उद्योग पर्व

उद्योग पर्व

युद्ध की तैयारी — श्रीकृष्ण का शांति-दूत बनकर हस्तिनापुर जाना, दुर्योधन का अहंकार, विदुर-नीति एवं कर्ण को कृष्ण का गुप्त संदेश।

अध्याय 1

युद्ध-मंथन का आरम्भ — विवाह-सभा में विचार-विमर्श

अभिमन्यु और उत्तरा के विवाह-समारोह की भव्यता के मध्य ही, विराटनगर में एकत्रित हुए समस्त मित्र-राजाओं, श्रीकृष्ण, बलराम, द्रुपद-नरेश तथा युधिष्ठिर के परामर्शदाताओं ने एक अत्यंत गंभीर राजनीतिक सभा का आयोजन किया, जिसमें यह निर्णय लिया जाना था कि अज्ञातवास की पूर्णता के पश्चात्, पांडवों को अपना न्यायपूर्ण राज्य पुनः प्राप्त करने हेतु आगे क्या मार्ग अपनाना चाहिए।

श्रीकृष्ण ने सभा को सम्बोधित करते हुए स्पष्ट किया कि यद्यपि युद्ध सर्वदा अंतिम, अनिवार्य विकल्प होना चाहिए, फिर भी दुर्योधन के स्वभाव और उसकी अटूट अहंकार-प्रवृत्ति को देखते हुए, यह अत्यंत सम्भव है कि वह शांतिपूर्वक राज्य लौटाने को कदापि सहमत नहीं होगा, अतः युद्ध की सम्पूर्ण तैयारी भी साथ-साथ आरम्भ की जानी चाहिए।

द्रुपद-नरेश ने यह सुझाव दिया कि इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण, संवेदनशील समय में शीघ्रता से निर्णय लेने के बजाय, सर्वप्रथम एक विश्वसनीय, अनुभवी दूत को हस्तिनापुर भेजा जाए, जो धृतराष्ट्र तथा भीष्म के समक्ष पांडवों का यह न्यायपूर्ण, स्पष्ट दावा प्रस्तुत करे कि अब, अज्ञातवास की सम्पूर्ण अवधि पूर्ण हो जाने पर, उनका राज्य उन्हें अविलंब लौटाया जाए।

युधिष्ठिर, अपने सहज स्वभाव के अनुरूप, इस शांतिपूर्ण मार्ग के प्रति सर्वाधिक उत्सुक थे, वे अब भी यह हार्दिक इच्छा रखते थे कि यदि सम्भव हो, तो युद्ध और रक्तपात के बिना ही, केवल न्याय और धर्म के आधार पर, यह विवाद सुलझाया जा सके, चाहे इसके लिए कितना भी संयम और धैर्य क्यों न रखना पड़े।

सभा ने अंततः यह सर्वसम्मत निर्णय लिया कि द्रुपद-नरेश के अपने ही पुरोहित को इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण, प्रथम दूत-कार्य हेतु हस्तिनापुर भेजा जाए, साथ ही, यह भी निश्चय किया गया कि दोनों पक्ष अपने-अपने मित्र-राज्यों से सैन्य-सहायता का अनुरोध भी तत्काल आरम्भ कर दें, ताकि यदि शांति-वार्ता असफल हो, तो युद्ध की तैयारी में कोई विलंब न हो।

इस अध्याय की शिक्षा

बुद्धिमत्तापूर्ण नेतृत्व वह है जो शांति के प्रयासों को कभी नहीं छोड़ता, फिर भी संभावित संघर्ष की सम्पूर्ण तैयारी साथ-साथ करने में भी कोई कोताही नहीं बरतता।

अध्याय 2

द्रुपद-पुरोहित का हस्तिनापुर में दूत-कार्य

द्रुपद-नरेश के वयोवृद्ध, अत्यंत विद्वान पुरोहित, हस्तिनापुर की राजसभा में पहुँचे, तथा भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य और विदुर सहित समस्त सभासदों के समक्ष, पांडवों का यह स्पष्ट, न्यायपूर्ण संदेश प्रस्तुत किया — कि तेरह वर्षों की सम्पूर्ण अवधि, वनवास और अज्ञातवास दोनों सहित, अब पूर्णतः और निर्विवाद रूप से समाप्त हो चुकी है, अतः उन्हें उनका इंद्रप्रस्थ राज्य अविलंब लौटाया जाए।

पुरोहित ने अत्यंत गंभीर, किंतु सम्मानजनक स्वर में यह भी स्पष्ट किया कि पांडव, अपनी असाधारण शक्ति के होते हुए भी, अब भी युद्ध के बजाय शांतिपूर्ण समाधान को ही सर्वोपरि प्राथमिकता देते हैं, किंतु यदि उनका यह न्यायपूर्ण दावा अस्वीकार किया गया, तो वे अपने अधिकार की रक्षा हेतु युद्ध करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।

भीष्म पितामह ने इस संदेश का उत्तर देते हुए, पांडवों के इस दावे को पूर्णतः न्यायपूर्ण और उचित स्वीकार किया, तथा धृतराष्ट्र को स्पष्ट परामर्श दिया कि राज्य को शांतिपूर्वक लौटा देना ही कुरुवंश की गरिमा और दीर्घकालिक कल्याण के लिए सर्वोत्तम मार्ग है।

किंतु कर्ण, जो उस सभा में उपस्थित था, ने अत्यंत उद्दंडतापूर्वक इस संदेश की निंदा करते हुए, यह तर्क दिया कि पांडवों ने वास्तव में अज्ञातवास की अवधि पूर्ण होने से पूर्व ही अपनी पहचान प्रकट कर दी थी (विराट-युद्ध में), अतः उनका यह दावा ही अवैध है, तथा उन्हें पुनः बारह वर्षों का वनवास भोगना चाहिए।

धृतराष्ट्र, अपने पुत्र-मोह में डूबे हुए, तथा दुर्योधन के निरंतर दबाव में, इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर कोई स्पष्ट, निर्णायक उत्तर नहीं दे पाए, उन्होंने केवल इतना ही कहा कि वे इस विषय पर आगे विचार करेंगे, तथा अपनी ओर से भी शीघ्र ही एक दूत पांडवों के पास भेजेंगे, यह अनिश्चितता ही आगे की सम्पूर्ण घटनाओं की जटिल पृष्ठभूमि बनी।

इस अध्याय की शिक्षा

एक न्यायपूर्ण दावे को भी, यदि नेतृत्व निर्णय लेने में अनिश्चित और कमजोर हो, अनावश्यक रूप से लंबित किया जा सकता है, जिसके परिणाम अंततः विनाशकारी सिद्ध होते हैं।

अध्याय 3

संजय का पांडवों के पास दूत बनकर आगमन

धृतराष्ट्र ने, भीष्म और विदुर के दबाव में, अपने विश्वस्त सारथी तथा मंत्री संजय को उपप्लव्य नगर (जहाँ अब पांडव अपने मित्र-राजाओं की सेनाओं सहित निवास कर रहे थे) भेजा, यह निर्देश देते हुए कि वे युधिष्ठिर से भेंट कर, शांति की सम्भावनाओं के विषय में गहन वार्तालाप करें, यद्यपि उनका यह संदेश स्वयं भी अस्पष्ट और अनिर्णायक था।

संजय, उपप्लव्य पहुँचकर, युधिष्ठिर तथा उपस्थित समस्त पांडवों और मित्र-राजाओं के समक्ष धृतराष्ट्र का संदेश सुनाया, जिसमें युद्ध के भीषण, विनाशकारी परिणामों की चेतावनी तो थी, किंतु राज्य लौटाने का कोई स्पष्ट, ठोस आश्वासन नहीं था, यह एक प्रकार से समय को टालने की ही एक कूटनीतिक चाल प्रतीत होती थी।

