कर्ण पर्व

कर्ण पर्व

कर्ण का सेनापतित्व, शल्य का सारथ्य, तथा अर्जुन और कर्ण के बीच का वह अंतिम, नियति-निर्धारित द्वंद्व-युद्ध जिसमें रथ का पहिया धँसने पर कर्ण मारे गए।

अध्याय 1

कर्ण का सेनापति-पद ग्रहण

द्रोणाचार्य के उस अत्यंत विवादास्पद, हृदयविदारक अंत के पश्चात्, सम्पूर्ण कौरव-सेना में गहन शोक और स्तब्धता व्याप्त हो गई, अनेक योद्धा यह मानने को भी तैयार नहीं थे कि जिस आचार्य ने अपने अस्त्र त्यागकर ध्यानमग्न अवस्था में प्राण त्यागे, वे अब इस संसार में नहीं रहे।

दुर्योधन, इस गहन शोक के मध्य भी, आगामी युद्ध की अनिवार्यता को समझते हुए, नए सेनापति के चयन हेतु शीघ्रता से विचार करने लगा, तथा उसकी दृष्टि स्वाभाविक रूप से कर्ण की ओर गई, जो दीर्घकाल से इस असाधारण दायित्व की मौन प्रतीक्षा में थे।

कर्ण ने, अपने प्रिय मित्र दुर्योधन के इस प्रस्ताव को अत्यंत गम्भीरता और कृतज्ञता के साथ स्वीकार किया, तथा उसे यह दृढ़ आश्वासन दिया कि वे अपने सम्पूर्ण पराक्रम, कौशल और दिव्य अस्त्रों के बल पर, पांडव-सेना का सम्पूर्ण संहार कर, उसे निश्चित विजय दिलाएँगे।

सम्पूर्ण कौरव-सेना में, कर्ण के इस सेनापति-पद ग्रहण से एक नवीन उत्साह और आशा का संचार हुआ, अनेक योद्धाओं ने यह माना कि अब अंततः वह क्षण आ गया है जब कर्ण अपने वास्तविक, असाधारण पराक्रम को सम्पूर्ण संसार के समक्ष प्रदर्शित करेंगे।

इस प्रकार, द्रोणाचार्य के अंत के साथ ही, महाभारत के इस भीषण संग्राम ने एक नया, अत्यंत निर्णायक मोड़ लिया, जिसमें अब कर्ण और अर्जुन के मध्य उस दीर्घकाल से प्रतीक्षित, नियति-निर्धारित द्वंद्व-युद्ध की पृष्ठभूमि रची जा चुकी थी।

इस अध्याय की शिक्षा

जब दायित्व का समय आता है, तो उसे विनम्रता और दृढ़ता के साथ स्वीकार करना ही सच्चे साहस की पहचान है।

अध्याय 2

शल्य को सारथी बनाने की शर्त

कर्ण, अपने सेनापतित्व के इस नए दायित्व के मध्य, दुर्योधन के समक्ष एक विशेष, अत्यंत महत्त्वपूर्ण इच्छा प्रकट करते हुए बोले कि जिस प्रकार अर्जुन के रथ का सारथ्य स्वयं भगवान श्रीकृष्ण करते हैं, उसी प्रकार उनके रथ का सारथ्य भी मद्रराज शल्य को ही करना चाहिए, क्योंकि शल्य अश्व-विद्या में अद्वितीय निपुण थे।

दुर्योधन, कर्ण की इस इच्छा को अत्यंत उचित मानते हुए, अत्यंत विनम्रता और सम्मान के साथ शल्य के पास गया, तथा उनसे यह अनुरोध किया कि वे कर्ण के सारथी का यह गुरुतर दायित्व स्वीकार करें, यह कहते हुए कि इससे कर्ण की शक्ति और भी अधिक अजेय सिद्ध होगी।

शल्य, प्रारम्भ में, अपने आपको एक सूतपुत्र के सारथी के रूप में देखे जाने से अत्यंत अपमानित अनुभव करते हुए, इस प्रस्ताव पर घोर क्रोध और आपत्ति व्यक्त करने लगे, यह स्मरण कराते हुए कि वे स्वयं एक शक्तिशाली राज्य के सम्राट हैं, न कि किसी का सारथी बनने योग्य।

दुर्योधन ने, अत्यंत चतुराई और धैर्य के साथ, शल्य की प्रशंसा करते हुए उन्हें यह समझाया कि यह कार्य किसी अपमान का नहीं, अपितु परम सम्मान का विषय है, तथा अंततः शल्य इस अनुरोध को स्वीकार करने पर सहमत हो गए, किंतु एक विशेष शर्त के साथ — कि युद्ध के दौरान वे जो भी वचन बोलें, कर्ण उन्हें बिना किसी प्रतिवाद के सहन करेंगे।

कर्ण ने, अपने इस दायित्व की गम्भीरता को समझते हुए, शल्य की इस असामान्य शर्त को भी सहर्ष स्वीकार कर लिया, बिना यह जाने कि आगामी युद्ध के दौरान यह शर्त उनके लिए कितनी गहरी मानसिक पीड़ा का कारण सिद्ध होने वाली है।

इस अध्याय की शिक्षा

कभी-कभी महानतम लक्ष्यों की प्राप्ति के मार्ग में, अपने ही सम्माननीय सहयोगियों से गहरा अपमान सहना भी अनिवार्य हो जाता है।

