।
द्रौपदी सहित अपने समस्त भाइयों और परिजनों के साथ, युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर की ओर प्रस्थान किया, इंद्रप्रस्थ के प्रजाजनों तथा स्वयं द्रौपदी के मन में भी एक अस्पष्ट, गहन अशुभ आशंका व्याप्त थी, यद्यपि कोई भी इस आसन्न विपत्ति की वास्तविक भयावहता की कल्पना नहीं कर सका था।
इस अध्याय की शिक्षा
कर्तव्य और परम्परा के प्रति सम्मान कभी-कभी विवेक की उस आंतरिक चेतावनी को भी दबा देता है जो किसी आसन्न संकट का स्पष्ट संकेत दे रही होती है।
द्यूत-क्रीड़ा का आरम्भ
हस्तिनापुर की उसी भव्य सभा में, जहाँ कभी पांडवों का सम्मानपूर्वक स्वागत हुआ करता था, अब वह विनाशकारी द्यूत-क्रीड़ा आरम्भ हुई, भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य तथा विदुर सहित समस्त वयोवृद्ध और सम्मानित सभासद इस सभा में उपस्थित थे, किंतु कोई भी इस अन्यायपूर्ण खेल को रोकने का साहस न जुटा सका।
शकुनि ने यह प्रस्ताव रखा कि चूँकि दुर्योधन को स्वयं द्यूत-क्रीड़ा में कोई विशेष रुचि नहीं, अतः वे स्वयं युधिष्ठिर के साथ खेलेंगे, दुर्योधन की ओर से केवल दाँव की वस्तुएँ आतीं, किंतु पासे शकुनि के ही हाथों में रहते, यह इस समस्त षड्यंत्र की सबसे कुटिल चाल थी।
युधिष्ठिर ने पहला दाँव अपने बहुमूल्य आभूषणों से आरम्भ किया, और शकुनि के इशारे पर चलने वाले उन कपटपूर्ण पासों ने तत्काल दुर्योधन के पक्ष में परिणाम दिया, युधिष्ठिर, अपनी हार से अप्रभावित रहते हुए, अगले, और भी बड़े दाँव की घोषणा करते गए।
एक के पश्चात् एक, युधिष्ठिर अपना स्वर्ण-भंडार, अपने रथ, अपने सेवक-सेविकाएँ, अपनी गौशालाएँ, तथा अपना अपार धन-वैभव हारते चले गए, विदुर सहित उपस्थित अनेक सभासद बार-बार उन्हें इस विनाशकारी खेल को तत्काल रोकने का अनुरोध करते रहे, किंतु द्यूत की उस अजीब, मादक आसक्ति में युधिष्ठिर स्वयं को रोक नहीं पाए।
जब उनका सम्पूर्ण चल-अचल धन समाप्त हो गया, युधिष्ठिर ने अपने दास-दासियों को दाँव पर लगाया, और उन्हें भी हार गए, इसके पश्चात्, बिना एक क्षण रुके, उन्होंने अपने भाइयों — नकुल, सहदेव, अर्जुन और अंततः स्वयं भीमसेन को भी, एक-एक कर दाँव पर लगाना आरम्भ कर दिया, यह दृश्य देखकर सम्पूर्ण सभा में स्तब्धता और भय व्याप्त हो गया।
इस अध्याय की शिक्षा
द्यूत की आसक्ति एक ऐसा मादक भ्रम रचती है जिसमें बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति भी विवेक खोकर अपने सर्वस्व को क्रमिक रूप से नष्ट करने के मार्ग पर बढ़ता चला जाता है।
युधिष्ठिर स्वयं को एवं द्रौपदी को दाँव पर लगाते हैं
