विराट पर्व
विराट पर्व
पांडवों का अज्ञातवास वर्ष राजा विराट के दरबार में छद्म वेशों में व्यतीत होना, कीचक वध एवं कौरवों की गोहरण-चेष्टा में अर्जुन का पराक्रम।
मत्स्य देश में प्रवेश एवं छद्म-वेश की योजना
बारह वर्षों का दीर्घकालिक वनवास पूर्ण होते ही, पांडवों के समक्ष अब सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण परीक्षा शेष रह गई थी — तेरहवाँ वर्ष, जिसे उन्हें पूर्णतः अज्ञातवास में, अपनी वास्तविक पहचान को पूर्णतः छिपाकर व्यतीत करना था, यह जानते हुए कि यदि इस अवधि में उन्हें पहचान लिया गया, तो उन्हें पुनः बारह वर्षों का वनवास भोगना होगा।
युधिष्ठिर ने, अपने भाइयों तथा द्रौपदी के साथ गहन विचार-विमर्श करते हुए, यह निश्चय किया कि वे राजा विराट के मत्स्य देश में शरण लेंगे, जो एक समृद्ध, सुरक्षित राज्य था, तथा जिसके शासक पहले से ही पांडवों के प्रति मैत्रीपूर्ण दृष्टिकोण रखते थे।
अपने शस्त्रों को, जो अज्ञातवास के दौरान उनकी पहचान का सबसे बड़ा खतरा बन सकते थे, उन्होंने नगर के बाहर स्थित एक विशाल शमी वृक्ष की घनी शाखाओं में, एक मृत शरीर के भ्रामक आवरण के साथ, अत्यंत गोपनीयता से छिपा दिया, ताकि कोई भी वहाँ से गुजरने वाला यात्री उन्हें खोजने का साहस न करे।
प्रत्येक पांडव तथा द्रौपदी ने अपने-अपने लिए एक अत्यंत सुविचारित, विश्वसनीय छद्म-पहचान और व्यवसाय का चयन किया, जो उनकी वास्तविक क्षमताओं और कौशल के अत्यंत निकट होते हुए भी, उनकी असली पहचान को पूर्णतः ढक सके, यह योजना उनकी दीर्घकालिक तपस्या और यक्ष से प्राप्त उस दिव्य वरदान पर आधारित थी जिसने उन्हें अपहचान बनाए रखने में विशेष सहायता प्रदान करने का वचन दिया था।
इस प्रकार, अत्यंत सतर्कता और सुनियोजित रणनीति के साथ, पांडवों ने मत्स्य देश की राजधानी विराटनगर में, अलग-अलग समय और मार्गों से, एक-एक कर प्रवेश किया, यह सुनिश्चित करते हुए कि कोई भी उन्हें एक साथ, समूह में प्रवेश करते हुए न देख सके, जिससे उनकी पारस्परिक पहचान का संदेह उत्पन्न हो।
इस अध्याय की शिक्षा
सबसे कठिन चुनौतियों का सामना करने के लिए भी सुव्यवस्थित योजना, सतर्कता तथा धैर्य ही सफलता की सबसे सुदृढ़ नींव रखते हैं।
युधिष्ठिर का कंक-रूप में प्रवेश
युधिष्ठिर ने एक ब्राह्मण द्यूत-विशेषज्ञ, "कंक" के नाम से, राजा विराट के दरबार में प्रवेश किया, उन्होंने स्वयं को हस्तिनापुर के राजा युधिष्ठिर का पूर्व मित्र तथा पासों के खेल में असाधारण निपुण व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया, यह एक अत्यंत सूक्ष्म, चतुर विडंबना थी कि उन्होंने अपने ही द्यूत-दुर्भाग्य को अपने छद्म-कौशल के रूप में प्रस्तुत किया।
राजा विराट, कंक की गंभीर, गरिमापूर्ण मुखाकृति तथा उसकी असाधारण बुद्धिमत्ता और शिष्टाचार से अत्यंत प्रभावित हुए, तथा उन्होंने उसे तत्काल अपने दरबार में एक सम्मानित सलाहकार तथा पासों के खेल में अपने साथी के रूप में नियुक्त किया, बिना यह तनिक भी संदेह किए कि यह स्वयं सम्पूर्ण भरतवंश का सर्वाधिक धर्मपरायण सम्राट है।
युधिष्ठिर ने अपनी इस भूमिका में यह विशेष सावधानी बरती कि वे कभी भी अत्यधिक धन का दाँव न लगाएँ, अपितु अपने कौशल का प्रदर्शन इस प्रकार करें कि दरबार में उनका सम्मान बना रहे, किंतु उनकी वास्तविक पहचान का तनिक भी संकेत प्रकट न हो।
उन्होंने राजा विराट के समक्ष यह भी घोषित किया कि उनके चार अन्य साथी भी शीघ्र ही इस नगरी में आकर विभिन्न सेवाओं में नियुक्ति की खोज करेंगे, तथा उन्होंने विराट से अनुरोध किया कि यदि वे योग्य पाए जाएँ, तो उन्हें भी उचित रोजगार प्रदान किया जाए, यह पूर्व-नियोजित वार्तालाप उनकी सुनियोजित रणनीति का ही एक भाग था।
इस प्रकार, युधिष्ठिर, अपनी संयमित, गरिमापूर्ण उपस्थिति से, शीघ्र ही विराट के दरबार में एक विश्वसनीय, आदरणीय व्यक्तित्व के रूप में स्थापित हो गए, यह उनके अज्ञातवास की सफलता की पहली, महत्त्वपूर्ण आधारशिला सिद्ध हुई।
इस अध्याय की शिक्षा
अपनी सबसे बड़ी दुर्बलता को भी, यदि विवेकपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया जाए, एक असाधारण शक्ति और अवसर में परिवर्तित किया जा सकता है।
भीम का वल्लभ-रूप में प्रवेश
भीमसेन ने "वल्लभ" नामक एक कुशल रसोइए का वेश धारण किया, उन्होंने स्वयं को पूर्व में राजा युधिष्ठिर के दरबार में मुख्य रसोइया तथा मल्ल-युद्ध का प्रशिक्षक बताया, यह एक अत्यंत बुद्धिमत्तापूर्ण चयन था, क्योंकि इससे उन्हें अपनी असाधारण शारीरिक शक्ति को भी स्वाभाविक रूप से प्रदर्शित करने का अवसर मिल सकता था, बिना किसी संदेह को जन्म दिए।
राजा विराट, भीम के भोजन बनाने के असाधारण कौशल तथा उसकी विशाल, बलिष्ठ काया से अत्यंत प्रभावित हुए, तथा उन्होंने उसे तत्काल अपनी राजसी रसोई का प्रधान नियुक्त किया, भीम ने शीघ्र ही अपने स्वादिष्ट व्यंजनों से सम्पूर्ण राजपरिवार का हृदय जीत लिया।
इसी अवधि में, विराट के राज्य में एक अत्यंत शक्तिशाली, अजेय मल्ल-योद्धा नियमित रूप से दरबार में आकर सभी को द्वंद्व-युद्ध की चुनौती देता था, तथा किसी को भी पराजित नहीं कर पाया था, राजा विराट ने वल्लभ (भीम) से इस मल्ल को चुनौती देने का अनुरोध किया, यह एक ऐसा अवसर था जिसमें भीम अपनी असाधारण शक्ति का सहज, स्वाभाविक प्रदर्शन कर सकते थे।
