स्त्री पर्व

स्त्री पर्व

युद्धभूमि में गांधारी, कुंती एवं अन्य स्त्रियों का करुण विलाप, तथा गांधारी का श्रीकृष्ण को दिया गया वह शाप जो आगे यदुवंश-नाश का कारण बनेगा।

अध्याय 1

धृतराष्ट्र का गहन शोक

अठारह दिनों तक चले इस भीषण महासंग्राम के समापन तथा अपने समस्त सौ पुत्रों की मृत्यु के इस अत्यंत हृदयविदारक समाचार को सुनकर, अंधे राजा धृतराष्ट्र, गहन शोक और असहनीय पीड़ा से पूर्णतः टूट गए, तथा उनकी अंतरात्मा एक भीषण विलाप में डूब गई।

संजय, जिन्हें महर्षि व्यास से प्राप्त दिव्य दृष्टि के माध्यम से इस सम्पूर्ण युद्ध का प्रत्यक्ष वर्णन करने का दायित्व मिला था, अब धृतराष्ट्र के समक्ष, अत्यंत धैर्य और करुणा के साथ, उन्हें इस अंतिम, त्रासद परिणाम से अवगत कराने लगे।

विदुर, अपने ज्येष्ठ भ्राता धृतराष्ट्र के इस असहनीय शोक को शांत करने हेतु, उन्हें जीवन, मृत्यु तथा नियति की उस गहन, शाश्वत सच्चाई का स्मरण कराते हुए, यह समझाने का प्रयास करने लगे कि यह विनाश, धृतराष्ट्र के अपने ही पुत्र-मोह और अनेक भूलों का अनिवार्य परिणाम था।

धृतराष्ट्र, अपने भीतर संचित इस असहनीय शोक तथा साथ ही, पांडवों के प्रति एक गहन, छिपे हुए क्रोध के मध्य, अत्यंत जटिल मनोदशा में, हस्तिनापुर से युद्धभूमि की ओर, अपने समस्त परिजनों सहित प्रस्थान करने का निश्चय किया।

इस प्रकार, इस भीषण युद्ध की समाप्ति के पश्चात्, अब उस अत्यंत करुण, हृदयविदारक अध्याय का आरम्भ होने वाला था, जिसमें युद्धभूमि पर एकत्रित होकर, समस्त स्त्रियाँ अपने प्रियजनों की मृत्यु पर विलाप करेंगी।

इस अध्याय की शिक्षा

गहन शोक के क्षण में भी, नियति की उस शाश्वत सच्चाई को स्वीकार करना ही, अंततः शांति की ओर ले जाने वाला एकमात्र मार्ग है।

अध्याय 2

लौह-प्रतिमा की घटना

युधिष्ठिर तथा शेष पांडव, अपने ज्येष्ठ, अंधे चाचा धृतराष्ट्र से भेंट करने तथा उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु, अत्यंत विनम्रता और सम्मान के साथ, उनके समक्ष उपस्थित हुए, यह न जानते हुए कि धृतराष्ट्र के हृदय में अभी भी कितना गहरा क्रोध छिपा हुआ है।

श्रीकृष्ण, अपनी असाधारण दूरदर्शिता से, धृतराष्ट्र के इस छिपे हुए क्रोध और उसके संभावित खतरे को पहले ही भांप चुके थे, तथा उन्होंने भीम को, धृतराष्ट्र के समक्ष जाने से पूर्व ही, अत्यंत सतर्क रहने का गुप्त परामर्श दिया।

धृतराष्ट्र, जब भीम को अपने समक्ष आया हुआ जानकर, उसे आलिंगन करने हेतु आगे बढ़े, तो श्रीकृष्ण ने, अत्यंत त्वरित बुद्धि का प्रयोग करते हुए, वास्तविक भीम के स्थान पर, भीम की ही एक विशाल लौह-प्रतिमा को धृतराष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत करवा दिया।

धृतराष्ट्र, अपने भीतर संचित उस असहनीय शोक और क्रोध के अतिरेक में, अपने असाधारण बल का प्रयोग करते हुए, उस लौह-प्रतिमा को अपनी बाहों में इतनी शक्ति से जकड़ लिया कि वह प्रतिमा ही चूर-चूर होकर टुकड़ों में बिखर गई, तथा धृतराष्ट्र स्वयं भी इस अतिरेक से रक्त वमन करने लगे।

