आदि पर्व
आदि पर्व
शांतनु-गंगा एवं भीष्म की प्रतिज्ञा, सत्यवती-विवाह, पांडव-कौरवों का जन्म, द्रोणाचार्य की शिक्षा, लाक्षागृह एवं द्रौपदी-स्वयंवर से इंद्रप्रस्थ की स्थापना तक।
सूत जी का नैमिषारण्य में आगमन
नैमिषारण्य के पवित्र वन में, महर्षि शौनक के नेतृत्व में अनेक ऋषिगण एक दीर्घकालिक सत्र-यज्ञ के आयोजन हेतु एकत्रित हुए थे। इसी समय, सूत उग्रश्रवा, जो व्यासशिष्य वैशम्पायन से महाभारत की कथा सुन चुके थे, इस पवित्र सभा में विनम्रतापूर्वक पधारे।
ऋषियों ने उनका भावभीना स्वागत करते हुए उनसे नवीन, ज्ञानवर्धक कथाएँ सुनाने का अनुरोध किया। सूत जी ने विनयपूर्वक बताया कि वे राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ में उपस्थित रहकर, वहाँ वैशम्पायन जी द्वारा सुनाई गई वह अद्भुत, विशाल कथा सुन चुके हैं जिसे स्वयं महर्षि वेदव्यास ने रचा था — भरतवंश के राजाओं की, धर्म और अधर्म के महासंग्राम की, वह कथा जिसे महाभारत कहा जाता है।
शौनक ऋषि सहित समस्त सभा अत्यंत उत्सुक हो उठी, और उन्होंने सूत जी से आग्रहपूर्वक प्रार्थना की कि वे इस समस्त कथा को आरम्भ से, विस्तार से सुनाएँ, क्योंकि यह कथा न केवल राजाओं के यश और पराक्रम का वर्णन करती है, अपितु धर्म के सूक्ष्मतम रहस्यों को भी उजागर करती है।
सूत जी ने, ऋषियों की इस श्रद्धापूर्ण जिज्ञासा से प्रसन्न होकर, महाभारत की उस विशाल गाथा को आरम्भ से सुनाने का संकल्प लिया, यह स्मरण कराते हुए कि यह कथा केवल एक राजवंश की नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए धर्म, कर्तव्य और सत्य के मार्ग को दर्शाने वाला एक कालातीत दर्पण है।
इस अध्याय की शिक्षा
जो कथा धर्म के सूक्ष्मतम रहस्यों को उजागर करे, वह केवल इतिहास नहीं, अपितु प्रत्येक युग के लिए एक जीवंत मार्गदर्शक बन जाती है।
महर्षि वेदव्यास एवं गणेश जी द्वारा ग्रंथ-लेखन
सूत जी ने आगे बताया कि जब महर्षि वेदव्यास ने अपनी दिव्य दृष्टि से इस विशाल, असंख्य घटनाओं से भरी कथा की रचना अपने मन में पूर्ण कर ली, तो उन्हें इसे लिपिबद्ध करने के लिए किसी ऐसे लेखक की आवश्यकता हुई जो उनकी वाणी की गति के साथ तालमेल बिठा सके।
उन्होंने ब्रह्माजी का स्मरण किया, जिन्होंने उन्हें परामर्श दिया कि इस कार्य के लिए स्वयं भगवान गणेश से प्रार्थना करें। व्यास जी ने गणेश जी का आवाहन किया, और गणेश जी ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए एक शर्त रखी — कि व्यास जी को बिना रुके, निरंतर श्लोक कहते रहना होगा, अन्यथा वे लेखन कार्य बीच में ही छोड़ देंगे।
व्यास जी ने भी एक चतुर प्रति-शर्त रखी — कि गणेश जी प्रत्येक श्लोक का अर्थ समझे बिना उसे नहीं लिखेंगे। इस प्रकार, जब भी व्यास जी को कोई जटिल, गूढ़ श्लोक रचने के लिए क्षण भर के विराम की आवश्यकता होती, वे ऐसे श्लोक कहते जिनका अर्थ समझने में गणेश जी को भी कुछ समय लगता, इस प्रकार दोनों की शर्तें सुंदर सामंजस्य में पूर्ण होती रहीं।
इसी अद्भुत, दिव्य सहयोग से महाभारत का यह विशाल ग्रंथ रचा गया, जिसमें एक लाख से भी अधिक श्लोक हैं, स्वयं व्यास जी ने इसे "जय" नाम दिया, यह घोषित करते हुए कि जो कोई भी इस कथा को सच्चे हृदय से सुनता या पढ़ता है, वह जीवन के प्रत्येक संघर्ष में विजय प्राप्त करने योग्य बनता है।
इस अध्याय की शिक्षा
सबसे महान रचनाएँ भी परस्पर सम्मान और बुद्धिमत्तापूर्ण सामंजस्य से ही सिद्ध होती हैं, चाहे रचयिता कितने भी महान क्यों न हों।
राजा शांतनु और गंगा का विवाह
कथा का वास्तविक आरम्भ हस्तिनापुर के राजा शांतनु से होता है, जो कुरुवंश के एक धर्मपरायण, न्यायप्रिय शासक थे। एक दिन, गंगा नदी के तट पर विचरण करते हुए, उन्होंने एक अत्यंत सुंदर स्त्री को देखा, जो वास्तव में स्वयं देवी गंगा ही थीं, मानव रूप धारण किए हुए।
शांतनु, उनके असाधारण सौंदर्य से मोहित होकर, उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। गंगा ने यह प्रस्ताव स्वीकार किया, किंतु एक कठोर शर्त रखी — कि राजा कभी उनके किसी भी कार्य पर प्रश्न नहीं उठाएँगे, चाहे वह कितना भी असामान्य या पीड़ादायक क्यों न प्रतीत हो, अन्यथा वे तत्काल उन्हें त्यागकर चली जाएँगी।