भीम ने, बिना अपनी वास्तविक पहचान को तनिक भी संदेह में डाले, इस मल्ल के साथ एक भीषण द्वंद्व-युद्ध में उसे परास्त कर, उसका वध कर दिया, इस असाधारण विजय से राजा विराट तथा सम्पूर्ण दरबार अत्यंत प्रसन्न और विस्मित हुए, तथा वल्लभ की ख्याति सम्पूर्ण राज्य में फैल गई।
भीम, अपनी इस भूमिका में, धीरे-धीरे राजदरबार में अत्यंत लोकप्रिय और सम्मानित हो गए, यद्यपि उन्हें अपनी असीम शक्ति को समय-समय पर संयमित रखना अत्यंत कठिन प्रतीत होता था, विशेष रूप से जब उन्हें अपनी प्रिय पत्नी द्रौपदी के प्रति किसी भी अन्याय का समाचार मिलता, तब उनका संयम सबसे अधिक परीक्षा में पड़ता।
इस अध्याय की शिक्षा
अपनी असाधारण शक्ति को उचित, स्वाभाविक अवसरों पर प्रकट करना, उसे पूर्णतः छिपाने के प्रयास से कहीं अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण और प्रभावी रणनीति सिद्ध होता है।
अर्जुन का बृहन्नला-रूप में प्रवेश
अर्जुन के समक्ष अज्ञातवास की सबसे असाधारण, अप्रत्याशित चुनौती थी — एक ऐसा छद्म-वेश धारण करना जो सम्पूर्ण भूमंडल में विख्यात, अजेय धनुर्धर की उनकी वास्तविक पहचान से पूर्णतः विपरीत हो, उन्होंने स्वर्गलोक में गंधर्वराज चित्रसेन से सीखी गई नृत्य-संगीत की कला का स्मरण करते हुए, एक नपुंसक नृत्य-गुरु "बृहन्नला" का वेश धारण करने का साहसिक निर्णय लिया।
यह भूमिका इतनी विपरीत, इतनी अप्रत्याशित थी कि किसी को भी यह कल्पना करना असम्भव प्रतीत होता कि यह वही अर्जुन है जिसने खांडव-दहन में अग्निदेव की सहायता की थी, तथा जिसने स्वर्गलोक में निवातकवच असुरों का संहार किया था, अर्जुन ने इस भूमिका को अत्यंत सहजता और कुशलता के साथ अपनाया।
राजा विराट की पुत्री उत्तरा, तथा उसकी अन्य सखियों को नृत्य और संगीत की शिक्षा देने हेतु, बृहन्नला को राजमहल के अंतःपुर में नियुक्त किया गया, यह अर्जुन के लिए एक अत्यंत विचित्र, किंतु आवश्यक अनुभव था, जिसमें उन्हें अपनी वीरता और पौरुष को पूर्णतः छिपाकर, एक कोमल, स्त्रैण आचरण अपनाना पड़ता था।
राजा विराट के पुत्र उत्तर, तथा अंतःपुर की समस्त स्त्रियाँ, बृहन्नला के असाधारण नृत्य-कौशल तथा उसके सौम्य, विनम्र स्वभाव से अत्यंत प्रभावित हुए, कोई भी यह तनिक भी संदेह नहीं कर सका कि यह विनम्र नृत्य-गुरु वास्तव में विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर है।
अर्जुन के लिए यह भूमिका सबसे अधिक आत्म-संयम की माँग करती थी, क्योंकि उन्हें अपनी संचित ऊर्जा, अपने युद्ध-कौशल तथा अपनी वास्तविक प्रकृति को निरंतर, प्रत्येक क्षण नियंत्रित रखना पड़ता था, यह एक ऐसी तपस्या थी जो शारीरिक नहीं, अपितु पूर्णतः मानसिक और आत्मिक अनुशासन की परीक्षा लेती थी।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्चा आत्म-संयम वह है जब कोई व्यक्ति अपनी सर्वोच्च क्षमता और शक्ति को जानते हुए भी, आवश्यकता पड़ने पर उसे पूर्णतः विनम्रता के आवरण में छिपाए रख सके।
नकुल, सहदेव एवं द्रौपदी का छद्म-प्रवेश
नकुल ने "ग्रंथिक" नामक एक अश्व-पालक के वेश में विराट के दरबार में प्रवेश किया, उन्होंने अपनी अश्वों के प्रति गहन ज्ञान और असाधारण कौशल से राजा को शीघ्र ही प्रभावित किया, तथा उन्हें राजा की अश्वशाला के प्रधान का पद प्राप्त हुआ, यह भूमिका उनकी वास्तविक विशेषज्ञता के अत्यंत निकट थी, जिससे उन्हें अपनी भूमिका निभाने में कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई।
सहदेव ने "तंतिपाल" के नाम से गोपालक का वेश धारण किया, उनका ज्योतिष तथा पशुपालन का गहन ज्ञान राजा विराट की गौशालाओं के प्रबंधन में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ, वे शीघ्र ही राज्य की समस्त गोशालाओं के मुख्य अधिकारी नियुक्त हुए।
द्रौपदी के लिए यह वर्ष सबसे अधिक जोखिमपूर्ण और चुनौतीपूर्ण था, उसने "सैरंध्री" नामक एक कुशल केश-सज्जाकार तथा दासी का वेश धारण किया, तथा महारानी सुदेष्णा की सेवा में नियुक्ति प्राप्त की, अपने असाधारण सौंदर्य को छिपाने के लिए, उसने यह चतुर कहानी रची कि वह पाँच गंधर्व राजकुमारों की पत्नी है, जो उसकी रक्षा हेतु सदैव अदृश्य रूप में उसके निकट रहते हैं, यह किसी भी अनुचित दृष्टि रखने वाले पुरुष के लिए एक स्पष्ट चेतावनी थी।
महारानी सुदेष्णा, सैरंध्री के असाधारण सौंदर्य, शिष्टाचार तथा कौशल से अत्यंत प्रभावित होकर, उसे अपनी सर्वाधिक विश्वस्त सेविका के रूप में स्वीकार किया, यद्यपि उन्होंने भी सावधानीपूर्वक यह चेतावनी दी कि राजमहल में उसका असाधारण सौंदर्य किसी न किसी पुरुष का ध्यान अवश्य आकर्षित करेगा, तथा उसे विशेष सावधानी बरतनी होगी।
इस प्रकार, सभी पाँचों पांडव तथा द्रौपदी, अपनी-अपनी अत्यंत सुविचारित भूमिकाओं में, विराट के राजमहल में सफलतापूर्वक स्थापित हो गए, आरम्भिक कुछ माह अत्यंत शांतिपूर्वक व्यतीत हुए, किंतु शीघ्र ही एक ऐसी घटना घटित होने वाली थी जो इस सम्पूर्ण गोपनीयता को गहन संकट में डाल देगी।
