मौसल पर्व
मौसल पर्व
गांधारी के शाप का फलीभूत होना — प्रभास क्षेत्र में यादवों का पारस्परिक संहार तथा स्वयं श्रीकृष्ण का इस संसार से प्रस्थान।
द्वारका में अशुभ संकेत
धृतराष्ट्र, गांधारी तथा कुंती के उस शांतिपूर्ण अंत के लगभग छत्तीस वर्ष पश्चात्, द्वारका नगरी में, धीरे-धीरे अनेक अत्यंत अशुभ, चिंताजनक संकेत प्रकट होने लगे, जिन्होंने सम्पूर्ण यदुवंश में एक गहन अशांति और भय का संचार किया।
आकाश में असामान्य उल्कापात, पशु-पक्षियों का विचित्र, अनियमित व्यवहार, तथा अनेक अन्य अपशकुन, निरंतर घटित होने लगे, जिन्हें देखकर स्वयं श्रीकृष्ण तथा बलराम भी, गहन चिंता में डूब गए।
श्रीकृष्ण, जो स्वयं यह भलीभाँति जानते थे कि गांधारी के उस शाप का समय अब निकट आ चुका है, अपने भीतर एक गहन, अनिवार्य स्वीकृति के भाव के साथ, इन आगामी घटनाओं की प्रतीक्षा करने लगे।
यदुवंश के अनेक युवा राजकुमार, इस दीर्घकालिक समृद्धि और शक्ति के मद में, धीरे-धीरे अहंकार और उच्छृंखलता की ओर अग्रसर होने लगे थे, तथा उनके आचरण में, विनम्रता और संयम का ह्रास स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा था।
इसी पृष्ठभूमि में, एक ऐसी घटना घटित होने वाली थी, जो अंततः सम्पूर्ण यदुवंश के इस विनाश की प्रत्यक्ष, तात्कालिक पृष्ठभूमि रचने वाली थी।
इस अध्याय की शिक्षा
समृद्धि और शक्ति का अहंकार, यदि संयम और विनम्रता से नियंत्रित न हो, तो वह अपने ही विनाश का मार्ग प्रशस्त कर देता है।
ऋषियों का उपहास एवं शाप
एक दिन, यदुवंश के कुछ उच्छृंखल युवा राजकुमार, जिनमें श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब भी सम्मिलित थे, विश्वामित्र, कण्व तथा नारद जैसे कुछ महान ऋषियों के साथ, अत्यंत अनुचित, अशोभनीय परिहास करने का दुःसाहस कर बैठे।
इन उच्छृंखल राजकुमारों ने, साम्ब को स्त्री-वेश में सजाकर, तथा उसे गर्भवती दिखाकर, इन ऋषियों से यह प्रश्न पूछा कि इस "स्त्री" को कौन सी संतान — पुत्र अथवा पुत्री — होगी, यह एक अत्यंत निंदनीय, अपमानजनक उपहास था।
ऋषिगण, इस अत्यंत अनुचित, अपमानजनक परिहास से गहन क्रोधित होकर, उन्हें यह भीषण शाप दे बैठे कि साम्ब के गर्भ से, एक लौह-मूसल (मूसला) का जन्म होगा, जो अंततः सम्पूर्ण यदुवंश के विनाश का कारण बनेगा।
यह शाप सुनकर, सम्पूर्ण यदुवंश में अत्यंत भय और चिंता व्याप्त हो गई, तथा शीघ्र ही, वास्तव में साम्ब के उस पेट से, एक भयंकर लौह-मूसल का प्राकट्य हुआ, जिसने इस शाप की सत्यता को प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित कर दिया।
यह घटना, गांधारी के उस पूर्व शाप के फलीभूत होने की, एक अत्यंत ठोस, प्रत्यक्ष पृष्ठभूमि बन गई, जिसने अंततः सम्पूर्ण यदुवंश को, एक अपरिहार्य, विनाशकारी अंत की ओर धकेलना आरम्भ कर दिया।
