महाप्रस्थानिक पर्व
महाप्रस्थानिक पर्व
युधिष्ठिर द्वारा राज्य परीक्षित को सौंपकर पांचों पांडवों एवं द्रौपदी का हिमालय की ओर महाप्रस्थान, तथा मार्ग में एक-एक कर उनका शरीर त्यागना।
परीक्षित का राज्याभिषेक
श्रीकृष्ण के उस असाधारण प्रस्थान तथा यदुवंश के उस सम्पूर्ण विनाश के इस समाचार के पश्चात्, युधिष्ठिर, अपने भीतर यह गहन, अटल स्पष्टता अनुभव करने लगे कि अब उनका अपना सांसारिक जीवन भी, धीरे-धीरे अपनी समाप्ति की ओर अग्रसर हो रहा है।
युधिष्ठिर ने, अपने पौत्र-तुल्य परीक्षित को, जो अब एक सक्षम, धर्मनिष्ठ युवा राजकुमार के रूप में पूर्णतः तैयार हो चुके थे, अपने इस विशाल कुरु साम्राज्य का उत्तराधिकारी नियुक्त करने का निश्चय किया।
एक अत्यंत भव्य, गरिमामय समारोह में, युधिष्ठिर ने, सम्पूर्ण हस्तिनापुर तथा असंख्य प्रजाजनों तथा ऋषिगणों की उपस्थिति में, परीक्षित का विधिवत राज्याभिषेक सम्पन्न करवाया, तथा उन्हें अपने इस साम्राज्य का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व सौंप दिया।
युधिष्ठिर ने, परीक्षित को, धर्म, न्याय तथा प्रजा-कल्याण के उन्हीं गहन सिद्धांतों का पालन करने का अंतिम, स्नेहपूर्ण परामर्श दिया, जो उन्होंने स्वयं भीष्म पितामह से, वर्षों पूर्व, शरशय्या पर प्राप्त किए थे।
इस राज्याभिषेक के पश्चात्, युधिष्ठिर, अपने चारों भाइयों तथा द्रौपदी के साथ विचार-विमर्श करते हुए, अब इस सांसारिक जीवन का पूर्ण त्याग कर, हिमालय की ओर, अपनी अंतिम, महाप्रस्थान की यात्रा आरम्भ करने का निश्चय करने लगे।
इस अध्याय की शिक्षा
एक सच्चे शासक का सर्वोच्च कर्तव्य, अपने उत्तराधिकारी को पूर्ण रूप से सक्षम बनाकर, अपने दायित्व को समय पर सौंप देना है।
सांसारिक जीवन का सम्पूर्ण त्याग
युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा द्रौपदी, अपने इस विशाल साम्राज्य, अपने समस्त वैभव, वस्त्र-आभूषण तथा अन्य समस्त भौतिक सम्पत्ति का पूर्ण त्याग कर, अत्यंत सरल, तपस्वी वेश धारण कर, अपनी इस अंतिम यात्रा हेतु तैयार हुए।
सम्पूर्ण हस्तिनापुर नगरी, अपने इन पांचों वीर पांडवों तथा द्रौपदी के इस अत्यंत गहन, अप्रत्याशित त्याग-निर्णय को सुनकर, गहन शोक और भावुकता में डूब गई, तथा असंख्य प्रजाजन, उन्हें अंतिम विदाई देने हेतु एकत्रित हुए।
परीक्षित, अपने इन दादा-तुल्य पांडवों तथा दादी-तुल्य द्रौपदी को, इस प्रकार वन की ओर प्रस्थान करते देखकर, गहन शोक से भर उठे, किंतु उन्होंने अपने इस उत्तरदायित्व को, पूर्ण धैर्य और गम्भीरता के साथ स्वीकार किया।
इस यात्रा के दौरान, एक श्वान (कुत्ता), जो न जाने कहाँ से आया था, पांडवों के इस समूह के साथ, अत्यंत स्नेह और निष्ठा के साथ, चलने लगा, तथा उसने इस सम्पूर्ण यात्रा में, उनका साथ कभी नहीं छोड़ा।
इस प्रकार, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी तथा वह निष्ठावान श्वान, अपने इस विशाल साम्राज्य को, हमेशा के लिए पीछे छोड़ते हुए, हिमालय की ओर, अपनी उस अंतिम, महाप्रस्थान की यात्रा पर आगे बढ़ चले।
इस अध्याय की शिक्षा