शांतनु, अपनी गहन प्रेमासक्ति में, इस शर्त को स्वीकार कर बैठे, बिना यह सोचे कि आगे क्या घटित होगा। विवाह के पश्चात्, जब गंगा ने एक-एक कर अपने सात नवजात पुत्रों को जन्म लेते ही स्वयं नदी में प्रवाहित कर दिया, शांतनु, अपनी शर्त के बंधन में, गहन पीड़ा सहते हुए भी मौन रहे, यह न समझ पाते हुए कि उनकी पत्नी ऐसा क्रूर कृत्य क्यों कर रही हैं।
जब आठवें पुत्र के जन्म का समय आया, शांतनु का धैर्य अंततः टूट गया, और उन्होंने गंगा को रोकते हुए इस कृत्य का कारण पूछ ही लिया, यह जानते हुए भी कि इससे उनका विवाह-बंधन सदा के लिए समाप्त हो सकता है।
इस अध्याय की शिक्षा
जो प्रतिज्ञा बिना गहन विचार के ली जाए, वह अंततः हृदय को असहनीय पीड़ा में डाल सकती है, फिर भी सत्य जानने का साहस कभी व्यर्थ नहीं जाता।
देवव्रत का जन्म एवं गंगा का प्रस्थान
गंगा ने शांतनु को यह गूढ़ रहस्य प्रकट किया कि वे सातों पुत्र वास्तव में आठ वसुओं में से सात थे, जिन्हें एक ऋषि के शाप के कारण मानव-योनि में जन्म लेना पड़ा था, और गंगा उन्हें जन्म लेते ही मुक्त कर उनके शाप से शीघ्रतम छुटकारा दिला रही थीं, यह उनके प्रति करुणा का ही एक रूप था, क्रूरता का नहीं।
किंतु आठवें वसु, जिसका नाम द्यौ था, को दीर्घकालिक मानव-जीवन व्यतीत करने का शाप प्राप्त हुआ था, अतः गंगा ने इस पुत्र को जीवित रखने का निश्चय किया। उन्होंने घोषणा की कि अब, अपनी शर्त के उल्लंघन के कारण, वे राजा को त्यागकर जा रही हैं, किंतु इस पुत्र को अपने साथ ले जाकर उसका समुचित पालन-पोषण और शिक्षा देंगी, तथा उचित समय पर उसे राजा को लौटा देंगी।
वर्षों पश्चात्, गंगा एक तेजस्वी, असाधारण रूप से शिक्षित युवक को लेकर शांतनु के समक्ष पुनः प्रकट हुईं, यह बालक देवव्रत के नाम से जाना गया, जिसने महर्षि वसिष्ठ, परशुराम तथा स्वयं बृहस्पति से समस्त शास्त्रों, अस्त्र-विद्या और राजनीति की पूर्ण शिक्षा प्राप्त की थी।
शांतनु, अपने इस असाधारण, गुणवान पुत्र को पाकर अत्यंत हर्षित हुए, और देवव्रत को हस्तिनापुर का युवराज घोषित किया, यह जानते हुए कि उनका राज्य अब एक ऐसे उत्तराधिकारी के हाथों में सुरक्षित है जो धर्म, शौर्य और ज्ञान तीनों में असाधारण रूप से निपुण था।
इस अध्याय की शिक्षा
जो शाप और पीड़ा प्रतीत होते हैं, वे कभी-कभी गहन करुणा का ही आवरण होते हैं, समय आने पर उनका वास्तविक अर्थ अवश्य प्रकट होता है।
सत्यवती और भीष्म की भीषण प्रतिज्ञा
कुछ वर्षों पश्चात्, शांतनु को एक धीवर-कन्या सत्यवती से गहन प्रेम हो गया, जिसके शरीर से दिव्य सुगंध निकलती थी। किंतु सत्यवती के पिता ने विवाह की एक कठोर शर्त रखी — कि सत्यवती की ही संतान को हस्तिनापुर का भावी राजा घोषित किया जाए, देवव्रत को नहीं।
शांतनु, यह शर्त सुनकर, धर्मसंकट में पड़ गए — वे न तो अपने ज्येष्ठ, योग्य पुत्र देवव्रत के अधिकार का हनन करना चाहते थे, और न ही सत्यवती के प्रति अपने प्रेम को त्याग सकते थे, अतः वे गहन उदासी में डूब गए, बिना किसी को अपने मन की व्यथा बताए।
देवव्रत, अपने पिता की इस अस्वाभाविक उदासी का कारण जानकर, स्वयं धीवरराज के पास गए और यह घोषणा की कि वे स्वयं राज्य पर अपना दावा सदा के लिए त्याग रहे हैं, ताकि उनके पिता सत्यवती से विवाह कर सकें।
धीवरराज ने एक और आशंका व्यक्त की — कि भविष्य में देवव्रत की अपनी संतान इस त्याग को चुनौती दे सकती है। इस पर देवव्रत ने वह भीषण, अभूतपूर्व प्रतिज्ञा ली जिसने उन्हें "भीष्म" नाम दिया — कि वे आजीवन अविवाहित रहेंगे, कभी सिंहासन की कामना नहीं करेंगे, तथा पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, सदैव हस्तिनापुर के सिंहासन की, चाहे उस पर कोई भी बैठे, निष्ठापूर्वक रक्षा करेंगे। आकाश से देवताओं ने पुष्पवर्षा कर उनकी इस असाधारण प्रतिज्ञा का सम्मान किया।
इस अध्याय की शिक्षा
पिता के सुख के लिए अपने ही अधिकार और सुख का सर्वस्व त्याग देना, सच्चे पुत्र-धर्म और निःस्वार्थ त्याग की सर्वोच्च मिसाल है।
विचित्रवीर्य का विवाह एवं असामयिक मृत्यु
शांतनु और सत्यवती के दो पुत्र हुए, चित्रांगद और विचित्रवीर्य। चित्रांगद की एक गंधर्व के साथ हुए युद्ध में असामयिक मृत्यु हो गई, अतः बाल्यवस्था में ही विचित्रवीर्य हस्तिनापुर के राजा बने, यद्यपि वास्तविक शासन-भार भीष्म के ही कुशल हाथों में रहा।