इस अध्याय की शिक्षा
प्रत्येक व्यक्ति की वास्तविक प्रतिभा को उसकी छद्म-भूमिका के निकटतम रूप में प्रस्तुत करना, गोपनीयता बनाए रखने की सबसे प्रभावी, स्वाभाविक रणनीति है।
कीचक की सैरंध्री के प्रति कुदृष्टि
राजा विराट के सेनापति तथा महारानी सुदेष्णा के भाई, कीचक, अपनी असाधारण शारीरिक शक्ति और सैन्य प्रभाव के कारण, राज्य में अत्यंत शक्तिशाली और प्रायः निरंकुश व्यक्ति माने जाते थे, एक दिन, जब उन्होंने सैरंध्री (द्रौपदी) के असाधारण सौंदर्य को देखा, वे तत्काल उसके प्रति एक अनियंत्रित, अनुचित वासना से भर उठे।
कीचक ने अपनी बहन सुदेष्णा से सैरंध्री का परिचय प्राप्त कर, उसके समक्ष प्रत्यक्ष रूप से विवाह तथा प्रेम-संबंध का अत्यंत अनुचित प्रस्ताव रखा, द्रौपदी ने इस प्रस्ताव को अत्यंत दृढ़ता से अस्वीकार करते हुए, उसे अपने गंधर्व-पतियों की रक्षा-प्रतिज्ञा की चेतावनी दी, यह स्पष्ट करते हुए कि उसकी यह चेष्टा उसके प्राणों के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
कीचक, इस अस्वीकृति से तनिक भी विचलित न होकर, बार-बार सैरंध्री का पीछा करने तथा उसे अनुचित प्रस्ताव देने लगा, अपनी बहन सुदेष्णा से भी उसने सहायता माँगी, जिन्होंने, अपने भाई के दबाव में आकर, एक बार सैरंध्री को कीचक के निवास पर मदिरा लाने हेतु भेज दिया, यह जानते हुए भी कि यह उसे गंभीर संकट में डाल सकता है।
कीचक के निवास पर पहुँचते ही, द्रौपदी को उसकी वासनापूर्ण मंशा का पूर्ण आभास हो गया, तथा जब कीचक ने उसे बलपूर्वक पकड़ने का प्रयास किया, वह तत्काल भागकर राजसभा की ओर दौड़ी, जहाँ स्वयं राजा विराट तथा युधिष्ठिर (कंक-रूप में) उपस्थित थे, यह विश्वास करते हुए कि वहाँ उसे अवश्य सुरक्षा प्राप्त होगी।
कीचक, अपनी वासना में अंधा होकर, राजसभा में भी द्रौपदी का पीछा करते हुए, सबके समक्ष ही उसे लात मारकर भूमि पर गिरा दिया, यह देखकर युधिष्ठिर, अपनी छद्म-पहचान बनाए रखने की विवशता में, तथा भीम को क्रोध से रोकने के लिए, अत्यंत कठिनाई से स्वयं को संयमित रखते हुए, केवल यह कह सके कि एक पतिव्रता स्त्री अपने पतियों की रक्षा में स्वयं सक्षम है।
इस अध्याय की शिक्षा
अनियंत्रित वासना और सत्ता का दुरुपयोग, चाहे कितना भी शक्तिशाली व्यक्ति क्यों न करे, अंततः उसके अपने ही विनाश का मार्ग प्रशस्त करता है।
द्रौपदी की व्यथा एवं भीम से सहायता याचना
राजसभा में हुए इस घोर अपमान से गहराई से आहत, द्रौपदी उस रात्रि, अत्यंत गोपनीयता से, अपने पति भीमसेन के पास, जो रसोईघर में वल्लभ के रूप में विश्राम कर रहे थे, पहुँची, तथा अपनी सम्पूर्ण व्यथा, कीचक के अत्याचार और राजसभा में हुए अपमान का विस्तृत वृत्तांत उन्हें सुनाया।
भीमसेन, अपनी प्रिय पत्नी की यह करुण कथा सुनकर, क्रोध से काँप उठे, उन्होंने द्रौपदी के प्रति यह गहन क्षोभ भी व्यक्त किया कि युधिष्ठिर, अपनी छद्म-पहचान बनाए रखने की चिंता में, उस समय उसकी समुचित रक्षा नहीं कर सके, यह उनके लिए असहनीय था कि उनकी पत्नी को इस प्रकार का अपमान सहना पड़े।
द्रौपदी ने भीम से यह स्पष्ट अनुरोध किया कि वे किसी न किसी उपाय से कीचक का वध करें, ताकि वह भविष्य में उसे या किसी अन्य निर्दोष स्त्री को इस प्रकार त्रस्त न कर सके, भीम ने अपनी पत्नी की इस पीड़ा को समझते हुए, तत्काल एक चतुर, गोपनीय योजना बनाने का वचन दिया।
उन्होंने द्रौपदी को सुझाव दिया कि वह कीचक को यह विश्वास दिलाए कि वह अंततः उसके प्रेम-प्रस्ताव को स्वीकार करने को तैयार है, तथा उसे रात्रि में नृत्यशाला में, पूर्णतः अंधकार में, एकांत भेंट हेतु आमंत्रित करे, जहाँ स्वयं भीम, द्रौपदी का रूप धारण कर, कीचक की प्रतीक्षा करेंगे।
द्रौपदी, इस योजना से आश्वस्त होकर, कीचक के पास गई, तथा उसे यह विश्वास दिलाया कि वह उसकी शर्तों को स्वीकार करने को तैयार है, बशर्ते यह भेंट पूर्णतः गोपनीय और एकांत में हो, कीचक, अपनी वासना में इतना अंधा हो चुका था कि उसने इस प्रस्ताव को बिना किसी संदेह के, अत्यंत हर्षपूर्वक स्वीकार कर लिया।
इस अध्याय की शिक्षा
जब न्याय की सामान्य व्यवस्थाएँ असफल हो जाएँ, तो सुनियोजित, बुद्धिमत्तापूर्ण प्रतिकार ही असहायों की रक्षा का अंतिम, प्रभावी मार्ग बनता है।
नृत्यशाला में कीचक का वध
निश्चित रात्रि को, कीचक, अत्यंत उत्साह और वासना से परिपूर्ण होकर, सुसज्जित होकर, नृत्यशाला की ओर प्रस्थान किया, जहाँ पूर्णतः अंधकार में, वह विश्वास करता था कि सैरंध्री उसकी प्रतीक्षा कर रही है, इस अंधकार में, वह द्रौपदी के स्थान पर वास्तव में भीमसेन के निकट पहुँच गया, जो स्त्री-वेश में वहाँ पहले से ही उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
जैसे ही कीचक ने भीम को स्पर्श करने का प्रयास किया, भीम, अपने संचित क्रोध को अब और अधिक रोक न सके, उन्होंने तत्काल कीचक को अपनी विशाल भुजाओं में जकड़ लिया, कीचक, अपनी असाधारण शारीरिक शक्ति के होते हुए भी, भीम के इस अप्रत्याशित, अजेय बल के समक्ष स्वयं को पूर्णतः असहाय पाया।