जीवन के अंतिम, सर्वोच्च लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए, समस्त सांसारिक वैभव और मोह का पूर्ण त्याग करना ही, सच्चे संन्यास की पहचान है।
हिमालय की ओर यात्रा
युधिष्ठिर, इस यात्रा में सबसे आगे चलते रहे, तथा उनके पीछे, क्रमशः भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, तथा द्रौपदी, और सबसे अंत में वह निष्ठावान श्वान, एक पंक्ति में चलते रहे, यह एक अत्यंत गम्भीर, आध्यात्मिक यात्रा थी।
इस दीर्घकालिक यात्रा के दौरान, वे अनेक विशाल पर्वतों, घने वनों तथा दुर्गम मार्गों से होकर गुजरे, तथा उन्होंने अपने इस मार्ग में, किसी भी प्रकार के भौतिक सुख-साधन अथवा विश्राम की तनिक भी अपेक्षा नहीं की।
यह यात्रा, वास्तव में, एक बाह्य यात्रा से कहीं अधिक, एक गहन, आंतरिक, आध्यात्मिक यात्रा थी, जिसमें प्रत्येक पांडव तथा द्रौपदी, अपने-अपने संचित सांसारिक कर्मों और मोहों से, धीरे-धीरे मुक्त होने का प्रयास कर रहे थे।
मार्ग में, अग्निदेव भी उनके समक्ष प्रकट हुए, तथा उन्होंने अर्जुन को यह परामर्श दिया कि वे अपने उस असाधारण गांडीव धनुष का, अब इस संसार में कोई और उपयोग शेष न रहने के कारण, त्याग कर दें, जिसे अर्जुन ने अत्यंत भारी हृदय से, किंतु पूर्ण स्वीकृति के साथ, वरुण देव को समर्पित कर दिया।
इस प्रकार, अपने समस्त शेष दिव्य अस्त्रों तथा अंतिम भौतिक वस्तुओं का भी त्याग करते हुए, यह समूह, हिमालय की उन ऊँची, दुर्गम चोटियों की ओर, निरंतर आगे बढ़ता रहा।
इस अध्याय की शिक्षा
जीवन की अंतिम यात्रा में, अपने सबसे प्रिय, सबसे शक्तिशाली साधनों का भी त्याग कर पाना, सच्चे वैराग्य की सर्वोच्च परीक्षा है।
द्रौपदी का प्रथम पतन
इस दीर्घकालिक, कष्टप्रद यात्रा के दौरान, हिमालय की उन दुर्गम, बर्फीली चोटियों पर चलते हुए, सबसे पहले, द्रौपदी, अत्यंत थकान और निढाल होकर, भूमि पर गिर पड़ी, तथा उसने वहीं अपने प्राण त्याग दिए।
भीम, यह देखकर अत्यंत व्याकुल हो उठे, तथा उन्होंने युधिष्ठिर से यह प्रश्न पूछा कि आखिर द्रौपदी, जो अत्यंत धर्मनिष्ठ, पतिव्रता तथा गुणवान थी, सबसे पहले क्यों गिर पड़ी, इस प्रश्न ने उनके हृदय को गहराई से व्यथित किया।
युधिष्ठिर, बिना पीछे मुड़े, अत्यंत शांत, गम्भीर स्वर में, यह उत्तर दिया कि यद्यपि द्रौपदी में अनेक असाधारण गुण थे, किंतु उसके हृदय में, अपने पाँचों पतियों में से, अर्जुन के प्रति, एक विशेष, गुप्त पक्षपात सदैव विद्यमान रहा, यही उसका एकमात्र दोष था।
युधिष्ठिर ने यह स्पष्ट किया कि इस प्रकार की यात्रा में, मनुष्य के समस्त पुण्य-कर्म, उसे आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करते हैं, किंतु उसके शेष, अनजाने अथवा सूक्ष्म दोष, उसे मार्ग में ही रोक देते हैं, चाहे वे कितने भी सूक्ष्म क्यों न हों।
भीम, अपने हृदय में गहन शोक लिए, इस उत्तर को स्वीकार करते हुए, अपने शेष भाइयों के साथ, इस यात्रा को आगे जारी रखने के लिए विवश हुए, यह जानते हुए कि अब उन्हें, बिना पीछे मुड़े, आगे ही बढ़ते रहना है।
इस अध्याय की शिक्षा
मनुष्य के सबसे सूक्ष्म, अदृश्य दोष भी, उसकी आध्यात्मिक यात्रा में, अंततः एक बड़ी बाधा बन सकते हैं।