जब विचित्रवीर्य विवाह-योग्य हुए, भीष्म ने काशी नरेश की तीन पुत्रियों, अंबा, अंबिका और अंबालिका के स्वयंवर में जाकर, अकेले ही समस्त उपस्थित राजाओं को पराजित कर, तीनों राजकुमारियों का हरण किया, यह अपने भाई के विवाह हेतु किया गया कर्तव्य था, अपनी किसी व्यक्तिगत इच्छा से नहीं।
मार्ग में, अंबा ने प्रकट किया कि उसने पहले ही मन ही मन राजा शाल्व को अपना पति चुन लिया था, अतः भीष्म ने उदारतापूर्वक उसे शाल्व के पास जाने की अनुमति दी। किंतु शाल्व ने, अपने अपमान के भय से, अंबा को अस्वीकार कर दिया, जिससे वह असहाय होकर हस्तिनापुर लौट आई, इस अस्वीकृति के बाद उसकी कथा एक भिन्न, दुखद दिशा में मुड़ती है जो आगे के पर्वों में प्रकट होगी।
अंबिका और अंबालिका का विवाह विचित्रवीर्य से सम्पन्न हुआ, किंतु दुर्भाग्यवश, अल्प समय पश्चात् ही विचित्रवीर्य क्षय रोग से ग्रस्त होकर, बिना किसी संतान को जन्म दिए, असामयिक मृत्यु को प्राप्त हो गए, जिससे हस्तिनापुर के सिंहासन के समक्ष एक गंभीर उत्तराधिकार-संकट उत्पन्न हो गया।
इस अध्याय की शिक्षा
भाई के प्रति कर्तव्य-पालन में की गई निष्पक्ष सेवा भी, यदि आगे की परिस्थितियाँ प्रतिकूल हों, तो अनजाने में ही किसी और के जीवन में गहन पीड़ा का कारण बन सकती है।
नियोग द्वारा धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
सत्यवती, वंश की निरंतरता हेतु अत्यंत चिंतित होकर, भीष्म से अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर सिंहासन ग्रहण करने का अनुरोध किया, किंतु भीष्म ने अपनी उस अटूट प्रतिज्ञा का सम्मान करते हुए विनम्रतापूर्वक इनकार कर दिया, चाहे परिस्थिति कितनी भी विकट क्यों न हो।
तब सत्यवती ने अपने उस पूर्व-विवाह-पूर्व पुत्र, महर्षि वेदव्यास, का स्मरण किया, जो ऋषि पराशर से उनकी संतान थे। उन्होंने व्यास जी से नियोग-विधि द्वारा विचित्रवीर्य की विधवाओं में संतानोत्पत्ति का अनुरोध किया, ताकि वंश आगे बढ़ सके, यह उस युग की एक स्वीकृत, धर्मसम्मत प्रथा थी।
व्यास जी के तपस्वी, भयंकर रूप को देखकर, अंबिका ने भय से अपनी आँखें मूँद लीं, जिसके फलस्वरूप उसका पुत्र धृतराष्ट्र जन्मांध हुआ। अंबालिका भय से पीली पड़ गई, जिससे उसका पुत्र पांडु जन्म से ही पीत-वर्ण और दुर्बल हुआ।
सत्यवती ने पुनः प्रयास का अनुरोध किया, किंतु इस बार अंबिका ने स्वयं जाने के स्थान पर अपनी दासी को भेजा। यह दासी, बिना किसी भय या संकोच के, व्यास जी के समक्ष पूर्ण सहजता से उपस्थित हुई, जिससे उसका पुत्र विदुर अत्यंत स्वस्थ, बुद्धिमान और धर्मपरायण जन्मा, यद्यपि दासी-पुत्र होने के कारण वह सिंहासन के उत्तराधिकार से वंचित रहा।
इस अध्याय की शिक्षा
भय और संकोच जन्म से ही व्यक्ति की नियति को प्रभावित कर सकते हैं, जबकि सहज, निर्भीक स्वीकृति सबसे बड़ा वरदान बन जाती है।
गांधारी और कुंती का विवाह — सौ कौरवों का जन्म
जन्मांध धृतराष्ट्र का विवाह गांधार-राजकुमारी गांधारी से हुआ, जिसने विवाह के तुरन्त पश्चात् ही यह जानकर कि उसका पति दृष्टिहीन है, अपनी आँखों पर सदा के लिए पट्टी बाँध ली, यह निश्चय करते हुए कि वह अपने पति से किसी भी सुख या क्षमता में आगे नहीं रहेगी, यह उसके असाधारण पातिव्रत्य का प्रमाण था।
पांडु का विवाह यदुवंशी कुंती और मद्र-राजकुमारी माद्री से हुआ। कुंती को बाल्यावस्था में ही ऋषि दुर्वासा से एक दिव्य मंत्र प्राप्त हुआ था, जिसके द्वारा वह किसी भी देवता का आवाहन कर उनसे संतान प्राप्त कर सकती थी, इस मंत्र की शक्ति की परीक्षा उसने बाल्यकाल में ही सूर्यदेव का आवाहन कर ली थी, जिससे कर्ण नामक पुत्र का गुप्त जन्म हुआ, जिसे लोक-लाज के भय से उसने नदी में प्रवाहित कर दिया था।
गांधारी, गर्भवती होने पर, एक दीर्घकालिक, असामान्य गर्भावस्था से पीड़ित हुई, जो दो वर्षों तक चली। अंततः, क्रोधवश अपने ही उदर पर प्रहार करने से, उसने एक मांस-पिंड को जन्म दिया, जिसे महर्षि व्यास ने अपनी योगशक्ति से सौ भागों में विभाजित कर, घी से भरे कुंडों में रखा, जिनसे क्रमशः सौ पुत्र और एक पुत्री उत्पन्न हुए।