इस अध्याय की शिक्षा
अहंकार और उच्छृंखलता में किया गया उपहास, कभी-कभी सम्पूर्ण कुल के विनाश का बीज बो सकता है।
मूसल का विनाश-प्रयास
यदुवंश के प्रमुख, वयोवृद्ध सदस्य, इस भीषण शाप और उस लौह-मूसल के प्राकट्य से अत्यंत भयभीत होकर, उन्होंने तत्काल इस मूसल को पीसकर चूर्ण बना डालने, तथा उसे समुद्र में विसर्जित कर देने का निश्चय किया, यह आशा करते हुए कि इससे यह शाप निष्फल हो जाएगा।
यह लौह-मूसल, अत्यंत सावधानीपूर्वक पीसकर, महीन चूर्ण के रूप में परिवर्तित किया गया, तथा इस चूर्ण को, समुद्र के गहन जल में, अत्यंत दूर तक फेंक दिया गया, यह विश्वास करते हुए कि अब यह शाप कभी भी फलीभूत नहीं होगा।
किंतु नियति की यह विडंबना थी कि उस चूर्ण का एक अत्यंत सूक्ष्म अंश, जिसे पूर्णतः नष्ट नहीं किया जा सका था, समुद्र तट पर उगने वाली "एरका" नामक एक विशेष घास में जा मिला, तथा वह घास, कालांतर में, अत्यंत कठोर, लौह के समान मजबूत हो गई।
इसी प्रकार, उस चूर्ण का एक अन्य अंश, समुद्र में एक मछली द्वारा निगल लिया गया, जिसे बाद में एक शिकारी द्वारा पकड़ा गया, तथा उस मछली के पेट से प्राप्त उस लौह-अंश को, उस शिकारी ने अपने बाण की नोक बनाने हेतु सुरक्षित रख लिया।
इस प्रकार, यदुवंश के इस भरसक प्रयास के बावजूद, वह भीषण शाप, अत्यंत सूक्ष्म, अप्रत्याशित रूपों में, अभी भी अपनी पूर्ण, अपरिहार्य पूर्ति की प्रतीक्षा में शेष रह गया।
इस अध्याय की शिक्षा
नियति द्वारा निर्धारित घटनाओं से बचने के प्रयास, चाहे कितने भी सावधानीपूर्वक क्यों न किए जाएँ, अंततः किसी न किसी अप्रत्याशित मार्ग से पूर्ण हो ही जाते हैं।
श्रीकृष्ण एवं बलराम की प्रतिक्रिया
श्रीकृष्ण, इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को, अपनी दिव्य दृष्टि से, अत्यंत गहराई से समझते हुए, यह भलीभाँति जानते थे कि यह अब अपरिहार्य हो चुका है कि यदुवंश का यह विनाश, शीघ्र ही, किसी न किसी रूप में घटित होकर रहेगा।
बलराम जी भी, अपने इस विशाल कुल के प्रति गहन स्नेह के होते हुए भी, इस आसन्न विनाश की अनिवार्यता को स्वीकार करते हुए, अत्यंत गम्भीर, चिंतित मनोदशा में, आगे की घटनाओं की प्रतीक्षा करने लगे।
श्रीकृष्ण ने, यदुवंश के समस्त प्रमुख सदस्यों को यह परामर्श दिया कि वे कुछ काल के लिए, प्रभास क्षेत्र नामक एक पवित्र तीर्थ-स्थल की यात्रा करें, तथा वहाँ स्नान और तीर्थाटन के माध्यम से, अपने पापों का प्रायश्चित करें।
सम्पूर्ण यदुवंश, श्रीकृष्ण के इस परामर्श का पालन करते हुए, अपने परिवारों सहित, प्रभास क्षेत्र की ओर प्रस्थान किया, यह न जानते हुए कि यह यात्रा ही, उनके इस सम्पूर्ण वंश के अंतिम, विनाशकारी अध्याय की पृष्ठभूमि रचने वाली है।
