अनुशासन पर्व
अनुशासन पर्व
भीष्म द्वारा दान-धर्म, वर्णाश्रम-कर्तव्य एवं स्त्री-पुरुष धर्म का आगे विस्तार, तथा उनका सूर्य के उत्तरायण होने पर अपने प्राण त्यागना।
उपदेश का आगे विस्तार
शांति पर्व के उस विशाल, गहन उपदेश के पश्चात् भी, भीष्म पितामह अभी भी शरशय्या पर जीवित पड़े हुए थे, तथा सूर्य के उत्तरायण होने की उस अंतिम, प्रतीक्षित घड़ी की प्रतीक्षा करते हुए, युधिष्ठिर को अपने ज्ञान का आगे विस्तार देने हेतु सहर्ष तैयार थे।
युधिष्ठिर, अपने पितामह के इस अपार, अद्वितीय ज्ञान-भंडार का पूर्ण लाभ उठाने की इच्छा से, पुनः उनके समक्ष उपस्थित हुए, तथा उनसे दान-धर्म, वर्णाश्रम-कर्तव्य तथा स्त्री-पुरुष धर्म के विषय में और भी गहन, विस्तृत ज्ञान प्राप्त करने का अनुरोध किया।
भीष्म, अपनी उस असहनीय शारीरिक पीड़ा के मध्य भी, अत्यंत उत्साह और स्नेह के साथ, युधिष्ठिर के इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए, इस नए, विस्तृत उपदेश-सत्र का आरम्भ करने के लिए सहमत हुए।
श्रीकृष्ण तथा अन्य अनेक ऋषिगण, इस अवसर पर भी उपस्थित रहे, यह जानते हुए कि भीष्म के इस अपार ज्ञान का प्रत्येक शब्द, आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य, शाश्वत निधि सिद्ध होने वाला है।
इस प्रकार, इस अत्यंत असाधारण उपदेश-सत्र का यह अगला, महत्त्वपूर्ण चरण आरम्भ हुआ, जिसमें भीष्म, अपने जीवन के इन अंतिम दिनों में भी, धर्म के अनेक गहनतम, सूक्ष्मतम पक्षों को उजागर करने वाले थे।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्चा ज्ञानी, अपने जीवन के अंतिम क्षण तक भी, सम्पूर्ण संसार के कल्याण हेतु, अपने ज्ञान को उदारतापूर्वक बाँटने से कभी नहीं थकता।
दान-धर्म का विस्तृत विवेचन
भीष्म पितामह ने, दान-धर्म के इस विस्तृत विवेचन में, विभिन्न प्रकार के दानों — गौ-दान, भूमि-दान, अन्न-दान तथा स्वर्ण-दान — के विशिष्ट महत्त्व एवं उनकी उचित विधि के विषय में, युधिष्ठिर को अत्यंत गहन उपदेश दिया।
उन्होंने विशेष रूप से गौ-दान के असाधारण महत्त्व पर बल देते हुए, यह स्पष्ट किया कि गौ, केवल एक पशु मात्र नहीं, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि के पोषण और कल्याण का एक अत्यंत पवित्र, दिव्य प्रतीक है, तथा उसका दान अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
भीष्म ने यह भी स्पष्ट किया कि दान, सदैव उचित पात्र को, उचित समय पर, तथा पूर्ण श्रद्धा और निःस्वार्थ भाव से ही दिया जाना चाहिए, अन्यथा वह अपना वास्तविक पुण्य-फल खो बैठता है।
उन्होंने अनेक मार्मिक कथाओं के माध्यम से यह भी स्पष्ट किया कि कभी-कभी, अत्यंत निर्धन व्यक्ति द्वारा दिया गया एक अल्प, किंतु श्रद्धापूर्ण दान भी, किसी धनी व्यक्ति के विशाल, अहंकारपूर्ण दान से कहीं अधिक श्रेष्ठ और पुण्यदायी सिद्ध होता है।
युधिष्ठिर, इस विस्तृत उपदेश को सुनते हुए, दान के इस गहन, आध्यात्मिक महत्त्व को पूर्णतः आत्मसात् करते गए, तथा उन्होंने यह संकल्प लिया कि वे अपने शासनकाल में, इस दान-धर्म का पूर्ण, निष्ठापूर्वक पालन करेंगे।
इस अध्याय की शिक्षा
श्रद्धा और निःस्वार्थ भाव से दिया गया अल्प दान भी, अहंकारपूर्ण विशाल दान से कहीं अधिक पुण्यदायी सिद्ध होता है।