इन सौ पुत्रों में ज्येष्ठ दुर्योधन का जन्म अशुभ संकेतों के साथ हुआ — गीदड़ों का रुदन, तूफान और अग्नि-प्रकोप — जिसे देखकर विद्वानों ने विदुर सहित सभी को यह चेतावनी दी कि यह बालक भविष्य में अपने ही वंश के विनाश का कारण बनेगा, तथा उन्होंने इसे त्याग देने का परामर्श भी दिया, किंतु पितृ-स्नेह में अंधे धृतराष्ट्र ने यह परामर्श अस्वीकार कर दिया।
इस अध्याय की शिक्षा
अशुभ संकेतों की उपेक्षा और अंधे स्नेह में लिया गया निर्णय, चाहे कितना भी स्वाभाविक प्रतीत हो, भविष्य में विनाशकारी परिणाम ला सकता है।
पांडु का शाप और वन-गमन
पांडु, एक कुशल धनुर्धर और पराक्रमी राजा थे, जिन्होंने अपने प्रारम्भिक शासनकाल में अनेक राज्यों पर विजय प्राप्त कर हस्तिनापुर की सीमाओं का विस्तार किया। एक दिन, आखेट के दौरान, उन्होंने एक मृग-युगल पर बाण चला दिया, जो वास्तव में एक ऋषि और उनकी पत्नी थे, मृग-रूप में प्रणय-क्रीड़ा में लीन।
मरणासन्न ऋषि ने पांडु को अत्यंत कठोर शाप दिया — कि जब भी वे भविष्य में किसी स्त्री के साथ प्रणय-संबंध बनाने का प्रयास करेंगे, उसी क्षण उनकी मृत्यु हो जाएगी, ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने प्रणय-क्षण में ही उस ऋषि के प्राण हर लिए थे।
इस भीषण शाप से गहरे आघात में डूबे पांडु ने राज्य और सांसारिक सुखों का त्याग कर, अपनी दोनों रानियों, कुंती और माद्री, सहित वन में तपस्वी जीवन व्यतीत करने का निश्चय किया, अपने अंधे भाई धृतराष्ट्र को हस्तिनापुर का शासन-भार सौंपते हुए।
वन में, पांडु दीर्घकाल तक संतानहीनता की गहन वेदना से पीड़ित रहे, क्योंकि शाप के कारण वे स्वयं पिता नहीं बन सकते थे, यही चिंता आगे चलकर कुंती के उस दिव्य मंत्र के प्रयोग की पृष्ठभूमि बनी जिसने पांडवों के असाधारण जन्म को जन्म दिया।
इस अध्याय की शिक्षा
एक क्षणिक, अविचारित कृत्य भी दीर्घकालिक, अपरिवर्तनीय परिणाम ला सकता है, फिर भी भगवद्-कृपा किसी भी शाप से परे नए मार्ग खोल सकती है।
पांडवों का जन्म
पांडु ने, अपनी संतानहीनता से व्यथित होकर, कुंती को उसके दिव्य मंत्र का पुनः उपयोग करने का अनुरोध किया, इस बार धर्मपूर्वक, वंश की निरंतरता के लिए। कुंती ने पहले धर्मराज (यमराज) का आवाहन किया, जिनसे युधिष्ठिर का जन्म हुआ, जो जन्म से ही सत्य और धर्म के प्रति असाधारण निष्ठा से युक्त थे।
इसके पश्चात् उन्होंने वायुदेव का आवाहन किया, जिनसे भीम का जन्म हुआ, जो अद्भुत शारीरिक बल और साहस से सम्पन्न थे, और फिर इंद्र का आवाहन किया, जिनसे अर्जुन का जन्म हुआ, जो भविष्य में विश्व के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर के रूप में विख्यात होने वाले थे।
माद्री, कुंती के अनुरोध पर, इसी मंत्र का एक बार उपयोग करने की अनुमति पाकर, अश्विनीकुमारों का आवाहन किया, जिनसे उसे जुड़वाँ पुत्र, नकुल और सहदेव, प्राप्त हुए, जो क्रमशः अश्व-विद्या और ज्योतिष-बुद्धि में असाधारण निपुण हुए।
इस प्रकार पांडु के पाँचों पुत्र, यद्यपि दैवीय रूप से जन्मे थे, फिर भी लोक-दृष्टि में पांडु के ही धर्मपुत्र माने गए, और वे "पांडव" के नाम से विख्यात हुए, प्रत्येक अपने-अपने पिता-देवता के गुणों को धारण करते हुए, एक असाधारण, संतुलित भ्रातृ-समूह का निर्माण करते हुए।
इस अध्याय की शिक्षा
जब मानवीय सीमाएँ बाधा बन जाएँ, दैवीय कृपा और धर्मपूर्ण उपाय नई संभावनाओं के द्वार खोल सकते हैं, बशर्ते वे सदाशयता से अपनाए जाएँ।
पांडु-माद्री की मृत्यु एवं कुंती का हस्तिनापुर लौटना
वर्षों तक वन में तपस्वी जीवन व्यतीत करने के पश्चात्, एक वसंत ऋतु की मनोहर सुबह, पांडु, माद्री के असाधारण सौंदर्य से क्षण भर के लिए मोहित होकर, अपने शाप को भूलते हुए, उसकी ओर आकर्षित हो गए, इस भूल का तत्काल, भीषण परिणाम भुगतते हुए उनकी उसी क्षण मृत्यु हो गई।
माद्री, अपने पति की मृत्यु का दोष स्वयं पर मानते हुए, गहन शोक और पश्चाताप में डूब गई, और उसने कुंती से अपने दोनों पुत्रों, नकुल और सहदेव, के पालन-पोषण का दायित्व सौंपते हुए, स्वयं पति के साथ सती होने का निश्चय किया।
