वन पर्व
वन पर्व
पांडवों का बारह वर्षों का वनवास — अनेक ऋषियों से भेंट, अर्जुन की तपस्या और दिव्यास्त्र-प्राप्ति, तथा युधिष्ठिर और यक्ष के बीच का प्रसिद्ध प्रश्नोत्तर।
वन-गमन की तैयारी एवं करुण विदाई
द्यूत-क्रीड़ा में सर्वस्व हारकर, पांडवों ने अपने राजसी वस्त्र और आभूषण त्यागकर, वल्कल-वस्त्र तथा मृगचर्म धारण किए, यह देखकर सम्पूर्ण हस्तिनापुर नगरी शोक और लज्जा में डूब गई, अनेक नगरवासी अपने-अपने घरों की खिड़कियों से इस करुण दृश्य को अश्रुपूरित नेत्रों से देखते रहे।
भीष्म, द्रोणाचार्य, विदुर तथा कृपाचार्य सहित समस्त वयोवृद्ध सभासद, अपनी गहन वेदना और असहायता के मध्य, पांडवों के समक्ष उपस्थित हुए, विदुर ने विशेष रूप से युधिष्ठिर को धैर्य और संयम बनाए रखने का स्नेहपूर्ण परामर्श दिया, यह आश्वासन देते हुए कि धर्म का मार्ग अंततः विजयी होगा।
कुंती, जो अत्यंत वृद्धावस्था के कारण वन-गमन में असमर्थ थीं, विदुर के घर में ही रहने का निश्चय किया, अपने पुत्रों से विदा लेते समय उनका हृदय शोक से विदीर्ण हो उठा, विशेष रूप से द्रौपदी के प्रति उनकी गहन करुणा उमड़ पड़ी, जिसे इतनी कठोर परिस्थितियों में वन जाना पड़ रहा था।
गांधारी, अपने पुत्र दुर्योधन के इस अधर्मपूर्ण कृत्य से अत्यंत क्षुब्ध होकर, उसे कठोर शब्दों में धिक्कारा, यह भविष्यवाणी करते हुए कि यह अन्याय अवश्य ही कुरुवंश के लिए महाविनाश लेकर आएगा, किंतु दुर्योधन, अपने अहंकार में डूबा हुआ, इस चेतावनी को भी अनसुना करता रहा।
सम्पूर्ण नगरी के प्रजाजन, पांडवों के इस अन्यायपूर्ण निर्वासन से क्षुब्ध होकर, उनके पीछे-पीछे नगर के बाहर तक साथ चले, अनेकों ने खुलकर धृतराष्ट्र और दुर्योधन की नीति की निंदा की, तथा पांडवों के प्रति अपनी अटूट निष्ठा और स्नेह व्यक्त किया।
इस प्रकार, अपने भाइयों, द्रौपदी तथा कुछ निष्ठावान ब्राह्मणों के साथ, युधिष्ठिर ने काम्यक वन की ओर प्रस्थान किया, बारह वर्षों के इस दीर्घकालिक, कठिन वनवास की यह पहली संध्या थी, जिसमें भविष्य में अनेक असाधारण घटनाओं, कठिनाइयों तथा आध्यात्मिक शिक्षाओं की एक विशाल शृंखला प्रतीक्षा कर रही थी।
इस अध्याय की शिक्षा
जब अन्याय का सामना करना पड़े, तो गरिमा और धैर्य के साथ उसे स्वीकार करना, क्रोध में प्रतिक्रिया देने से कहीं अधिक शक्तिशाली और दूरदर्शी मार्ग सिद्ध होता है।
काम्यक वन में धौम्य ऋषि का उपदेश
काम्यक वन में पहुँचकर, पांडवों के कुलपुरोहित धौम्य ऋषि ने उन्हें वन में तपस्वी-जीवन व्यतीत करने की विधियों का विस्तृत उपदेश दिया, कंद-मूल-फल के संग्रहण, अग्निहोत्र के नियमित पालन, तथा असंख्य वन्य-पशुओं और प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के उपायों का वर्णन करते हुए।
अनेक ऋषि-मुनि, जो पांडवों के प्रति गहन सहानुभूति और स्नेह रखते थे, अपनी इच्छा से इस वनवास में उनके साथ रहने का निश्चय किया, यह देखकर युधिष्ठिर को गहन चिंता हुई कि वे इतने अतिथियों के भरण-पोषण का प्रबंध कैसे करेंगे, क्योंकि उनके पास अब कोई राजसी कोष शेष नहीं था।
इसी चिंता के समाधान हेतु, युधिष्ठिर ने सूर्यदेव की गहन तपस्या की, जिनकी कृपा से उन्हें अक्षय पात्र नामक एक दिव्य पात्र प्राप्त हुआ, जो प्रतिदिन तब तक भोजन उत्पन्न करता रहता जब तक स्वयं द्रौपदी भोजन ग्रहण न कर लें, इसके पश्चात् वह अगले दिन तक रिक्त रहता।
इस अद्भुत, दैवीय वरदान से, पांडव न केवल स्वयं का भरण-पोषण करने में सक्षम हुए, अपितु अपने साथ रहने वाले असंख्य ऋषि-मुनियों तथा किसी भी आगंतुक अतिथि का भी उचित सत्कार कर पाने में समर्थ हो गए, यह वरदान उनके वनवास के सम्पूर्ण काल में उनकी सबसे बड़ी सहायता सिद्ध हुआ।
धौम्य ऋषि ने युधिष्ठिर को यह भी गहन शिक्षा दी कि वनवास को केवल एक दंड या विपत्ति के रूप में नहीं, अपितु आत्म-निरीक्षण, तपस्या तथा गहन आध्यात्मिक उन्नति के एक असाधारण अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए, यह उपदेश युधिष्ठिर के हृदय में गहराई से अंकित हो गया, तथा आगामी वर्षों में उनका मार्गदर्शक सिद्ध हुआ।
इस अध्याय की शिक्षा