श्रीकृष्ण, इस सम्पूर्ण घटनाक्रम के मध्य भी, अत्यंत शांत, स्थिर मनोदशा में बने रहे, यह जानते हुए कि यह उनके स्वयं के इस पृथ्वी-अवतरण के उद्देश्य की पूर्ति के पश्चात्, एक अनिवार्य, पूर्वनिर्धारित घटना ही है।
इस अध्याय की शिक्षा
जब नियति का निर्णय अटल हो जाए, तो उसे शांत, स्थिर मनोदशा के साथ स्वीकार करना ही सच्ची दिव्य बुद्धिमत्ता है।
प्रभास क्षेत्र में मदिरा-पान एवं कलह
प्रभास क्षेत्र में, यदुवंश के समस्त सदस्य, कुछ काल तक तीर्थाटन और धार्मिक अनुष्ठानों में व्यस्त रहे, किंतु शीघ्र ही, अनेक युवा राजकुमार, अत्यधिक मदिरा-पान में लिप्त होकर, अपने विवेक और संयम को खोने लगे।
मदिरा के इस अत्यधिक प्रभाव में, यदुवंश के अनेक सदस्यों के मध्य, पुरानी शत्रुताएँ तथा छोटी-छोटी बातों पर आधारित विवाद, धीरे-धीरे उग्र रूप लेने लगे, तथा वातावरण में एक गहन तनाव व्याप्त होने लगा।
इसी मध्य, सात्यकि तथा कृतवर्मा के बीच, युद्ध के दौरान हुई कुछ पुरानी घटनाओं को लेकर, विशेष रूप से सोए हुए योद्धाओं के उस भीषण संहार में कृतवर्मा की संलिप्तता को लेकर, अत्यंत कटु शब्दों का आदान-प्रदान होने लगा।
यह विवाद, शीघ्र ही अत्यंत उग्र रूप धारण कर गया, तथा सात्यकि ने, अपने क्रोध के अतिरेक में, कृतवर्मा का सिर काट डाला, यह देखकर सम्पूर्ण यदुवंश में उपस्थित अन्य सदस्य भी, क्रोध और प्रतिशोध की भावना से भर उठे।
इस एक भीषण घटना ने, शीघ्र ही, सम्पूर्ण यदुवंश के मध्य, एक अनियंत्रित, सर्वनाशकारी कलह को जन्म दे दिया, जिसने उस भीषण शाप को, अंततः पूर्ण रूप से फलीभूत होने की दिशा में अग्रसर कर दिया।
इस अध्याय की शिक्षा
अत्यधिक मदिरा-पान और असंयम, संचित पुरानी शत्रुताओं को भड़काकर, क्षणभर में ही सम्पूर्ण विनाश का कारण बन सकता है।
यदुवंश का पारस्परिक संहार
सात्यकि द्वारा कृतवर्मा के इस अंत के पश्चात्, सम्पूर्ण यदुवंश, दो विरोधी समूहों में विभाजित होकर, एक-दूसरे पर अत्यंत क्रोधपूर्वक टूट पड़ा, तथा उनके पास कोई भी पारम्परिक शस्त्र न होने के कारण, उन्होंने तट पर उगी उसी "एरका" घास को उखाड़कर, एक-दूसरे पर प्रहार करना आरम्भ कर दिया।
वह एरका घास, गांधारी के उस शाप के प्रभाव से, अत्यंत कठोर, लौह के समान शक्तिशाली बन चुकी थी, तथा इसने, इस भीषण, अनियंत्रित संघर्ष में, एक अत्यंत घातक, विनाशकारी अस्त्र का रूप धारण कर लिया।
श्रीकृष्ण, इस भीषण, अनियंत्रित कलह को शांत करने का भरसक प्रयास करते रहे, किंतु मदिरा और क्रोध के इस अंधे अतिरेक में, स्वयं उनके पुत्र प्रद्युम्न सहित, यदुवंश के अनेक अन्य प्रमुख सदस्य भी, इस भीषण संघर्ष में उलझ गए।
यह भीषण, पारस्परिक संहार, इतनी तीव्रता और व्यापकता से फैला कि कुछ ही घंटों में, यदुवंश के लगभग समस्त पुरुष सदस्य, इस भीषण कलह में एक-दूसरे के हाथों मारे गए, यह एक अत्यंत त्रासद, अभूतपूर्व सामूहिक विनाश था।