आश्रम के ऋषियों ने, इस करुण घटना से द्रवित होकर, कुंती और पाँचों पांडवों को हस्तिनापुर तक सुरक्षित पहुँचाया, जहाँ उन्होंने भीष्म, विदुर और धृतराष्ट्र के समक्ष पांडु की मृत्युगाथा तथा पांडवों की दिव्य उत्पत्ति का विस्तृत वृत्तांत सुनाया।
हस्तिनापुर की समस्त प्रजा ने पांडवों का हार्दिक स्वागत किया, यद्यपि इसी क्षण से, अनजाने में ही, कौरवों और पांडवों के बीच उस दीर्घकालिक, अंततः विनाशकारी प्रतिस्पर्धा का बीजारोपण भी हो गया जो आगामी पर्वों की केंद्रीय कथा बनेगी।
इस अध्याय की शिक्षा
एक क्षणिक विस्मृति भी नियति के लिखे को टाल नहीं सकती, फिर भी सच्चा पश्चाताप और उत्तरदायित्व-बोध ही शोक में भी गरिमा बनाए रखता है।
गुरु द्रोणाचार्य का आगमन एवं शिक्षा
बाल्यावस्था से ही कौरव और पांडव एक साथ हस्तिनापुर में पले-बढ़े, किंतु दुर्योधन के हृदय में भीम की असाधारण शारीरिक शक्ति के प्रति गहन ईर्ष्या जन्म ले चुकी थी, जो आगे चलकर अनेक गुप्त, कुटिल षड्यंत्रों का कारण बनी।
इसी काल में, आचार्य द्रोण, जो अस्त्र-विद्या में असाधारण निपुण ब्राह्मण थे, अपने बाल्यमित्र राजा द्रुपद द्वारा अपमानित किए जाने के पश्चात्, हस्तिनापुर पधारे और भीष्म के अनुरोध पर राजकुमारों को अस्त्र-शिक्षा देना स्वीकार किया।
द्रोणाचार्य ने समस्त राजकुमारों को धनुर्विद्या, गदा-युद्ध तथा अन्य युद्ध-कौशलों की गहन शिक्षा दी, किंतु उन्होंने विशेष रूप से अर्जुन में असाधारण एकाग्रता, समर्पण और प्रतिभा पहचानी, तथा उसे अपना सर्वाधिक प्रिय, सर्वश्रेष्ठ शिष्य घोषित किया।
गुरु द्रोण ने अर्जुन को यह वचन दिया कि वे उसे विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाएँगे, एक ऐसा वचन जिसे उन्होंने अपने असाधारण समर्पण और अनुशासन से पूर्ण किया, यद्यपि इसी वचन ने आगे चलकर एकलव्य नामक एक अन्य असाधारण शिष्य के साथ हुए अन्याय की पृष्ठभूमि भी रची।
इस अध्याय की शिक्षा
एक गुरु का अपने शिष्य के प्रति दिया गया वचन, चाहे कितना भी उदात्त क्यों न हो, कभी-कभी अन्य योग्य आत्माओं के प्रति अन्याय का कारण भी बन सकता है।
एकलव्य की गुरुभक्ति
एकलव्य, निषादराज का पुत्र, धनुर्विद्या सीखने की तीव्र इच्छा से द्रोणाचार्य के पास पहुँचा, किंतु द्रोण ने, उसे निम्न कुल का जानकर, तथा राजकुमारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के कारण, उसे शिष्य के रूप में अस्वीकार कर दिया।
एकलव्य, इस अस्वीकृति से किंचित भी विचलित हुए बिना, वन में लौट गया और वहाँ द्रोणाचार्य की एक मिट्टी की प्रतिमा स्थापित कर, उसे ही अपना गुरु मानकर, एकांत में अथक, अनुशासित स्वाध्याय के माध्यम से धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा।
कुछ समय पश्चात्, जब राजकुमार वन में शिकार करते हुए एकलव्य के असाधारण कौशल को, जिसने केवल ध्वनि सुनकर एक भौंकते कुत्ते का मुख बाणों से बंद कर दिया था, देखा, वे स्तब्ध रह गए। द्रोणाचार्य को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि एकलव्य ने स्वयं को अर्जुन से भी अधिक निपुण बना लिया था।
अर्जुन को दिए अपने वचन का सम्मान करने हेतु, द्रोण ने एकलव्य से गुरु-दक्षिणा के रूप में उसका दाहिना अंगूठा माँगा। एकलव्य ने, बिना एक क्षण की हिचकिचाहट के, अपनी गुरुभक्ति के प्रमाण स्वरूप अपना अंगूठा काटकर अर्पित कर दिया, यद्यपि इससे उसकी धनुर्विद्या सदा के लिए क्षीण हो गई, यह कथा भागवत साहित्य में निःस्वार्थ गुरुभक्ति की सर्वोच्च, किंतु सर्वाधिक करुण मिसालों में से एक मानी जाती है।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्ची गुरुभक्ति किसी औपचारिक स्वीकृति की मोहताज नहीं होती, किंतु यह कथा यह भी स्मरण कराती है कि न्याय कभी-कभी कुल और परिस्थिति से प्रभावित होकर पक्षपाती बन सकता है।
अस्त्र-प्रदर्शन में कर्ण का प्राकट्य
शिक्षा पूर्ण होने पर, द्रोणाचार्य ने राजकुमारों के कौशल-प्रदर्शन हेतु एक भव्य अस्त्र-प्रदर्शन का आयोजन किया, जिसमें सम्पूर्ण हस्तिनापुर, राजपरिवार सहित, उपस्थित हुआ। अर्जुन ने अपनी असाधारण धनुर्विद्या से समस्त उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया।