दोनों के बीच एक भीषण, अत्यंत संक्षिप्त किंतु घातक संघर्ष हुआ, भीम ने कीचक को भूमि पर पटककर, उसके शरीर को इतनी बुरी तरह कुचल दिया कि उसका शरीर एक मांस-पिंड के समान बनकर रह गया, यह देखकर स्वयं भीम भी क्षण भर के लिए विस्मित हुए कि उनका संचित क्रोध कितना विनाशकारी सिद्ध हुआ।
भीम, अपने कार्य को पूर्ण कर, चुपचाप रसोईघर में अपनी सामान्य भूमिका में लौट गए, जब प्रातःकाल कीचक के इस रहस्यमय, भीषण वध का समाचार सम्पूर्ण राजमहल में फैला, सभी अत्यंत विस्मित हुए, क्योंकि किसी को भी यह समझ नहीं आया कि इतने शक्तिशाली सेनापति को कौन इस प्रकार परास्त कर सकता है।
सैरंध्री (द्रौपदी) के गंधर्व-पतियों की कथा, जो अब तक केवल एक चतुर बहाना प्रतीत होती थी, इस घटना के पश्चात् सम्पूर्ण राज्य में और भी अधिक विश्वसनीय मानी जाने लगी, तथा किसी अन्य पुरुष ने अब उसकी ओर अनुचित दृष्टि से देखने का साहस नहीं किया।
इस अध्याय की शिक्षा
जो शक्ति दीर्घकाल तक संयमित रखी जाए, वह जब अन्याय के विरुद्ध मुक्त होती है, तो वह अत्यंत निर्णायक और अपरिहार्य परिणाम लाती है।
उपकीचकों का प्रतिशोध एवं द्रौपदी की रक्षा
कीचक के भाई, जिन्हें उपकीचक कहा जाता था, अपने भाई की इस रहस्यमय मृत्यु से अत्यंत क्रोधित और शोकाकुल हुए, तथा उन्होंने यह निश्चय किया कि इस मृत्यु का वास्तविक कारण स्वयं सैरंध्री ही है, जिसने किसी गुप्त उपाय से यह षड्यंत्र रचा होगा, अतः उन्होंने द्रौपदी को भी दंडित करने का कुटिल निश्चय किया।
उन्होंने राजा विराट से यह अनुमति माँगी कि कीचक के अंतिम संस्कार के समय, प्रचलित एक क्रूर प्रथा के अनुसार, सैरंध्री को भी उसकी चिता के साथ ही सती कर दिया जाए, यह एक अत्यंत अन्यायपूर्ण, निराधार आरोप था, किंतु शोक और क्रोध में डूबे उपकीचकों ने इसे बलपूर्वक लागू करने का प्रयास किया।
द्रौपदी, इस भीषण संकट में, अत्यंत भयभीत होकर, ऊँची आवाज़ में अपने गंधर्व-पतियों का आवाहन करने लगी, यह पुकार सुनते ही, भीमसेन, जो निकट ही थे, तत्काल वहाँ पहुँचे, तथा अपनी वास्तविक पहचान को गुप्त रखते हुए भी, एक अदृश्य गंधर्व होने का अभिनय करते हुए, उपकीचकों पर भीषण आक्रमण किया।
भीम ने, अत्यंत तीव्र गति से, समस्त उपकीचकों का, एक-एक कर, वध कर दिया, यह दृश्य देखकर उपस्थित समस्त जनसमूह भय और विस्मय से स्तब्ध रह गया, तथा यह विश्वास और भी अधिक दृढ़ हो गया कि सैरंध्री वास्तव में किसी असाधारण, दैवीय शक्ति की छत्रछाया में है।
राजा विराट, इस समस्त घटनाक्रम से अत्यंत भयभीत होकर, यह अनुभव करने लगे कि सैरंध्री की उपस्थिति उनके राज्य के लिए किसी न किसी रूप में संकटपूर्ण सिद्ध हो सकती है, तथा उन्होंने उसे राज्य छोड़ने का अनुरोध भी किया, किंतु महारानी सुदेष्णा के अनुरोध पर, तथा स्वयं द्रौपदी की विनम्र प्रार्थना पर, उसे केवल तेरह दिनों के लिए अस्थायी रूप से राज्य में ही, अत्यंत सतर्कता के साथ, रहने की अनुमति मिल गई, जो संयोगवश उनके अज्ञातवास के अंतिम शेष दिनों के लगभग बराबर ही था।
इस अध्याय की शिक्षा
जब एक निर्दोष स्त्री की रक्षा का प्रश्न हो, तो छद्म-पहचान की सुरक्षा से भी अधिक महत्त्वपूर्ण उसकी वास्तविक सुरक्षा और सम्मान है।
दुर्योधन की शंका — पांडवों की खोज
कीचक की इस असाधारण, रहस्यमय मृत्यु का समाचार शीघ्र ही हस्तिनापुर तक पहुँचा, दुर्योधन तथा उनके गुप्तचरों ने तत्काल यह अनुमान लगाया कि इतने शक्तिशाली सेनापति का इस प्रकार वध केवल भीमसेन जैसे किसी असाधारण बलशाली योद्धा द्वारा ही सम्भव है, अतः उन्हें यह प्रबल संदेह हुआ कि पांडव सम्भवतः मत्स्य देश में ही, किसी छद्म-वेश में, अज्ञातवास व्यतीत कर रहे हैं।
दुर्योधन ने अपने गुप्तचरों को सम्पूर्ण भारतवर्ष में पांडवों की खोज हेतु पुनः सक्रिय किया, तथा विशेष रूप से मत्स्य देश पर अपनी दृष्टि केंद्रित की, यह जानते हुए कि यदि अज्ञातवास की अवधि पूर्ण होने से पूर्व ही पांडवों को खोज लिया जाए, तो उन्हें पुनः बारह वर्षों के वनवास हेतु विवश किया जा सकता है, जो कौरवों के लिए एक असाधारण राजनीतिक लाभ सिद्ध होगा।
इसी समय, कर्ण तथा शकुनि के परामर्श से, दुर्योधन ने एक चतुर, द्वि-आयामी योजना रची — त्रिगर्त देश के राजा सुशर्मा, जो पूर्व में मत्स्य-नरेश विराट से पराजित हो चुके थे तथा उनसे गहरा प्रतिशोध रखते थे, को यह प्रोत्साहित किया गया कि वे दक्षिण दिशा से मत्स्य देश पर आक्रमण कर, विराट की गौओं का हरण करें, जिससे मत्स्य-सेना विभाजित हो जाए।
इसके ठीक पश्चात्, कौरव-सेना स्वयं उत्तर दिशा से मत्स्य देश पर आक्रमण कर, शेष गौओं का हरण करने की योजना बनाएगी, यह दुहरी रणनीति इस उद्देश्य से रची गई थी कि यदि पांडव वास्तव में विराट के राज्य में छिपे हों, तो इस संकट के समय वे अवश्य ही अपनी वास्तविक पहचान और पराक्रम प्रकट करने को विवश होंगे।
इस प्रकार, कीचक-वध की एक घटना ने, अनजाने में ही, पांडवों के अज्ञातवास के अंतिम, सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण दिनों की पृष्ठभूमि रच दी, जिसमें उन्हें अपनी पहचान की रक्षा और मत्स्य-राज्य की सुरक्षा, दोनों के मध्य एक अत्यंत नाजुक संतुलन बनाए रखना था।
इस अध्याय की शिक्षा