श्रीकृष्ण, अपने इस सम्पूर्ण वंश के इस भीषण, अपरिहार्य विनाश को, अत्यंत गहन शोक के साथ, किंतु पूर्ण दिव्य स्वीकृति के साथ देखते रहे, यह जानते हुए कि यह गांधारी के उस शाप का, अंततः अपरिहार्य, पूर्ण फलीभूत होना ही है।
इस अध्याय की शिक्षा
एक शाप अथवा नियति का विधान, चाहे उसे टालने के कितने भी प्रयास किए जाएँ, अपने निश्चित समय पर, अवश्य ही फलीभूत होकर रहता है।
बलराम का प्रस्थान
इस भीषण, सर्वनाशकारी विनाश के पश्चात्, बलराम जी, अपने इस सम्पूर्ण वंश की इस अपार क्षति से, गहन शोक और थकान का अनुभव करते हुए, समुद्र तट के एक निर्जन स्थान पर, अत्यंत गम्भीर ध्यान की मुद्रा में बैठ गए।
बलराम जी, जो स्वयं शेषनाग के ही एक अंश माने जाते थे, अपनी इस गहन ध्यान-अवस्था में, धीरे-धीरे अपने भौतिक शरीर से मुक्त होने लगे, तथा एक अद्भुत, दिव्य दृश्य में, उनके मुख से एक विशाल, श्वेत सर्प प्रकट होकर, समुद्र की ओर सरकने लगा।
यह वही शेषनाग थे, जिनका अंश बलराम जी के रूप में इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ था, तथा अब, अपने इस पृथ्वी-अवतरण के उद्देश्य की पूर्ति के पश्चात्, वे अपने वास्तविक, दिव्य स्वरूप में, पुनः समुद्र में विलीन हो गए।
बलराम जी का यह अंत, किसी भी हिंसा अथवा युद्ध के परिणामस्वरूप नहीं, अपितु अत्यंत शांतिपूर्ण, योगिक, दिव्य प्रस्थान के रूप में हुआ, जो उनके इस असाधारण, दिव्य स्वरूप की एक अंतिम, गरिमामय पुष्टि थी।
श्रीकृष्ण, अपने ज्येष्ठ भ्राता बलराम के इस अंत का समाचार सुनकर, गहन शोक में डूब गए, तथा उन्होंने यह अनुभव किया कि अब उनका स्वयं का भी, इस पृथ्वी से प्रस्थान करने का समय अत्यंत निकट आ चुका है।
इस अध्याय की शिक्षा
एक दिव्य आत्मा का अंत, सदैव उसके वास्तविक, शाश्वत स्वरूप में लौटने का एक शांतिपूर्ण, गरिमामय प्रस्थान ही होता है।
श्रीकृष्ण का पृथ्वी-लोक से प्रस्थान
बलराम जी के इस प्रस्थान के पश्चात्, श्रीकृष्ण, अकेले ही, एक निर्जन वन में, एक वृक्ष के नीचे, अत्यंत शांत, ध्यानमग्न अवस्था में बैठ गए, यह जानते हुए कि अब उनके इस पृथ्वी-अवतरण का उद्देश्य पूर्णतः सम्पन्न हो चुका है।
इसी समय, जरा नामक एक शिकारी, जो वन में मृगों के आखेट हेतु भ्रमण कर रहा था, ने दूर से, वृक्ष के नीचे स्थित श्रीकृष्ण के उस पैर को, जिस पर एक विशेष, लाल रंग का चिन्ह था, किसी मृग के मुख के समान देखकर, अनजाने में ही, उस दिशा में अपना बाण चला दिया।
यह वही बाण था, जिसकी नोक, उस लौह-मूसल के उस सूक्ष्म अवशेष से बनी थी, जो एक मछली के माध्यम से इस शिकारी तक पहुँचा था, तथा यह बाण, सीधे श्रीकृष्ण के उसी पैर में जा लगा, जो उनके शरीर का एकमात्र भेद्य स्थान माना जाता था।