युधिष्ठिर ने अत्यंत धैर्य और गरिमा के साथ इस अस्पष्ट संदेश का उत्तर दिया, उन्होंने पुनः स्पष्ट किया कि वे स्वयं युद्ध की कदापि कामना नहीं करते, तथा यदि उन्हें उनका न्यायपूर्ण राज्य, चाहे केवल पाँच गाँव ही क्यों न हों, सम्मानपूर्वक लौटा दिया जाए, तो वे इसी में संतुष्ट होकर शांति स्थापित करने को पूर्णतः तत्पर हैं।

भीमसेन तथा अन्य पांडव, इस अत्यंत नम्र, समझौतापूर्ण प्रस्ताव पर कुछ असंतोष भी व्यक्त करते रहे, यह मानते हुए कि इतने वर्षों के अपमान और अन्याय के पश्चात्, इतनी अधिक विनम्रता दिखाना अनुचित है, किंतु युधिष्ठिर ने अपने धैर्य और न्यायप्रियता को बनाए रखते हुए, यह स्पष्ट किया कि अंतिम प्रयास तक शांति का मार्ग ही सर्वोत्तम है।

संजय, युधिष्ठिर के इस उत्तर तथा पांडवों की सम्पूर्ण सैन्य-तैयारी और मित्र-राजाओं की उपस्थिति का प्रत्यक्ष अवलोकन कर, अत्यंत भारी हृदय से हस्तिनापुर लौटे, यह भलीभाँति समझते हुए कि आगामी संघर्ष अब लगभग अपरिहार्य प्रतीत हो रहा है, जब तक कि कोई असाधारण, निर्णायक हस्तक्षेप न हो।

इस अध्याय की शिक्षा

अस्पष्ट, अनिर्णायक संदेश केवल समय को टालते हैं, किंतु वास्तविक समाधान नहीं लाते, स्पष्ट, ठोस निर्णय ही सच्चे संकट-समाधान का मार्ग है।

अध्याय 4

धृतराष्ट्र की अनिद्रा एवं विदुर-नीति का आरम्भ

संजय के लौटने पर, तथा पांडवों की असाधारण सैन्य-तैयारी और उनके न्यायपूर्ण दावे का विस्तृत वृत्तांत सुनकर, धृतराष्ट्र गहन चिंता और आसन्न विनाश की आशंका से इतने अधिक व्याकुल हो उठे कि उन्हें रात्रि में तनिक भी निद्रा नहीं आई, वे अपने भावी विनाश के भय से निरंतर करवटें बदलते रहे।

अपनी इस असहनीय अनिद्रा और मानसिक व्याकुलता से त्रस्त होकर, धृतराष्ट्र ने अपने अत्यंत बुद्धिमान, धर्मपरायण भाई विदुर को मध्यरात्रि में ही बुलवाया, तथा उनसे यह अनुरोध किया कि वे उन्हें कोई ऐसा गहन ज्ञान या परामर्श दें जिससे उनका मन शांत हो सके, तथा वे सही निर्णय ले सकें।

विदुर ने, इसी अवसर पर, धृतराष्ट्र को वह असाधारण, गहन उपदेश देना आरम्भ किया जो आगे "विदुर-नीति" के नाम से चिरस्थायी विख्यात हुआ, उन्होंने राजधर्म, सच्चे मित्र और शत्रु की पहचान, बुद्धिमत्ता और मूर्खता के लक्षण, तथा एक शासक के कर्तव्यों पर अत्यंत गहन, व्यावहारिक ज्ञान प्रस्तुत किया।

विदुर ने विशेष बल देकर समझाया कि जो व्यक्ति अपने ही हितैषियों के सत्य, कटु परामर्श को अनसुना कर, केवल चाटुकारों की मीठी, किंतु विनाशकारी बातों को सुनता है, वह अंततः स्वयं अपने ही पतन का कारण बनता है, उन्होंने धृतराष्ट्र को स्पष्ट, निर्भीक शब्दों में यह चेतावनी दी कि दुर्योधन का अहंकार सम्पूर्ण कुरुवंश को महाविनाश की ओर ले जा रहा है।

उन्होंने यह भी गहन शिक्षा दी कि एक सच्चा राजा वह है जो अपने पुत्र और शत्रु के मध्य भी न्याय और सत्य के आधार पर निर्णय ले सके, तथा पितृ-स्नेह के कारण अधर्म का समर्थन करना, स्वयं में एक गहन पाप है, यह उपदेश धृतराष्ट्र के हृदय को गहराई से स्पर्श तो कर गया, किंतु उनकी अंतिम निर्णय-शक्ति अब भी पुत्र-मोह के अधीन ही बनी रही।

इस अध्याय की शिक्षा

सच्चे हितैषी के कटु किंतु सत्य परामर्श को स्वीकार करने का साहस ही एक सच्चे नेता और एक असफल नेता के मध्य का अंतर निर्धारित करता है।

अध्याय 5

विदुर-नीति — आगे का उपदेश

विदुर ने अपने इस गहन उपदेश को आगे बढ़ाते हुए, धृतराष्ट्र को यह भी समझाया कि किसी भी राज्य की स्थिरता और समृद्धि के लिए छह गुण अनिवार्य हैं — सत्य, दान, अध्यवसाय (परिश्रम), अद्वेष (द्वेष-रहितता), क्षमा और तप, तथा जो शासक इनमें से किसी की भी उपेक्षा करता है, उसका राज्य अंततः पतन की ओर ही अग्रसर होता है।

उन्होंने अत्यंत मार्मिक उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि किस प्रकार एक अच्छा शासक अपने शत्रु की भी सराहनीय गुणों को पहचानने में संकोच नहीं करता, तथा अपने ही पुत्र के दोषों को भी बिना भय के स्वीकार करता है, यह निष्पक्षता ही सच्चे राजधर्म की आधारशिला है।

विदुर ने एक अत्यंत प्रसिद्ध रूपक के माध्यम से यह भी समझाया कि संसार एक ऐसे विशाल वृक्ष के समान है जिसकी जड़ें अधर्म और लोभ में हों, तो चाहे वह ऊपर से कितना भी हरा-भरा प्रतीत हो, उसका पतन निश्चित है, ठीक इसी प्रकार दुर्योधन का अहंकार, कुरुवंश के इस विशाल वृक्ष की जड़ों को ही खोखला कर रहा है।

उन्होंने धृतराष्ट्र को यह अंतिम, अत्यंत गंभीर सलाह दी कि वे अभी भी समय रहते दुर्योधन को नियंत्रित करें, तथा पांडवों को उनका न्यायपूर्ण राज्य लौटाकर, सम्पूर्ण भरतवंश को एक अवश्यंभावी, विनाशकारी महासंग्राम से बचा लें, यह अंतिम अवसर है जो शीघ्र ही सदा के लिए हाथ से निकल सकता है।

धृतराष्ट्र, विदुर के इस सम्पूर्ण, गहन उपदेश को सुनकर, क्षण भर के लिए गहन आत्म-मंथन में डूब गए, तथा उन्होंने स्वीकार भी किया कि विदुर का प्रत्येक शब्द पूर्णतः सत्य और उचित है, किंतु जैसे ही प्रातःकाल दुर्योधन उनके समक्ष पुनः उपस्थित हुआ, उनका यह क्षणिक विवेक, पितृ-स्नेह की उसी पुरानी दुर्बलता में पुनः विलीन हो गया।

इस अध्याय की शिक्षा

ज्ञान और विवेक की प्राप्ति भी तब तक निरर्थक रहती है जब तक उसे दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ व्यावहारिक निर्णयों में परिणत न किया जाए।

अध्याय 6

सनत्सुजात का धृतराष्ट्र को आध्यात्मिक उपदेश

धृतराष्ट्र, विदुर-नीति सुनने के पश्चात् भी अपने मन में पूर्ण शांति न पाकर, विदुर से यह अनुरोध किया कि क्या कोई और भी गहन, आध्यात्मिक उपाय है जिससे उनकी यह असहनीय व्याकुलता पूर्णतः शांत हो सके, विदुर ने, स्वयं एक शूद्र-योनि में जन्मे होने के कारण कुछ आध्यात्मिक विषयों पर सीमाओं का उल्लेख करते हुए, महर्षि सनत्सुजात का स्मरण किया।