वर्णाश्रम-कर्तव्यों का उपदेश
भीष्म पितामह ने, इसके पश्चात्, वर्णाश्रम-व्यवस्था के उस मूल सिद्धांत को विस्तार से समझाया, यह स्पष्ट करते हुए कि यह व्यवस्था, समाज में विभिन्न कर्तव्यों के सुव्यवस्थित विभाजन तथा सामंजस्यपूर्ण संचालन हेतु ही स्थापित की गई थी।
उन्होंने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र, इन चारों वर्णों के अपने-अपने विशिष्ट कर्तव्यों तथा उनकी सामाजिक जिम्मेदारियों के विषय में विस्तार से उपदेश दिया, यह स्पष्ट करते हुए कि प्रत्येक वर्ण, अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान रहकर ही, सम्पूर्ण समाज के कल्याण में योगदान दे सकता है।
भीष्म ने यह भी स्पष्ट किया कि यह वर्ण-व्यवस्था, वास्तव में जन्म से नहीं, अपितु मनुष्य के गुण, कर्म और स्वभाव से निर्धारित होनी चाहिए, तथा एक व्यक्ति का सच्चा मूल्यांकन, उसके कर्मों की शुद्धता और निष्ठा से ही किया जाना चाहिए।
उन्होंने आश्रम-व्यवस्था — ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास — के विषय में भी विस्तार से उपदेश दिया, यह स्पष्ट करते हुए कि जीवन के प्रत्येक चरण का अपना विशिष्ट उद्देश्य और कर्तव्य होता है, जिसका पालन करना अत्यंत आवश्यक है।
युधिष्ठिर, इस गहन उपदेश को सुनते हुए, यह समझने लगे कि एक सुव्यवस्थित, कल्याणकारी समाज की स्थापना हेतु, प्रत्येक व्यक्ति को अपने वर्ण और आश्रम के अनुरूप, अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना कितना आवश्यक है।
इस अध्याय की शिक्षा
मनुष्य का सच्चा मूल्यांकन, उसके जन्म से नहीं, अपितु उसके गुण, कर्म और स्वभाव की शुद्धता से ही किया जाना चाहिए।
स्त्री-धर्म का उपदेश
भीष्म पितामह ने, इसके आगे, स्त्री-धर्म के उस अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषय पर भी विस्तार से उपदेश दिया, यह स्पष्ट करते हुए कि परिवार तथा समाज की स्थिरता एवं समृद्धि में, स्त्रियों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण तथा अपरिहार्य है।
उन्होंने यह स्पष्ट किया कि एक पत्नी, अपने पति के प्रति निष्ठा, प्रेम तथा सम्मान रखते हुए, परिवार की समृद्धि और सुख-शांति की एक प्रमुख आधारशिला होती है, तथा उसका उचित सम्मान करना, प्रत्येक पुरुष का अनिवार्य कर्तव्य है।
भीष्म ने यह भी बल देकर कहा कि जिस घर में स्त्रियों का सम्मान नहीं होता, तथा जहाँ उन्हें प्रताड़ित अथवा अपमानित किया जाता है, वहाँ कभी भी सुख, समृद्धि अथवा दैवीय कृपा स्थायी रूप से नहीं टिक सकती।
उन्होंने माता की उस असाधारण, अतुलनीय महिमा का भी विशेष रूप से वर्णन किया, यह स्पष्ट करते हुए कि माता का स्थान, गुरु और देवताओं से भी कहीं ऊपर माना जाता है, तथा उसकी सेवा और सम्मान, मनुष्य का सर्वोच्च कर्तव्य है।
युधिष्ठिर, अपनी माता कुंती तथा द्रौपदी के प्रति अपने कर्तव्यों को स्मरण करते हुए, इस उपदेश को अत्यंत गहनता से आत्मसात् करने लगे, यह संकल्प लेते हुए कि वे अपने राज्य में स्त्रियों के सम्मान और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे।
इस अध्याय की शिक्षा
जिस समाज में स्त्रियों का सम्मान सुरक्षित नहीं है, वहाँ सुख, समृद्धि और दैवीय कृपा कभी भी स्थायी रूप से नहीं टिक सकती।