अपने चारों भाइयों को भी हार जाने के पश्चात्, युधिष्ठिर, अब अपने पास दाँव पर लगाने के लिए कुछ भी शेष न पाकर, अंततः स्वयं को ही दाँव पर लगा बैठे, शकुनि के कपटपूर्ण पासों ने इस बार भी वही परिणाम दिया, और युधिष्ठिर स्वयं भी दुर्योधन के दास बन गए।
सभा में उपस्थित समस्त गणमान्य जन — भीष्म, द्रोण, विदुर, कृपाचार्य — गहन वेदना और लज्जा से मौन बैठे रहे, कोई भी इस अन्यायपूर्ण खेल को रोकने का साहस नहीं जुटा सका, यह उस युग की एक कटु सच्चाई थी कि राजसभा की मर्यादा और परम्पराएँ कभी-कभी स्पष्ट अन्याय के समक्ष भी मूक बनी रह जाती थीं।
शकुनि, इस बिंदु पर भी संतुष्ट न होकर, अत्यंत कुटिल मुस्कान के साथ युधिष्ठिर को उकसाने लगा कि अभी भी एक अंतिम, अमूल्य वस्तु शेष है जिसे वे दाँव पर लगा सकते हैं — स्वयं महारानी द्रौपदी।
युधिष्ठिर, द्यूत की उस विचित्र, विवेक-हरण करने वाली मादकता में इतने गहरे डूब चुके थे कि उन्होंने, बिना अपने इस निर्णय के भयावह परिणामों पर विचार किए, द्रौपदी को भी दाँव पर लगा दिया, यह सुनते ही सम्पूर्ण सभा में एक असहनीय स्तब्धता और गहन क्षोभ की लहर दौड़ गई।
शकुनि ने पासे फेंके, और एक बार पुनः वही निर्णायक, कपटपूर्ण परिणाम आया — युधिष्ठिर, स्वयं की, अपने चारों भाइयों की, तथा अंततः द्रौपदी की भी हार गए, दुर्योधन का हर्ष अब अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका था, और उसने तत्काल विदुर को आदेश दिया कि द्रौपदी को तत्काल सभा में बुलाया जाए।
इस अध्याय की शिक्षा
जब आसक्ति विवेक पर पूर्णतः हावी हो जाती है, तो वह न केवल स्वयं के, अपितु अपने सबसे प्रिय, सम्मानित सम्बन्धों के भी विनाश का कारण बन सकती है।
द्रौपदी का चीरहरण एवं भरी सभा में अपमान
विदुर ने, इस अधर्मपूर्ण आदेश का पालन करने से स्पष्ट इनकार करते हुए, दुर्योधन को गंभीरता से चेताया कि द्रौपदी को इस प्रकार सभा में बुलाना घोर अधर्म और विनाशकारी परिणामों को आमंत्रित करना होगा, किंतु क्रोधित दुर्योधन ने विदुर की इस चेतावनी को पूर्णतः अनसुना कर दिया।
दुर्योधन ने अपने भाई दुःशासन को आदेश दिया कि वह स्वयं जाकर द्रौपदी को, उनके केशों को पकड़कर ही सही, बलपूर्वक सभा में खींच लाए, दुःशासन, इस क्रूर आदेश का तत्काल पालन करते हुए, अंतःपुर में जाकर, रजस्वला अवस्था में एकवस्त्रा द्रौपदी को उनके केशों से पकड़कर, बलपूर्वक भरी सभा में घसीट लाया।
द्रौपदी, इस असहनीय अपमान के मध्य भी, अपनी अद्भुत गरिमा और साहस के साथ, सभा में उपस्थित समस्त वयोवृद्ध, ज्ञानी सभासदों से यह गंभीर, तीक्ष्ण प्रश्न पूछा — कि जब युधिष्ठिर स्वयं को ही दाँव पर लगाकर पहले ही अपनी स्वतंत्रता खो चुके थे, तो क्या उन्हें उसके पश्चात् उसे दाँव पर लगाने का कोई वैध अधिकार भी शेष रह गया था?