सनत्सुजात, जो एक चिरंजीवी, ब्रह्मा के मानस-पुत्रों में से एक माने जाते थे, विदुर के आवाहन पर धृतराष्ट्र के समक्ष प्रकट हुए, तथा उन्होंने धृतराष्ट्र को जीवन, मृत्यु, आत्मा की शाश्वतता तथा अज्ञान की वास्तविक प्रकृति पर एक अत्यंत गहन, दार्शनिक उपदेश दिया, जो आगे "सनत्सुजातीय" के नाम से विख्यात हुआ।

उन्होंने धृतराष्ट्र को यह गूढ़ सत्य समझाया कि मृत्यु वास्तव में कोई बाह्य शक्ति नहीं, अपितु स्वयं मनुष्य के भीतर व्याप्त प्रमाद (आत्म-विस्मृति) और अज्ञान ही सच्ची मृत्यु है, तथा जो व्यक्ति आत्मज्ञान और सत्य के प्रति निरंतर जागरूक रहता है, वह वास्तविक अर्थ में अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है।

सनत्सुजात ने यह भी स्पष्ट किया कि सांसारिक विजय और पराजय, दोनों ही अंततः क्षणभंगुर हैं, तथा जो शासक इस शाश्वत सत्य को समझे बिना केवल क्षणिक सांसारिक विजय की कामना में अपने ही कुल का विनाश करने को उद्यत हो, वह वास्तव में अपने ही अज्ञान का शिकार है।

यह गहन, अत्यंत सूक्ष्म आध्यात्मिक उपदेश धृतराष्ट्र के मन को कुछ काल के लिए शांत तो कर गया, किंतु यह उनके मूल निर्णय को परिवर्तित करने में असमर्थ रहा, क्योंकि उनकी वास्तविक व्याकुलता आध्यात्मिक अज्ञान से नहीं, अपितु पुत्र के प्रति उनके अंधे, अनियंत्रित मोह से उत्पन्न हुई थी, जिसे कोई भी दार्शनिक उपदेश पूर्णतः दूर नहीं कर सका।

इस अध्याय की शिक्षा

गहनतम आध्यात्मिक ज्ञान भी तब तक व्यर्थ रहता है जब तक हृदय की मूल, आधारभूत दुर्बलता — चाहे वह मोह हो या अहंकार — को स्वयं पहचान कर त्याग न दिया जाए।

अध्याय 7

श्रीकृष्ण का शांति-दूत बनने का निश्चय

उपप्लव्य में, संजय के लौट जाने के पश्चात्, तथा हस्तिनापुर से किसी स्पष्ट, सकारात्मक उत्तर की प्रतीक्षा में, युधिष्ठिर ने अपने समस्त भाइयों और मित्र-राजाओं के साथ यह गहन विचार-विमर्श किया कि अब आगे किस प्रकार आगे बढ़ा जाए, अधिकांश उपस्थित जन युद्ध की अनिवार्यता को स्वीकार करते हुए भी, एक अंतिम, निर्णायक शांति-प्रयास के पक्ष में थे।

श्रीकृष्ण ने, इस गंभीर परिस्थिति में, स्वयं ही यह अत्यंत साहसिक, महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव रखा कि वे स्वयं, व्यक्तिगत रूप से, पांडवों के दूत के रूप में हस्तिनापुर जाएँगे, तथा धृतराष्ट्र और दुर्योधन के समक्ष प्रत्यक्ष रूप से शांति का अंतिम, सर्वोच्च प्रयास करेंगे, यह जानते हुए भी कि यह यात्रा स्वयं उनके लिए भी अत्यंत जोखिमपूर्ण सिद्ध हो सकती है।

युधिष्ठिर तथा अन्य पांडव, इस प्रस्ताव पर गहन चिंता व्यक्त करते हुए, श्रीकृष्ण को शत्रु के गढ़ में इस प्रकार अकेले जाने से रोकने का प्रयास करने लगे, यह आशंका व्यक्त करते हुए कि दुर्योधन जैसा कुटिल व्यक्ति उनके साथ किसी अनुचित, विश्वासघाती व्यवहार से भी नहीं हिचकिचाएगा।

श्रीकृष्ण ने, अत्यंत आत्मविश्वास और शांत मुस्कान के साथ, यह आश्वासन दिया कि वे इस यात्रा के हर सम्भावित खतरे से पूर्णतः अवगत हैं, तथा वे इसे स्वीकार करते हैं, क्योंकि यदि यह अंतिम प्रयास भी सफल न हो, तो कम से कम यह इतिहास में सदा के लिए यह प्रमाणित रहेगा कि पांडवों ने शांति का प्रत्येक सम्भव प्रयास पूर्ण गंभीरता और निष्ठा से किया था।

इस प्रकार, सम्पूर्ण सभा की सहमति और आशीर्वाद के साथ, श्रीकृष्ण ने स्वयं हस्तिनापुर जाकर, इस भीषण, अवश्यंभावी प्रतीत होते महासंग्राम को टालने के अंतिम, सर्वोच्च प्रयास का दायित्व अपने कंधों पर उठाया, यह निर्णय स्वयं में उनकी असाधारण साहस और कर्तव्य-निष्ठा का सर्वोच्च प्रमाण था।

इस अध्याय की शिक्षा

सच्चा नेतृत्व वह है जो अंतिम, सर्वाधिक जोखिमपूर्ण प्रयास स्वयं करने का साहस दिखाए, बजाय इसके कि वह इसे किसी और पर छोड़ दे।

अध्याय 8

श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर हेतु प्रस्थान

श्रीकृष्ण के हस्तिनापुर प्रस्थान से पूर्व, अनेक अशुभ संकेत प्रकट हुए, जिन्हें देखकर उपस्थित ऋषि-मुनि और ज्योतिषी अत्यंत चिंतित हुए, यह भविष्यवाणी करते हुए कि आगामी घटनाएँ अत्यंत भीषण और संभवतः विनाशकारी सिद्ध होंगी, किंतु श्रीकृष्ण, इन संकेतों से तनिक भी विचलित हुए बिना, अपने निश्चित मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़े।

द्रौपदी, अपने हृदय की गहन व्यथा और उस असहनीय अपमान को स्मरण करते हुए जो उसने भरी सभा में सहा था, श्रीकृष्ण से भावविह्वल होकर यह अनुरोध किया कि वे हस्तिनापुर में उसके इस अपमान का समुचित उल्लेख अवश्य करें, तथा यह सुनिश्चित करें कि यह अन्याय कभी अनुत्तरित न रहे, श्रीकृष्ण ने उसे अत्यंत स्नेहपूर्वक आश्वस्त किया कि उसका यह अपमान कदापि व्यर्थ नहीं जाएगा।

श्रीकृष्ण, अपने भव्य रथ पर सवार होकर, कुछ चुने हुए यादव-वीरों तथा सेवकों के साथ, हस्तिनापुर की ओर प्रस्थान किए, मार्ग में अनेक ग्रामवासी और नगरवासी, उनके दर्शन हेतु उमड़ पड़े, यह विश्वास करते हुए कि स्वयं भगवान की यह यात्रा किसी महान, कल्याणकारी उद्देश्य से हो रही है।

मार्ग में, महर्षि मैत्रेय ऋषि से भी उनकी भेंट हुई, जिन्होंने दुर्योधन को यह गंभीर परामर्श दिया कि वह पांडवों से संधि कर ले, तथा जब दुर्योधन ने इस परामर्श का भी उपहास किया, मैत्रेय ने क्रोधित होकर उसे शाप दिया कि शीघ्र ही भीम उसकी जंघा को अपनी गदा से चूर-चूर करेगा, यह भविष्यवाणी आगे चलकर सत्य सिद्ध होने वाली थी।