जो परिस्थिति बाह्य रूप से विपत्ति प्रतीत होती है, वह भीतर से आत्म-निरीक्षण और उन्नति का असाधारण अवसर भी हो सकती है, यदि उसे सही दृष्टि से ग्रहण किया जाए।
किर्मीर राक्षस का वध
काम्यक वन से आगे बढ़ते हुए, एक रात्रि, पांडव एक सघन, भयावह वन में विश्राम कर रहे थे, जब उन्हें ज्ञात हुआ कि यह वन किर्मीर नामक एक अत्यंत भयंकर राक्षस का निवास-स्थल है, जो पूर्व में बकासुर का घनिष्ठ मित्र भी था, तथा भीम द्वारा अपने मित्र की मृत्यु का प्रतिशोध लेने हेतु दीर्घकाल से अवसर की प्रतीक्षा में था।
किर्मीर, मनुष्यों की गंध पाकर, गर्जना करते हुए पांडवों के समक्ष प्रकट हुआ, और भीम को पहचानते ही, अपने मित्र बकासुर की मृत्यु का उल्लेख करते हुए, उसने भीम को तत्काल द्वंद्व-युद्ध की चुनौती दी, यह घोषित करते हुए कि आज वह अपने मित्र की मृत्यु का पूर्ण प्रतिशोध लेकर रहेगा।
भीम, बिना तनिक भी भय के, इस चुनौती को स्वीकार करते हुए, राक्षस के साथ एक भीषण, दीर्घकालिक द्वंद्व-युद्ध में उलझ गए, दोनों महाबली एक-दूसरे को वृक्षों और शिलाखंडों से प्रहार करते हुए, सम्पूर्ण वन को अपने युद्ध-घोष से कंपायमान करते रहे।
युधिष्ठिर, द्रौपदी तथा शेष भाई इस भीषण युद्ध को चिंतित दृष्टि से देखते रहे, किंतु भीम ने अपनी असाधारण शक्ति और अदम्य साहस से, अंततः किर्मीर को भूमि पर पटककर, उसकी गर्दन तोड़कर उसका वध कर दिया, इस विजय ने सम्पूर्ण क्षेत्र को इस राक्षस के दीर्घकालिक आतंक से सदा के लिए मुक्त कर दिया।
इस घटना के पश्चात्, पांडव कुछ काल तक इसी वन में शांतिपूर्वक निवास करते रहे, यह उनके वनवास की प्रथम असाधारण विजय थी, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि चाहे वे राज्यविहीन और वस्त्रहीन ही क्यों न हों, उनका पराक्रम और साहस तनिक भी क्षीण नहीं हुआ है।
इस अध्याय की शिक्षा
बाह्य वैभव और राजसी सम्पदा भले ही छिन जाए, किंतु आंतरिक शक्ति, साहस और कौशल कभी छीने नहीं जा सकते, यही सच्ची, अविनाशी सम्पत्ति है।
श्रीकृष्ण का सांत्वना हेतु आगमन
पांडवों की इस दुर्दशा का समाचार पाकर, श्रीकृष्ण, अत्यंत व्यथित हृदय से, स्वयं द्वारका से काम्यक वन की ओर प्रस्थान किए, उनके साथ उनकी बहन सुभद्रा तथा अन्य अनेक यादव-वीर भी थे, जो पांडवों के प्रति अपनी सहानुभूति और समर्थन प्रकट करने आए थे।
श्रीकृष्ण, वन में पांडवों को इस दयनीय, तपस्वी अवस्था में देखकर, अत्यंत क्रोधित हुए, उन्होंने खुले शब्दों में यह घोषणा की कि यदि वे स्वयं उस समय द्वारका में उपस्थित होते, तो कदापि इस अन्यायपूर्ण द्यूत-क्रीड़ा को होने ही न देते, तथा अब भी वे इस अन्याय का समुचित प्रतिशोध लेने हेतु पूर्णतः तत्पर हैं।
युधिष्ठिर ने, अत्यंत धैर्यपूर्वक, श्रीकृष्ण को समझाया कि उन्होंने स्वयं ही धर्मसम्मत ढंग से यह वनवास स्वीकार किया है, तथा वे इसे अपने वचन के अनुसार पूर्ण करना चाहते हैं, इस समय किसी भी प्रकार का प्रतिशोध या युद्ध, उनके वचन-भंग का कारण बनेगा, अतः उन्होंने धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करने का निश्चय व्यक्त किया।
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर के इस असाधारण धैर्य और सत्यनिष्ठा की भूरि-भूरि प्रशंसा की, तथा यह वचन दिया कि जब भी उचित समय आएगा, वे स्वयं पांडवों के साथ खड़े होकर इस अन्याय का पूर्ण, निर्णायक प्रतिकार सुनिश्चित करेंगे, उन्होंने द्रौपदी को भी विशेष स्नेह और सांत्वना से भरे शब्दों में आश्वस्त किया।
इस भेंट ने पांडवों के हृदय में नई आशा और शक्ति का संचार किया, श्रीकृष्ण के इस अप्रत्याशित, स्नेहपूर्ण आगमन ने उन्हें यह स्मरण कराया कि चाहे सांसारिक परिस्थितियाँ कितनी भी विपरीत क्यों न हों, स्वयं भगवान की मित्रता और कृपा सदैव उनके साथ है।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्चे मित्र की उपस्थिति सबसे कठिन परिस्थितियों में भी नई आशा और शक्ति का संचार करती है, यह वह सम्पदा है जो कभी छिन नहीं सकती।
द्रौपदी-युधिष्ठिर संवाद — धर्म पर प्रश्न