अध्याय 3

शल्य द्वारा कर्ण का निरंतर उपहास

युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करते समय, तथा युद्ध के प्रत्येक चरण के मध्य, शल्य ने अपनी उस शर्त का पूर्ण लाभ उठाते हुए, कर्ण की जाति, उनके सूतपुत्र होने, तथा उनके अतीत के अनेक अपमानों को बार-बार स्मरण कराना आरम्भ कर दिया, यह कहते हुए कि वे कभी भी अर्जुन के समक्ष नहीं टिक सकेंगे।

शल्य ने बार-बार अर्जुन के असाधारण पराक्रम, उनके दिव्य अस्त्रों तथा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के उनके सारथी होने की महिमा का गुणगान करते हुए, कर्ण के आत्मविश्वास को निरंतर आघात पहुँचाने का प्रयास किया, यह आशा करते हुए कि सम्भवतः इससे कर्ण युद्ध से विमुख हो जाएँ।

कर्ण, अपने भीतर गहन क्रोध और पीड़ा को दबाते हुए भी, अपनी दी गई शर्त का पूर्णतः पालन करते रहे, तथा अत्यंत धैर्य और संयम के साथ, शल्य के इन कटु वचनों को सहन करते हुए, अपने कर्तव्य-पथ पर अडिग बने रहे, यह मानते हुए कि यह भी उनकी नियति का एक अनिवार्य अंग है।

कभी-कभी, कर्ण, अत्यंत क्षुब्ध होकर, शल्य को भी कटु उत्तर दे बैठते, अपने स्वयं के असाधारण पराक्रम और अतीत की अनेक विजयों को स्मरण कराते हुए, किंतु शल्य अपनी बातों से तनिक भी विचलित नहीं होते थे, अपितु और भी अधिक तीव्रता से अपना उपहास जारी रखते।

इस प्रकार, कर्ण को अपने ही सारथी से निरंतर मानसिक पीड़ा सहते हुए, युद्धभूमि में अपने असाधारण पराक्रम का प्रदर्शन करना था, यह एक ऐसी असाधारण, अकेली चुनौती थी जिसका सामना किसी अन्य महारथी को नहीं करना पड़ा।

इस अध्याय की शिक्षा

सच्चा धैर्य वही है जो अपमान और आघात के मध्य भी अपने कर्तव्य-पथ से विचलित न हो।

अध्याय 4

युद्ध के सत्रहवें दिन का आरम्भ

सूर्योदय के साथ ही, कुरुक्षेत्र की रणभूमि पुनः शंख-ध्वनियों, रथों की गड़गड़ाहट तथा योद्धाओं की सिंहगर्जना से गूँज उठी, दोनों ही सेनाएँ, इस युद्ध के सत्रहवें, अत्यंत निर्णायक दिन के लिए पूर्ण रूप से सुसज्जित होकर आमने-सामने खड़ी हो गईं।

कर्ण, अपने नवीन सेनापतित्व के इस प्रथम दिवस पर, अत्यंत उत्साह और आत्मविश्वास के साथ, कौरव-सेना का नेतृत्व करते हुए, पांडव-सेना पर एक भीषण, अभूतपूर्व आक्रमण आरम्भ किया, उनके बाणों की वर्षा ने शीघ्र ही पांडव-सेना के अनेक भागों में भारी विनाश उत्पन्न कर दिया।

युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव तथा अन्य अनेक महारथी, कर्ण के इस असाधारण आक्रमण का सामना करने हेतु विभिन्न दिशाओं में आगे बढ़े, जबकि अर्जुन, अन्य कौरव-सेना के भागों में व्यस्त होने के कारण, अभी तक कर्ण के प्रत्यक्ष सम्मुख नहीं आए थे।

इसी मध्य, भीम और दुःशासन के बीच भी एक भीषण द्वंद्व-युद्ध आरम्भ हुआ, भीम, द्रौपदी के उस भीषण अपमान को स्मरण करते हुए, जिसमें दुःशासन ने उसके केश पकड़कर उसे सभा में घसीटा था, अत्यंत क्रोध से प्रज्वलित होकर, अपनी उस दीर्घकालिक प्रतिज्ञा को अंततः पूर्ण करने के लिए आगे बढ़े।

सम्पूर्ण रणभूमि में, इस दिन, एक साथ अनेक भीषण, निर्णायक द्वंद्व-युद्ध चल रहे थे, तथा प्रत्येक पक्ष को यह भलीभाँति ज्ञात था कि इस दिन की घटनाएँ, इस महासंग्राम के अंतिम परिणाम को गहराई से प्रभावित करने वाली सिद्ध होंगी।

इस अध्याय की शिक्षा

प्रत्येक नए दायित्व के प्रथम दिवस पर, अपने सम्पूर्ण साहस और कौशल का प्रदर्शन करना ही आगे की सफलता की नींव रखता है।

अध्याय 5

भीम-दुःशासन द्वंद्व एवं दुःशासन-वध

भीम और दुःशासन के मध्य आरम्भ हुआ यह द्वंद्व-युद्ध शीघ्र ही अत्यंत भीषण, रक्तरंजित रूप धारण कर गया, दोनों महारथी पहले बाणों से, फिर गदाओं से, तथा अंततः निःशस्त्र होकर, अपनी समस्त शक्ति के साथ एक-दूसरे पर टूट पड़े।

भीम ने, अपने असाधारण बल का प्रयोग करते हुए, दुःशासन के रथ, धनुष तथा कवच को क्षणभर में ही ध्वस्त कर दिया, तथा अंततः उसे भूमि पर पटककर, अपनी उस भीषण, दीर्घकालिक प्रतिज्ञा को स्मरण करते हुए, उसकी छाती को चीरकर उसका रक्त पीने के लिए आगे बढ़े।