एक असाधारण घटना का प्रभाव, चाहे कितनी भी दूरी पर क्यों न हो, अंततः उन तक अवश्य पहुँचता है जो सतर्कता से उसके संकेतों को पढ़ना जानते हैं।
त्रिगर्त का आक्रमण एवं विराट की बंदी
योजना के अनुसार, त्रिगर्त-नरेश सुशर्मा ने अपनी विशाल सेना सहित दक्षिण दिशा से मत्स्य देश पर अचानक आक्रमण कर, राजा विराट की असंख्य गौओं का हरण आरम्भ कर दिया, यह समाचार पाते ही, राजा विराट, स्वयं अपनी सेना का नेतृत्व करते हुए, इस आक्रमण का प्रतिकार करने हेतु तत्काल युद्धभूमि की ओर प्रस्थान किए।
युधिष्ठिर (कंक), भीम (वल्लभ), तथा नकुल-सहदेव भी, अपनी सेवा के अनुरूप, राजा विराट के साथ इस युद्ध में सम्मिलित हुए, यद्यपि उन्हें अपनी वास्तविक युद्ध-कुशलता को अत्यंत सावधानीपूर्वक, केवल आवश्यक सीमा तक ही प्रकट करना था, ताकि उनकी पहचान का रहस्य उजागर न हो।
युद्ध अत्यंत भीषण सिद्ध हुआ, तथा एक क्षण ऐसा भी आया जब राजा विराट, स्वयं युद्धभूमि में सुशर्मा द्वारा बंदी बना लिए गए, यह देखकर मत्स्य-सेना में हाहाकार मच गया, तथा उनका मनोबल पूर्णतः टूटने लगा।
भीमसेन, अपने राजा की इस दुर्दशा को देखकर, अब और अधिक संयम नहीं रख सके, उन्होंने युधिष्ठिर की चेतावनी की भी अनदेखी करते हुए, अपनी असाधारण शक्ति का पूर्ण प्रदर्शन करते हुए, त्रिगर्त-सेना पर भीषण आक्रमण किया, तथा स्वयं सुशर्मा को पराजित कर, राजा विराट को सुरक्षित मुक्त कराया।
युधिष्ठिर ने, अपनी बुद्धिमत्ता से, तत्काल भीम को यह स्मरण कराया कि सुशर्मा का वध न करें, अपितु उसे बंदी बनाकर राजा विराट के समक्ष प्रस्तुत करें, ताकि विराट स्वयं उसे उचित दंड दें, यह सुझाव इस उद्देश्य से भी था कि भीम की असाधारण शक्ति का यह प्रदर्शन, यथासम्भव, राजा विराट की ही विजय के रूप में देखा जाए, न कि किसी अज्ञात योद्धा की।
इस अध्याय की शिक्षा
अपने स्वामी या मित्र की रक्षा के लिए संकट के क्षण में सावधानी को क्षण भर के लिए त्यागना भी उचित हो सकता है, बशर्ते इसके पश्चात् पुनः विवेकपूर्ण संयम अपनाया जाए।
कौरवों का उत्तर से गोहरण
ठीक उसी समय, जब राजा विराट की सेना दक्षिण में त्रिगर्तों से युद्धरत थी, दुर्योधन, कर्ण, द्रोणाचार्य, भीष्म तथा अश्वत्थामा के नेतृत्व में विशाल कौरव-सेना ने उत्तर दिशा से मत्स्य देश पर आक्रमण कर, राजा की शेष असंख्य गौओं का हरण करना आरम्भ कर दिया, यह ठीक वही योजना थी जिसे कर्ण और शकुनि ने पूर्व में रचा था।
इस समय, विराटनगर में केवल राजकुमार उत्तर ही उपस्थित थे, जो अभी अत्यंत युवा तथा युद्ध-अनुभवहीन थे, किंतु अपने अत्यंत आत्मविश्वासी, कुछ हद तक अहंकारी स्वभाव के कारण, उन्होंने अंतःपुर की स्त्रियों के समक्ष यह दंभपूर्ण घोषणा की कि यदि उनके पास एक उपयुक्त सारथी हो, तो वे अकेले ही सम्पूर्ण कौरव-सेना को परास्त कर सकते हैं।
उत्तरा, राजकुमार की बहन, तथा द्रौपदी की शिष्या, ने तत्काल यह सुझाव दिया कि नृत्य-गुरु बृहन्नला, जो पूर्व में एक कुशल सारथी भी रह चुके हैं, इस कार्य हेतु सर्वाधिक उपयुक्त होंगे, यह सुझाव, अनजाने में ही, इस सम्पूर्ण गाथा के सबसे नाटकीय, निर्णायक मोड़ की पृष्ठभूमि रचने वाला था।
उत्तर, आरम्भ में इस सुझाव पर हँस पड़े, यह विश्वास न करते हुए कि एक नृत्य-गुरु युद्धभूमि में उपयोगी सिद्ध हो सकता है, किंतु अन्य कोई सारथी उपलब्ध न होने के कारण, तथा अपनी बहन के आग्रह पर, उन्होंने बृहन्नला को ही अपना सारथी बनाने का निश्चय किया।
बृहन्नला (अर्जुन), अपनी स्त्रैण भूमिका को बनाए रखते हुए, कुछ आपत्ति और संकोच प्रकट करते हुए, अंततः उत्तर का सारथी बनने को सहमत हुए, यह जानते हुए कि यह क्षण उनके अज्ञातवास की सबसे बड़ी परीक्षा और सम्भावित प्रकटीकरण दोनों का कारण बन सकता है।
इस अध्याय की शिक्षा
नियति कभी-कभी सबसे अप्रत्याशित, विनम्र प्रतीत होने वाले मार्गों से ही सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं की पृष्ठभूमि रचती है।
उत्तर का भय एवं बृहन्नला का धैर्य
बृहन्नला को सारथी बनाकर, राजकुमार उत्तर, अत्यंत आत्मविश्वास और उत्साह के साथ, अकेले ही कौरव-सेना का सामना करने युद्धभूमि की ओर रथ लेकर बढ़े, प्रारम्भ में उनका उत्साह अत्यंत प्रबल था, यह विश्वास करते हुए कि वे सचमुच अकेले ही इस विशाल सेना को परास्त कर सकते हैं।
किंतु जैसे ही उत्तर ने दूर से भीष्म, द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा तथा दुर्योधन सहित उस विशाल, असंख्य कौरव-सेना को अपने ध्वजों और अस्त्रों की चमक के साथ देखा, उनका सम्पूर्ण आत्मविश्वास क्षण भर में भय और आतंक में परिवर्तित हो गया, वे काँपते हुए, रथ से कूदकर भागने का प्रयास करने लगे।
बृहन्नला ने, अत्यंत धैर्य और चतुराई से, भागते हुए उत्तर को पकड़ लिया, तथा उसे समझाया कि एक क्षत्रिय राजकुमार के लिए युद्धभूमि से इस प्रकार भागना, किसी भी मृत्यु से कहीं अधिक अपमानजनक होगा, यह स्वयं उसकी तथा उसके सम्पूर्ण वंश की प्रतिष्ठा को सदा के लिए धूमिल कर देगा।
उत्तर, अपने भय में इतने अभिभूत थे कि वे बृहन्नला के इन तर्कों को भी सुनने की स्थिति में नहीं थे, अंततः, बृहन्नला ने एक अंतिम, चतुर प्रस्ताव रखा — कि यदि उत्तर स्वयं युद्ध करने में असमर्थ हैं, तो वे कम से कम बृहन्नला को ही सारथी के स्थान पर धनुर्धर तथा स्वयं को सारथी की भूमिका में स्वीकार कर लें।