एक दिन, द्रौपदी, अपने हृदय की गहन पीड़ा और असंतोष को अब और अधिक छिपा न सकते हुए, युधिष्ठिर के समक्ष एक अत्यंत गंभीर, तीक्ष्ण प्रश्न उठाया — कि जब वे स्वयं इतने धर्मपरायण, सत्यनिष्ठ और सदाचारी हैं, तो फिर उन्हें इतनी असहनीय विपत्तियाँ क्यों सहनी पड़ रही हैं, जबकि दुर्योधन जैसे अधर्मी व्यक्ति सुख-वैभव में जी रहे हैं।
उसने अत्यंत मार्मिक शब्दों में यह भी प्रश्न किया कि क्या स्वयं ईश्वर इस संसार के कर्मों के प्रति उदासीन हैं, अथवा यह सम्पूर्ण जगत् केवल अंधे भाग्य के हाथों संचालित होता है, जिसमें धर्म और अधर्म का कोई वास्तविक अर्थ ही नहीं रह जाता।
युधिष्ठिर ने अत्यंत शांत, गंभीर स्वर में उत्तर दिया कि वे धर्म का पालन किसी फल की आकांक्षा से नहीं, अपितु धर्म स्वयं के प्रति अपने कर्तव्य के रूप में करते हैं, उन्होंने समझाया कि धर्म का फल कभी-कभी तत्काल नहीं, अपितु दीर्घकाल में, कभी-कभी अगले जन्मों में भी प्रकट होता है, तथा इस विलंब पर संदेह करना स्वयं ही धर्म से विचलन होगा।
इसी वार्तालाप के मध्य, भीमसेन भी अपने संचित क्रोध को व्यक्त करते हुए, युधिष्ठिर से आग्रह करने लगे कि वे तत्काल शस्त्र उठाकर दुर्योधन से अपना राज्य छीन लें, यह तर्क देते हुए कि अत्यधिक धैर्य कभी-कभी दुर्बलता का ही पर्याय बन जाता है, तथा वचन का पालन करने की भी एक उचित सीमा होनी चाहिए।
युधिष्ठिर, अपने भाई और पत्नी दोनों के इस गहन क्षोभ को समझते हुए, फिर भी अपने संकल्प पर अडिग रहे, उन्होंने अत्यंत विनम्रता से समझाया कि सत्य और वचन-पालन ही एक क्षत्रिय की सच्ची शक्ति है, तथा वे तेरह वर्षों की इस अवधि को पूर्ण किए बिना कभी शस्त्र नहीं उठाएँगे, चाहे इसके लिए कितना भी अधिक धैर्य क्यों न रखना पड़े।
इस अध्याय की शिक्षा
धर्म का पालन तत्काल फल की आकांक्षा से नहीं, अपितु स्वयं के प्रति सच्चाई और कर्तव्य-बोध से किया जाना चाहिए, फल का समय निर्धारित करना मनुष्य के हाथ में नहीं है।
महर्षि व्यास का आगमन — प्रतिस्मृति विद्या
पांडवों की इस गहन वेदना और असमंजस को अपनी दिव्य दृष्टि से जानकर, स्वयं महर्षि वेदव्यास काम्यक वन में पधारे, उन्होंने युधिष्ठिर को अत्यंत स्नेहपूर्वक सांत्वना देते हुए, यह प्रकट किया कि यह वनवास-काल भी अंततः पांडवों के महान भविष्य की ही एक आवश्यक, अनिवार्य तैयारी है।
व्यास जी ने युधिष्ठिर को समझाया कि आगामी वर्षों में उन्हें अनेक शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्रों तथा दिव्य सहायता की आवश्यकता पड़ेगी, विशेष रूप से उस महासंग्राम के लिए जो अंततः अपरिहार्य प्रतीत हो रहा है, अतः इस वनवास-काल का सदुपयोग इसी दिशा में किया जाना चाहिए।
उन्होंने युधिष्ठिर को "प्रतिस्मृति" नामक एक दुर्लभ, दिव्य विद्या प्रदान की, जिसके द्वारा वे इस विद्या को अर्जुन को सिखा सकते थे, इस विद्या के प्रभाव से, अर्जुन तपस्या के दौरान स्वयं को स्मरण करके, किसी भी अस्त्र या विद्या का आवाहन कर सकते थे, बिना उसे भूले या खोए।
व्यास जी ने विशेष रूप से यह सुझाव दिया कि अर्जुन को स्वयं भगवान शिव से पाशुपतास्त्र, तथा अन्य देवताओं से उनके विशिष्ट, अजेय अस्त्रों को प्राप्त करने हेतु हिमालय की ओर तपस्या करने के लिए प्रस्थान करना चाहिए, यह आगामी युद्ध की दृष्टि से एक अत्यंत आवश्यक, दूरदर्शी कदम था।
युधिष्ठिर, व्यास जी के इस दिव्य मार्गदर्शन से गहराई से प्रेरित होकर, तथा शेष पांडवों की सहमति प्राप्त कर, अर्जुन को यह असाधारण, चुनौतीपूर्ण दायित्व सौंपने का निश्चय किया, यह जानते हुए कि उनका यह पृथक्करण कष्टदायक अवश्य होगा, किंतु भविष्य की दृष्टि से यह अत्यंत आवश्यक था।
इस अध्याय की शिक्षा
विपत्ति के समय में भी भविष्य की सुदूरदर्शी तैयारी करना, वर्तमान के दुःख में डूबे रहने से कहीं अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण और फलदायी होता है।
अर्जुन का तपस्या हेतु प्रस्थान
अपने भाइयों और द्रौपदी से भावभीनी विदा लेकर, अर्जुन अकेले ही उत्तर दिशा की ओर, हिमालय पर्वत की ओर प्रस्थान किए, इस दुष्कर यात्रा में उनका एकमात्र संबल उनकी गहन भक्ति, दृढ़ संकल्प तथा व्यास जी से प्राप्त प्रतिस्मृति विद्या थी।