सहदेव एवं नकुल का पतन
यात्रा आगे बढ़ते ही, कुछ काल पश्चात्, सहदेव भी, अत्यंत थकान से निढाल होकर, भूमि पर गिर पड़े, तथा उन्होंने भी वहीं अपने प्राण त्याग दिए, यह देखकर भीम ने पुनः युधिष्ठिर से इसका कारण पूछा।
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि सहदेव, अपने ज्ञान और बुद्धिमत्ता के लिए अत्यंत विख्यात होते हुए भी, अपने भीतर, इस बात का एक सूक्ष्म अहंकार रखते थे कि उनके समान बुद्धिमान अन्य कोई भी नहीं है, यही उनका एकमात्र दोष था।
इसके कुछ काल पश्चात्, नकुल भी, इसी प्रकार, थककर भूमि पर गिर पड़े, तथा उनके प्राण भी वहीं समाप्त हो गए, भीम ने, पुनः अत्यंत व्याकुल होकर, इसका कारण जानना चाहा।
युधिष्ठिर ने स्पष्ट किया कि नकुल, अपने असाधारण सौंदर्य के लिए विख्यात थे, तथा उनके भीतर, यह सूक्ष्म भाव विद्यमान रहा कि उनके समान सुंदर अन्य कोई भी पुरुष नहीं है, यही उनका एकमात्र, सूक्ष्म दोष सिद्ध हुआ।
भीम, अपने इन दोनों छोटे भाइयों की इस क्षति से, गहन शोक में डूबते हुए भी, युधिष्ठिर के इन गहन उत्तरों से, यह समझने लगे कि इस यात्रा में, प्रत्येक व्यक्ति का सबसे सूक्ष्म अहंकार भी, अंततः उजागर होकर ही रहता है।
इस अध्याय की शिक्षा
ज्ञान अथवा सौंदर्य जैसे गुणों पर भी यदि सूक्ष्म अहंकार किया जाए, तो वह भी अंततः आत्मिक उन्नति में एक बाधा ही सिद्ध होता है।
अर्जुन का पतन
यात्रा आगे बढ़ते ही, अर्जुन भी, अत्यंत थककर, भूमि पर गिर पड़े, तथा उन्होंने भी वहीं अपने प्राण त्याग दिए, यह देखकर भीम, अपने इस परम प्रिय भाई की क्षति से, अत्यंत गहन शोक में डूब गए।
भीम ने, अत्यंत व्याकुल स्वर में, युधिष्ठिर से पूछा कि अर्जुन, जो स्वयं इतने महान, अजेय योद्धा थे, तथा जिन्होंने अनगिनत असाधारण विजयें प्राप्त कीं, वे भी आखिर क्यों इस प्रकार मार्ग में गिर पड़े।
युधिष्ठिर ने अत्यंत गम्भीर स्वर में उत्तर दिया कि अर्जुन के भीतर, यह एक सूक्ष्म अहंकार विद्यमान रहा कि वे एक ही दिन में, अपने समस्त शत्रुओं का सम्पूर्ण संहार कर सकते हैं, यह अहंकारपूर्ण विचार, उनकी वास्तविक क्षमता से कहीं अधिक था।
युधिष्ठिर ने यह भी स्पष्ट किया कि अर्जुन ने, एक अवसर पर, अन्य महान योद्धाओं का उचित सम्मान न कर, अपनी ही श्रेष्ठता का अत्यधिक दंभ प्रदर्शित किया था, यही उनका एकमात्र, सूक्ष्म किंतु महत्त्वपूर्ण दोष सिद्ध हुआ।
भीम, अपने इस सबसे प्रिय भाई की इस क्षति से गहन आघात का अनुभव करते हुए भी, युधिष्ठिर के इस गहन उत्तर को स्वीकार कर, अत्यंत भारी हृदय से, अपने शेष भाई सहदेव — अब केवल युधिष्ठिर और स्वयं भीम ही शेष रह गए थे — के साथ, इस यात्रा को आगे जारी रखा।
इस अध्याय की शिक्षा
अपनी असाधारण क्षमताओं पर भी अत्यधिक गर्व करना, चाहे वह कितना भी न्यायोचित प्रतीत हो, अंततः आत्मिक पतन का ही कारण बनता है।
भीम का पतन
अंततः, यात्रा के इस अगले चरण में, स्वयं भीम भी, अत्यंत थककर, भूमि पर गिर पड़े, तथा उन्होंने भी वहीं अपने प्राण त्याग दिए, अब युधिष्ठिर, सम्पूर्णतः अकेले, केवल उस निष्ठावान श्वान के साथ, इस यात्रा में शेष रह गए।