उत्तर, इस प्रस्ताव को हर्षपूर्वक स्वीकार करते हुए, यह पूछ बैठे कि क्या एक नृत्य-गुरु वास्तव में युद्ध-कौशल में भी निपुण है, इसी प्रश्न के उत्तर में, अर्जुन ने अंततः उस शमी वृक्ष की ओर रथ मोड़ने का निर्देश दिया, जहाँ उनके दिव्य अस्त्र वर्षों से गोपनीय रूप से छिपे हुए थे, इस प्रकार उनके प्राकट्य का वह ऐतिहासिक क्षण अब निकट आ पहुँचा था।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्चा साहस केवल भय के अभाव में नहीं, अपितु भय की उपस्थिति में भी कर्तव्य-पालन के प्रति दृढ़ रहने में निहित है, यह शिक्षा स्वयं ही एक असाधारण गुरु-दक्षिणा है।
शमी वृक्ष से अस्त्र-प्राप्ति एवं अर्जुन का प्राकट्य
शमी वृक्ष के समक्ष पहुँचकर, बृहन्नला ने उत्तर को उस वृक्ष पर चढ़कर, वहाँ छिपाए गए एक विशेष पोटली को नीचे उतारने का निर्देश दिया, उत्तर, अत्यंत कुतूहलवश, इस आदेश का पालन करते हुए, वृक्ष पर चढ़ गए, और जब उन्होंने उस पोटली को खोला, तो उसमें से अद्भुत, तेजस्वी दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रकट हुए, जिनकी चमक से सम्पूर्ण वातावरण जगमगा उठा।
उत्तर, गांडीव धनुष सहित अन्य असाधारण अस्त्रों को देखकर अत्यंत विस्मित हुए, तथा उन्होंने बृहन्नला से इनके वास्तविक स्वामी के विषय में पूछा, इसी क्षण, अर्जुन ने अंततः अपनी वास्तविक पहचान — कि वे स्वयं पांडु-पुत्र अर्जुन हैं, तथा उनके साथी कंक, वल्लभ, ग्रंथिक और तंतिपाल वास्तव में युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव हैं — पूर्ण रूप से प्रकट कर दी।
उत्तर, यह असाधारण, अकल्पनीय सत्य जानकर, प्रारम्भ में अत्यंत विस्मित तथा किंचित अविश्वास से भर उठे, किंतु अर्जुन की गंभीर, आत्मविश्वासपूर्ण मुद्रा तथा दिव्य अस्त्रों की प्रत्यक्ष उपस्थिति ने शीघ्र ही उनके समस्त संदेह को दूर कर दिया, वे अत्यंत श्रद्धा और भय के मिश्रित भाव से अर्जुन के समक्ष नतमस्तक हो गए।
अर्जुन ने अपने राजसी वस्त्र और कवच धारण किए, अपने गांडीव धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाई, जिसकी भीषण टंकार से सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठीं, तथा उन्होंने अपना दिव्य शंख भी बजाया, यह ध्वनि इतनी भयंकर थी कि दूर खड़ी कौरव-सेना के अनेक सैनिकों के हृदय भय से काँप उठे, तथा अनुभवी योद्धाओं ने तत्काल पहचान लिया कि यह ध्वनि किसी साधारण योद्धा की नहीं हो सकती।
उत्तर, अब अत्यंत आत्मविश्वास से भरकर, अर्जुन के सारथी की भूमिका ग्रहण करते हुए, रथ को कौरव-सेना की दिशा में आगे बढ़ाया, इस प्रकार, तेरह वर्षों के दीर्घकालिक अज्ञातवास के पश्चात्, अर्जुन का यह प्राकट्य, सम्पूर्ण भरतवंश के इतिहास के सर्वाधिक नाटकीय, रोमांचक क्षणों में से एक सिद्ध हुआ।
इस अध्याय की शिक्षा
छिपाई गई शक्ति और पहचान, चाहे कितने भी दीर्घकाल तक गुप्त रखी जाए, उचित, नियति-निर्धारित क्षण आने पर पूर्ण गरिमा और तेज के साथ प्रकट होती ही है।
अर्जुन का कौरव-सेना से एकाकी युद्ध
अर्जुन के गांडीव की टंकार तथा उनके दिव्य शंख की ध्वनि सुनते ही, भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य ने तत्काल यह पहचान लिया कि यह स्वयं अर्जुन ही है, तथा उन्होंने दुर्योधन को यह सूचना दी कि पांडवों के अज्ञातवास की अवधि अब पूर्ण हो चुकी प्रतीत होती है, चूँकि उन्होंने अपनी पहचान स्वेच्छा से प्रकट कर दी है।
दुर्योधन, कर्ण तथा शकुनि इस दावे को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे, उनका तर्क था कि अवधि की गणना में कुछ दिनों का अंतर हो सकता है, तथा यदि अवधि पूर्ण होने से पूर्व ही पांडवों को पहचाना गया है, तो उन्हें पुनः बारह वर्षों का वनवास भोगना होगा, यह विवाद ही आगे इस युद्ध के औचित्य का आधार बना।
अर्जुन, अकेले ही, अपने रथ पर सवार होकर, उस विशाल कौरव-सेना के समक्ष प्रकट हुए, उन्होंने सर्वप्रथम भीष्म और द्रोणाचार्य, अपने वयोवृद्ध पितामह और गुरु, को अत्यंत श्रद्धा और विनम्रता से प्रणाम किया, तथा उनसे युद्ध करने की अनिच्छा भी व्यक्त की, किंतु परिस्थितिवश यह अपरिहार्य सिद्ध हुआ।
इसके पश्चात्, अर्जुन ने अपने असाधारण धनुर्विद्या-कौशल का ऐसा अद्भुत प्रदर्शन किया कि सम्पूर्ण कौरव-सेना स्तब्ध रह गई, उन्होंने एक साथ भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य तथा अश्वत्थामा जैसे महारथियों का सामना करते हुए, प्रत्येक को क्रमिक रूप से पराजित किया, बिना किसी की हत्या किए, केवल उनके अस्त्रों और रथों को नष्ट करते हुए।
कर्ण, जो अर्जुन के साथ एक निर्णायक द्वंद्व में उलझे, को भी अंततः अर्जुन की असाधारण कुशलता के समक्ष पराजित होकर, युद्धभूमि से पलायन करना पड़ा, इस असाधारण, एकाकी विजय ने सम्पूर्ण कौरव-सेना के मनोबल को पूर्णतः चूर-चूर कर दिया, तथा उन्हें विवश होकर पीछे हटना पड़ा।
इस अध्याय की शिक्षा
जब वर्षों की तपस्या, अनुशासन और संचित कौशल एक साथ प्रकट होते हैं, तो वे अकेले भी सम्पूर्ण सेनाओं को परास्त करने में सक्षम सिद्ध होते हैं।