इस घटना के पश्चात्, धृतराष्ट्र का वह संचित क्रोध पूर्णतः शांत हो गया, तथा वे अत्यंत लज्जित होकर, अपने इस क्षणिक, विनाशकारी विचार पर गहन पश्चाताप का अनुभव करने लगे, तथा उन्होंने वास्तविक भीम को स्नेहपूर्वक आलिंगन कर, उसे क्षमा-याचना सहित आशीर्वाद प्रदान किया।

इस अध्याय की शिक्षा

संचित क्रोध, चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, दूरदर्शी बुद्धि और सतर्कता से, बिना किसी नई क्षति के, शांत किया जा सकता है।

अध्याय 3

युद्धभूमि की ओर स्त्रियों का प्रस्थान

इस घटना के पश्चात्, धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती तथा हस्तिनापुर की अन्य समस्त स्त्रियाँ, अपने-अपने प्रियजनों के शवों को अंतिम बार देखने तथा उनका विधिवत अंतिम संस्कार करने हेतु, अत्यंत भारी हृदय के साथ, कुरुक्षेत्र की उस भीषण रणभूमि की ओर प्रस्थान किया।

कुरुक्षेत्र की वह विशाल रणभूमि, जो अठारह दिनों तक चले इस भीषण संहार के पश्चात्, असंख्य वीरों के शवों, टूटे हुए रथों, तथा रक्त से सनी हुई भूमि के साथ, एक अत्यंत करुण, त्रासद दृश्य प्रस्तुत कर रही थी, इन स्त्रियों के समक्ष प्रकट हुई।

गांधारी, अपने समस्त सौ पुत्रों तथा अपने अनेक पौत्रों के शवों को इस प्रकार बिखरा हुआ देखकर, गहन शोक और असहनीय पीड़ा से पूर्णतः टूट गई, तथा उसकी करुण चीत्कार सम्पूर्ण रणभूमि में गूँज उठी।

कुंती भी, कर्ण, तथा अपने अन्य अनेक स्वजनों के शवों को देखकर, गहन शोक में डूब गई, यद्यपि उसके हृदय में कर्ण के प्रति एक विशेष, गुप्त वेदना थी, जिसे वह अभी भी अपने पुत्रों से छिपाए हुए थी।

इस प्रकार, सम्पूर्ण कुरुक्षेत्र की वह भीषण रणभूमि, अब विजय के उल्लास के स्थान पर, स्त्रियों के उस अत्यंत करुण, हृदयविदारक विलाप से गूँज उठी, जो इस युद्ध के वास्तविक, अपार मूल्य को सम्पूर्ण संसार के समक्ष प्रकट कर रहा था।

इस अध्याय की शिक्षा

युद्ध की विजय चाहे किसी भी पक्ष को क्यों न मिले, उसका वास्तविक, अपार मूल्य सदैव स्त्रियों के आँसुओं में ही चुकाया जाता है।

अध्याय 4

गांधारी का करुण विलाप

गांधारी, अपने समस्त सौ पुत्रों के शवों के मध्य खड़ी होकर, एक-एक कर उनके नाम पुकारते हुए, अत्यंत करुण, हृदयविदारक विलाप करने लगी, यह स्मरण करते हुए कि किस प्रकार उसने इन सबका पालन-पोषण अपनी ममता से किया था।

गांधारी ने विशेष रूप से दुर्योधन के उस भीषण, अपमानजनक अंत पर, तथा दुःशासन के उस अत्यंत क्रूर वध पर, गहन शोक व्यक्त किया, यह प्रश्न बार-बार पूछते हुए कि आखिर उसकी यह ममता, इतने भीषण विनाश को रोकने में असमर्थ क्यों सिद्ध हुई।

युधिष्ठिर तथा शेष पांडव, गांधारी के इस असहनीय शोक को देखकर, अत्यंत विनम्रता और लज्जा के साथ, उसके समक्ष उपस्थित हुए, यह जानते हुए कि उन्हीं के हाथों गांधारी के समस्त पुत्रों का यह अंत हुआ है।

गांधारी, अपने भीतर के इस असहनीय शोक और क्रोध के मध्य भी, अपनी दिव्य तपस्या और संयम के बल पर, स्वयं को किसी अनुचित कृत्य से रोकते हुए, केवल अपने अश्रुओं और विलाप के माध्यम से ही, अपनी इस अपार पीड़ा को व्यक्त करती रही।

यह दृश्य, सम्पूर्ण महाभारत की सर्वाधिक करुण, मार्मिक घटनाओं में से एक के रूप में सदा स्मरण किया जाता है, जिसमें एक माता की ममता और उसका असहनीय शोक, युद्ध के समस्त विजय-पराजय के प्रश्नों से भी कहीं अधिक गहन सिद्ध हुआ।