मार्ग में, अर्जुन को एक तपस्वी का रूप धारण किए स्वयं भगवान इंद्र मिले, जिन्होंने अपने पुत्र की परीक्षा लेते हुए उनसे पूछा कि वे किस उद्देश्य से इतनी कठोर तपस्या करने जा रहे हैं, अर्जुन ने विनम्रतापूर्वक अपना सम्पूर्ण उद्देश्य — दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति तथा धर्म की रक्षा — स्पष्ट किया।
इंद्र, अपने पुत्र के इस दृढ़ संकल्प से अत्यंत प्रसन्न होकर, अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए, तथा उन्होंने अर्जुन को यह परामर्श दिया कि दिव्य अस्त्रों की सर्वोच्च प्राप्ति के लिए, उन्हें सर्वप्रथम स्वयं भगवान शिव की आराधना करनी होगी, क्योंकि शिव के पास वह सर्वशक्तिमान पाशुपतास्त्र है जो किसी भी युद्ध का निर्णायक अस्त्र सिद्ध हो सकता है।
अर्जुन ने इंद्रकील पर्वत पर पहुँचकर, अपने समस्त सांसारिक वस्त्र और आभूषण त्यागकर, वल्कल-वस्त्र धारण किया, तथा एकाग्र चित्त से, अत्यंत कठोर, निर्जल तपस्या आरम्भ की, उनकी यह तपस्या इतनी उग्र थी कि इसकी तीव्रता से सम्पूर्ण त्रिलोक में हलचल मच गई।
देवगण, अर्जुन की इस असाधारण तपस्या से चिंतित होकर, स्वयं भगवान शिव के पास गए, तथा उनसे अनुरोध किया कि वे इस तपस्वी की परीक्षा लेकर, उचित पाए जाने पर, उसे शीघ्र ही वांछित वरदान प्रदान करें, इसी अनुरोध के साथ, अगले अध्याय की उस असाधारण घटना की पृष्ठभूमि रची गई जिसमें स्वयं शिव, एक किरात (वनवासी शिकारी) का रूप धारण करके अर्जुन की परीक्षा लेने आए।
इस अध्याय की शिक्षा
किसी महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अकेले, कठिन मार्ग पर चलने का साहस ही सच्ची तपस्या है, यह साहस ही अंततः असाधारण फल प्रदान करता है।
किरात-रूपी शिव से युद्ध
अर्जुन की तपस्या के दौरान, मूकासुर नामक एक राक्षस, वराह का रूप धारण कर, अर्जुन पर आक्रमण करने हेतु आगे बढ़ा, अर्जुन ने तत्काल अपना धनुष उठाकर उस पर बाण चलाया, ठीक इसी क्षण, एक किरात-रूपधारी शिकारी, जो वास्तव में स्वयं भगवान शिव थे, अपनी पत्नी पार्वती तथा गणों के साथ, उसी वराह पर बाण चला बैठे।
दोनों बाण एक साथ ही उस वराह के शरीर में जा लगे, और वह तत्काल प्राणहीन होकर गिर पड़ा, इसके पश्चात् इस बात को लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ कि इस आखेट का वास्तविक श्रेय किसे प्राप्त हो — अर्जुन को, अथवा उस अपरिचित किरात को।
किरात ने दृढ़तापूर्वक यह दावा किया कि यह आखेट उसी का है, क्योंकि यह उसके ही क्षेत्र में हुआ, अर्जुन, इस अपरिचित वनवासी के इस अहंकारपूर्ण दावे से क्रोधित होकर, उसे द्वंद्व-युद्ध की चुनौती दे बैठे, बिना यह जाने कि वे किसके समक्ष खड़े हैं।
दोनों के बीच पहले बाणों से, फिर तलवार से, और अंततः केवल भुजाओं से एक अत्यंत भीषण, दीर्घकालिक युद्ध हुआ, अर्जुन, अपनी समस्त दिव्य शक्ति और कौशल का प्रयोग करने पर भी, इस असाधारण किरात को तनिक भी परास्त नहीं कर पाए, यह देखकर उन्हें गहन विस्मय हुआ कि यह वनवासी वास्तव में कोई साधारण मनुष्य नहीं हो सकता।
अंततः, थककर, अर्जुन ने भगवान शिव की एक मिट्टी की प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करने का निश्चय किया, तभी उन्होंने देखा कि उनके द्वारा अर्पित पुष्प उस किरात के मस्तक पर जा गिरे, इसी क्षण अर्जुन को यह गूढ़ सत्य प्रकट हुआ कि यह किरात वास्तव में स्वयं महादेव ही हैं, और वे तत्काल उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम कर, अपनी अज्ञानतावश की गई ढिठाई के लिए क्षमा-याचना करने लगे।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान कभी-कभी सबसे साधारण, अनपेक्षित रूप में हमारी परीक्षा लेने आते हैं, सच्ची भक्ति और साहस ही उन्हें प्रसन्न कर उनकी वास्तविक पहचान प्रकट करा सकते हैं।
पाशुपतास्त्र की प्राप्ति
भगवान शिव, अर्जुन के इस असाधारण साहस, कौशल तथा उसकी अंतिम विनम्रता और भक्ति से अत्यंत प्रसन्न होकर, अपने वास्तविक, दिव्य रूप में प्रकट हुए, देवी पार्वती सहित, उन्होंने अर्जुन को गले लगाकर अपना स्नेह और आशीर्वाद प्रदान किया।
शिव ने अर्जुन से कहा कि उन्होंने उसकी तपस्या, साहस और युद्ध-कौशल की भलीभाँति परीक्षा ले ली है, तथा वे उससे अत्यंत प्रसन्न हैं, उन्होंने अर्जुन को वह सर्वशक्तिमान, सृष्टि के विनाश में भी सक्षम पाशुपतास्त्र प्रदान किया, जिसके संधान और संहार की विधि भी उन्होंने अत्यंत सावधानीपूर्वक समझाई।