यह गूढ़, धर्मसम्मत प्रश्न सुनकर, भीष्म सहित समस्त सभा गहन असमंजस में पड़ गई, भीष्म ने स्वयं स्वीकार किया कि यह प्रश्न अत्यंत जटिल है, तथा धर्म का मार्ग कभी-कभी इतना सूक्ष्म हो जाता है कि उसे पूर्ण निश्चितता से नहीं समझाया जा सकता, किंतु इस असमंजस के मध्य भी, उन्होंने द्रौपदी को इस अपमान से बचाने हेतु कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
अंततः, दुःशासन ने, दुर्योधन के इशारे पर, द्रौपदी के वस्त्र उतारने का अत्यंत निर्लज्ज प्रयास आरम्भ किया, द्रौपदी, असहाय होकर, अपने पाँचों पतियों की ओर, तथा भीष्म-द्रोण की ओर सहायता की गिड़गिड़ाती दृष्टि से देखती रही, किंतु जब उसे कहीं से भी सहायता की कोई आशा दिखाई न दी, तो उसने अपने हृदय की सम्पूर्ण भक्ति और शरणागति के साथ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का आवाहन किया।
इस अध्याय की शिक्षा
जब मनुष्यों की सम्पूर्ण सभा भी न्याय करने में असमर्थ हो जाए, तो एक सच्चे, निष्कपट हृदय की अंतिम, सच्ची शरण केवल स्वयं भगवान ही रह जाते हैं।
श्रीकृष्ण द्वारा द्रौपदी की लाज की रक्षा
द्रौपदी की इस हृदयविदारक, सच्चे हृदय की पुकार को सुनते ही, यद्यपि श्रीकृष्ण स्वयं इस सभा में शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं थे, अपने भक्त की इस असहनीय पीड़ा को अपनी दिव्य शक्ति से तत्काल अनुभव करते हुए, उन्होंने अदृश्य रूप से द्रौपदी के वस्त्र को अनंत रूप से विस्तारित करना आरम्भ कर दिया।
दुःशासन, द्रौपदी के वस्त्र को खींचते-खींचते थककर हाँफने लगा, किंतु चाहे वह कितना भी वस्त्र खींचता, द्रौपदी का शरीर सदैव एक नए, अंतहीन वस्त्र से पूर्णतः आच्छादित रहता, वस्त्रों का यह विशाल पर्वत अंततः सभा के मध्य ही एकत्रित हो गया, दुःशासन, थककर तथा इस चमत्कार से भयभीत होकर, अंततः यह प्रयास त्यागने को विवश हुआ।
यह असाधारण, चमत्कारिक दृश्य देखकर सम्पूर्ण सभा विस्मय और श्रद्धा से स्तब्ध रह गई, भीमसेन, जो इस पूरे प्रसंग के दौरान क्रोध से काँप रहे थे, ने अपने भाई युधिष्ठिर के धैर्य पर तीव्र आक्षेप लगाते हुए, यह भीषण प्रतिज्ञा ली कि वे एक दिन दुःशासन की छाती चीरकर उसका रक्त पिएँगे, तथा दुर्योधन की जंघा को अपनी गदा से चूर-चूर करेंगे।
इसी क्षण, विदुर सहित कुछ अन्य वयोवृद्ध सभासदों ने भी, गांधारी के तत्काल हस्तक्षेप और दुर्योधन को समझाने के अनुरोध के साथ, अंतःपुर में सूचना भिजवाई, गांधारी, अपनी दिव्य दृष्टि से इस समस्त अधर्म को पहचानते हुए, अत्यंत क्रोधित और व्यथित होकर सभा की ओर दौड़ीं।
इसी दौरान, अनेक अशुभ संकेत भी प्रकट होने लगे — सियारों का रुदन, गीदड़ों की भयंकर हुँकार — जिन्हें देखकर स्वयं धृतराष्ट्र भी भयभीत हो उठे, यह अनुभव करते हुए कि उनके पुत्र का यह अधर्मपूर्ण कृत्य अब सम्पूर्ण कुरुवंश के लिए किसी महाविनाश को आमंत्रित कर रहा है।
इस अध्याय की शिक्षा
जब कोई भक्त पूर्ण, निश्छल शरणागति के साथ भगवान को पुकारता है, तो दूरी, समय अथवा सभा की असहायता, कुछ भी उसकी रक्षा के मार्ग में बाधा नहीं बन सकता।