जरा, जब निकट आकर यह देखकर स्तब्ध रह गया कि उसने अनजाने में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण पर बाण चला दिया है, तो वह अत्यंत भयभीत और पश्चातापयुक्त होकर, उनके चरणों में गिर पड़ा, तथा बारम्बार क्षमा-याचना करने लगा।
श्रीकृष्ण, अपनी उस असीम करुणा के साथ, जरा को तत्काल क्षमा प्रदान करते हुए, उसे यह आश्वासन दिया कि यह घटना, उनके अपने ही पूर्वनिर्धारित प्रस्थान का एक अनिवार्य, दिव्य माध्यम मात्र थी, तथा उन्होंने, अत्यंत शांतिपूर्वक, अपने इस पृथ्वी-लोक के शरीर का त्याग कर, अपने वैकुंठ-धाम को प्रस्थान किया।
इस अध्याय की शिक्षा
स्वयं ईश्वर भी, अपने पृथ्वी-अवतरण के उद्देश्य की पूर्ति के पश्चात्, अत्यंत विनम्र, साधारण माध्यम से ही, अपने वास्तविक धाम को प्रस्थान करना स्वीकार करते हैं।
अर्जुन का द्वारका आगमन
श्रीकृष्ण के इस असाधारण, हृदयविदारक प्रस्थान का समाचार, शीघ्र ही हस्तिनापुर तक पहुँचा, तथा युधिष्ठिर तथा शेष पांडव, इस अपार, अकल्पनीय क्षति से गहन शोक और स्तब्धता में डूब गए, यह विश्वास करना भी उनके लिए अत्यंत कठिन था।
अर्जुन, अपने परम मित्र और सखा श्रीकृष्ण के इस प्रस्थान से, तथा यदुवंश के उस भीषण, सम्पूर्ण विनाश के इस समाचार से, अत्यंत गहन शोक में डूबकर, तत्काल द्वारका की ओर प्रस्थान किया, यह देखने हेतु कि वहाँ की क्या स्थिति है।
द्वारका पहुँचकर, अर्जुन ने वहाँ एक अत्यंत भीषण, हृदयविदारक दृश्य देखा — सम्पूर्ण यदुवंश के पुरुष सदस्य, उस भीषण पारस्परिक संहार में समाप्त हो चुके थे, तथा केवल स्त्रियाँ, वृद्धजन तथा बालक ही शेष रह गए थे।
अर्जुन, इस अपार, अकल्पनीय विनाश को देखकर, गहन शोक और असहनीय पीड़ा से टूट पड़े, तथा उन्होंने, अपने परम मित्र श्रीकृष्ण के इस अंतिम आदेशानुसार, द्वारका के इन शेष निवासियों — स्त्रियों, वृद्धजनों तथा बालकों — को, सुरक्षित स्थान पर ले जाने का दायित्व स्वीकार किया।
अर्जुन ने, विधिवत रीति से, श्रीकृष्ण तथा बलराम सहित, यदुवंश के समस्त मृत सदस्यों का अंतिम संस्कार सम्पन्न करवाया, तथा इसके पश्चात्, द्वारका के शेष बचे निवासियों को साथ लेकर, हस्तिनापुर की ओर वापसी की यात्रा आरम्भ की।
इस अध्याय की शिक्षा
गहनतम व्यक्तिगत शोक के मध्य भी, अपने मित्र के प्रति अंतिम कर्तव्यों का निर्वहन करना, सच्ची मित्रता की पहचान है।
अर्जुन का क्षीण होता पराक्रम
अर्जुन, द्वारका के इन शेष निवासियों को लेकर, हस्तिनापुर की ओर वापस लौटते समय, मार्ग में, कुछ असभ्य, लुटेरी जनजातियों ने, इस विशाल जनसमूह पर आक्रमण कर, अनेक स्त्रियों तथा धन-सम्पत्ति को लूटने का प्रयास किया।
अर्जुन, जो कभी अपने असाधारण गांडीव धनुष और दिव्य अस्त्रों के बल पर, सम्पूर्ण भारतवर्ष के सर्वाधिक अजेय योद्धा माने जाते थे, इस अवसर पर, अपने उसी गांडीव धनुष को उठाकर, इन लुटेरों का सामना करने का प्रयास किया।