शिव ने यह गंभीर चेतावनी भी दी कि यह अस्त्र इतना भयंकर और सर्वनाशकारी है कि इसे केवल अत्यंत असाधारण, जीवन-मृत्यु के प्रश्न वाली परिस्थिति में ही, तथा किसी असाधारण शक्तिशाली शत्रु के विरुद्ध ही प्रयुक्त किया जाना चाहिए, अन्यथा यह सम्पूर्ण सृष्टि के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।
इस असाधारण वरदान के पश्चात्, शिव अंतर्ध्यान हो गए, और अर्जुन, इस अभूतपूर्व उपलब्धि से अभिभूत होकर, कृतज्ञता से भरे हृदय के साथ अपनी आगे की तपस्या और अन्य दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति हेतु आगे बढ़े, यह उनकी इस दीर्घकालिक तपस्या-यात्रा की प्रथम, सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी।
इसके पश्चात्, लोकपालों — वरुण, कुबेर और यम — ने भी अर्जुन को प्रसन्न होकर अपने-अपने विशिष्ट, दुर्लभ अस्त्र प्रदान किए, प्रत्येक अस्त्र अपनी विशिष्ट शक्ति और उपयोग-विधि के साथ, यह सिद्ध करते हुए कि अर्जुन अब त्रिलोक के सर्वाधिक सुसज्जित, अजेय योद्धाओं में से एक बन चुके थे।
इस अध्याय की शिक्षा
असाधारण शक्ति सदैव असाधारण उत्तरदायित्व के साथ आती है, इसका प्रयोग केवल विवेकपूर्ण, अत्यंत आवश्यक परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।
अर्जुन का स्वर्गारोहण एवं इंद्र से मिलन
लोकपालों से दिव्य अस्त्र प्राप्त करने के पश्चात्, स्वयं इंद्रदेव अर्जुन के समक्ष अपने दिव्य रथ के साथ प्रकट हुए, तथा उन्हें कुछ काल के लिए स्वर्गलोक चलने का आमंत्रण दिया, जहाँ वे अपने पिता के रूप में अर्जुन को और भी अधिक दिव्य ज्ञान तथा अस्त्र-विद्या प्रदान करना चाहते थे।
अर्जुन, इंद्र के इस दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर, स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान किए, यह यात्रा स्वयं में अत्यंत अद्भुत और चमत्कारिक थी, मार्ग में उन्होंने अनेक असाधारण, दिव्य लोकों तथा प्राणियों के दर्शन किए, जिनकी कल्पना भी किसी साधारण मनुष्य के लिए असम्भव थी।
स्वर्गलोक पहुँचकर, अर्जुन का समस्त देवगणों तथा गंधर्वों ने भव्य स्वागत किया, इंद्र ने उन्हें अपने ही सिंहासन पर आधा स्थान देते हुए, यह असाधारण सम्मान प्रदान किया, जो किसी भी मर्त्य मनुष्य के लिए अभूतपूर्व था।
इंद्र ने अर्जुन को अपने दिव्य वज्र अस्त्र सहित अनेक अन्य दुर्लभ, शक्तिशाली अस्त्रों की गहन शिक्षा दी, तथा उन्हें यह भी बताया कि आगामी वर्षों में उन्हें असुरों के विरुद्ध, स्वयं देवताओं की सहायता हेतु, एक विशेष युद्ध में भी भाग लेना होगा, जो उनकी योग्यता की एक और महत्त्वपूर्ण परीक्षा सिद्ध होगी।
इस प्रकार, अर्जुन का यह स्वर्गारोहण न केवल दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति का, अपितु स्वयं देवराज इंद्र के पुत्र के रूप में उनकी असाधारण पहचान और सम्मान की भी पुनर्स्थापना का प्रतीक बना।
इस अध्याय की शिक्षा
जो आत्मा तपस्या और साहस से स्वयं को सिद्ध करती है, उसे मनुष्य-लोक की सीमाओं से परे भी असाधारण सम्मान और अवसर प्राप्त होते हैं।
चित्रसेन से नृत्य-संगीत की शिक्षा एवं निवातकवच-युद्ध
स्वर्गलोक में रहते हुए, इंद्र ने अर्जुन को गंधर्वराज चित्रसेन से नृत्य और संगीत की शिक्षा प्राप्त करने का निर्देश दिया, यह जानते हुए कि आगामी अज्ञातवास के दौरान यह कला उनके लिए एक उपयुक्त छद्म-वेश के रूप में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।
अर्जुन ने, अपनी सहज विनम्रता और समर्पण के साथ, चित्रसेन से इस कला में असाधारण निपुणता प्राप्त की, यह दूरदर्शी शिक्षा आगे चलकर विराट पर्व में उनके बृहन्नला-रूप की पृष्ठभूमि बनेगी, जब वे अज्ञातवास के दौरान एक नृत्य-गुरु के वेश में अपनी वास्तविक पहचान छिपाएँगे।
इसी अवधि में, स्वर्गलोक पर निवातकवच नामक असुरों के एक शक्तिशाली समूह ने आक्रमण करने की योजना बनाई, जिन्हें ब्रह्माजी से यह वरदान प्राप्त था कि कोई भी देवता उन्हें पराजित नहीं कर सकता, किंतु यह वरदान किसी मनुष्य पर लागू नहीं होता था।