श्राद्ध एवं पितृ-ऋण का महत्त्व
भीष्म पितामह ने, इसके पश्चात्, पितरों के प्रति मनुष्य के उस अनिवार्य कर्तव्य — श्राद्ध तथा पितृ-तर्पण — के विषय में भी विस्तार से उपदेश दिया, यह स्पष्ट करते हुए कि अपने पूर्वजों का ऋण चुकाना, प्रत्येक मनुष्य का एक पवित्र कर्तव्य है।
उन्होंने श्राद्ध-कर्म की उचित विधि, उसके उपयुक्त समय तथा उसमें दिए जाने वाले अन्न और दान के महत्त्व के विषय में भी विस्तार से समझाया, यह स्पष्ट करते हुए कि यह कर्म, केवल एक कर्मकांड मात्र नहीं, अपितु पूर्वजों के प्रति गहन श्रद्धा और कृतज्ञता का प्रतीक है।
भीष्म ने यह भी स्पष्ट किया कि जो मनुष्य अपने पितरों के प्रति इस ऋण को उचित रीति से नहीं चुकाता, वह अपने जीवन में अनेक प्रकार की बाधाओं और अशांति का सामना कर सकता है, तथा उसकी आगे की पीढ़ियाँ भी इससे प्रभावित हो सकती हैं।
उन्होंने कुछ मार्मिक कथाओं के माध्यम से यह भी स्पष्ट किया कि पितरों की सच्ची तृप्ति, केवल भौतिक दान-सामग्री से नहीं, अपितु संतानों की सच्ची श्रद्धा, स्नेह और स्मरण से ही प्राप्त होती है।
युधिष्ठिर, इस उपदेश को सुनते हुए, अपने पूर्वजों तथा युद्ध में मारे गए अपने गुरुजनों के प्रति अपने इस कर्तव्य को गहनता से समझने लगे, तथा उन्होंने इस विधि का पूर्ण निष्ठा से पालन करने का संकल्प लिया।
इस अध्याय की शिक्षा
पूर्वजों की सच्ची तृप्ति, केवल भौतिक दान से नहीं, अपितु संतानों की सच्ची श्रद्धा, स्नेह और स्मरण से ही प्राप्त होती है।
विष्णु-सहस्रनाम का उपदेश
इस विशाल उपदेश-श्रृंखला के एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण, दिव्य क्षण में, युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से यह प्रश्न पूछा कि वह कौन सा एक ऐसा सर्वोच्च नाम अथवा स्तोत्र है, जिसके निरंतर स्मरण मात्र से ही, मनुष्य समस्त पापों और दुखों से मुक्त हो सकता है।
भीष्म पितामह, इस अत्यंत गहन, महत्त्वपूर्ण प्रश्न के उत्तर में, स्वयं भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए, उनके उन सहस्र दिव्य नामों — विष्णु सहस्रनाम — का, अत्यंत भक्तिपूर्ण, गहन स्वर में, विस्तार से पाठ करने लगे।
यह विष्णु सहस्रनाम, भगवान के उन अनंत, दिव्य गुणों, उनकी सृष्टि, पालन तथा संहार की शक्तियों, तथा उनके सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान स्वरूप का एक अत्यंत सुंदर, गहन वर्णन प्रस्तुत करता है, जो सम्पूर्ण संसार में आज भी अत्यंत श्रद्धा से पढ़ा जाता है।
युधिष्ठिर तथा सभी उपस्थित ऋषिगण, इस अत्यंत पवित्र, दिव्य स्तोत्र को अत्यंत भक्ति और श्रद्धा के साथ श्रवण करते हुए, एक गहन आध्यात्मिक शांति और आनंद का अनुभव करने लगे, जो शब्दों में वर्णन करना भी अत्यंत कठिन था।
यह विष्णु सहस्रनाम, आगे चलकर, सम्पूर्ण भारतवर्ष में, भक्ति और आध्यात्मिक साधना का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण, अमर स्तम्भ बन गया, जिसे आज भी करोड़ों भक्त, प्रतिदिन अत्यंत श्रद्धा से पढ़ते हैं।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान के दिव्य नामों का श्रद्धापूर्ण स्मरण, मनुष्य को समस्त सांसारिक दुखों और पापों से मुक्ति की ओर ले जाने वाला एक सर्वोच्च, सरल मार्ग है।