किंतु अर्जुन, अत्यंत आश्चर्यजनक रूप से, इस अवसर पर, अपने उस असाधारण, दिव्य पराक्रम और अस्त्र-कौशल का, तनिक भी समुचित प्रदर्शन नहीं कर सके, तथा वे इन साधारण लुटेरों के समक्ष भी, अपेक्षाकृत असहाय सिद्ध हुए।
अर्जुन, स्वयं इस असाधारण, अप्रत्याशित असफलता से गहन आश्चर्य और गहन शोक का अनुभव करने लगे, यह समझने लगे कि श्रीकृष्ण के इस पृथ्वी-लोक से प्रस्थान के साथ ही, उनकी अपनी वह दिव्य शक्ति भी, अब सदा के लिए क्षीण हो चुकी है।
यह घटना, अर्जुन को यह गहन, मार्मिक शिक्षा दे गई कि उनका सम्पूर्ण असाधारण पराक्रम, वास्तव में, सदैव श्रीकृष्ण की ही दिव्य कृपा और उपस्थिति पर आधारित था, तथा उनके बिना, वे स्वयं भी एक साधारण मनुष्य मात्र रह गए हैं।
इस अध्याय की शिक्षा
मनुष्य का सम्पूर्ण पराक्रम और सामर्थ्य, वास्तव में, सदैव किसी उच्चतर, दिव्य शक्ति की कृपा पर ही आधारित होता है, तथा उस कृपा के हटते ही, यह सामर्थ्य भी क्षीण हो जाता है।
मौसल पर्व का समापन
अर्जुन, अत्यंत भारी, शोकाकुल हृदय के साथ, द्वारका के इन शेष निवासियों को, किसी प्रकार सुरक्षित रूप से हस्तिनापुर पहुँचाकर, युधिष्ठिर तथा शेष पांडवों के समक्ष, इस सम्पूर्ण, हृदयविदारक घटनाक्रम का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया।
युधिष्ठिर तथा शेष पांडव, श्रीकृष्ण के इस असाधारण प्रस्थान, यदुवंश के इस सम्पूर्ण विनाश, तथा अर्जुन के इस क्षीण होते पराक्रम के इस समाचार से, गहन शोक और गहन आत्म-मंथन में डूब गए।
यह सम्पूर्ण घटनाक्रम, पांडवों के लिए, यह एक अत्यंत स्पष्ट, अपरिहार्य संकेत सिद्ध हुआ कि अब, इस पृथ्वी पर उनका अपना समय भी, धीरे-धीरे समाप्ति की ओर अग्रसर हो रहा है, तथा उन्हें भी, शीघ्र ही, अपने इस सांसारिक जीवन के अंतिम अध्याय की ओर बढ़ना चाहिए।
युधिष्ठिर, अपने इस साम्राज्य के भावी उत्तराधिकारी — परीक्षित — को, अब पर्याप्त रूप से सक्षम और तैयार पाकर, अपने राज्य को उन्हें सौंपने, तथा स्वयं इस सांसारिक जीवन का त्याग कर, अपनी अंतिम, महाप्रस्थान की यात्रा आरम्भ करने का निश्चय करने लगे।
इस प्रकार मौसल पर्व, गांधारी के उस शाप के इस अंतिम, अपरिहार्य फलीभूत होने, यदुवंश के उस सम्पूर्ण पारस्परिक संहार, तथा स्वयं श्रीकृष्ण और बलराम के इस पृथ्वी-लोक से प्रस्थान के साथ अपने समापन पर पहुँचता है, अगले महाप्रस्थानिक पर्व में, पांडवों की उस अंतिम, हिमालय की ओर की महायात्रा की कथा वर्णित की जाएगी।
इस अध्याय की शिक्षा
जब उच्चतम दिव्य सहारा भी इस संसार से प्रस्थान कर जाए, तो यह समझना ही बुद्धिमत्ता है कि अब अपने स्वयं के सांसारिक अध्याय को भी विराम देने का समय आ चुका है।