इंद्र ने अर्जुन से इन असुरों के विरुद्ध युद्ध करने का अनुरोध किया, अर्जुन ने अपने दिव्य अस्त्रों तथा असाधारण कौशल से, एक भीषण, दीर्घकालिक युद्ध में इन निवातकवच असुरों का सम्पूर्ण संहार किया, यह विजय स्वर्गलोक के इतिहास में एक असाधारण घटना के रूप में सदा स्मरण की गई।
इस असाधारण विजय से प्रसन्न होकर, इंद्र तथा समस्त देवगणों ने अर्जुन की भूरि-भूरि प्रशंसा की, तथा उन्हें "किरीटी" (मुकुटधारी) की उपाधि प्रदान की, अर्जुन, इन सभी असाधारण उपलब्धियों के साथ, अब अपने भाइयों के पास पुनर्मिलन हेतु मर्त्यलोक लौटने के लिए तत्पर हुए।
इस अध्याय की शिक्षा
जो शिक्षा तत्काल अनावश्यक प्रतीत होती है, वह भी भविष्य के किसी अप्रत्याशित मोड़ पर सर्वाधिक मूल्यवान सिद्ध हो सकती है, दूरदर्शिता का यही सार है।
शेष पांडवों की तीर्थयात्रा
अर्जुन की अनुपस्थिति के इन वर्षों में, शेष पांडव, युधिष्ठिर के नेतृत्व में, लोमश ऋषि के मार्गदर्शन में, सम्पूर्ण भारतवर्ष के अनेक पवित्र तीर्थ-स्थलों की यात्रा पर निकल पड़े, यह यात्रा उनके वनवास-काल को न केवल सहनीय, अपितु आध्यात्मिक रूप से अत्यंत समृद्ध बनाने का एक सुंदर माध्यम बनी।
उन्होंने प्रयाग, काशी, गया जैसे अनेक पवित्र स्थलों में स्नान और पूजा-अर्चना की, तथा अनेक ऋषियों से भेंट कर उनसे विभिन्न धर्मशास्त्रीय तथा आध्यात्मिक विषयों पर गहन ज्ञान प्राप्त किया, इन तीर्थयात्राओं ने युधिष्ठिर के धैर्य और सहनशीलता को और भी अधिक सुदृढ़ किया।
इसी यात्रा के दौरान, लोमश ऋषि ने पांडवों को स्वर्गलोक से लौट रहे अर्जुन का शुभ समाचार सुनाया, यह जानकर सभी अत्यंत हर्षित हुए, तथा उन्होंने गंधमादन पर्वत की ओर प्रस्थान करने का निश्चय किया, जहाँ अर्जुन के साथ पुनर्मिलन निश्चित हुआ था।
इसी तीर्थयात्रा के दौरान, द्रौपदी को एक अत्यंत सुगंधित, दिव्य पुष्प प्राप्त हुआ, जिसे पाकर उसने भीम से इसी प्रकार के और पुष्प लाने का अनुरोध किया, इस अनुरोध ने भीम को कुबेर के उद्यान की ओर एक साहसिक यात्रा पर भेजा, जहाँ उनकी भेंट अपने ही भाई हनुमान जी से हुई।
इस भेंट में, हनुमान जी ने भीम को अपनी वास्तविक, विराट शक्ति की एक झलक दिखाकर उनके अहंकार को विनम्र किया, तथा उन्हें रामायण-काल की अनेक शिक्षाप्रद कथाएँ भी सुनाईं, यह भेंट भीम के लिए एक गहन, स्मरणीय अनुभव सिद्ध हुई, जिसने उनके हृदय में विनम्रता का एक नया आयाम जोड़ा।
इस अध्याय की शिक्षा
विपत्ति के काल को तीर्थयात्रा और आध्यात्मिक साधना में परिवर्तित करना, समय को व्यर्थ गँवाने के बजाय उसे गहन आंतरिक समृद्धि में बदलने की कला है।
अर्जुन का पांडवों से पुनर्मिलन
गंधमादन पर्वत पर, दीर्घकाल के पश्चात्, अर्जुन का अपने भाइयों तथा द्रौपदी से भावविह्वल पुनर्मिलन हुआ, सभी अत्यंत हर्षित हुए, तथा अर्जुन ने अपनी सम्पूर्ण दिव्य यात्रा — पाशुपतास्त्र की प्राप्ति, स्वर्गारोहण, तथा निवातकवच-वध — का विस्तृत, रोमांचक वृत्तांत सुनाया।
युधिष्ठिर, अपने भाई की इन असाधारण उपलब्धियों को सुनकर अत्यंत गर्वित और आश्वस्त हुए, यह अनुभव करते हुए कि आगामी संघर्ष के लिए अब वे कहीं अधिक सुसज्जित और सक्षम हैं, अर्जुन ने अपने साथ प्राप्त सभी दिव्य अस्त्र भी अपने भाइयों को दिखाए, जिन्हें देखकर सबका उत्साह और आशा नई ऊँचाइयों को छू गई।
इसी अवधि में, पांडवों को अनेक अन्य असाधारण अनुभवों का भी सामना करना पड़ा — एक बार भीम, अपने अभिमान में, एक वृद्ध वानर (जो वास्तव में हनुमान जी ही थे) की पूँछ को हटाने का प्रयत्न करते हुए असफल रहे, यह घटना उनके अहंकार को शमन करने वाली एक गहन शिक्षा सिद्ध हुई।
द्रौपदी, पुनः अर्जुन के साथ अपने समस्त पतियों को एकत्रित पाकर, गहन संतोष और आनंद का अनुभव करने लगी, यद्यपि वनवास की कठिनाइयाँ अभी भी यथावत् थीं, किंतु परिवार का यह पुनर्मिलन उसके हृदय को गहन आश्वासन प्रदान करता रहा।
इस पुनर्मिलन के पश्चात्, पांडवों ने काम्यक वन की ओर पुनः लौटने का निश्चय किया, जहाँ उन्हें अपने वनवास-काल के शेष वर्ष व्यतीत करने थे, यह यात्रा अब पहले से कहीं अधिक आत्मविश्वास और आशा से परिपूर्ण थी।
इस अध्याय की शिक्षा