सम्मोहनास्त्र एवं वस्त्र-हरण
युद्ध के इस निर्णायक क्षण में, जब कौरव-सेना पूर्णतः पराजित होकर पीछे हट चुकी थी, अर्जुन ने अपने विवेक और करुणा का असाधारण परिचय देते हुए, अपने वयोवृद्ध गुरुजनों तथा कुल के सदस्यों का वध करने के बजाय, एक विशेष "सम्मोहनास्त्र" का प्रयोग किया, जिसने सम्पूर्ण कौरव-सेना को गहन निद्रा में डुबो दिया।
जब समस्त कौरव योद्धा — भीष्म, द्रोण, कर्ण, दुर्योधन तथा अन्य — इस दिव्य निद्रा में मूर्च्छित पड़े थे, उत्तर ने अर्जुन से एक असाधारण, कुछ हद तक विचित्र अनुरोध किया — कि उन्हें भी युद्ध में कुछ न कुछ पराक्रम दिखाने का श्रेय प्राप्त हो, ताकि वे अपने पिता और नगरवासियों के समक्ष लज्जित न हों।
अर्जुन, अपने इस युवा सारथी के प्रति स्नेह और समझदारी दिखाते हुए, उत्तर को यह अनुमति दी कि वह मूर्च्छित पड़े कौरव योद्धाओं, विशेष रूप से दुर्योधन, कर्ण, द्रोण, कृपाचार्य तथा भीष्म, के उत्तरीय वस्त्र उतारकर अपने साथ ले जाए, जिससे वह अपनी नगरी में यह दावा कर सके कि उसने इन महारथियों को पराजित किया।
उत्तर, इस प्रस्ताव से अत्यंत प्रसन्न होकर, तत्काल इस कार्य को सम्पन्न किया, तथा इन बहुमूल्य वस्त्रों को शमी वृक्ष की उन्हीं शाखाओं में, जहाँ अस्त्र छिपाए गए थे, गोपनीय रूप से रख दिया, जो आगे चलकर, पांडवों की पहचान की अंतिम, निर्णायक पुष्टि का प्रमाण बनने वाले थे।
अर्जुन, अपने इस असाधारण, दयापूर्ण किंतु निर्णायक युद्ध को सम्पन्न कर, उत्तर सहित विराटनगर की ओर विजयी होकर लौटे, कौरव-सेना, अपनी इस अभूतपूर्व पराजय और अपमान से अत्यंत क्षुब्ध होकर, बिना कोई और प्रतिरोध किए, चुपचाप हस्तिनापुर की ओर वापस लौट गई।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्चा पराक्रम केवल विनाश में नहीं, अपितु विजय के क्षण में भी करुणा और विवेक बनाए रखने में निहित है, यही सर्वोच्च योद्धा-धर्म है।
उत्तर की वापसी एवं आरम्भिक झूठा दावा
विराटनगर लौटते हुए मार्ग में, अर्जुन ने पुनः अपना बृहन्नला-वेश धारण कर लिया, तथा अस्त्रों को पुनः शमी वृक्ष में गोपनीय रूप से छिपा दिया, यह सुनिश्चित करते हुए कि नगर में प्रवेश करते समय, बाह्य रूप से सब कुछ पूर्ववत् ही प्रतीत हो, ताकि अंतिम कुछ शेष दिनों में भी उनकी पहचान पूर्णतः सुरक्षित रहे।
नगर में प्रवेश करते ही, राजकुमार उत्तर, अपने इस असाधारण "विजय" के गर्व में, दरबार में तथा नगरवासियों के समक्ष यह दावा करने लगे कि उन्होंने स्वयं अकेले ही भीष्म, द्रोण, कर्ण जैसे महारथियों को युद्ध में परास्त किया है, यह सुनकर राजा विराट तथा सम्पूर्ण दरबार अत्यंत गर्वित और हर्षित हुए।
राजा विराट, अपने पुत्र की इस असाधारण उपलब्धि से अभिभूत होकर, उसे तत्काल युवराज घोषित करने की तैयारी करने लगे, तथा एक भव्य उत्सव के आयोजन का भी निश्चय किया, इसी हर्ष के मध्य, उन्होंने कंक (युधिष्ठिर) के साथ द्यूत-क्रीड़ा करते हुए, अपने पुत्र की इस विजय की भूरि-भूरि प्रशंसा करनी आरम्भ कर दी।
युधिष्ठिर, जो स्वयं इस समस्त सत्य से भलीभाँति अवगत थे कि यह विजय वास्तव में अर्जुन की ही थी, इस अतिशयोक्तिपूर्ण दावे को सुनकर, अनजाने में ही, कुछ हल्के, व्यंग्यात्मक शब्दों में यह टिप्पणी कर बैठे कि निश्चय ही यह विजय किसी और के पराक्रम का परिणाम रही होगी, यह सुनकर राजा विराट अत्यंत क्रोधित हो उठे।
क्रोधित विराट ने, अपने पुत्र के इस अपमान को सहन न करते हुए, कंक की ओर पासा फेंक मारा, जिससे उनकी नासिका से रक्त बहने लगा, इस अप्रत्याशित घटना ने, अनजाने में ही, पांडवों के प्रकटीकरण के उस अंतिम, निर्णायक क्षण की पृष्ठभूमि रच दी, जिसकी अब और अधिक विलंब से प्रतीक्षा नहीं की जा सकती थी।
इस अध्याय की शिक्षा
अल्पकालिक गर्व और अतिशयोक्तिपूर्ण दावे, चाहे कितने भी सुखद प्रतीत हों, अंततः सत्य के समक्ष टिक नहीं पाते, तथा कभी-कभी अप्रत्याशित परिणाम भी ला सकते हैं।
पांडवों की वास्तविक पहचान का प्रकटीकरण
इसी क्षण, उत्तर, जो अपने पिता के इस अनुचित आक्रोश को देखकर अत्यंत लज्जित हुए, उन्होंने अंततः सम्पूर्ण सत्य प्रकट करने का साहस जुटाया, उन्होंने अपने पिता को बताया कि युद्ध में वास्तविक विजय उनकी नहीं, अपितु उनके सारथी, नृत्य-गुरु बृहन्नला की थी, जिसने अकेले ही सम्पूर्ण कौरव-सेना को परास्त किया।
इस प्रकटीकरण से राजा विराट और भी अधिक असमंजस में पड़ गए, यह समझ न पाते हुए कि एक साधारण नृत्य-गुरु इतना असाधारण युद्ध-कौशल कैसे धारण कर सकता है, उन्होंने तत्काल बृहन्नला को दरबार में बुलाने का आदेश दिया, ताकि इस रहस्य का समाधान हो सके।
युधिष्ठिर ने, यह अनुभव करते हुए कि अब उनकी पहचान छिपाना असम्भव हो चुका है, तथा अज्ञातवास की अवधि भी लगभग पूर्ण हो चुकी है, स्वयं यह निश्चय किया कि अब सत्य को पूर्णतः प्रकट कर दिया जाए, उन्होंने राजा विराट से क्षमा माँगते हुए, अपनी नासिका से बहते रक्त को रोकने के अपने इस असामान्य कृत्य का कारण भी स्पष्ट किया — कि यदि उनका रक्त भूमि पर गिरता, तो यह अत्यंत अशुभ संकेत होता।