धृतराष्ट्र का हस्तक्षेप एवं द्रौपदी को वरदान
इन अशुभ संकेतों तथा गांधारी के गहन क्षोभ से भयभीत होकर, धृतराष्ट्र ने अंततः स्वयं हस्तक्षेप किया, उन्होंने द्रौपदी को अत्यंत स्नेहपूर्ण शब्दों में सम्बोधित करते हुए, इस अधर्मपूर्ण घटना के लिए क्षमा माँगी, तथा उसे प्रसन्न करने हेतु कोई भी वरदान माँगने को कहा।
द्रौपदी ने, अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता और संयम का परिचय देते हुए, अपने लिए स्वयं कुछ भी माँगने के बजाय, सर्वप्रथम केवल यही वरदान माँगा कि युधिष्ठिर को दासत्व से मुक्त किया जाए, ताकि उनका ज्येष्ठ पुत्र कभी किसी के समक्ष दास न कहलाए।
धृतराष्ट्र ने तत्काल यह वरदान प्रदान करते हुए, उससे एक और वरदान माँगने का अनुरोध किया, द्रौपदी ने इस बार शेष चारों पांडवों तथा उनके रथ, अस्त्र-शस्त्र सहित सम्पूर्ण मुक्ति की याचना की, यह वरदान भी तत्काल स्वीकृत हुआ।
जब धृतराष्ट्र ने तीसरा वरदान माँगने का पुनः आग्रह किया, द्रौपदी ने अत्यंत गरिमापूर्ण संयम के साथ यह कहते हुए इनकार कर दिया कि लोभ धर्म का नाश करता है, तथा उसने पहले ही दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण वरदानों से अपने पतियों की सम्पूर्ण मुक्ति और सम्मान प्राप्त कर लिया है, इससे अधिक माँगना अनुचित होगा।
इस प्रकार, धृतराष्ट्र ने पांडवों का सम्पूर्ण खोया हुआ राज्य, धन और सम्मान भी उन्हें वापस लौटाया, तथा उन्हें शांतिपूर्वक इंद्रप्रस्थ लौट जाने की अनुमति दी, यद्यपि यह प्रतीत होता था कि यह भीषण संकट अंततः शुभ रूप से समाप्त हुआ, किंतु दुर्योधन के हृदय में यह पराजय और भी अधिक गहन प्रतिशोध की अग्नि प्रज्वलित कर चुकी थी।
इस अध्याय की शिक्षा
संकट के गहनतम क्षण में भी संयम और विवेकपूर्ण संतोष बनाए रखना, लोभ में बहकर अधिक माँगने से कहीं अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण और फलदायी सिद्ध होता है।
दुर्योधन का पुनः द्यूत हेतु आग्रह
पांडवों के इंद्रप्रस्थ की ओर प्रस्थान करते ही, दुर्योधन, अपने पिता के इस निर्णय से अत्यंत क्षुब्ध और असंतुष्ट होकर, पुनः धृतराष्ट्र के समक्ष उपस्थित हुए, उन्होंने अत्यंत तीव्र स्वर में यह तर्क दिया कि पांडवों को इस प्रकार मुक्त कर देना अत्यंत अदूरदर्शितापूर्ण निर्णय था, क्योंकि अब वे निश्चय ही प्रतिशोध की भावना से भर उठेंगे।
शकुनि ने इसी अवसर का लाभ उठाते हुए एक अंतिम, और भी अधिक कुटिल प्रस्ताव रखा — कि युधिष्ठिर को एक बार पुनः द्यूत-क्रीड़ा हेतु आमंत्रित किया जाए, इस बार यह शर्त रखी जाए कि जो भी पक्ष हारे, उसे बारह वर्षों का वनवास तथा तेरहवाँ वर्ष अज्ञातवास में व्यतीत करना होगा, और यदि अज्ञातवास के दौरान उन्हें पहचान लिया गया, तो पुनः बारह वर्षों का वनवास भोगना होगा।
यह प्रस्ताव इस दुष्ट आशा से रचा गया था कि इतने दीर्घकालिक वनवास और अज्ञातवास के मध्य, पांडव स्वयं ही किसी अनहोनी का शिकार हो जाएँगे, अथवा उनकी शक्ति और प्रभाव इतने क्षीण हो जाएँगे कि वे कभी पुनः अपने राज्य पर दावा करने योग्य ही नहीं रहेंगे।