इस अध्याय की शिक्षा

एक माता का शोक, चाहे उसके पुत्रों ने कैसे भी कर्म क्यों न किए हों, सदैव ही सर्वाधिक गहन और मार्मिक होता है।

अध्याय 5

कुंती का गुप्त रहस्य-प्रकटीकरण

इसी मध्य, कुंती, अपने हृदय में वर्षों से छिपाए हुए उस गुप्त रहस्य के बोझ से अत्यंत व्यथित होकर, अंततः अपने पुत्रों — युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल तथा सहदेव — के समक्ष, एक अत्यंत चौंकाने वाला, हृदयविदारक सत्य प्रकट करने का निश्चय किया।

कुंती ने, अत्यंत भारी हृदय और अश्रुपूरित नेत्रों के साथ, अपने पुत्रों को यह बताया कि कर्ण, जिसे उन्होंने इस युद्ध में अपना कट्टर शत्रु मानकर मारा था, वास्तव में उन्हीं की सबसे बड़ी, ज्येष्ठ संतान थी, जिसे उसने विवाह से पूर्व, सूर्यदेव के वरदान से जन्म दिया था।

यह सुनकर, पांचों पांडव, विशेष रूप से युधिष्ठिर, अत्यंत गहन आघात और असहनीय शोक से टूट पड़े, यह जानकर कि उन्होंने अनजाने में ही अपने ही सबसे बड़े भ्राता का अंत कर डाला है, जिसे वे जीवनभर एक शत्रु के रूप में ही जानते रहे।

युधिष्ठिर, इस असहनीय सत्य से गहन क्रोध और शोक में डूबकर, अपनी माता कुंती को अत्यंत कटु शब्दों में धिक्कारने लगे, यह प्रश्न करते हुए कि यदि यह सत्य पहले ही प्रकट कर दिया गया होता, तो सम्भवतः यह भीषण भ्रातृ-युद्ध ही कभी न होता।

युधिष्ठिर, अपने इस असहनीय क्रोध और शोक के अतिरेक में, समस्त स्त्री-जाति को यह शाप दे बैठे कि वे अब कभी भी किसी गुप्त रहस्य को दीर्घकाल तक अपने हृदय में नहीं छिपा पाएँगी, यह शाप आगे चलकर स्त्री-स्वभाव की एक विशेषता के रूप में सदा स्मरण किया गया।

इस अध्याय की शिक्षा

छिपाया गया सत्य, चाहे कितने भी शुभ आशय से क्यों न रखा गया हो, समय आने पर प्रकट होकर, गहन पीड़ा और पश्चाताप ही लेकर आता है।

अध्याय 6

अन्य स्त्रियों का विलाप

द्रौपदी, जिसने इस युद्ध में अपने पाँचों पुत्रों, अपने पिता द्रुपद तथा अपने भाई धृष्टद्युम्न को भी खो दिया था, इस युद्धभूमि में अपने इन समस्त प्रियजनों के शवों को देखकर, गहन शोक और असहनीय पीड़ा में डूब गई।

उत्तरा, अभिमन्यु की युवा पत्नी, अपने पति के उस अत्यंत भीषण, चक्रव्यूह में हुए वीरगति-प्राप्त शव के समक्ष, अपने गर्भ में पल रही संतान के साथ, अत्यंत करुण विलाप करने लगी, यह प्रश्न पूछते हुए कि उसकी संतान अब बिना पिता के कैसे बड़ी होगी।

कौरव-पक्ष की अन्य अनेक स्त्रियाँ, अपने-अपने पतियों, पुत्रों तथा भाइयों के इस भीषण संहार पर, अत्यंत करुण विलाप करती हुई, सम्पूर्ण रणभूमि में इधर-उधर भटकती रहीं, यह दृश्य किसी भी कठोर हृदय को भी द्रवित कर देने वाला था।

इस प्रकार, सम्पूर्ण कुरुक्षेत्र की वह रणभूमि, दोनों ही पक्षों की स्त्रियों के इस अपार, सामूहिक शोक और विलाप से आच्छादित हो गई, जिसने यह स्पष्ट प्रमाणित किया कि युद्ध में कोई भी पक्ष वास्तव में विजयी नहीं होता, केवल क्षति का अनुपात ही भिन्न होता है।

युधिष्ठिर तथा शेष पांडव, इन समस्त स्त्रियों के इस असहनीय शोक को देखकर, गहन आत्म-मंथन और पश्चाताप का अनुभव करने लगे, यह प्रश्न बार-बार अपने हृदय में पूछते हुए कि क्या यह विजय, इतने अपार मूल्य के योग्य वास्तव में थी।