भीम, गिरते हुए भी, अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर से, अत्यंत क्षीण स्वर में, यह अंतिम प्रश्न पूछ बैठे कि आखिर उनका भी क्या दोष था, जिसके कारण वे भी इस प्रकार मार्ग में गिर पड़े।
युधिष्ठिर, बिना रुके, अत्यंत गम्भीर, किंतु स्नेहपूर्ण स्वर में, यह उत्तर दिया कि भीम, अपने भोजन के प्रति अत्यधिक आसक्ति रखते थे, तथा उन्होंने कभी भी, दूसरों को भोजन दिए बिना, स्वयं भोजन ग्रहण नहीं करने का व्रत नहीं लिया, तथा वे अपने बल पर भी अत्यधिक गर्व करते थे।
इस प्रकार, एक-एक कर, द्रौपदी तथा चारों पांडव, अपने-अपने सूक्ष्म, अनजाने दोषों के कारण, इस दीर्घकालिक, कठिन यात्रा में मार्ग में ही गिर पड़े, तथा उनके प्राण, वहीं इस पृथ्वी पर ही समाप्त हो गए।
युधिष्ठिर, अपने इन समस्त प्रियजनों की इस क्रमिक क्षति से, गहन शोक का अनुभव करते हुए भी, बिना एक बार भी पीछे मुड़े, अत्यंत दृढ़ संकल्प और धैर्य के साथ, अपनी इस अंतिम यात्रा को अकेले ही आगे जारी रखा।
इस अध्याय की शिक्षा
जीवन की सर्वोच्च परीक्षा में, चाहे वह कितनी भी हृदयविदारक क्यों न हो, बिना पीछे मुड़े, अपने कर्तव्य-पथ पर दृढ़ता से आगे बढ़ते रहना ही सच्चा धैर्य है।
इंद्र का आगमन
युधिष्ठिर, अब पूर्णतः अकेले, केवल उस निष्ठावान श्वान के साथ, हिमालय की उन अत्यंत ऊँची, दुर्गम चोटियों की ओर, अत्यंत धैर्य और दृढ़ता के साथ, आगे बढ़ते रहे, यह जानते हुए कि उनकी यह यात्रा भी अब समाप्ति के निकट है।
अचानक ही, एक अद्भुत, दिव्य दृश्य में, स्वयं देवराज इंद्र, अपने भव्य, स्वर्णिम रथ के साथ, आकाश से युधिष्ठिर के समक्ष प्रकट हुए, तथा उन्होंने युधिष्ठिर को, अपने इसी भौतिक शरीर के साथ, सीधे स्वर्गलोक चलने का आमंत्रण दिया।
इंद्र ने युधिष्ठिर को यह बताया कि उनकी यह असाधारण धर्मनिष्ठा, तथा इस यात्रा में उनका यह अद्वितीय धैर्य, उन्हें इस दुर्लभ सम्मान का अधिकारी बनाता है कि वे अपने इसी भौतिक शरीर के साथ, बिना मृत्यु का अनुभव किए, सीधे स्वर्गलोक में प्रवेश कर सकें।
युधिष्ठिर, इस असाधारण आमंत्रण से प्रसन्न होते हुए भी, तत्काल इस रथ पर आरूढ़ होने से पूर्व, इंद्र से यह अनुरोध किया कि जो श्वान, इस सम्पूर्ण दीर्घकालिक यात्रा में, अत्यंत निष्ठा और स्नेह के साथ उनका साथ देता रहा है, वह भी उनके साथ, इस रथ पर स्वर्गलोक जाए।
इंद्र ने, युधिष्ठिर के इस अनुरोध पर, कुछ आपत्ति व्यक्त करते हुए, यह कहा कि स्वर्गलोक में, इस प्रकार के सामान्य पशुओं के लिए कोई स्थान नहीं है, तथा युधिष्ठिर को, इस श्वान का मोह त्यागकर, अकेले ही रथ पर आरूढ़ होना चाहिए।
इस अध्याय की शिक्षा
सर्वोच्च, दुर्लभतम सम्मान के प्रलोभन के समक्ष भी, अपने प्रति निष्ठावान रहने वालों का साथ न छोड़ना, सच्चे धर्म की पराकाष्ठा है।
श्वान का रहस्योद्घाटन
युधिष्ठिर, इंद्र के इस अनुरोध के होते हुए भी, अत्यंत दृढ़ता और स्पष्टता के साथ, यह घोषणा की कि वे इस निष्ठावान श्वान को, जिसने इस सम्पूर्ण, कठिन यात्रा में उनका साथ कभी नहीं छोड़ा, किसी भी स्वर्गीय सुख के प्रलोभन में, अकेला छोड़कर नहीं जा सकते।