धृतराष्ट्र, यद्यपि आरम्भ में इस पुनः-आमंत्रण के विनाशकारी परिणामों से भलीभाँति अवगत थे, फिर भी अपने पुत्र-मोह और शकुनि के कुटिल तर्कों के समक्ष एक बार पुनः विवश होकर झुक गए, तथा उन्होंने प्रतिहारी को पुनः इंद्रप्रस्थ भेजकर युधिष्ठिर को इस दूसरे द्यूत हेतु आमंत्रित करने का आदेश दिया।
इस बार भी, युधिष्ठिर, अपने उसी धर्मसम्मत, किंतु घातक विश्वास के साथ कि एक क्षत्रिय को द्यूत-क्रीड़ा के निमंत्रण को अस्वीकार नहीं करना चाहिए, तथा भाग्य के लेख को टाला नहीं जा सकता, इस दूसरे, अंतिम द्यूत के लिए भी हस्तिनापुर लौट आए, यह जानते हुए भी कि इसके परिणाम पहले से कहीं अधिक भयंकर हो सकते हैं।
इस अध्याय की शिक्षा
एक बार अनुभव किए गए संकट से पर्याप्त शिक्षा न लेना, तथा उसी विनाशकारी मार्ग पर पुनः लौटना, विवेक की सबसे गहन पराजय है।
दूसरा द्यूत एवं वनवास की शर्त
दूसरी द्यूत-क्रीड़ा में, शकुनि के वही कपटपूर्ण पासे पुनः निर्णायक सिद्ध हुए, और युधिष्ठिर, इस पूर्व-निर्धारित शर्त के अनुसार, स्वयं तथा अपने चारों भाइयों सहित, इस बार भी पराजित हो गए, इस प्रकार पांडवों को अब बारह वर्षों का कठोर वनवास तथा तेरहवाँ वर्ष अज्ञातवास में व्यतीत करना अनिवार्य हो गया।
पांडव, अपनी इस पराजय को पूर्ण गरिमा और धैर्य के साथ स्वीकार करते हुए, अपने राजसी वस्त्रों के स्थान पर तपस्वियों के वल्कल-वस्त्र धारण किए, और द्रौपदी सहित, इंद्रप्रस्थ का अपना सम्पूर्ण वैभवशाली राज्य त्यागकर, वन की ओर प्रस्थान की तैयारी करने लगे।
इसी अवसर पर, भीमसेन, अर्जुन और द्रौपदी ने, अपने हृदय में उबल रहे गहन क्रोध और प्रतिशोध की भावना को, सभा के समक्ष ही, अत्यंत गंभीर, भीषण प्रतिज्ञाओं के रूप में व्यक्त किया — भीम ने दुःशासन-वध तथा दुर्योधन की जंघा भंग करने की, तथा अर्जुन ने कर्ण के अंत की प्रतिज्ञा दोहराई।
विदुर, भीष्म और द्रोणाचार्य सहित समस्त वयोवृद्ध सभासद, इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को असहाय, गहन वेदना के साथ देखते रहे, वे भलीभाँति जानते थे कि यह द्यूत-क्रीड़ा तथा इससे उत्पन्न वनवास, सम्पूर्ण भरतवंश को अंततः उस भीषण, विनाशकारी युद्ध की ओर ले जाएगा जिसे अब कोई भी टाल नहीं सकता।
पांडव, द्रौपदी सहित, हस्तिनापुर की प्रजा के करुण, अश्रुपूरित विदाई-समारोह के मध्य, वन की ओर प्रस्थान कर गए, इस प्रकार सभा पर्व, इस गहन, हृदयविदारक शिक्षा के साथ अपने समापन पर पहुँचता है कि अधर्म, चाहे वह कितने भी कुशल छल-कपट से रचा जाए, अंततः धर्म के मार्ग को केवल विलंबित कर सकता है, समाप्त नहीं, तथा आगामी वन पर्व में पांडवों के इसी वनवास-काल की अनेक शिक्षाप्रद, गहन कथाओं का वर्णन किया जाएगा।
इस अध्याय की शिक्षा
अधर्म चाहे कितने भी कुशल छल से रचा जाए, वह धर्म के मार्ग को केवल विलंबित कर सकता है, समाप्त कभी नहीं कर सकता, अंततः न्याय की पुनर्स्थापना निश्चित है।