परिवार का पुनर्मिलन, चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियों में हो, हृदय को नई आशा और शक्ति से भर देता है, यही पारिवारिक बंधन की सच्ची शक्ति है।
जटासुर द्वारा छल एवं वध
काम्यक वन में पुनः लौटने के पश्चात्, एक दिन, जटासुर नामक एक अत्यंत कुटिल राक्षस, जो ब्राह्मण का छद्म वेश धारण करने में निपुण था, पांडवों के शिविर में एक साधारण, विनम्र ब्राह्मण के रूप में प्रविष्ट हुआ, तथा गुप्त रूप से उनके अस्त्र-शस्त्रों तथा द्रौपदी का अपहरण करने की योजना बनाने लगा।
एक अवसर पाकर, जब भीम, अर्जुन तथा अन्य पांडव भोजन-सामग्री की खोज में दूर निकल गए, जटासुर ने युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव को बलपूर्वक बंदी बना लिया, तथा द्रौपदी का भी अपहरण कर, अपने वास्तविक, विशालकाय रूप में आकाश-मार्ग से भागने का प्रयास किया।
द्रौपदी की करुण पुकार सुनकर, तथा सहदेव के किसी प्रकार सचेत करने पर, भीम तत्काल वहाँ पहुँचे, और जटासुर का पीछा करते हुए, उसे रोककर उसके साथ एक भीषण द्वंद्व-युद्ध आरम्भ किया, जो अत्यंत भीषण और दीर्घकालिक सिद्ध हुआ।
भीम, अपनी असाधारण शक्ति से, अंततः जटासुर को भूमि पर पटककर, उसका सिर धड़ से अलग कर उसका वध कर दिया, इस प्रकार युधिष्ठिर, द्रौपदी तथा अन्य भाई इस भीषण संकट से सुरक्षित मुक्त हुए, यह घटना पुनः यह प्रमाणित करती है कि छल और कपट अंततः पराजित होकर ही रहते हैं।
इस घटना ने पांडवों को यह गहन शिक्षा दी कि वनवास में केवल प्रत्यक्ष शत्रुओं से ही नहीं, अपितु छद्मवेशधारी, कुटिल शक्तियों से भी सदैव सतर्क रहना आवश्यक है, विशेष रूप से जब द्रौपदी अकेली या अल्प सुरक्षा में हों।
इस अध्याय की शिक्षा
छल और कपट चाहे कितने भी सूक्ष्म, धार्मिक वेश में क्यों न आएँ, सतर्कता और साहस के समक्ष अंततः उनका पर्दाफाश होकर ही रहता है।
कर्ण की घोषयात्रा — दुर्योधन का अपमानजनक प्रदर्शन
दुर्योधन, शकुनि और कर्ण के परामर्श से, पांडवों की दुर्दशा और वनवासी जीवन का प्रत्यक्ष अवलोकन कर उनका उपहास करने की एक कुटिल इच्छा से प्रेरित होकर, "घोषयात्रा" के बहाने — अर्थात् अपने गोधन (गायों) के निरीक्षण के छद्म-प्रयोजन से — काम्यक वन के निकट एक विशाल शिविर स्थापित करने का निश्चय किया।
यह वास्तविक उद्देश्य पूर्णतः यह था कि दुर्योधन अपने अपार वैभव, विशाल सेना तथा राजसी ठाट-बाट का प्रदर्शन करते हुए, पांडवों के समक्ष अपनी श्रेष्ठता और उनकी दयनीय स्थिति का उपहास कर सके, कर्ण और शकुनि ने इस योजना का पूर्ण समर्थन किया, यह विश्वास करते हुए कि इससे दुर्योधन का घायल अहंकार शांत होगा।
किंतु वहाँ पहुँचने पर, दुर्योधन का सामना गंधर्वराज चित्रसेन की सेना से हुआ, जो पहले से ही उस सरोवर के निकट विश्राम कर रहे थे, तथा जिन्होंने दुर्योधन को उस स्थान पर अपने शिविर स्थापित करने से रोका, इस विवाद ने शीघ्र ही एक भीषण युद्ध का रूप ले लिया।
गंधर्वों की दिव्य शक्ति के समक्ष, दुर्योधन की सम्पूर्ण विशाल सेना बुरी तरह पराजित हुई, कर्ण भी अंततः युद्धभूमि से पलायन करने को विवश हुए, तथा दुर्योधन, अपने भाइयों सहित, गंधर्वों द्वारा बंदी बना लिए गए, यह उनके ही अहंकारपूर्ण प्रयास का एक अत्यंत विडंबनापूर्ण, अपमानजनक परिणाम था।
भयभीत, बंदी बनाए गए कौरव सैनिकों में से कुछ किसी प्रकार भागकर पांडवों के शिविर तक पहुँचे, तथा उन्हें अपने स्वामी की इस दुर्दशा और बंदी होने का समाचार दिया, यह जानकर पांडवों के समक्ष एक अत्यंत गहन, नैतिक दुविधा उत्पन्न हुई कि इस परिस्थिति में उन्हें क्या करना चाहिए।
इस अध्याय की शिक्षा
जो अहंकार दूसरों के दुःख का उपहास करने निकलता है, वह प्रायः स्वयं ही किसी अप्रत्याशित, अधिक गहन अपमान का शिकार बनकर लौटता है।
पांडवों द्वारा कौरवों की मुक्ति
युधिष्ठिर ने, इस समाचार को सुनते ही, बिना एक क्षण का विलंब किए, भीम और अर्जुन को यह आदेश दिया कि वे तत्काल जाकर अपने बंदी बनाए गए चचेरे भाइयों को गंधर्वों से मुक्त कराएँ, भीम ने आरम्भ में इस आदेश पर आश्चर्य व्यक्त किया, यह तर्क देते हुए कि दुर्योधन को उसके अहंकार का यह उचित दंड मिलना ही चाहिए था।