क्षमा एवं सत्य के महत्त्व पर उपदेश
भीष्म पितामह ने, विष्णु सहस्रनाम के इस दिव्य उपदेश के पश्चात्, क्षमा तथा सत्य के उन दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण गुणों के विषय में भी, युधिष्ठिर को गहन उपदेश दिया, यह स्पष्ट करते हुए कि ये दोनों ही गुण, एक सच्चे धर्मनिष्ठ व्यक्ति की पहचान हैं।
उन्होंने यह स्पष्ट किया कि क्षमा, केवल दुर्बलता का प्रतीक नहीं, अपितु वास्तव में यह सर्वाधिक शक्तिशाली, साहसी व्यक्तियों का ही गुण है, क्योंकि क्रोध और प्रतिशोध का त्याग करना, आत्म-नियंत्रण की सर्वोच्च परीक्षा होती है।
भीष्म ने सत्य के महत्त्व पर भी अत्यंत बल दिया, यह स्पष्ट करते हुए कि सत्य ही समस्त धर्मों का मूल आधार है, तथा जो व्यक्ति सदैव सत्य के मार्ग पर चलता है, वह अंततः सर्वत्र विजयी होता है, चाहे इसके लिए उसे कितना भी कष्ट क्यों न सहना पड़े।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कभी-कभी, अत्यंत विषम परिस्थितियों में, कठोर सत्य से भी अधिक महत्त्वपूर्ण, किसी की भावनाओं की रक्षा करने वाला मधुर, करुणापूर्ण मौन हो सकता है, किंतु यह अपवाद, कभी भी नियम नहीं बनना चाहिए।
युधिष्ठिर, जो स्वयं सत्य और धर्म के प्रति अपनी निष्ठा के लिए सम्पूर्ण भारतवर्ष में विख्यात थे, इस उपदेश को सुनकर, अपने इन्हीं गुणों के महत्त्व को और भी अधिक गहनता से समझने लगे।
इस अध्याय की शिक्षा
क्षमा, दुर्बलता का नहीं, अपितु सर्वाधिक शक्तिशाली, आत्म-नियंत्रित व्यक्तियों के साहस का सच्चा प्रतीक है।
सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा
इस विशाल, दीर्घकालिक उपदेश-सत्र के पूर्ण होने के पश्चात्, भीष्म पितामह, अब अत्यंत शांत, संतुष्ट मनोदशा में, सूर्य के उत्तरायण होने की उस अंतिम, प्रतीक्षित घड़ी की प्रतीक्षा करने लगे, जिसकी उन्होंने वर्षों पूर्व, अपने पिता से एक विशेष वरदान के रूप में इच्छा-मृत्यु प्राप्त की थी।
युधिष्ठिर तथा शेष पांडव, इस दौरान, नियमित रूप से भीष्म के पास आते रहे, उनकी सेवा करते रहे, तथा उनके इस अंतिम, कष्टप्रद समय में, अपनी पूर्ण श्रद्धा और स्नेह के साथ, उनके साथ खड़े रहे।
भीष्म, अपनी उस असहनीय शारीरिक पीड़ा के मध्य भी, अत्यंत धैर्य और आध्यात्मिक शांति के साथ, अपने प्राणों को त्यागने की उस उचित, दिव्य घड़ी की प्रतीक्षा करते रहे, यह जानते हुए कि यह उनके दीर्घकालिक तप और संयम का ही परिणाम है।
सम्पूर्ण कुरु साम्राज्य में, भीष्म पितामह के इस असाधारण धैर्य, ज्ञान तथा आत्म-नियंत्रण की चर्चा, अत्यंत श्रद्धा और विस्मय के साथ होने लगी, तथा उन्हें एक जीवंत आदर्श के रूप में देखा जाने लगा।
अंततः, दीर्घ प्रतीक्षा के पश्चात्, वह शुभ, दिव्य घड़ी निकट आई, जब सूर्यदेव ने अपनी दक्षिणायन गति का त्याग कर, उत्तरायण की ओर अपनी यात्रा आरम्भ की, तथा भीष्म पितामह के प्राण-त्याग का वह अंतिम, ऐतिहासिक क्षण अब निकट आ चुका था।
इस अध्याय की शिक्षा
दीर्घकालिक तप और आत्म-संयम से अर्जित शक्ति, मनुष्य को अपने अंतिम क्षण को भी, अपनी इच्छानुसार, पूर्ण शांति से चुनने का सामर्थ्य प्रदान करती है।