हस्तिनापुर में, श्रीकृष्ण के आगमन की सूचना पाते ही, धृतराष्ट्र ने उनके भव्य स्वागत की तैयारी करने का आदेश दिया, तथा उन्हें बहुमूल्य उपहार और आतिथ्य प्रस्तुत करने का प्रयास किया, किंतु श्रीकृष्ण ने, अत्यंत विनम्रतापूर्वक, इन समस्त राजसी उपहारों को अस्वीकार करते हुए, यह स्पष्ट किया कि वे किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, अपितु केवल धर्म और शांति की स्थापना हेतु ही यहाँ आए हैं।

इस अध्याय की शिक्षा

जो व्यक्ति किसी उच्च, निःस्वार्थ उद्देश्य से प्रेरित होकर कार्य करता है, वह किसी भी प्रलोभन या भय से विचलित हुए बिना, अपने मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़ता है।

अध्याय 9

विदुर से भेंट एवं दुर्योधन की बंदी-योजना

हस्तिनापुर में, श्रीकृष्ण, राजसी अतिथि-गृह के बजाय, अपने घनिष्ठ, विश्वस्त मित्र विदुर के साधारण, किंतु धर्मपूर्ण निवास में ठहरने का निश्चय किया, यह उनकी ओर से एक स्पष्ट, प्रतीकात्मक संकेत था कि वे दुर्योधन के आडंबरपूर्ण आतिथ्य के बजाय, सच्चे धर्म और सत्यनिष्ठा के साथ खड़े हैं।

विदुर ने श्रीकृष्ण को गुप्त रूप से यह गंभीर चेतावनी दी कि दुर्योधन तथा उसके कुछ कुटिल सलाहकार, गुप्त रूप से यह षड्यंत्र रच रहे हैं कि यदि शांति-वार्ता असफल हो, तो वे कृष्ण को ही बलपूर्वक बंदी बना लें, यह विश्वास करते हुए कि उनकी बंदी बनाए जाने से पांडवों का मनोबल पूर्णतः टूट जाएगा।

श्रीकृष्ण, इस भीषण, विश्वासघाती योजना को सुनकर, तनिक भी भयभीत या विचलित नहीं हुए, अपितु उन्होंने अत्यंत शांत मुस्कान के साथ यह उत्तर दिया कि दुर्योधन को अपने इस दुस्साहस के परिणामों का तनिक भी आभास नहीं है, तथा वे स्वयं इस सभा में जाकर, अपनी वास्तविक शक्ति का आवश्यकतानुसार प्रदर्शन करने में पूर्णतः सक्षम हैं।

भीष्म तथा द्रोणाचार्य को भी, जब इस कुटिल, अत्यंत अनुचित योजना का आभास हुआ, वे तत्काल दुर्योधन के पास गए, तथा उसे यह कठोरतापूर्वक चेताया कि श्रीकृष्ण जैसे सम्मानित अतिथि तथा दूत के साथ ऐसा विश्वासघाती व्यवहार, न केवल अत्यंत अधर्मपूर्ण है, अपितु यह सम्पूर्ण कुरुवंश के लिए भी अत्यंत विनाशकारी सिद्ध होगा।

दुर्योधन, अपने वयोवृद्ध पितामह और गुरु के इस कठोर विरोध के समक्ष, अपनी इस योजना को खुले रूप में आगे बढ़ाने का साहस तो नहीं जुटा सका, किंतु उसके मन में यह कुटिल विचार अंदर ही अंदर सुलगता रहा, जो अगले ही दिन की राजसभा में एक अत्यंत नाटकीय, अप्रत्याशित मोड़ की पृष्ठभूमि रचने वाला था।

इस अध्याय की शिक्षा

सच्चा साहस वह है जो शत्रु के गढ़ में, संभावित विश्वासघात के भय के मध्य भी, अपने उद्देश्य और सत्य के प्रति दृढ़ बना रहे।

अध्याय 10

राजसभा में श्रीकृष्ण का शांति-प्रस्ताव

अगले दिन, हस्तिनापुर की भव्य राजसभा में, धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, विदुर तथा समस्त कौरव-राजकुमारों तथा अन्य आमंत्रित राजाओं की उपस्थिति में, श्रीकृष्ण ने अत्यंत गंभीर, गरिमापूर्ण स्वर में पांडवों की ओर से अपना अंतिम, स्पष्ट शांति-प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

उन्होंने अत्यंत तर्कसंगत, धैर्यपूर्ण ढंग से पांडवों के साथ हुए समस्त अन्याय — द्यूत-क्रीड़ा का छल, द्रौपदी का घोर अपमान, तथा तेरह वर्षों का अन्यायपूर्ण निर्वासन — का विस्तृत वर्णन किया, तथा यह स्पष्ट किया कि इतने असहनीय अन्याय के पश्चात् भी, पांडव अब भी युद्ध के बजाय शांति को ही प्राथमिकता देते हैं।

श्रीकृष्ण ने यह अंतिम, अत्यंत उदार प्रस्ताव रखा कि यदि दुर्योधन सम्पूर्ण राज्य लौटाने में असमर्थ या अनिच्छुक है, तो वह कम से कम पांडवों को केवल पाँच गाँव — प्रत्येक भाई के लिए एक — प्रदान कर दे, ताकि वे सम्मानपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सकें, तथा सम्पूर्ण भरतवंश एक भीषण, विनाशकारी युद्ध से बच सके।

इस प्रस्ताव को सुनकर, भीष्म, द्रोणाचार्य तथा विदुर सहित सभा के अनेक वयोवृद्ध, बुद्धिमान सदस्य, इस अत्यंत उचित और उदार प्रस्ताव को स्वीकार करने का दुर्योधन को खुलकर परामर्श देने लगे, यह स्पष्ट करते हुए कि इतना छोटा त्याग, सम्पूर्ण वंश के विनाश को टालने के लिए अत्यंत सस्ता मूल्य है।

किंतु दुर्योधन, अपने अहंकार और गहन ईर्ष्या में इतना अंधा हो चुका था कि इस अत्यंत उचित, विनम्र प्रस्ताव को भी वह अपने ही अपमान के रूप में देखने लगा, तथा सभा में उपस्थित सभी की स्पष्ट सलाह की अवहेलना करते हुए, वह क्रोध से उबलता हुआ खड़ा हो गया, अपने अंतिम, उद्दंड उत्तर की तैयारी करते हुए।

इस अध्याय की शिक्षा

जब उदारता और न्याय का प्रस्ताव भी अहंकार के कारण अपमान के रूप में देखा जाने लगे, तो यह समझना चाहिए कि विनाश अब अपरिहार्य हो चुका है।

अध्याय 11

दुर्योधन का उद्दंड अस्वीकार

दुर्योधन ने, सम्पूर्ण सभा के समक्ष, अत्यंत उद्दंडता और अहंकार से भरे स्वर में, यह ऐतिहासिक, कुख्यात घोषणा की — कि वह पांडवों को सुई की नोक के बराबर भी भूमि, बिना युद्ध के, कदापि नहीं देगा, यह कथन आगे चलकर उसके अहंकार का सबसे स्थायी, प्रतीकात्मक प्रमाण बनकर इतिहास में सदा के लिए अंकित हो गया।

उसने श्रीकृष्ण पर यह आरोप भी लगाया कि वे पांडवों के पक्षधर होकर, इस सभा में अनुचित रूप से हस्तक्षेप कर रहे हैं, तथा यह भी कहा कि वह स्वयं को किसी भी परिस्थिति में पांडवों के समक्ष झुकने के लिए बाध्य नहीं मानता, चाहे इसके लिए उसे सम्पूर्ण कुरुवंश का ही विनाश क्यों न करना पड़े।

श्रीकृष्ण ने, दुर्योधन के इस अहंकारपूर्ण, अत्यंत अनुचित उत्तर पर, अपनी गंभीरता को तनिक भी खोए बिना, उसे एक अंतिम, गहन चेतावनी दी — कि उसका यह अहंकार और अन्याय अंततः स्वयं उसी के, तथा उसके सम्पूर्ण कुल के विनाश का कारण बनेगा, तथा यह विनाश उसकी अपनी ही मूर्खतापूर्ण हठधर्मिता का परिणाम होगा, न कि पांडवों की किसी आक्रामकता का।