ठीक इसी क्षण, एक अपरिचित, तेजस्वी युवक, कर्ण, सभा में प्रविष्ट हुआ, और अर्जुन के समक्ष उसकी ही समकक्ष, यहाँ तक कि कहीं अधिक असाधारण कुशलता का प्रदर्शन करते हुए, उसे द्वंद्व-युद्ध की खुली चुनौती दे डाली।
जब कर्ण के कुल के विषय में प्रश्न उठा, और यह प्रकट हुआ कि वह एक सूत-पुत्र (सारथी-पुत्र) है, कृपाचार्य ने यह तर्क देते हुए द्वंद्व को अनुचित घोषित किया कि राजकुमार के समक्ष निम्न-कुल का व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता, जिससे कर्ण अपमानित होकर मौन खड़ा रह गया।
इसी क्षण, दुर्योधन ने, अर्जुन को नीचा दिखाने के अवसर की तलाश में, कर्ण को तत्काल अंग देश का राजा घोषित कर दिया, इस प्रकार उसे राजसी सम्मान प्रदान कर द्वंद्व-योग्य बनाया। कर्ण, इस अप्रत्याशित उदारता से गहराई से आभारी होकर, दुर्योधन के प्रति आजीवन अटूट मित्रता और निष्ठा से बँध गया, यह मित्रता ही आगे चलकर उसकी सम्पूर्ण नियति को निर्धारित करेगी।
इस अध्याय की शिक्षा
एक उदार, समयोचित सम्मान किसी अपमानित हृदय को आजीवन की अटूट निष्ठा में बाँध सकता है, चाहे इसके पीछे का उद्देश्य कुछ भी क्यों न हो।
द्रोणाचार्य की गुरु-दक्षिणा — द्रुपद पर विजय
शिक्षा पूर्ण होने पर, द्रोणाचार्य ने राजकुमारों से गुरु-दक्षिणा के रूप में एक ही अनुरोध किया — कि वे पांचाल-नरेश द्रुपद को बंदी बनाकर उनके समक्ष लाएँ, यह उनके बाल्यमित्र द्वारा किए गए पुराने अपमान का प्रतिशोध लेने की इच्छा थी।
कौरवों ने प्रथम प्रयास किया, किंतु द्रुपद की सेना से पराजित होकर लौट आए। इसके पश्चात् पांडवों ने, अर्जुन के नेतृत्व में, द्रुपद की सेना पर आक्रमण किया, और अर्जुन के असाधारण पराक्रम से द्रुपद पराजित होकर बंदी बना लिए गए।
द्रोणाचार्य ने द्रुपद को समझाया कि वे अब भी उन्हें अपना बाल्यमित्र मानते हैं, और प्रतिशोध के रूप में केवल आधा राज्य ही अपने पास रखते हुए, शेष आधा राज्य द्रुपद को ससम्मान लौटा दिया, यह घोषित करते हुए कि अब दोनों समान स्तर के राजा होने के कारण पुनः मित्रता कर सकते हैं।
द्रुपद, इस अपमान से आंतरिक रूप से गहरे आहत होकर, प्रतिशोध की तीव्र अग्नि में जलने लगे, और उन्होंने एक ऐसे पुत्र की कामना करते हुए यज्ञ आरम्भ किया जो द्रोणाचार्य का वध कर सके, इसी यज्ञ से आगे चलकर धृष्टद्युम्न तथा स्वयं द्रौपदी का भी असाधारण प्राकट्य होगा।
इस अध्याय की शिक्षा
एक अपमान, चाहे कितने भी वर्षों बाद हो, गहन प्रतिशोध की अग्नि को जन्म दे सकता है जो आगे चलकर विशाल घटनाओं की नींव बन जाती है।
युवराज-पद हेतु ईर्ष्या एवं लाक्षागृह षड्यंत्र
युधिष्ठिर, अपने ज्येष्ठ होने तथा अपनी असाधारण धर्मनिष्ठा के कारण, हस्तिनापुर का युवराज घोषित किए गए, जिससे प्रजा में हर्ष की लहर दौड़ गई, किंतु दुर्योधन का हृदय ईर्ष्या और असुरक्षा से जल उठा, यह मानते हुए कि सिंहासन पर उसका ही अधिकार है।
दुर्योधन ने, अपने मामा शकुनि तथा कर्ण के साथ मिलकर, पांडवों को सदा के लिए समाप्त करने की एक कुटिल योजना रची। उन्होंने धृतराष्ट्र को यह सुझाव देकर सहमत किया कि पांडवों को कुछ समय के लिए वारणावत नगर भेजा जाए, जहाँ एक धार्मिक उत्सव हो रहा था।
गुप्त रूप से, दुर्योधन ने वारणावत में पांडवों के निवास हेतु एक भवन बनवाया जो पूर्णतः लाख, घी और अन्य अत्यंत ज्वलनशील पदार्थों से निर्मित था, यह योजना बनाते हुए कि उचित समय पर इस "लाक्षागृह" में आग लगाकर पांडवों तथा कुंती को जीवित जला दिया जाएगा।
विदुर, जो अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता और गुप्तचरों के माध्यम से इस समस्त षड्यंत्र से पूर्णतः अवगत हो चुके थे, ने युधिष्ठिर को एक गुप्त संकेत-भाषा में सावधान किया, बिना धृतराष्ट्र या दुर्योधन को इसका तनिक भी आभास होने दिए।
इस अध्याय की शिक्षा
अंधे स्नेह में पला हुआ अहंकार अपने ही परिवार के विनाश की योजना रचने से भी नहीं हिचकिचाता, किंतु सतर्क, बुद्धिमान मित्र समय रहते सबसे बड़े संकट को भी टाल सकते हैं।
लाक्षागृह से पांडवों का बचाव
युधिष्ठिर, विदुर के गुप्त संकेत को समझकर, अपने भाइयों को सावधान किया, और उन्होंने मिलकर लाक्षागृह से एक गुप्त सुरंग खुदवाई, जो नगर के बाहर तक जाती थी, यह सब अत्यंत गोपनीयता के साथ, बिना किसी को संदेह होने दिए, सम्पन्न किया गया।