इसके पश्चात्, अर्जुन (बृहन्नला) दरबार में उपस्थित हुए, तथा उन्होंने विधिवत् रूप से अपनी तथा अपने चारों भाइयों की वास्तविक पहचान प्रकट कर दी — कि कंक स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर हैं, वल्लभ भीमसेन हैं, ग्रंथिक नकुल हैं, तंतिपाल सहदेव हैं, तथा वे स्वयं अर्जुन हैं, तथा सैरंध्री स्वयं महारानी द्रौपदी हैं।
राजा विराट, यह असाधारण सत्य जानकर, प्रारम्भ में अत्यंत भयभीत और लज्जित हुए, यह स्मरण करते हुए कि उन्होंने अनजाने में स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर पर पासा फेंककर उन्हें आघात पहुँचाया था, वे तत्काल क्षमा-याचना करते हुए, पांडवों के चरणों में नतमस्तक हो गए, तथा उन्हें अपना सम्पूर्ण राज्य और सम्पदा अर्पित करने की पेशकश की।
इस अध्याय की शिक्षा
सत्य, चाहे कितने भी दीर्घकाल तक छिपाया जाए, अंततः अपने पूर्ण गौरव और प्रभाव के साथ प्रकट होता ही है, तथा उसके प्रकटीकरण से पूर्व की समस्त भ्रांतियाँ स्वतः ही दूर हो जाती हैं।
अभिमन्यु-उत्तरा विवाह की योजना
पांडवों की वास्तविक पहचान के इस प्रकटीकरण के पश्चात्, राजा विराट ने अत्यंत हर्ष और श्रद्धा के साथ, अपनी पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन से करने का प्रस्ताव रखा, यह देखते हुए कि अर्जुन ने दीर्घकाल तक उसके नृत्य-गुरु के रूप में उसे शिक्षा दी थी, तथा उसकी रक्षा भी की थी।
अर्जुन ने अत्यंत विनम्रता और उचित नैतिकता का परिचय देते हुए, इस प्रस्ताव को यह कहते हुए अस्वीकार किया कि उन्होंने उत्तरा को अपनी शिष्या के रूप में देखा है, तथा एक गुरु-शिष्या का सम्बन्ध पवित्र और अनुल्लंघनीय होता है, अतः उनके मध्य विवाह अनुचित होगा।
इसके स्थान पर, अर्जुन ने एक अत्यंत सुंदर, बुद्धिमत्तापूर्ण प्रस्ताव रखा — कि उत्तरा का विवाह उनके अपने पुत्र अभिमन्यु से किया जाए, जो सुभद्रा से उत्पन्न, अत्यंत तेजस्वी और वीर युवा राजकुमार था, तथा जो स्वयं भी अपने पिता के समान असाधारण युद्ध-कौशल का स्वामी था।
राजा विराट, तथा उपस्थित समस्त पांडव और यादव-कुटुंबीजन, इस प्रस्ताव से अत्यंत प्रसन्न हुए, यह विवाह न केवल एक पारिवारिक सम्बन्ध, अपितु मत्स्य देश और पांडवों के मध्य एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण, सामरिक मैत्री-संधि का भी प्रतीक बनने वाला था, जो आगामी अपरिहार्य महासंग्राम में अत्यंत मूल्यवान सिद्ध होगी।
इस प्रकार, विराट पर्व, अपने इस भव्य, हर्षोल्लासपूर्ण विवाह-प्रस्ताव के साथ, तथा पांडवों के अज्ञातवास की सफल, गौरवपूर्ण पूर्णता के साथ, अपने समापन की ओर अग्रसर होता है, अब पांडव अपनी वास्तविक पहचान और सम्मान के साथ, अपने खोए हुए राज्य को पुनः प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र थे।
इस अध्याय की शिक्षा
गुरु-शिष्य सम्बन्ध की पवित्रता का सम्मान करना, तथा उससे भी बड़े, दीर्घकालिक सामरिक और पारिवारिक हित को पहचानना, सच्ची बुद्धिमत्ता और नैतिकता का परिचायक है।
विराट पर्व का समापन — युद्ध की तैयारी का आरम्भ
अभिमन्यु और उत्तरा के इस निश्चित विवाह की सूचना सम्पूर्ण भारतवर्ष के मित्र-राज्यों में भेजी गई, तथा युधिष्ठिर ने इस अवसर का उपयोग करते हुए, अपने समस्त संभावित मित्रों और सहयोगियों को इस विवाह-समारोह में आमंत्रित किया, यह एक चतुर, दूरदर्शी रणनीति थी जिससे आगामी युद्ध की तैयारी हेतु आवश्यक राजनीतिक गठबंधन स्थापित किए जा सकें।
स्वयं श्रीकृष्ण, बलराम, तथा द्वारका के अनेक यादव-वीर भी इस भव्य विवाह-समारोह में विराटनगर पधारे, यह भेंट पांडवों के लिए विशेष रूप से हर्षपूर्ण सिद्ध हुई, क्योंकि दीर्घकाल पश्चात् उन्हें अपने सबसे विश्वसनीय मित्र और मार्गदर्शक श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष उपस्थिति और परामर्श प्राप्त हुआ।
इस अवसर पर, द्रुपद-नरेश तथा अन्य अनेक शक्तिशाली मित्र-राजा भी उपस्थित हुए, तथा सभी ने मिलकर यह गंभीर विचार-विमर्श आरम्भ किया कि अब, अज्ञातवास की पूर्णता के पश्चात्, कौरवों से अपना न्यायपूर्ण राज्य पुनः प्राप्त करने हेतु आगे क्या रणनीति अपनाई जाए — क्या यह शांतिपूर्ण संधि-वार्ता से सम्भव है, अथवा युद्ध ही अंतिम, अपरिहार्य मार्ग है।
विवाह-समारोह अत्यंत भव्यता और हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ, अभिमन्यु और उत्तरा का विधिवत् विवाह हुआ, यह पांडवों के जीवन के इस अत्यंत कठिन, तेरह वर्षों के लम्बे संघर्ष-काल के पश्चात् आया एक दुर्लभ, शुद्ध आनंद का क्षण था, जिसने सबके हृदयों को नई आशा और उत्साह से भर दिया।
इस प्रकार विराट पर्व, पांडवों के अज्ञातवास की सफल, गौरवपूर्ण पूर्णता, उनकी वास्तविक पहचान की पुनर्स्थापना, तथा एक महत्त्वपूर्ण नई मैत्री-संधि की स्थापना के साथ अपने समापन पर पहुँचता है, अगले उद्योग पर्व में, इसी विवाह-सभा में आरम्भ हुए युद्ध-मंथन से, अंततः उस भीषण, अपरिहार्य महासंग्राम की सम्पूर्ण तैयारी की कथा वर्णित की जाएगी।
इस अध्याय की शिक्षा
एक दीर्घकालिक, कठिन संघर्ष की सफल पूर्णता के पश्चात् प्राप्त आनंद और विजय का क्षण, आगे की चुनौतियों का सामना करने हेतु नई शक्ति और एकता प्रदान करता है।