इसी क्षण, अपने अहंकार की चरम सीमा पर पहुँचकर, तथा श्रीकृष्ण के इस दूत-कार्य को पूर्णतः विफल घोषित करते हुए, दुर्योधन ने अपने कुछ विश्वस्त सहयोगियों के साथ, अंततः वही कुटिल, विश्वासघाती योजना क्रियान्वित करने का साहस जुटाया जिसकी चेतावनी विदुर पहले ही दे चुके थे — उसने श्रीकृष्ण को बलपूर्वक बंदी बनाने का आदेश दिया।

यह देखकर सम्पूर्ण सभा में भय और स्तब्धता की एक लहर दौड़ गई, भीष्म, द्रोण और विदुर सहित सभी उपस्थित गणमान्य जन इस अभूतपूर्व, घोर अधर्मपूर्ण कृत्य को रोकने का प्रयास करने लगे, किंतु इसी क्षण, स्वयं श्रीकृष्ण ने अपनी वास्तविक, असीम शक्ति का वह असाधारण, चमत्कारिक प्रदर्शन आरम्भ किया जो इस समस्त सभा को सदा के लिए स्तब्ध कर देने वाला था।

इस अध्याय की शिक्षा

अहंकार, जब अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है, तो वह विवेक और आत्म-संरक्षण की भी सम्पूर्ण सीमाओं को लांघकर, स्वयं के ही विनाश को आमंत्रित करने लगता है।

अध्याय 12

श्रीकृष्ण का विश्वरूप दर्शन

जैसे ही दुर्योधन के सैनिक श्रीकृष्ण को बंदी बनाने के लिए आगे बढ़े, श्रीकृष्ण, अत्यंत शांत मुद्रा में, अपने स्थान से उठे, तथा उन्होंने अपनी वह असीम, दिव्य शक्ति प्रकट करनी आरम्भ की जो सामान्य मानवीय दृष्टि और कल्पना से पूर्णतः परे थी, उनके शरीर से एक असहनीय, तीव्र तेज प्रस्फुटित होने लगा।

क्षण भर में, सम्पूर्ण सभा ने यह अद्भुत, विस्मयकारी दृश्य देखा — श्रीकृष्ण के शरीर से असंख्य देवता, ब्रह्मा, शिव, इंद्र सहित समस्त लोकपाल, तथा उनके विभिन्न दिव्य अस्त्र-शस्त्र, प्रकट होने लगे, यह उनका वही अद्भुत "विश्वरूप" था जिसने सम्पूर्ण सृष्टि, समस्त लोकों और प्राणियों को अपने ही भीतर समाहित किए रखा था।

इस असाधारण, भयावह किंतु दिव्य दृश्य को देखकर, सम्पूर्ण सभा भय और विस्मय से स्तब्ध होकर, अपनी आँखें बंद करने या दूर देखने को विवश हुई, केवल कुछ विशेष रूप से दिव्य-दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति — भीष्म, द्रोण, विदुर तथा संजय — ही इस सम्पूर्ण, अलौकिक दृश्य को पूर्ण रूप से देख सके।

दुर्योधन तथा उसके साथी, इस अभूतपूर्व, भयावह शक्ति-प्रदर्शन को देखकर, अत्यंत भयभीत होकर पीछे हट गए, उनकी बंदी बनाने की सम्पूर्ण योजना, इस एक क्षण में ही, पूर्णतः निष्फल और हास्यास्पद सिद्ध हो गई, यह स्पष्ट हो गया कि जिसे वे बंदी बनाने का साहस कर रहे थे, वह वास्तव में स्वयं सृष्टि के मूल कारण, परम भगवान ही हैं।

इस असाधारण दर्शन के पश्चात्, श्रीकृष्ण ने अपनी सामान्य, मानवीय काया पुनः धारण की, तथा बिना किसी और शब्द के, सभा से प्रस्थान की ओर बढ़े, यह स्पष्ट करते हुए कि उन्होंने अपना दूत-कार्य पूर्ण गंभीरता और धैर्य से सम्पन्न कर लिया है, तथा अब निर्णय पूर्णतः दुर्योधन तथा उसके परिणामों के हाथ में है।

इस अध्याय की शिक्षा

जो शक्ति सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करती है, उसे किसी भी सांसारिक बल या षड्यंत्र से बंदी बनाना असम्भव है, अहंकार की यह भ्रांति ही स्वयं उसके पतन का कारण बनती है।

अध्याय 13

कर्ण से कृष्ण की गुप्त भेंट — जन्म-रहस्य का प्रकटीकरण

हस्तिनापुर से प्रस्थान करने से ठीक पूर्व, श्रीकृष्ण ने एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण, अंतिम प्रयास के रूप में, कर्ण को अपने रथ पर आमंत्रित किया, तथा उसे नगर के बाहर तक साथ ले जाते हुए, एक अत्यंत गोपनीय, हृदयस्पर्शी वार्तालाप आरम्भ किया, जो कर्ण के सम्पूर्ण जीवन को ही बदल सकता था।

श्रीकृष्ण ने कर्ण को यह गूढ़, अब तक पूर्णतः गोपनीय सत्य प्रकट किया कि वह वास्तव में सूत-पुत्र नहीं, अपितु स्वयं कुंती का ज्येष्ठ पुत्र है, जिसे सूर्यदेव से प्राप्त हुआ था, तथा इस प्रकार वह वास्तव में युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन का ही सबसे बड़ा, सगा भाई है, अतः उसे इस अवैध, अन्यायपूर्ण युद्ध में दुर्योधन के पक्ष में खड़े होने की कोई वास्तविक आवश्यकता नहीं है।

श्रीकृष्ण ने यह असाधारण प्रस्ताव भी रखा कि यदि कर्ण पांडवों के पक्ष में आ जाए, तो वह न केवल अपने भाइयों से पुनर्मिलित होगा, अपितु अपनी ज्येष्ठता के आधार पर, वह स्वयं हस्तिनापुर का चक्रवर्ती सम्राट भी बन सकता है, युधिष्ठिर स्वयं उसकी इस ज्येष्ठता को सहर्ष स्वीकार करेंगे, तथा द्रौपदी सहित सम्पूर्ण पांडव-परिवार उसे अपने परिवार के सर्वोच्च सदस्य के रूप में सम्मान देगा।

यह असाधारण, जीवन-परिवर्तनकारी सत्य सुनकर, कर्ण गहन आघात और भावनात्मक उथल-पुथल में डूब गया, उसने स्वीकार किया कि वह इस सम्पूर्ण सत्य से पूर्णतः अवगत नहीं था, तथा यह जानकर कि वह वास्तव में एक क्षत्रिय राजकुमार, तथा स्वयं पांडवों का ज्येष्ठ भ्राता है, उसके हृदय में गहन वेदना और आत्म-मंथन उत्पन्न हुआ।

इस भावनात्मक क्षण में, कर्ण के समक्ष एक असाधारण, कठिनतम निर्णय था — अपनी वास्तविक, रक्त-सम्बन्धित पहचान और असीम राजसी सम्मान को स्वीकार करना, अथवा अपने पालक-पिता के परिवार तथा अपने बाल्यमित्र दुर्योधन के प्रति अपनी दीर्घकालिक, अटूट निष्ठा को बनाए रखना, यह निर्णय आगामी अध्याय में प्रकट होगा।

इस अध्याय की शिक्षा

सबसे बड़े प्रलोभन और सबसे बड़े सत्य के मध्य भी, सच्ची निष्ठा और कृतज्ञता का मूल्य कभी-कभी सांसारिक लाभ से कहीं अधिक भारी सिद्ध होता है।

अध्याय 14

कर्ण का श्रीकृष्ण के प्रस्ताव को अस्वीकार करना

कर्ण, गहन आंतरिक द्वंद्व के पश्चात्, श्रीकृष्ण के समक्ष अत्यंत गंभीर, भावुक किंतु दृढ़ स्वर में अपना अंतिम उत्तर प्रस्तुत किया, उसने कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार किया कि यह प्रस्ताव असाधारण रूप से उदार और आकर्षक है, किंतु वह इसे स्वीकार करने में स्वयं को असमर्थ पाता है।