जब षड्यंत्रकारियों ने निश्चित रात्रि को लाक्षागृह में आग लगाई, पांडव और कुंती, पूर्व-निर्मित सुरंग के माध्यम से सुरक्षित बच निकले। संयोगवश, उसी रात एक निषाद-स्त्री अपने पाँच पुत्रों सहित उस भवन में आश्रय लिए हुए थी, जो अग्नि में जलकर भस्म हो गए।
इन छह शवों को देखकर, सम्पूर्ण हस्तिनापुर ने यह विश्वास कर लिया कि कुंती और पाँचों पांडव इस दुर्घटना में मारे गए हैं, दुर्योधन और शकुनि ने आंतरिक हर्ष व्यक्त किया, जबकि भीष्म और विदुर सहित शेष नगरवासी गहन शोक में डूब गए, यद्यपि विदुर आंतरिक रूप से जानते थे कि पांडव सुरक्षित हैं।
पांडव, इस समय का लाभ उठाते हुए, गुप्त रूप से वन में भ्रमण करने लगे, एक साधारण ब्राह्मण-परिवार का वेश धारण किए हुए, यह प्रतीक्षा करते हुए कि उचित समय आने पर वे पुनः अपनी वास्तविक पहचान प्रकट कर सकें।
इस अध्याय की शिक्षा
जब षड्यंत्र कितना भी गुप्त और सुनियोजित क्यों न हो, सतर्कता और दूरदर्शिता से पूर्व-तैयारी करने वाले ही अंततः सुरक्षित निकल पाते हैं।
हिडिंब वध एवं भीम-हिडिंबा विवाह
ब्राह्मण-वेश में वन-वन भ्रमण करते हुए, पांडव एक दिन हिडिंब नामक एक भयंकर राक्षस के क्षेत्र में जा पहुँचे, जो मनुष्यों का आखेट कर उन्हें भक्षण करता था। हिडिंब ने अपनी बहन हिडिंबा को इन नवागंतुकों का वध कर लाने हेतु भेजा।
हिडिंबा, भीम के असाधारण, आकर्षक बल और सौंदर्य को देखकर, तत्काल उससे प्रेम कर बैठी, और अपने भाई के आदेश का पालन करने के बजाय, स्वयं एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर भीम के समक्ष प्रकट होकर, उसके प्रति अपने प्रेम और विवाह की इच्छा प्रकट की।
जब हिडिंब, अपनी बहन के इस विलंब से क्रोधित होकर स्वयं वहाँ पहुँचा, भीम और उसके बीच एक भीषण द्वंद्व-युद्ध हुआ, जिसमें भीम ने अपने असाधारण बल से हिडिंब का वध कर दिया, कुंती और युधिष्ठिर की सहमति से, भीम ने हिडिंबा से विवाह किया, यद्यपि यह विवाह केवल एक निश्चित अवधि, पुत्र-प्राप्ति तक ही सीमित रहने की शर्त पर हुआ।
इस विवाह से घटोत्कच नामक एक असाधारण, शक्तिशाली पुत्र का जन्म हुआ, जो आगे चलकर कुरुक्षेत्र के महासंग्राम में पांडवों के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण, वीर योद्धा सिद्ध होगा।
इस अध्याय की शिक्षा
प्रेम कभी-कभी सबसे अप्रत्याशित परिस्थितियों में भी जन्म ले सकता है, और ऐसे सम्बन्ध भी भविष्य में अमूल्य सिद्ध हो सकते हैं।
बकासुर वध
आगे भ्रमण करते हुए, पांडव एकचक्रा नामक नगरी में एक ब्राह्मण के घर आश्रय लेकर रहने लगे। वहाँ उन्होंने जाना कि यह नगरी बकासुर नामक एक भयंकर राक्षस के आतंक से त्रस्त है, जो प्रत्येक सप्ताह एक परिवार से प्रचुर भोजन तथा एक मनुष्य की बलि की माँग करता था।
एक दिन, उस ब्राह्मण परिवार की बारी आई जिनके यहाँ पांडव आश्रय लिए हुए थे, और कुंती ने, उनकी करुण स्थिति देखकर, अपने पुत्र भीम को इस भयंकर कार्य हेतु स्वेच्छा से प्रस्तुत करने का निश्चय किया, यह जानते हुए कि भीम में इस राक्षस का सामना करने की असाधारण शक्ति है।
भीम, बकासुर के लिए निर्धारित भोजन की गाड़ी लेकर स्वयं वन में गया, और मार्ग में ही सारा भोजन स्वयं खा गया, जब क्रोधित बकासुर वहाँ पहुँचा, दोनों के बीच एक दीर्घ, भीषण द्वंद्व-युद्ध हुआ, जिसमें भीम ने अंततः बकासुर की पीठ तोड़कर उसका वध कर दिया।
इस प्रकार सम्पूर्ण नगरी को इस दीर्घकालिक आतंक से सदा के लिए मुक्ति मिली, यद्यपि पांडवों ने अपनी वास्तविक पहचान गुप्त ही रखी, यह केवल एक ब्राह्मण-पुत्र के असाधारण पराक्रम के रूप में ही जाना गया, जिससे राक्षस के आतंक का अंत हुआ।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्चा पराक्रम प्रसिद्धि की कामना से नहीं, अपितु असहायों की रक्षा के कर्तव्य-बोध से प्रेरित होना चाहिए।
द्रौपदी स्वयंवर
राजा द्रुपद ने अपनी असाधारण, अग्नि से प्रकट हुई पुत्री द्रौपदी के विवाह हेतु एक भव्य स्वयंवर का आयोजन किया, जिसमें एक अत्यंत कठिन लक्ष्य-भेद प्रतियोगिता रखी गई — घूमते हुए चक्र के मध्य से देखकर, ऊपर स्थापित मत्स्य-लक्ष्य को बाण से भेदना।