सम्पूर्ण रणभूमि में उपस्थित सभी योद्धा, भीम के इस अभूतपूर्व, भयंकर कृत्य को देखकर स्तब्ध रह गए, किंतु भीम ने, द्रौपदी के उस भीषण अपमान को स्मरण करते हुए, अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करते हुए घोषणा की कि उन्होंने इस संसार में अब तक का सर्वाधिक स्वादिष्ट पेय चखा है।

इसके पश्चात्, भीम ने दुःशासन के उसी रक्त से अपने केशों को स्पर्श कर, यह उद्घोषणा की कि द्रौपदी अब अपने केशों को पुनः बाँध सकती है, जिन्हें उसने उस भीषण अपमान के पश्चात् से खुला ही रखा था, यह प्रतिज्ञा भी इस प्रकार पूर्ण हुई।

दुर्योधन तथा सम्पूर्ण कौरव-सेना, अपने प्रिय भ्राता दुःशासन की इस अत्यंत भीषण, अपमानजनक मृत्यु से गहन शोक और भय में डूब गई, यह घटना कौरव-पक्ष के मनोबल पर एक अत्यंत गहरा, विनाशकारी आघात सिद्ध हुई।

इस अध्याय की शिक्षा

अन्याय के विरुद्ध ली गई प्रतिज्ञा, चाहे उसे पूर्ण होने में कितना भी समय क्यों न लगे, अंततः अवश्य ही फलीभूत होती है।

अध्याय 6

द्रौपदी की प्रतिज्ञा-पूर्ति

जब यह समाचार द्रौपदी तक पहुँचा कि भीम ने अंततः दुःशासन का वध कर, अपनी उस भीषण प्रतिज्ञा को पूर्ण कर लिया है, तो उसके हृदय में वर्षों से संचित पीड़ा, अपमान और प्रतीक्षा का यह गहन बोझ, अश्रुओं के रूप में उमड़ पड़ा।

द्रौपदी, जो उस भीषण चीरहरण की घटना के पश्चात् से अपने केशों को खुला ही रखे हुए थी, यह प्रतिज्ञा लेते हुए कि जब तक दुःशासन के रक्त से उन्हें पुनः न बाँधा जाए, वे इसी अवस्था में रहेंगे, अब अत्यंत गहन भावुकता के साथ इस दीर्घकालिक प्रतिज्ञा की पूर्ति का साक्षी बनी।

पांडव-शिविर में, इस समाचार से एक विचित्र, मिश्रित भावनाओं का वातावरण उत्पन्न हुआ — एक ओर दुःशासन के अत्यंत भीषण अंत की गम्भीरता थी, तो दूसरी ओर, वर्षों से संचित उस अन्याय के प्रतिशोध की गहन संतुष्टि भी थी।

युधिष्ठिर, भीम के इस कृत्य की उग्रता से कुछ हद तक विचलित होते हुए भी, इस बात को स्वीकार करने पर विवश हुए कि दुःशासन ने अपने उस भीषण अपराध का ही यह अनिवार्य फल प्राप्त किया है, तथा द्रौपदी को अब इस दीर्घकालिक अपमान से मुक्ति मिली है।

इस प्रकार, द्यूत-सभा की उस भीषण घटना के तेरह वर्षों पश्चात्, द्रौपदी की वह प्रतिज्ञा, जो सम्पूर्ण भारतवर्ष में सुविख्यात हो चुकी थी, अंततः पूर्ण हुई, तथा यह घटना धर्म की अंतिम विजय के एक सुदृढ़ प्रतीक के रूप में सदा स्मरण की गई।

इस अध्याय की शिक्षा

अन्याय सहने वाले की पीड़ा और धैर्य, चाहे कितना भी समय क्यों न लगे, अंततः न्याय की विजय में परिणत होती है।

अध्याय 7

कर्ण का नकुल से युद्ध एवं क्षमादान

इसी रणभूमि के एक अन्य भाग में, कर्ण का सामना नकुल से हुआ, तथा दोनों के मध्य एक अत्यंत तीव्र, कुशलतापूर्ण द्वंद्व-युद्ध आरम्भ हुआ, कर्ण ने शीघ्र ही अपने असाधारण कौशल से नकुल के रथ, धनुष तथा कवच को ध्वस्त कर, उन्हें पूर्णतः असहाय अवस्था में ला खड़ा किया।

कर्ण, अपनी तलवार नकुल के गले तक ले जाकर, उन्हें भूमि पर गिराकर, यह अवसर प्राप्त कर चुके थे कि वे क्षणभर में ही नकुल का अंत कर सकते थे, किंतु उन्होंने अचानक ही अपना हाथ रोक लिया, तथा अपनी माता कुंती को दिए गए उस गुप्त वचन को स्मरण किया।

कर्ण ने, नकुल के सिर को स्नेहपूर्वक स्पर्श करते हुए, उन्हें यह परामर्श दिया कि वे भविष्य में अधिक कुशल योद्धाओं से युद्ध करने से पूर्व, अपने कौशल को और अधिक निखारें, तथा उन्हें जीवनदान देकर, वहाँ से लौट जाने का आदेश दिया।

नकुल, इस अप्रत्याशित क्षमादान से अत्यंत विस्मित और लज्जित होते हुए, अपने शिविर की ओर लौट गए, यह समझ न पाते हुए कि आखिर किस कारण से कर्ण ने, इतने सुनिश्चित अवसर के होते हुए भी, उन्हें जीवनदान क्यों प्रदान किया।