युधिष्ठिर ने यह स्पष्ट किया कि किसी शरणागत, निष्ठावान प्राणी का परित्याग करना, चाहे वह स्वर्ग-प्राप्ति जैसे सर्वोच्च लक्ष्य के लिए ही क्यों न हो, उनके धर्म के सर्वथा विपरीत है, तथा वे इस प्रकार का अधर्म कदापि नहीं कर सकते।
युधिष्ठिर के इस अटल, धर्मनिष्ठ निर्णय को देखकर, वह श्वान, अचानक ही, अपने वास्तविक, दिव्य स्वरूप में प्रकट हुआ — वह वास्तव में स्वयं धर्मराज (यमराज) ही थे, जो युधिष्ठिर के अपने ही पिता, तथा उनकी इस अंतिम, सर्वोच्च धर्मनिष्ठा की परीक्षा लेने हेतु, इस श्वान के रूप में प्रकट हुए थे।
धर्मराज ने, युधिष्ठिर की इस असाधारण, अटूट धर्मनिष्ठा, करुणा तथा निष्ठा से अत्यंत प्रसन्न होकर, उन्हें अपना स्नेहपूर्ण आशीर्वाद प्रदान किया, तथा यह घोषित किया कि उन्होंने अपने इस पूरे जीवन में, धर्म की इस कसौटी पर, स्वयं को हर बार सिद्ध किया है।
युधिष्ठिर, अपने पिता धर्मराज के इस असाधारण, दिव्य रहस्योद्घाटन से गहराई तक अभिभूत होकर, अत्यंत विनम्रता से उन्हें प्रणाम किया, तथा अब वे इंद्र के उस दिव्य रथ पर, धर्मराज के साथ, स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान करने हेतु तत्पर हुए।
इस अध्याय की शिक्षा
किसी भी सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भी, अपने प्रति निष्ठावान, शरणागत प्राणी का त्याग करना, कभी भी सच्चा धर्म नहीं हो सकता।
महाप्रस्थानिक पर्व का समापन
युधिष्ठिर, धर्मराज के इस स्नेहपूर्ण आशीर्वाद तथा इंद्र के इस दिव्य निमंत्रण के साथ, अपने इसी भौतिक शरीर सहित, उस स्वर्णिम रथ पर आरूढ़ होकर, स्वर्गलोक की ओर, अत्यंत गरिमामय ढंग से प्रस्थान कर गए, यह एक अत्यंत दुर्लभ, असाधारण सम्मान था।
यह घटना, सम्पूर्ण महाभारत की सर्वाधिक मार्मिक, आध्यात्मिक रूप से गहन घटनाओं में से एक सिद्ध हुई, जिसमें युधिष्ठिर की वह आजीवन धर्मनिष्ठा, अंततः अपने सर्वोच्च, दुर्लभतम पुरस्कार के रूप में प्रकट हुई।
द्रौपदी तथा चारों पांडव, जो इस यात्रा में मार्ग में ही अपने प्राण त्याग चुके थे, उनकी आत्माएँ भी, अपने-अपने संचित पुण्य-कर्मों के अनुसार, आगे चलकर, स्वर्गलोक में ही, एक-एक कर, युधिष्ठिर से पुनः मिलने वाली थीं।
इस प्रकार, पांडवों तथा द्रौपदी का यह सांसारिक जीवन, अत्यंत गरिमामय, आध्यात्मिक रूप से पूर्ण ढंग से समाप्त हुआ, तथा उनकी यह अंतिम यात्रा, आने वाली पीढ़ियों के लिए, धर्म, त्याग और निष्ठा की एक शाश्वत, प्रेरणादायी गाथा बन गई।
इस प्रकार महाप्रस्थानिक पर्व, परीक्षित के राज्याभिषेक, पांडवों तथा द्रौपदी के उस अंतिम, हिमालय की ओर के महाप्रस्थान, तथा अंततः युधिष्ठिर के अपने भौतिक शरीर सहित स्वर्गारोहण के साथ अपने समापन पर पहुँचता है, अगले स्वर्गारोहण पर्व में, स्वर्गलोक में युधिष्ठिर के उस अंतिम, गहन दर्शन-परीक्षण तथा समस्त पात्रों के पुनर्मिलन की कथा वर्णित की जाएगी।
इस अध्याय की शिक्षा
एक सम्पूर्ण जीवन, धर्म और सत्य के मार्ग पर चलकर व्यतीत किया जाए, तो उसका अंत भी, उतना ही गरिमामय और दिव्य सिद्ध होता है।