उसने समझाया कि वह अपने पालक माता-पिता, अधिरथ और राधा, को ही अपने सच्चे माता-पिता के रूप में सम्मान देता है, जिन्होंने उसे तब अपनाया और पाला जब उसकी जन्मदात्री माता ने उसे लोक-लाज के भय से त्याग दिया था, तथा वह इस पालन-पोषण के ऋण को कदापि भुला नहीं सकता।

उसने यह भी अत्यंत मार्मिक शब्दों में स्पष्ट किया कि दुर्योधन, जिसने उसे उस दिन सम्मान दिया जब सम्पूर्ण विश्व ने उसका उपहास किया था, जिसने उसे अंग देश का राजा बनाकर उसकी गरिमा की रक्षा की, उसके प्रति उसकी निष्ठा और कृतज्ञता किसी भी सांसारिक सिंहासन या पारिवारिक सम्बन्ध से कहीं अधिक मूल्यवान है।

कर्ण ने श्रीकृष्ण से यह भी अनुरोध किया कि वे इस पूरे वार्तालाप को, तथा उसकी वास्तविक पहचान को, तब तक पूर्णतः गोपनीय रखें जब तक वह स्वयं इसे उचित न समझे, क्योंकि यदि युधिष्ठिर को यह ज्ञात हो जाए कि कर्ण ही सबसे ज्येष्ठ पांडव है, तो वे स्वयं राज्य त्यागकर उसे सौंपने का प्रस्ताव रख सकते हैं, जो युद्ध की सम्पूर्ण गतिशीलता को अनावश्यक रूप से जटिल बना देगा।

श्रीकृष्ण, कर्ण के इस असाधारण त्याग, कृतज्ञता और निष्ठा से गहराई से प्रभावित हुए, उन्होंने उसकी इस दृढ़ता का सम्मान करते हुए, उसका अंतिम अनुरोध स्वीकार किया, तथा भारी हृदय से यह स्वीकार भी किया कि कर्ण का यह निर्णय, चाहे कितना भी दुःखद क्यों न हो, उसकी अपनी असाधारण चारित्रिक श्रेष्ठता का ही प्रमाण है।

इस अध्याय की शिक्षा

कृतज्ञता और निष्ठा, जब सच्चे हृदय से निभाई जाए, वह किसी भी सिंहासन, सम्पदा या यहाँ तक कि रक्त-सम्बन्ध से भी अधिक मूल्यवान सिद्ध हो सकती है।

अध्याय 15

कुंती-कर्ण संवाद

श्रीकृष्ण के हस्तिनापुर से प्रस्थान के पश्चात्, स्वयं कुंती, अपने हृदय की गहन वेदना और अपराध-बोध से प्रेरित होकर, गंगा के तट पर, जहाँ कर्ण प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्यदेव की आराधना करता था, गुप्त रूप से उसके समक्ष प्रकट हुईं, यह उनके जीवन का सबसे कठिन, सबसे भावनात्मक क्षणों में से एक था।

कुंती ने, दीर्घकाल से छिपाए गए अपने इस गहन रहस्य और अपराध-बोध को अब और अधिक न सह सकते हुए, कर्ण के समक्ष स्वयं को उसकी जन्मदात्री माता के रूप में प्रकट किया, तथा अश्रुपूरित नेत्रों से उससे क्षमा-याचना करते हुए, उससे यह अनुरोध किया कि वह अपने भाइयों के साथ, पांडवों के पक्ष में आ जाए।

कर्ण, अपनी माता के इस अप्रत्याशित, भावविह्वल प्रकटीकरण से गहराई से आहत और क्षुब्ध हुआ, उसने अत्यंत कटु किंतु न्यायपूर्ण शब्दों में कुंती को स्मरण कराया कि उसने अपने जन्म के तत्काल पश्चात् ही उसे त्याग दिया था, तथा आज, केवल इसलिए कि उसे अपने अन्य पुत्रों की सुरक्षा की चिंता है, वह उसे अपना पुत्र स्वीकार करने आई है।

उसने अत्यंत मार्मिक शब्दों में यह भी कहा कि यदि कुंती ने उसे अपने जन्म के समय ही स्वीकार किया होता, तो आज उसका सम्पूर्ण जीवन ही भिन्न होता, किंतु अब, इतने वर्षों के अपमान, संघर्ष और कृतघ्नता के पश्चात्, वह अपनी वर्तमान पहचान और अपने प्रति दुर्योधन की निष्ठा को त्यागकर, पांडवों के पक्ष में जाना अपने ही सम्मान और आत्म-सम्मान के विरुद्ध मानता है।

फिर भी, अपनी माता के प्रति गहन करुणा और सम्मान दिखाते हुए, कर्ण ने यह असाधारण वचन दिया कि वह युद्ध में युधिष्ठिर, भीम, नकुल या सहदेव में से किसी का भी अंत नहीं करेगा, वह केवल अर्जुन से ही युद्ध करेगा, तथा युद्ध के अंत में, कुंती के पास सदैव पाँच पुत्र ही शेष रहेंगे — चाहे वह स्वयं जीवित रहे अथवा अर्जुन, यह वचन उसके हृदय की गहन, अंतर्निहित करुणा का एक अंतिम, मार्मिक प्रमाण था।

इस अध्याय की शिक्षा

एक माता का देर से किया गया पश्चाताप भी, चाहे वह पूर्ण क्षति की भरपाई न कर सके, फिर भी हृदय में छिपी करुणा को जागृत कर, कुछ न कुछ शुभ वचन अवश्य दिला सकता है।

अध्याय 16

युद्ध की अनिवार्यता — दोनों पक्षों की सेना-संग्रह

श्रीकृष्ण के शांति-मिशन की इस अंतिम, निर्णायक असफलता के पश्चात्, तथा दुर्योधन के अटूट, हठधर्मी अहंकार के प्रत्यक्ष प्रमाण के साथ, युद्ध अब सम्पूर्ण रूप से अपरिहार्य हो चुका था, दोनों ही पक्षों ने अब सम्पूर्ण गंभीरता और तीव्रता से अपनी-अपनी सेनाओं को एकत्रित करने का कार्य आरम्भ कर दिया।

पांडवों के पक्ष में, द्रुपद, विराट, धृष्टद्युम्न, शिखंडी, सात्यकि (जो श्रीकृष्ण के परम भक्त थे), केकय-देश के राजकुमार, तथा अन्य अनेक शक्तिशाली मित्र-राजा अपनी-अपनी सेनाओं सहित सम्मिलित हुए, कुल मिलाकर, पांडवों की सेना सात अक्षौहिणी (एक विशाल, सुव्यवस्थित सैन्य-इकाई) तक विस्तृत हुई।

कौरवों के पक्ष में, भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, शल्य (जो नकुल-सहदेव के मामा होते हुए भी, छलपूर्वक कौरवों के पक्ष में सम्मिलित हुए), भगदत्त, तथा अन्य असंख्य शक्तिशाली राजाओं की सेनाएँ एकत्रित हुईं, कौरवों की यह विशाल सेना ग्यारह अक्षौहिणी तक विस्तृत हुई, जो पांडवों से भी अधिक थी।

एक अत्यंत रोचक, महत्त्वपूर्ण घटना में, स्वयं श्रीकृष्ण ने अर्जुन और दुर्योधन, दोनों को यह विकल्प दिया कि वे या तो उनकी विशाल, शक्तिशाली नारायणी सेना ले सकते हैं, अथवा स्वयं श्रीकृष्ण को, जो युद्ध में शस्त्र नहीं उठाएँगे, केवल सारथी और परामर्शदाता के रूप में, अर्जुन ने अत्यंत बुद्धिमत्ता से स्वयं श्रीकृष्ण को चुना, जबकि दुर्योधन, प्रसन्नतापूर्वक उनकी विशाल सेना ले गए।