यह घटना, कर्ण द्वारा कुंती को दिए गए उस गुप्त वचन का प्रथम, प्रत्यक्ष प्रमाण थी, जिसमें उन्होंने वचन दिया था कि वे अर्जुन को छोड़कर, शेष चारों पांडवों में से किसी का भी अंत नहीं करेंगे, चाहे युद्धभूमि में परिस्थिति कैसी भी क्यों न हो।

इस अध्याय की शिक्षा

दिया गया गुप्त वचन, चाहे युद्धभूमि की सर्वाधिक विषम परिस्थिति में भी, सच्चे धर्मनिष्ठ व्यक्ति को अपने मार्ग से विचलित नहीं कर पाता।

अध्याय 8

कर्ण का युधिष्ठिर से युद्ध एवं अपमान

इसी दिन, कर्ण का सामना स्वयं युधिष्ठिर से भी हुआ, तथा दोनों के मध्य एक अत्यंत तीव्र द्वंद्व-युद्ध आरम्भ हुआ, कर्ण ने अपने असाधारण कौशल से शीघ्र ही युधिष्ठिर को पूर्णतः परास्त कर, उन्हें रथ से नीचे गिरा दिया।

कर्ण ने, युधिष्ठिर को असहाय अवस्था में देखकर, उन्हें अत्यंत कटु शब्दों में यह उपहास किया कि वे धर्मराज होते हुए भी युद्ध-कौशल में अत्यंत निर्बल हैं, तथा उन्हें यह परामर्श दिया कि वे युद्धभूमि का त्याग कर, केवल धर्म-ग्रंथों के पठन-पाठन तक ही सीमित रहें।

किंतु इसके पश्चात्, कर्ण ने भी अपनी उसी गुप्त प्रतिज्ञा को स्मरण करते हुए, युधिष्ठिर का अंत करने से स्वयं को रोक लिया, तथा उन्हें केवल अपने धनुष के पिछले भाग से स्पर्श कर, जीवनदान देते हुए, वहाँ से चले जाने का आदेश दिया।

युधिष्ठिर, इस अत्यंत अपमानजनक पराजय और कर्ण के उन कटु वचनों से गहन आघात और लज्जा का अनुभव करते हुए, अत्यंत क्षुब्ध, आहत मनोदशा में अपने शिविर की ओर लौट गए, उनका आत्मविश्वास इस घटना से गहराई तक हिल चुका था।

यह घटना, यद्यपि युधिष्ठिर के लिए अत्यंत अपमानजनक सिद्ध हुई, किंतु इसने आगे चलकर एक ऐसी शृंखला की घटनाओं को जन्म दिया, जिसने स्वयं अर्जुन और युधिष्ठिर के मध्य के सम्बन्धों की भी गहन परीक्षा ली।

इस अध्याय की शिक्षा

अपमान का क्षण, चाहे कितना भी कटु क्यों न हो, कभी-कभी आगे की एक बड़ी, महत्त्वपूर्ण घटना की पृष्ठभूमि रचता है।

अध्याय 9

युधिष्ठिर का क्रोध एवं अर्जुन का दुर्भाग्यपूर्ण वचन

जब अर्जुन को यह समाचार मिला कि युधिष्ठिर कर्ण द्वारा पराजित और अपमानित होकर शिविर लौट आए हैं, तो वे अत्यंत चिंतित होकर, अपने बड़े भाई की कुशलक्षेम जानने हेतु शीघ्रता से शिविर की ओर गए, जहाँ युधिष्ठिर विश्राम कर रहे थे।

युधिष्ठिर, अपने उस गहन अपमान की पीड़ा और क्रोध के अतिरेक में, अर्जुन को देखते ही, उन पर अत्यंत कटु आरोप लगाने लगे, यह कहते हुए कि यदि उनके पास वह अद्वितीय गांडीव धनुष है, तथा स्वयं श्रीकृष्ण जैसा सारथी है, तो अब तक कर्ण का अंत क्यों नहीं हुआ।

अर्जुन, अपने बड़े भाई के इस अप्रत्याशित, अत्यंत कटु आक्षेप से गहन आघात का अनुभव करते हुए, अपनी वह पुरानी प्रतिज्ञा स्मरण कर बैठे, जिसमें उन्होंने वचन दिया था कि जो भी उनके गांडीव धनुष की क्षमता पर संदेह करेगा, वे उसका तत्काल वध कर देंगे।

इस भीषण, आंतरिक द्वंद्व में फँसकर, अर्जुन ने अपनी तलवार उठाई, तथा अपने ही परम आदरणीय, ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर के प्राण लेने हेतु आगे बढ़े, यह देखकर सम्पूर्ण शिविर में उपस्थित सभी लोग स्तब्ध और भयभीत रह गए।

यह वह अत्यंत विकट, हृदयविदारक क्षण था, जिसमें एक ओर भ्रातृ-प्रेम, तथा दूसरी ओर एक दी गई प्रतिज्ञा की मर्यादा, दोनों ही आपस में टकरा रहे थे, तथा इस स्थिति को सुलझाने हेतु स्वयं श्रीकृष्ण को तत्काल हस्तक्षेप करना पड़ा।

इस अध्याय की शिक्षा

क्रोध और पीड़ा के क्षण में कहे गए वचन, कभी-कभी अपने ही सबसे प्रिय सम्बन्धों को भी गहन संकट में डाल सकते हैं।