एकचक्रा से यह समाचार सुनकर, पांडव भी ब्राह्मण-वेश में इस स्वयंवर में सम्मिलित होने पहुँचे। अनेक शक्तिशाली राजाओं तथा स्वयं कर्ण के भी इस कठिन लक्ष्य-भेद में असफल होने के पश्चात्, सभा में यह घोषणा की गई कि कोई भी ब्राह्मण इस प्रतियोगिता में भाग ले सकता है।
अर्जुन, ब्राह्मण-वेश में आगे बढ़े, और अपनी असाधारण एकाग्रता तथा कौशल से, उस अत्यंत कठिन लक्ष्य को सफलतापूर्वक भेद दिया, जिससे सम्पूर्ण सभा स्तब्ध रह गई और द्रौपदी ने उन्हें वरमाला अर्पित की।
यह देखकर उपस्थित अनेक राजा, विशेष रूप से यह अपमानित अनुभव करते हुए कि एक ब्राह्मण ने उन सबको पराजित किया है, क्रोधित होकर आक्रमण करने को उद्यत हुए, किंतु अर्जुन और भीम ने मिलकर उन्हें सफलतापूर्वक परास्त किया, इस प्रकार द्रौपदी को सुरक्षित प्राप्त करते हुए।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्चा कौशल और एकाग्रता बाह्य वेश या सामाजिक स्थिति की मोहताज नहीं होती, यह किसी भी परिस्थिति में स्वयं को प्रकट कर ही देती है।
पांचों पांडवों का द्रौपदी से विवाह
जब अर्जुन, द्रौपदी को साथ लेकर उस कुम्हार के घर पहुँचे जहाँ पांडव और कुंती ठहरे हुए थे, कुंती ने, बिना देखे, यह सामान्य निर्देश दे दिया कि जो कुछ भी लाए हो, उसे आपस में बाँट लो, यह न जानते हुए कि पुत्र आज कोई भिक्षा नहीं, अपितु स्वयं द्रौपदी को लाए हैं।
माता की वाणी को अनुल्लंघनीय मानते हुए, तथा युधिष्ठिर के इस अवलोकन पर कि यह घटना स्वयं भगवद्-इच्छा का ही एक भाग प्रतीत होती है, पांडवों ने यह असाधारण, अभूतपूर्व निर्णय लिया कि द्रौपदी पाँचों भाइयों की समान रूप से पत्नी बनेंगी।
व्यास जी ने स्वयं आकर इस असाधारण विवाह के औचित्य को स्पष्ट किया, यह प्रकट करते हुए कि द्रौपदी अपने पूर्व जन्म में एक ऐसी तपस्विनी थी जिसने पाँच बार शिवजी से पति की कामना की थी, अतः उसे पाँच पतियों का यह असाधारण वरदान प्राप्त हुआ था।
इस प्रकार द्रौपदी का विवाह विधिवत् पाँचों पांडवों से सम्पन्न हुआ, राजा द्रुपद और उनके पुत्र धृष्टद्युम्न ने भी इस असाधारण व्यवस्था को स्वीकार किया, तथा इसी स्वयंवर से यह समाचार भी हस्तिनापुर पहुँचा कि पांडव जीवित हैं, जिससे कौरवों के मध्य गहन असमंजस और चिंता उत्पन्न हुई।
इस अध्याय की शिक्षा
कभी-कभी असामान्य प्रतीत होने वाली परिस्थितियाँ भी, यदि सत्य और धर्म के प्रति निष्ठा से स्वीकार की जाएँ, गहन दैवीय प्रयोजन का ही भाग सिद्ध होती हैं।
इंद्रप्रस्थ की स्थापना एवं खांडवप्रस्थ दहन
पांडवों के जीवित होने का समाचार पाकर, भीष्म और विदुर के परामर्श पर, धृतराष्ट्र ने राज्य को विभाजित करने का निर्णय लिया — कौरवों को हस्तिनापुर, तथा पांडवों को खांडवप्रस्थ नामक एक बंजर, वनाच्छादित भूभाग प्रदान किया गया, जो वास्तव में एक चतुर, असमान बँटवारा था।
पांडवों ने, बिना किसी शिकायत के, इस चुनौती को स्वीकार किया, और स्वयं भगवान विश्वकर्मा की सहायता से, इस बंजर भूमि पर एक भव्य, अलौकिक नगरी इंद्रप्रस्थ की स्थापना की, जो शीघ्र ही समृद्धि, न्याय और वैभव का प्रतीक बन गई।
इसी काल में, श्रीकृष्ण और अर्जुन ने मिलकर खांडव वन को अग्निदेव को अर्पित करने में सहायता की, यह वन देवताओं द्वारा संरक्षित था, किंतु अग्निदेव को अपनी क्षीण हुई शक्ति पुनः प्राप्त करने हेतु इस वन के भक्षण की आवश्यकता थी, अर्जुन और कृष्ण ने अपने दिव्य अस्त्रों, गांडीव धनुष और सुदर्शन चक्र, से इस कार्य में अग्निदेव की सहायता की।
इसी दहन से बचकर निकले मय दानव नामक एक शिल्पकार ने, कृतज्ञतावश, पांडवों के लिए वह अद्भुत, मायावी मयसभा का निर्माण किया, जो आगे चलकर द्यूत-क्रीड़ा की उस विनाशकारी घटना की पृष्ठभूमि बनेगी। इस प्रकार आदि पर्व, पांडवों की इंद्रप्रस्थ में सुदृढ़ स्थापना के साथ, अपने समापन पर पहुँचता है, अगले, सभा पर्व में युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ तथा उस भीषण जुए की कथा प्रतीक्षा करती है जो सम्पूर्ण भरतवंश को महाविनाश की ओर ले जाएगी।
इस अध्याय की शिक्षा
एक असमान, चुनौतीपूर्ण प्रारम्भ भी, यदि धैर्य, परिश्रम और दैवीय सहायता से स्वीकार किया जाए, अंततः असाधारण समृद्धि और गौरव में परिणत हो सकता है।