भीष्म का प्राण-त्याग
सूर्य के उत्तरायण होने की इस शुभ घड़ी में, युधिष्ठिर, शेष पांडव, श्रीकृष्ण, तथा अनेक ऋषिगण एवं कुरु-वंश के अन्य सदस्य, भीष्म पितामह के अंतिम दर्शन तथा उनके इस ऐतिहासिक प्राण-त्याग के साक्षी बनने हेतु, उनके समक्ष एकत्रित हुए।
भीष्म पितामह ने, अपने अंतिम क्षणों में, समस्त उपस्थित जनों को अपना अंतिम, स्नेहपूर्ण आशीर्वाद प्रदान किया, तथा युधिष्ठिर को पुनः यह स्मरण कराया कि वे सदैव धर्म, सत्य और करुणा के मार्ग पर ही अडिग रहें।
भीष्म, अपनी उस असाधारण योग-शक्ति का प्रयोग करते हुए, अत्यंत शांत, संतुष्ट मनोदशा में, अपने प्राणों को धीरे-धीरे अपने शरीर से मुक्त करने लगे, यह एक अत्यंत दिव्य, अलौकिक दृश्य था, जिसे देखकर सभी उपस्थित जन गहन श्रद्धा और विस्मय से भर उठे।
इस प्रकार, भीष्म पितामह, अपने उस दीर्घकालिक, कष्टप्रद इंतजार के पश्चात्, अंततः इस संसार से, अत्यंत शांतिपूर्वक, अपनी ही इच्छा से, प्रस्थान कर गए, तथा उनका यह अंत, सम्पूर्ण महाभारत की सर्वाधिक गरिमामय, अद्वितीय घटनाओं में से एक के रूप में सदा स्मरण किया जाता है।
सम्पूर्ण कुरु साम्राज्य, इस असाधारण, ज्ञानी योद्धा के इस अंत पर, गहन शोक में डूब गया, यद्यपि सभी को यह भी गहन संतोष था कि भीष्म ने, अपने जीवन के इन अंतिम क्षणों में भी, सम्पूर्ण संसार को एक अमूल्य, शाश्वत ज्ञान प्रदान किया।
इस अध्याय की शिक्षा
जिस जीवन ने अपने अंतिम क्षण तक भी ज्ञान और धर्म का प्रकाश फैलाया हो, उसका अंत, शोक से कहीं अधिक, गहन श्रद्धा और कृतज्ञता का विषय बनता है।
अनुशासन पर्व का समापन
भीष्म पितामह के इस अत्यंत गरिमामय, ऐतिहासिक प्राण-त्याग के पश्चात्, युधिष्ठिर तथा शेष पांडवों ने, उनके शरीर का, सम्पूर्ण राजकीय सम्मान तथा विधिवत रीति से, अंतिम संस्कार सम्पन्न किया।
युधिष्ठिर, अपने पितामह से प्राप्त इस अपार, अमूल्य ज्ञान — राजधर्म, आपद्धर्म, मोक्षधर्म, दान-धर्म, वर्णाश्रम-कर्तव्य, स्त्री-धर्म तथा विष्णु सहस्रनाम — को अपने हृदय में सदैव सँजोए रखने का दृढ़ संकल्प लेकर, हस्तिनापुर लौट गए।
श्रीकृष्ण, इस सम्पूर्ण घटनाक्रम के साक्षी बनने के पश्चात्, अब द्वारका की ओर अपनी यात्रा पूर्ण करने के लिए प्रस्थान करने की तैयारी करने लगे, यद्यपि उन्होंने युधिष्ठिर को यह आश्वासन दिया कि वे आवश्यकता पड़ने पर सदैव उनकी सहायता हेतु उपस्थित रहेंगे।
सम्पूर्ण कुरु साम्राज्य, अब भीष्म पितामह के इस अंत के साथ ही, महाभारत की उस पीढ़ी के अंतिम, महानतम स्तम्भ को भी खो चुका था, जिसने कुरुवंश के इतिहास को, अपने जन्म से लेकर अपने अंत तक, प्रत्यक्ष रूप से आकार दिया था।
इस प्रकार अनुशासन पर्व, दान-धर्म, वर्णाश्रम-कर्तव्य, स्त्री-धर्म तथा विष्णु सहस्रनाम के उस विस्तृत उपदेश, तथा अंततः भीष्म पितामह के उस अत्यंत गरिमामय प्राण-त्याग के साथ अपने समापन पर पहुँचता है, अगले अश्वमेधिक पर्व में, युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ की कथा वर्णित की जाएगी।
इस अध्याय की शिक्षा
एक महान आत्मा का सच्चा अंत, उसके शरीर के त्याग से नहीं, अपितु उसके छोड़े गए ज्ञान और आदर्शों की शाश्वत विरासत से मापा जाता है।