अध्याय 10

श्रीकृष्ण की अद्भुत बुद्धि — संकट का समाधान

श्रीकृष्ण, इस अत्यंत विकट परिस्थिति को तत्काल समझते हुए, अर्जुन के समक्ष आकर, अत्यंत शांत किंतु दृढ़ स्वर में उन्हें यह स्मरण कराया कि ज्येष्ठ भ्राता की हत्या, किसी भी प्रतिज्ञा से कहीं अधिक गम्भीर, अक्षम्य पाप सिद्ध होगी।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह अद्भुत, सूक्ष्म बुद्धि प्रदान की कि किसी को कठोरतम शब्दों में अपमानित करना भी, उसके प्राण लेने के ही समतुल्य माना जाता है, अतः अर्जुन अपनी प्रतिज्ञा का पालन, युधिष्ठिर को कटु वचन कहकर भी कर सकते हैं, बिना उनके प्राण लिए।

अर्जुन ने, श्रीकृष्ण के इस परामर्श का अनुसरण करते हुए, युधिष्ठिर को उनके नाम से सम्बोधित कर, यह कहा कि यदि कोई अपने से छोटे को उसके नाम से पुकारे, तो यह भी उसके वध के ही समतुल्य अपमान माना जाता है, इस प्रकार उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा को तकनीकी रूप से पूर्ण किया।

किंतु इसके तुरंत पश्चात्, अर्जुन को अपनी इस दूसरी प्रतिज्ञा का स्मरण हुआ, जिसमें उन्होंने वचन दिया था कि जो भी उन्हें अपमानित करेगा, वे उसका वध कर देंगे, अतः उन्होंने इस अपमान के प्रतिकारस्वरूप, अपने ही प्राण त्यागने हेतु अपनी तलवार उठा ली।

श्रीकृष्ण ने पुनः अत्यंत त्वरित बुद्धि का प्रयोग करते हुए, अर्जुन को यह समझाया कि अपनी ही प्रशंसा करना भी, स्वयं को अपमानित करने के ही समतुल्य माना जाता है, अतः अर्जुन ने अपने ही गुणों की मुक्तकंठ से प्रशंसा कर, इस अत्यंत विकट संकट का शांतिपूर्ण समाधान प्राप्त किया।

इस अध्याय की शिक्षा

गहनतम संकट में भी, सच्ची बुद्धि वह मार्ग खोज लेती है जिसमें प्रतिज्ञा और प्रेम, दोनों की ही रक्षा हो सके।

अध्याय 11

अर्जुन का पश्चाताप एवं युधिष्ठिर से क्षमा-याचना

इस अत्यंत विकट संकट के शांत होने के पश्चात्, अर्जुन को अपने उस क्षणिक क्रोध और अपने ज्येष्ठ भ्राता के विरुद्ध उठाए गए शस्त्र पर गहन पश्चाताप और लज्जा का अनुभव हुआ, वे अत्यंत विनम्रता से युधिष्ठिर के समक्ष क्षमा-याचना हेतु उपस्थित हुए।

युधिष्ठिर, जो स्वयं भी अपने उस क्षणिक क्रोध और अर्जुन के प्रति कहे गए अनुचित, कटु वचनों पर गहन पश्चाताप का अनुभव कर रहे थे, अर्जुन को हृदय से लगाकर, उन्हें स्नेहपूर्वक क्षमा प्रदान की, तथा उन्हें आश्वस्त किया कि उनका क्रोध केवल क्षणिक निराशा का ही परिणाम था।

अर्जुन ने, इसके पश्चात्, अपने ज्येष्ठ भ्राता से यह दृढ़ वचन दिया कि वे अब निश्चित रूप से कर्ण का सामना करेंगे, तथा उन्हें अंततः पराजित कर, इस दीर्घकालिक शत्रुता का निर्णायक अंत करेंगे, चाहे इसके लिए उन्हें कोई भी मूल्य क्यों न चुकाना पड़े।

श्रीकृष्ण, इन दोनों भ्राताओं के मध्य इस स्नेहपूर्ण, हृदयस्पर्शी पुनर्मिलन को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए, तथा उन्होंने अर्जुन को यह परामर्श दिया कि अब वे अपना सम्पूर्ण ध्यान और शक्ति, कर्ण के साथ होने वाले उस अंतिम, निर्णायक द्वंद्व-युद्ध पर केंद्रित करें।

इस प्रकार, इस अत्यंत विकट पारिवारिक संकट के शांतिपूर्ण समाधान के साथ ही, अर्जुन, नए सिरे से दृढ़ संकल्प और स्पष्ट लक्ष्य के साथ, कर्ण की खोज में रणभूमि की ओर पुनः प्रस्थान कर गए।

इस अध्याय की शिक्षा

सच्चा प्रेम वह है जो क्षणिक क्रोध के पश्चात् भी, विनम्र क्षमा-याचना और स्नेह से पुनः सुदृढ़ हो सके।

अध्याय 12

अर्जुन-कर्ण के अंतिम द्वंद्व का आरम्भ

अंततः, इस दीर्घकाल से प्रतीक्षित, नियति-निर्धारित क्षण का आगमन हुआ, जब अर्जुन और कर्ण, दोनों ही महारथी, अपने-अपने रथों पर आरूढ़ होकर, सम्पूर्ण रणभूमि के केंद्र में, एक-दूसरे के सम्मुख आ खड़े हुए, दोनों पक्षों की सेनाएँ इस अभूतपूर्व दृश्य को देखने हेतु स्तब्ध होकर रुक गईं।