इस अध्याय की शिक्षा

युद्ध का वास्तविक परिणाम, विजय-पराजय के गौरव में नहीं, अपितु उन असंख्य स्त्रियों के अपार, असहनीय शोक में ही निहित होता है।

अध्याय 7

गांधारी का श्रीकृष्ण से प्रश्न

गांधारी, अपने समस्त सौ पुत्रों की इस भीषण क्षति से, गहन शोक और असहनीय क्रोध में डूबी हुई, अंततः स्वयं श्रीकृष्ण के समक्ष उपस्थित हुई, तथा उनसे अत्यंत तीक्ष्ण, मार्मिक प्रश्न पूछने लगी।

गांधारी ने श्रीकृष्ण से यह पूछा कि जब वे स्वयं साक्षात् भगवान थे, तथा इस सम्पूर्ण भीषण विनाश को रोकने की पूर्ण क्षमता रखते थे, तो उन्होंने इतने असंख्य निर्दोष प्राणों की इस भीषण क्षति को क्यों नहीं रोका, तथा इस विनाशकारी युद्ध को घटित होने ही क्यों दिया।

श्रीकृष्ण, गांधारी के इस असहनीय शोक और क्रोध को अत्यंत गम्भीरता और करुणा के साथ सुनते हुए, उन्हें अत्यंत शांत स्वर में यह समझाने का प्रयास किया कि यह युद्ध, स्वयं दुर्योधन तथा कौरवों के अपने ही अनगिनत अधर्मपूर्ण कृत्यों का अनिवार्य, स्वाभाविक परिणाम था।

गांधारी, श्रीकृष्ण के इस उत्तर से संतुष्ट न होते हुए, अपने भीतर के इस असहनीय शोक और क्रोध के अतिरेक में, अंततः स्वयं श्रीकृष्ण को ही एक अत्यंत गम्भीर, दूरगामी शाप देने का निश्चय कर लिया।

गांधारी ने यह घोषणा की कि जिस प्रकार उसने अपने समस्त कुल का यह भीषण विनाश अपनी आँखों से देखा है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण भी, आगामी छत्तीस वर्षों में, अपने ही सम्पूर्ण यदुवंश का पारस्परिक संहार, अपनी ही आँखों से देखेंगे।

इस अध्याय की शिक्षा

गहन शोक और असहनीय पीड़ा के क्षण में, मनुष्य कभी-कभी स्वयं ईश्वर से भी न्याय और उत्तर की मांग करने लगता है।

अध्याय 8

श्रीकृष्ण द्वारा शाप की स्वीकृति

श्रीकृष्ण, गांधारी के इस अत्यंत गम्भीर, दूरगामी शाप को सुनकर, तनिक भी विचलित या क्रोधित हुए बिना, अत्यंत शांत, मुस्कुराते हुए, इस शाप को पूर्ण विनम्रता के साथ स्वीकार कर लिया, यह कहते हुए कि यह शाप वास्तव में अनावश्यक ही था।

श्रीकृष्ण ने गांधारी को यह गूढ़ रहस्य बताया कि वे स्वयं भी यह भलीभाँति जानते थे कि यदुवंश का यह पारस्परिक विनाश, उनके स्वयं के इस पृथ्वी-अवतरण के उद्देश्य की पूर्ति के पश्चात्, एक अनिवार्य, पूर्वनिर्धारित घटना ही है।

श्रीकृष्ण ने यह भी स्पष्ट किया कि गांधारी का यह शाप, वास्तव में किसी नई घटना को जन्म नहीं दे रहा, अपितु केवल उस घटना को ही स्वीकृति प्रदान कर रहा है, जो नियति द्वारा पहले से ही निर्धारित की जा चुकी थी।

गांधारी, श्रीकृष्ण की इस अद्भुत, दिव्य शांति तथा उनकी इस गहन स्वीकृति को देखकर, कुछ हद तक स्तब्ध और शांत हुई, यद्यपि उसके हृदय में अपने पुत्रों की क्षति का वह गहन शोक अभी भी बना रहा।

इस घटना ने यह गहन शिक्षा दी कि सच्चा ईश्वरत्व, किसी भी शाप या क्रोध से भयभीत नहीं होता, अपितु वह नियति के प्रत्येक विधान को, पूर्ण शांति और स्वीकृति के साथ, अपने भीतर समाहित कर लेता है।