इसी काल में, बलराम ने, दोनों पक्षों के प्रति अपने समान स्नेह के कारण, इस युद्ध में पूर्णतः तटस्थ रहने का निश्चय किया, तथा तीर्थयात्रा पर प्रस्थान कर गए, यह निर्णय, स्वयं में, इस भीषण पारिवारिक संघर्ष की गहन त्रासदी और जटिलता का एक और मार्मिक प्रमाण था।

इस अध्याय की शिक्षा

जब शांति के समस्त द्वार बंद हो जाएँ, तो शेष एकमात्र कर्तव्य अपनी सम्पूर्ण शक्ति और बुद्धिमत्ता के साथ, न्याय की रक्षा हेतु तैयार होना ही रह जाता है।

अध्याय 17

भीष्म का सेनापति-पद स्वीकार करना — शर्त सहित

युद्ध की सम्पूर्ण तैयारी पूर्ण होने पर, दुर्योधन ने कौरव-सेना के सेनापति-पद हेतु सर्वप्रथम अपने पितामह भीष्म से अनुरोध किया, यह जानते हुए कि उनका अनुभव, कौशल और गरिमा सम्पूर्ण सेना के मनोबल के लिए अत्यंत आवश्यक है, भीष्म ने इस अनुरोध को स्वीकार किया, किंतु एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण, हृदयस्पर्शी शर्त के साथ।

भीष्म ने स्पष्ट किया कि वे पांडवों के प्रति अपने गहन स्नेह के कारण, तथा स्वयं उनकी सत्यनिष्ठा और धर्मपरायणता के प्रति अपनी श्रद्धा के कारण, उनका प्रत्यक्ष अंत कदापि नहीं करेंगे, किंतु वे प्रतिदिन दस सहस्र योद्धाओं का वध करने का वचन देते हैं, तथा जब तक वे स्वयं युद्धरत रहेंगे, कौरव-सेना पराजित नहीं हो सकती।

उन्होंने यह भी एक गूढ़, महत्त्वपूर्ण शर्त रखी — कि यदि कर्ण युद्धभूमि में उपस्थित रहा, तो वे स्वयं युद्ध नहीं करेंगे, क्योंकि भीष्म और कर्ण के मध्य पूर्व से ही एक गहरा, व्यक्तिगत मतभेद तथा प्रतिद्वंद्विता की भावना विद्यमान थी, कर्ण, अपने पितामह-तुल्य भीष्म के इस अनुरोध का सम्मान करते हुए, तब तक युद्ध से विरत रहने का निश्चय किया जब तक भीष्म स्वयं युद्धरत हैं।

दुर्योधन, यद्यपि इस शर्त से कुछ असंतुष्ट हुआ, फिर भी भीष्म के अनुभव और गरिमा के महत्त्व को समझते हुए, इसे स्वीकार करने को विवश हुआ, इस प्रकार भीष्म को औपचारिक रूप से कौरव-सेना का प्रथम सेनापति घोषित किया गया, यह पद उन्होंने अत्यंत भारी, विभाजित हृदय के साथ स्वीकार किया, यह जानते हुए कि वे अपने ही प्रिय पौत्रों के विरुद्ध युद्ध करने जा रहे हैं।

भीष्म ने युधिष्ठिर को गुप्त रूप से यह भी संदेश भिजवाया कि वे कर्तव्य-वश कौरवों की ओर से युद्ध अवश्य करेंगे, किंतु यदि पांडव उनसे उनकी मृत्यु का उपाय पूछें, तो वे इसे सहर्ष प्रकट कर देंगे, यह असाधारण, विरोधाभासी वचन भीष्म के हृदय की उस गहन द्विविधा को प्रकट करता है जिसमें कर्तव्य और स्नेह निरंतर संघर्षरत थे।

इस अध्याय की शिक्षा

कर्तव्य और व्यक्तिगत स्नेह के मध्य का संघर्ष, कभी-कभी किसी को भी ऐसी विरोधाभासी स्थिति में डाल सकता है जहाँ वह कर्तव्य निभाते हुए भी, गुप्त रूप से न्याय की सहायता करने का मार्ग खोज लेता है।

अध्याय 18

रथी-अतिरथियों की गणना

युद्ध की अंतिम तैयारियों के मध्य, भीष्म ने दुर्योधन के अनुरोध पर, दोनों पक्षों में उपस्थित समस्त प्रमुख योद्धाओं की उनकी क्षमता के अनुसार, अतिरथी (जो अकेले असंख्य रथियों के समान युद्ध कर सकें), महारथी, तथा रथी की श्रेणियों में विस्तृत, सुव्यवस्थित गणना प्रस्तुत की, यह एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सामरिक विश्लेषण था।

इस गणना में, भीष्म ने स्वयं को, द्रोणाचार्य को, तथा कृपाचार्य को अतिरथी श्रेणी में रखा, तथा अर्जुन की असाधारण क्षमता को स्वीकार करते हुए, उन्हें भी इस सर्वोच्च श्रेणी में सम्मिलित किया, यह भी उल्लेख किया कि अर्जुन अकेले ही सम्पूर्ण त्रिलोक की समस्त सेनाओं का सामना करने में सक्षम है।

कर्ण की क्षमता के विषय में, भीष्म ने कुछ विवादास्पद, कटु टिप्पणी की, यह कहते हुए कि कर्ण, अपने असाधारण दान-गुण और पराक्रम के होते हुए भी, केवल आधे रथी की श्रेणी का ही है, क्योंकि उसकी वासवी शक्ति एक बार प्रयोग के पश्चात् समाप्त हो जाएगी, तथा उसका अभेद्य कवच भी पूर्व में ही इंद्र को दान में दिया जा चुका है, यह टिप्पणी कर्ण को अत्यंत आहत कर गई, तथा उसने प्रतिशोधवश यह प्रतिज्ञा ली कि जब तक भीष्म युद्धरत रहेंगे, वह स्वयं युद्ध नहीं करेगा।

इसी गणना में, धृष्टद्युम्न, शिखंडी, अभिमन्यु, तथा द्रौपदी के पाँचों पुत्र (उपपांडव) सहित पांडव-पक्ष के अनेक असाधारण योद्धाओं की भी विस्तृत, सम्मानजनक सूची प्रस्तुत की गई, यह गणना दोनों पक्षों की वास्तविक सामरिक शक्ति और सम्भावनाओं का एक स्पष्ट, यथार्थपरक चित्रण प्रस्तुत करती थी।

इस विस्तृत गणना ने यह स्पष्ट कर दिया कि आगामी युद्ध, संख्या में भले ही कौरव-पक्ष अधिक शक्तिशाली प्रतीत हो, किंतु पांडव-पक्ष में उपस्थित असाधारण, अद्वितीय योद्धाओं तथा स्वयं श्रीकृष्ण की उपस्थिति, इस युद्ध के परिणाम को अत्यंत अनिश्चित और रोमांचक बनाने वाली थी।

इस अध्याय की शिक्षा

युद्ध की सच्ची शक्ति केवल सैनिकों की संख्या में नहीं, अपितु योद्धाओं के असाधारण कौशल, मनोबल तथा उनके पक्ष में खड़े धर्म और सत्य में निहित होती है।

अध्याय 19

अंबा की कथा एवं शिखंडी का रहस्य

इसी काल में, भीष्म ने युधिष्ठिर तथा अन्य पांडवों को एक अत्यंत गूढ़, प्राचीन कथा का स्मरण कराया, जो आगामी युद्ध में अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध होने वाली थी — काशी-राजकुमारी अंबा की कथा, जिसे वर्षों पूर्व भीष्म ने अपने भाई विचित्रवीर्य के विवाह हेतु हरण किया था, किंतु बाद में उसके अनुरोध पर उसे उसके चुने हुए वर शाल्व के पास जाने की अनुमति दी थी।