कर्ण और अर्जुन के मध्य आरम्भ हुआ यह द्वंद्व-युद्ध, महाभारत के इस भीषण संग्राम के सर्वाधिक भव्य, रोमांचकारी युद्धों में से एक सिद्ध हुआ, दोनों ही महारथी अपने-अपने दिव्य अस्त्रों और असाधारण कौशल का पूर्ण प्रदर्शन करने लगे।

बाणों की एक ऐसी सघन वर्षा आरम्भ हुई कि सम्पूर्ण आकाश ही बाणों से आच्छादित प्रतीत होने लगा, दोनों योद्धा एक-दूसरे के प्रत्येक अस्त्र का, अद्वितीय कौशल के साथ, समुचित प्रत्युत्तर देते रहे, तथा दीर्घकाल तक कोई भी पक्ष स्पष्ट रूप से हावी नहीं हो सका।

श्रीकृष्ण, अर्जुन के सारथी के रूप में, अत्यंत कुशलतापूर्वक रथ का संचालन करते हुए, अर्जुन को प्रत्येक क्षण सतर्क और सुरक्षित रखने का भरसक प्रयास करते रहे, यह भलीभाँति जानते हुए कि कर्ण एक अत्यंत असाधारण, शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी है।

इसी मध्य, शल्य भी कर्ण को निरंतर प्रोत्साहित करते हुए, उन्हें अपने सम्पूर्ण पराक्रम का प्रदर्शन करने हेतु उकसाते रहे, यद्यपि उनके शब्दों में अभी भी वह पुराना उपहास कुछ मात्रा में शेष था।

इस अध्याय की शिक्षा

जब नियति दो असाधारण प्रतिद्वंद्वियों को आमने-सामने ले आती है, तो वह संघर्ष इतिहास में सदा के लिए अमर हो जाता है।

अध्याय 13

नागास्त्र एवं अश्वसेन की कथा

इस भीषण द्वंद्व-युद्ध के मध्य, कर्ण ने एक अत्यंत विशेष, भयंकर बाण का संधान किया, जिसमें एक सर्प, जिसका नाम अश्वसेन था, गुप्त रूप से निवास कर रहा था, यह वही सर्प था जिसकी माता को अर्जुन ने खांडव-वन दहन के समय भस्म कर दिया था, तथा जो अपनी माता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने हेतु दीर्घकाल से अवसर की प्रतीक्षा में था।

अश्वसेन ने, इस अवसर का लाभ उठाते हुए, कर्ण को गुप्त रूप से यह सुझाव दिया कि यह बाण निश्चित रूप से अर्जुन का अंत कर देगा, तथा कर्ण ने, इस सर्प की वास्तविक पहचान से अनभिज्ञ रहते हुए, अपने सम्पूर्ण बल के साथ इस भयंकर बाण को अर्जुन की ओर छोड़ दिया।

श्रीकृष्ण, अपनी दिव्य दृष्टि से इस बाण के भीतर छिपे उस गहन खतरे को तत्काल पहचान गए, तथा उन्होंने अत्यंत त्वरित बुद्धि का प्रयोग करते हुए, अपने पैर से रथ को भूमि में कुछ गहराई तक दबा दिया, जिससे अर्जुन का सम्पूर्ण रथ ही क्षणभर के लिए नीचे धँस गया।

इस अप्रत्याशित घटना के कारण, वह भयंकर बाण, अर्जुन के प्राणघातक अंगों को स्पर्श करने के स्थान पर, केवल उनके मुकुट को ही उड़ा ले गया, इस प्रकार श्रीकृष्ण की इस अद्भुत सतर्कता ने अर्जुन के प्राणों की रक्षा की।

अश्वसेन, इस असफलता से अत्यंत निराश होकर, कर्ण से पुनः एक अवसर की याचना करने लगा, किंतु कर्ण ने, यह मानते हुए कि एक सच्चा योद्धा एक ही बाण को दो बार प्रयुक्त नहीं करता, उस सर्प के इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया, तथा अश्वसेन वहाँ से निराश होकर लौट गया।

इस अध्याय की शिक्षा

सतर्क बुद्धि और त्वरित निर्णय, अत्यंत भीषण, अप्रत्याशित संकट के क्षण में भी प्राणों की रक्षा कर सकते हैं।

अध्याय 14

कर्ण पर संचित शापों का प्रभाव

इस भीषण युद्ध के चरम पर पहुँचते ही, कर्ण के जीवन में संचित हुए वे समस्त शाप, जो उन्होंने अनजाने में अथवा नियतिवश प्राप्त किए थे, अब एक साथ ही फलीभूत होने लगे, यह वह क्षण था जिसकी छाया कर्ण के सम्पूर्ण जीवन पर सदैव मंडराती रही थी।

गुरु परशुराम का वह शाप, जिसमें उन्होंने कर्ण को यह अभिशाप दिया था कि अपने सर्वाधिक आवश्यक क्षण में वे अपनी सर्वोच्च अस्त्र-विद्या को पूर्णतः विस्मृत कर बैठेंगे, अब इसी अंतिम, निर्णायक युद्ध में स्वयं को प्रकट करने लगा।

इसके साथ ही, उस निर्दोष ब्राह्मण की गाय की अनजाने में हुई मृत्यु का वह शाप भी स्मरण हो आया, जिसमें कर्ण को यह अभिशाप मिला था कि युद्ध के सर्वाधिक निर्णायक क्षण में, उनके रथ का चक्र धरती में धँस जाएगा, तथा वे स्वयं को पूर्णतः असहाय अवस्था में पाएँगे।