इस अध्याय की शिक्षा

सच्ची दिव्यता वह है जो क्रोध और शाप के समक्ष भी विचलित न होकर, नियति के प्रत्येक विधान को शांतिपूर्वक स्वीकार कर सके।

अध्याय 9

अंतिम संस्कार एवं तर्पण

इस भीषण युद्ध की समाप्ति के पश्चात्, युधिष्ठिर के आदेश से, कुरुक्षेत्र की उस रणभूमि में पड़े असंख्य वीरों के शवों का, यथाशीघ्र, विधिवत अंतिम संस्कार करने की एक विशाल, अत्यंत गम्भीर प्रक्रिया आरम्भ की गई।

भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन तथा उसके शेष भाइयों सहित, दोनों ही पक्षों के समस्त प्रमुख योद्धाओं का, उनकी मर्यादा और सम्मान के अनुरूप, विधिवत दाह-संस्कार सम्पन्न किया गया, तथा उनके लिए समुचित तर्पण-विधि भी सम्पन्न की गई।

धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती तथा अन्य समस्त स्त्रियों ने, गंगा तट पर जाकर, अपने-अपने प्रियजनों को जल-तर्पण अर्पित किया, यह एक अत्यंत करुण, गम्भीर दृश्य था, जिसमें विजेता और पराजित, दोनों ही पक्ष, समान रूप से शोकाकुल दिखाई दिए।

कुंती ने, इस अवसर पर, कर्ण के लिए भी विशेष रूप से तर्पण अर्पित किया, तथा युधिष्ठिर ने, अपने इस ज्येष्ठ भ्राता के सम्मान में, उसके लिए भी सम्पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की समुचित व्यवस्था करवाई।

इस प्रकार, इस अत्यंत भीषण, दीर्घकालिक महासंग्राम के पश्चात्, अंततः समस्त मृत आत्माओं को उचित सम्मान और शांति प्रदान करने की यह गम्भीर प्रक्रिया सम्पन्न हुई, जो आगे की उस नई, चुनौतीपूर्ण यात्रा की पृष्ठभूमि रचने लगी।

इस अध्याय की शिक्षा

युद्ध चाहे कितना भी भीषण क्यों न हो, अंततः प्रत्येक मृतात्मा को उचित सम्मान और शांति प्रदान करना ही मानवता का सच्चा धर्म है।

अध्याय 10

स्त्री पर्व का समापन

इस भीषण युद्ध की समाप्ति, तथा समस्त मृत योद्धाओं के अंतिम संस्कार के पश्चात्, युधिष्ठिर सहित समस्त पांडव, इस असाधारण विजय के मध्य भी, गहन शोक और आत्म-मंथन की एक अत्यंत जटिल मनोदशा में डूबे रहे।

गांधारी का वह शाप, जो उसने श्रीकृष्ण को दिया था, अब सम्पूर्ण यदुवंश के भविष्य पर एक अत्यंत गहरी, अशुभ छाया के रूप में मंडराने लगा, यद्यपि इस विषय में अभी तक केवल श्रीकृष्ण ही इसकी वास्तविक, अपरिहार्य प्रकृति को भलीभाँति समझते थे।

कुंती द्वारा प्रकट किया गया कर्ण का वह गुप्त रहस्य, युधिष्ठिर के हृदय पर एक ऐसा गहरा, स्थायी घाव छोड़ गया, जो आगे आने वाले वर्षों में भी, उनके मन में बार-बार गहन पीड़ा और आत्म-ग्लानि उत्पन्न करता रहा।

सम्पूर्ण हस्तिनापुर तथा कुरुक्षेत्र, इस भीषण युद्ध के पश्चात्, एक नई, अनिश्चित किंतु आवश्यक शुरुआत की प्रतीक्षा में था, जिसमें युधिष्ठिर को अब इस विशाल, युद्ध-क्षत साम्राज्य का उत्तरदायित्व स्वयं सम्भालना था।

इस प्रकार स्त्री पर्व, स्त्रियों के उस अपार, सामूहिक विलाप, कुंती के रहस्य-प्रकटीकरण, गांधारी के शाप, तथा समस्त मृतकों के अंतिम संस्कार के साथ अपने समापन पर पहुँचता है, अगले शांति पर्व में, युधिष्ठिर के राज्याभिषेक तथा भीष्म के उस विशाल, गहन उपदेश की कथा वर्णित की जाएगी।

इस अध्याय की शिक्षा

युद्ध की सबसे बड़ी विजय के पश्चात् भी, उसके छोड़े गए घाव और शाप, आने वाली पीढ़ियों के भाग्य को दीर्घकाल तक प्रभावित करते रहते हैं।