शाल्व द्वारा अस्वीकार किए जाने के पश्चात्, अंबा, अपने इस अपमान और असहनीय दुर्भाग्य के लिए भीष्म को ही उत्तरदायी मानते हुए, प्रतिशोध की तीव्र अग्नि में जलने लगी थी, उसने अनेक राजाओं से भीष्म के विरुद्ध युद्ध का अनुरोध किया, किंतु किसी ने भी भीष्म से युद्ध करने का साहस नहीं दिखाया, यहाँ तक कि स्वयं परशुराम भी भीष्म को पराजित नहीं कर सके थे।

अंततः, अंबा ने भगवान शिव की अत्यंत कठोर तपस्या की, तथा उनसे यह वरदान प्राप्त किया कि अगले जन्म में वह भीष्म की मृत्यु का कारण बनेगी, इस वरदान की प्राप्ति के पश्चात्, उसने अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग दिए, तथा अगले जन्म में वह द्रुपद-नरेश की पुत्री शिखंडिनी के रूप में जन्मी।

एक विचित्र, दैवीय घटनाक्रम के अंतर्गत, शिखंडिनी को आगे चलकर एक यक्ष के वरदान से पुरुष-रूप प्राप्त हुआ, तथा वह "शिखंडी" के नाम से एक पुरुष योद्धा के रूप में विख्यात हुआ, भीष्म ने पांडवों को स्पष्ट किया कि वे कभी भी किसी स्त्री, अथवा पूर्व में स्त्री रहे किसी व्यक्ति पर शस्त्र नहीं उठाएँगे, अतः शिखंडी उनकी इस प्रतिज्ञा का लाभ उठाकर, युद्ध में उनके समक्ष निर्भीक होकर खड़ा हो सकता है।

यह गूढ़ रहस्य, आगे चलकर, भीष्म के अंतिम पतन की कुंजी सिद्ध होने वाला था, यह कथा इस गहन सत्य को भी प्रकट करती है कि नियति के चक्र कितने भी दीर्घकालिक और जटिल क्यों न हों, वे अंततः अपने निर्धारित, अपरिहार्य परिणाम तक अवश्य पहुँचते हैं।

इस अध्याय की शिक्षा

एक पुरानी प्रतिज्ञा, चाहे कितनी भी उदात्त और सम्मानजनक हो, भविष्य में किसी अप्रत्याशित, दूरगामी परिणाम की कुंजी बन सकती है, यही नियति के जटिल विधान का रहस्य है।

अध्याय 20

उलूक का अंतिम संदेश एवं युद्ध की घोषणा

युद्ध आरम्भ होने से ठीक पूर्व, शकुनि के पुत्र उलूक को, दुर्योधन के एक अंतिम, अत्यंत उद्दंड और उपहासपूर्ण संदेश के साथ, पांडवों के शिविर में भेजा गया, इस संदेश में दुर्योधन ने पुनः यह घोषणा की कि वह युद्ध के लिए पूर्णतः तत्पर है, तथा पांडवों को उनकी अब तक की समस्त कमजोरियों और अपमानों का स्मरण कराते हुए उन्हें उकसाने का प्रयास किया।

भीमसेन, यह अपमानजनक संदेश सुनकर, अपने संचित क्रोध को अब पूर्णतः प्रकट करते हुए, उलूक के माध्यम से दुर्योधन को यह स्पष्ट, भीषण प्रत्युत्तर भेजा कि वह शीघ्र ही युद्धभूमि में उसकी जंघा को अपनी गदा से चूर-चूर करेगा, तथा दुःशासन का रक्त पीएगा, यह प्रतिज्ञा वर्षों पूर्व द्रौपदी के अपमान के समय ली गई थी, तथा अब उसे पूर्ण करने का समय निकट आ चुका था।

अर्जुन ने भी अपना संदेश भेजा, यह स्पष्ट करते हुए कि वे कर्ण सहित समस्त कौरव-योद्धाओं का सामना करने के लिए पूर्णतः तैयार हैं, तथा युद्ध का यह निर्णय अब अंतिम और अपरिवर्तनीय है, इस प्रकार, दोनों पक्षों के मध्य किसी भी अंतिम शांति की सूक्ष्मतम सम्भावना भी सदा के लिए समाप्त हो गई।

युधिष्ठिर ने भी, अपनी सहज गंभीरता और खेद के साथ, यह संदेश भेजा कि उन्होंने शांति का प्रत्येक सम्भव प्रयास किया, किंतु अब जब युद्ध अपरिहार्य हो चुका है, तो वे धर्म और न्याय की रक्षा हेतु पूर्ण दृढ़ता के साथ युद्धभूमि में उतरेंगे, तथा इस युद्ध का परिणाम अंततः धर्म की ही विजय सुनिश्चित करेगा।

इस प्रकार, दोनों पक्षों की सेनाएँ, अपनी-अपनी अंतिम तैयारियों को पूर्ण करते हुए, कुरुक्षेत्र के उस पवित्र, ऐतिहासिक मैदान की ओर प्रस्थान करने लगीं, जहाँ आगामी अठारह दिनों में, विश्व के इतिहास का सबसे भीषण, सबसे महत्त्वपूर्ण युद्ध लड़ा जाने वाला था।

इस अध्याय की शिक्षा

जब समस्त शांति-प्रयास असफल हो जाएँ, तो स्पष्ट, दृढ़ प्रतिज्ञाओं के साथ न्याय की रक्षा हेतु तैयार होना ही एकमात्र, सम्मानजनक मार्ग शेष रह जाता है।

अध्याय 21

कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान

दोनों पक्षों की विशाल सेनाएँ, अपने-अपने असंख्य रथों, गजराजों, अश्वारोहियों तथा पदाति-सैनिकों सहित, कुरुक्षेत्र के उस विस्तृत, समतल मैदान की ओर धीरे-धीरे अग्रसर होने लगीं, यह वही पवित्र भूमि थी जिसे प्राचीन काल से ही धर्म और यज्ञ की भूमि के रूप में पूजनीय माना जाता था, अब इसे इतिहास के सबसे भीषण संग्राम का साक्षी बनना था।

युधिष्ठिर, अपनी सम्पूर्ण सेना का नेतृत्व करते हुए, अंतिम बार अपने हृदय में यह गहन आशा संजोए हुए थे कि सम्भवतः अंतिम क्षण में भी कोई चमत्कारिक समाधान प्रकट हो सकता है, किंतु दुर्योधन के अटूट अहंकार को देखते हुए, वे भलीभाँति जानते थे कि यह आशा अब अत्यंत क्षीण हो चुकी है।

श्रीकृष्ण, अर्जुन के सारथी के रूप में, तथा शेष पांडवों तथा उनकी विशाल मित्र-सेना के साथ, कुरुक्षेत्र की ओर इस अंतिम यात्रा में सम्मिलित हुए, उनकी शांत, आत्मविश्वासपूर्ण उपस्थिति ही सम्पूर्ण पांडव-सेना के लिए सबसे बड़ा संबल और आश्वासन थी।

दोनों सेनाओं ने, कुरुक्षेत्र के मैदान में पहुँचकर, एक-दूसरे के विपरीत दिशाओं में अपने-अपने विशाल शिविर स्थापित किए, अस्त्र-शस्त्रों की चमक, अश्वों की हिनहिनाहट तथा असंख्य योद्धाओं की गर्जना से सम्पूर्ण वातावरण एक भीषण, आसन्न संघर्ष की गंभीरता से परिपूर्ण हो उठा।

इस प्रकार, उद्योग पर्व, अपने समस्त शांति-प्रयासों की अंतिम, दुःखद असफलता के साथ, तथा उस अपरिहार्य, भीषण महासंग्राम की पूर्ण तैयारी के साथ अपने समापन पर पहुँचता है, जिसका वर्णन अब आगामी भीष्म पर्व में, स्वयं श्रीमद्भगवद्गीता के अमर उपदेश से आरम्भ होते हुए, विस्तार से किया जाएगा।

इस अध्याय की शिक्षा

जब शांति के समस्त द्वार निष्ठापूर्वक, पूर्ण प्रयास के साथ खटखटाए जा चुके हों, तो युद्ध की अनिवार्यता भी अपने साथ एक गहन नैतिक स्पष्टता और दृढ़ संकल्प लेकर आती है।