कर्ण, इन समस्त शापों के प्रभाव से अनभिज्ञ रहते हुए भी, यह गहराई से अनुभव करने लगे कि इस युद्ध में, किसी अदृश्य, अपरिहार्य शक्ति के प्रभाव से, उनका सम्पूर्ण कौशल और पराक्रम भी धीरे-धीरे उनका साथ छोड़ता जा रहा है।

यह वह अत्यंत त्रासद क्षण था, जिसमें एक असाधारण, महान योद्धा को, अपने ही अतीत की अनजाने भूलों के कारण, नियति के हाथों एक ऐसी विवशता का सामना करना पड़ रहा था, जिससे बचने का अब कोई भी मार्ग शेष नहीं रहा था।

इस अध्याय की शिक्षा

अनजाने में किए गए कर्मों के परिणाम भी, समय आने पर, अत्यंत गहन और अपरिहार्य रूप से प्रकट होते हैं।

अध्याय 15

रथ का चक्र धँसना

युद्ध के इसी चरम, अत्यंत निर्णायक क्षण में, अंततः वह भयावह घटना घटित हुई जिसकी छाया कर्ण के जीवन पर वर्षों से मंडरा रही थी — उनके रथ का एक चक्र, अचानक ही, धरती में गहराई तक धँस गया, तथा रथ पूर्णतः स्थिर, असहाय अवस्था में रुक गया।

कर्ण, इस अप्रत्याशित, विकट परिस्थिति से घबराए बिना, रथ से नीचे उतरे, तथा अपने सम्पूर्ण बल का प्रयोग करते हुए, उस धँसे हुए चक्र को धरती से बाहर निकालने का भरसक प्रयास करने लगे, यह भलीभाँति जानते हुए कि यह क्षण उनके लिए अत्यंत जोखिमपूर्ण है।

अर्जुन, इस अवसर का लाभ उठाते हुए, अपने धनुष पर बाण चढ़ाकर, कर्ण पर आक्रमण करने हेतु तत्पर हुए, किंतु कर्ण ने, अत्यंत उच्च स्वर में, अर्जुन को युद्ध के उन प्राचीन, स्थापित नियमों का स्मरण कराया, जिनके अनुसार एक निःशस्त्र, असहाय योद्धा पर आक्रमण करना अधर्म माना जाता है।

कर्ण ने अर्जुन से यह अनुरोध किया कि वे कुछ क्षण प्रतीक्षा करें, जब तक वे अपने रथ के इस चक्र को पुनः ठीक न कर लें, यह स्मरण कराते हुए कि क्षत्रिय धर्म सदैव ही ऐसी असहाय परिस्थिति में शत्रु को उचित अवसर प्रदान करने का आदेश देता है।

अर्जुन, कर्ण के इस अनुरोध से क्षणभर के लिए द्वंद्व में पड़ गए, तथा उन्होंने अपना धनुष कुछ क्षणों के लिए नीचे कर लिया, यह सोचते हुए कि क्या इस परिस्थिति में भी धर्म के इन प्राचीन नियमों का पालन करना उचित होगा।

इस अध्याय की शिक्षा

नियति के सर्वाधिक कठोर क्षण में भी, धर्म और नियमों का स्मरण करना, एक महान योद्धा की अंतिम पहचान बना रहता है।

अध्याय 16

श्रीकृष्ण का कर्ण को उत्तर

श्रीकृष्ण, अर्जुन के इस क्षणिक संकोच को देखते हुए, अत्यंत गम्भीर, तीव्र स्वर में कर्ण को उत्तर देने हेतु आगे बढ़े, तथा उन्होंने कर्ण से यह पूछा कि जब द्रौपदी को भरी सभा में निर्वस्त्र करने का प्रयास किया गया, तब उनका यह धर्म और यह नियम कहाँ था।

श्रीकृष्ण ने आगे स्मरण कराया कि जब अभिमन्यु, एक अकेला, निःशस्त्र, चक्रव्यूह में घिरा हुआ किशोर योद्धा था, तथा उसे छह महारथियों ने मिलकर घेरकर मार डाला, तब भी क्षत्रिय धर्म का यह नियम कहाँ लुप्त हो गया था, यह प्रश्न अत्यंत तीक्ष्ण और मार्मिक था।

श्रीकृष्ण ने यह भी स्मरण कराया कि जब शकुनि के छल से भरे पासों द्वारा युधिष्ठिर का सम्पूर्ण राज्य छीना गया, तथा जब लाक्षागृह में पांडवों को जीवित जलाने का षड्यंत्र रचा गया, तब भी यही धर्म और यही नियम कहाँ थे, यह प्रत्येक प्रश्न कर्ण की अंतरात्मा को गहराई तक भेद रहा था।

श्रीकृष्ण ने अंततः यह घोषणा की कि जब धर्म का मार्ग बार-बार तोड़ा जा चुका है, तो अब उसी असाधारण शत्रु के विरुद्ध, इस अंतिम, निर्णायक क्षण में, उन्हीं नियमों का कठोरता से पालन करने का कोई औचित्य शेष नहीं रहता, तथा उन्होंने अर्जुन को कर्ण पर आक्रमण करने का स्पष्ट आदेश दिया।

कर्ण, श्रीकृष्ण के इन अत्यंत तीक्ष्ण, सत्य-प्रधान प्रश्नों का कोई भी समुचित उत्तर न दे पाते हुए, मौन होकर, अपने रथ के उस धँसे हुए चक्र को निकालने के प्रयास में पुनः जुट गए, यह जानते हुए कि अब उनके प्राणों की रक्षा का कोई अन्य मार्ग शेष नहीं है।

इस अध्याय की शिक्षा

जिस धर्म का बार-बार उल्लंघन किया गया हो, उसी धर्म की दुहाई अंतिम क्षण में देना, स्वयं के ही अतीत के विरुद्ध खड़ा होना सिद्ध होता है।

अध्याय 17

कर्ण का अंत

श्रीकृष्ण के इस स्पष्ट आदेश के पश्चात्, अर्जुन ने अत्यंत गम्भीर, संकल्पपूर्ण मुद्रा में, अपना अत्यंत शक्तिशाली अंजलिक-अस्त्र अपने गांडीव धनुष पर चढ़ाया, यह वही सर्वोच्च, निर्णायक बाण था जो इस युद्ध का अंतिम, अपरिवर्तनीय परिणाम निर्धारित करने वाला था।

कर्ण, इसी मध्य, अपने रथ के उस चक्र को धरती से बाहर निकालने के अपने प्रयास में पूर्णतः तल्लीन थे, तथा गुरु परशुराम के उस शाप के प्रभाव से, वे उस क्षण अपनी सर्वोच्च ब्रह्मास्त्र-विद्या को भी पूर्णतः विस्मृत कर चुके थे, जिससे वे स्वयं को असाधारण रूप से असहाय अनुभव कर रहे थे।

अर्जुन ने, अत्यंत दृढ़ता के साथ, अपना वह अंजलिक-अस्त्र कर्ण की ओर छोड़ दिया, तथा वह अत्यंत तीव्र, प्रचंड बाण, क्षणभर में ही कर्ण के सिर को उनके धड़ से पृथक करते हुए, इस दीर्घकालिक, नियति-निर्धारित द्वंद्व का अंतिम, अपरिवर्तनीय निर्णय सुना दिया।

कर्ण का वह विशाल, पराक्रमी शरीर, अपने रथ के समीप ही, धरती पर गिर पड़ा, तथा सूर्यदेव के इस असाधारण पुत्र का, इस संसार में जन्म से लेकर अंत तक, अभाव, अपमान और संघर्ष से भरा वह अत्यंत त्रासद जीवन-चक्र, अंततः इस युद्धभूमि में ही समाप्त हो गया।

सम्पूर्ण कौरव-सेना में, कर्ण के इस अत्यंत अप्रत्याशित, हृदयविदारक अंत के साथ ही, गहन शोक और भय की एक ऐसी लहर दौड़ गई, जिसने यह स्पष्ट संकेत दे दिया कि अब इस महासंग्राम की दिशा, अपरिवर्तनीय रूप से पांडवों की ओर मुड़ चुकी है।

इस अध्याय की शिक्षा

नियति का निर्णय, चाहे कितने भी शाप, प्रतिज्ञाएँ अथवा परिस्थितियाँ क्यों न मिलें, अंततः अपने निश्चित समय पर ही प्रकट होता है।

अध्याय 18

कर्ण पर्व का समापन

कर्ण के इस असाधारण, हृदयविदारक अंत के पश्चात्, शल्य, अत्यंत गहन शोक और भय के मध्य, शेष कौरव-सेना को किसी प्रकार युद्धभूमि से सुरक्षित निकालने के प्रयास में जुट गए, सम्पूर्ण कौरव-पक्ष में एक गहन निराशा व्याप्त हो गई।

दुर्योधन, अपने परम मित्र और सर्वाधिक विश्वसनीय योद्धा कर्ण की इस मृत्यु से, अत्यंत गहन शोक और मानसिक आघात का अनुभव करते हुए, यह अनुभव करने लगा कि अब उसकी विजय की सम्भावनाएँ अत्यंत क्षीण हो चुकी हैं, फिर भी उसने युद्ध जारी रखने का ही निश्चय किया।

पांडव-शिविर में, इस असाधारण विजय के साथ, एक गहन संतुष्टि और नई आशा का संचार हुआ, यद्यपि युधिष्ठिर, कर्ण की उस अंतिम, त्रासद पहचान से अभी भी अनभिज्ञ थे, जिसे केवल कुंती, कृष्ण तथा स्वयं कर्ण ही जानते थे।

अर्जुन, अपने इस असाधारण, दीर्घकाल से प्रतीक्षित विजय के पश्चात् भी, कहीं गहराई में एक विचित्र, अस्पष्ट पीड़ा का अनुभव करते रहे, यह न जानते हुए कि जिस महारथी का उन्होंने अभी अंत किया है, वह वास्तव में उनका ही ज्येष्ठ भ्राता था।

इस प्रकार कर्ण पर्व, सेनापतित्व के गौरव से आरम्भ होकर, शल्य के निरंतर उपहास, दुःशासन-वध, द्रौपदी की प्रतिज्ञा-पूर्ति, एक भ्रातृ-संकट के शांतिपूर्ण समाधान, तथा अंततः कर्ण के उस अत्यंत त्रासद, नियति-निर्धारित अंत के साथ अपने समापन पर पहुँचता है, अगले शल्य पर्व में, इस महासंग्राम के अंतिम, निर्णायक चरण की कथा वर्णित की जाएगी।

इस अध्याय की शिक्षा

जीवन की सबसे बड़ी विजय भी, कभी-कभी उन गहन सत्यों की छाया में रहती है जो समय आने पर ही प्रकट होते हैं।