युधिष्ठिर ने अत्यंत गंभीरता से समझाया कि चाहे दुर्योधन कितना भी अधर्मी क्यों न हो, वह फिर भी उनके अपने ही कुल का सदस्य है, तथा किसी बाह्य शक्ति के हाथों अपने ही वंशज का अपमान होते देखना, कुल की गरिमा के सर्वथा विपरीत है, अतः उनकी रक्षा करना उनका अनिवार्य कर्तव्य है।
अर्जुन और भीम, अपने ज्येष्ठ भ्राता की इस उदात्त आज्ञा का पालन करते हुए, तत्काल गंधर्वों की सेना की ओर प्रस्थान किए, तथा चित्रसेन से भेंट कर, अत्यंत विनम्रतापूर्वक कौरवों की मुक्ति का अनुरोध किया।
चित्रसेन, जो वास्तव में अर्जुन के घनिष्ठ मित्र भी थे (वही चित्रसेन जिनसे अर्जुन ने स्वर्गलोक में नृत्य-संगीत सीखा था), ने अर्जुन के इस अनुरोध को सहर्ष स्वीकार किया, तथा दुर्योधन और उनके भाइयों को तत्काल मुक्त कर दिया, यह प्रकट करते हुए कि यह सम्पूर्ण घटना वास्तव में स्वयं इंद्र के निर्देश पर ही, दुर्योधन को एक शिक्षा देने हेतु रची गई थी।
दुर्योधन, इस अपमानजनक मुक्ति से — कि जिन पांडवों का उपहास करने वे आए थे, उन्हीं के हाथों उन्हें मुक्ति मिली — गहन लज्जा और और भी अधिक तीव्र क्रोध से भर उठे, वे बिना पांडवों से भेंट किए ही, चुपचाप हस्तिनापुर लौट गए, यहाँ तक कि उन्होंने आत्महत्या करने का भी विचार किया, किंतु शकुनि और कर्ण ने उन्हें किसी प्रकार समझा-बुझाकर इससे रोका।
इस अध्याय की शिक्षा
कुल की गरिमा और उदारता की सच्ची परीक्षा तब होती है जब हमें अपने ही शत्रु की रक्षा करनी पड़े, यही सच्चे धर्म और सच्चे बड़प्पन की पहचान है।
जयद्रथ द्वारा द्रौपदी-हरण का प्रयास
कुछ समय पश्चात्, एक अवसर पर, जब समस्त पांडव आखेट हेतु दूर वन में निकल गए थे, सिंधु-देश के राजा जयद्रथ, जो दुर्योधन की बहन दुःशला के पति थे, संयोगवश उसी वन-मार्ग से गुजर रहे थे, और उन्होंने द्रौपदी को शिविर में अकेली देखा।
जयद्रथ, द्रौपदी के असाधारण सौंदर्य से मोहित होकर, तथा अपनी क्षणिक वासना में अंधे होकर, उसके समक्ष विवाह का अनुचित प्रस्ताव रखा, द्रौपदी ने इस प्रस्ताव को अत्यंत दृढ़ता और तिरस्कार के साथ अस्वीकार करते हुए, उसे उसके अनुचित आचरण के लिए कठोर शब्दों में फटकारा।
अपने इस अस्वीकार से क्रोधित और अपमानित होकर, जयद्रथ ने बलपूर्वक द्रौपदी का अपहरण कर उसे अपने रथ पर बिठाया, तथा वहाँ से भागने का प्रयास किया, द्रौपदी की करुण पुकार सुनकर, धौम्य ऋषि सहित शिविर में उपस्थित कुछ लोगों ने उसे रोकने का प्रयास किया, किंतु जयद्रथ का बल उनके समक्ष अधिक सिद्ध हुआ।
जब पांडव आखेट से लौटे, तथा उन्हें द्रौपदी के अपहरण का समाचार मिला, वे तत्काल क्रोधित होकर जयद्रथ के पीछे दौड़े, युधिष्ठिर ने धौम्य ऋषि से पूछताछ कर घटना की सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त की, तथा भीम और अर्जुन को तत्काल जयद्रथ का पीछा करने का आदेश दिया।
भीम और अर्जुन, अपने अश्वों की अद्भुत गति से, शीघ्र ही जयद्रथ के रथ तक जा पहुँचे, तथा उसकी सेना को सरलता से परास्त करते हुए, द्रौपदी को सुरक्षित मुक्त कराया, यह घटना पुनः इस बात का प्रमाण बनी कि पांडवों का पराक्रम, वनवास की दुर्दशा में भी, तनिक भी क्षीण नहीं हुआ था।
इस अध्याय की शिक्षा
क्षणिक वासना और अहंकार में लिया गया कोई भी अनुचित कदम, चाहे अपराधी कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः घोर अपमान और पराजय ही लाता है।
जयद्रथ का पराभव एवं मुक्ति
जयद्रथ को बंदी बनाकर पांडवों के समक्ष लाया गया, भीमसेन, अपने असीम क्रोध में, उसका तत्काल वध कर देना चाहते थे, किंतु द्रौपदी ने, अपनी असाधारण करुणा और विवेक का परिचय देते हुए, यह अनुरोध किया कि जयद्रथ को प्राण-दंड न दिया जाए, क्योंकि वह उनकी ननद दुःशला का पति है, तथा उसका वध उसे विधवा बना देगा।
युधिष्ठिर ने भी द्रौपदी के इस करुणापूर्ण अनुरोध का समर्थन किया, किंतु उन्होंने यह भी निश्चय किया कि जयद्रथ को उसके इस घृणित कृत्य के लिए कोई उचित, अपमानजनक दंड अवश्य मिलना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी इस प्रकार का दुस्साहस करने से पूर्व सौ बार विचार करे।
भीमसेन ने जयद्रथ के सिर को पाँच स्थानों पर मुंडवाकर, केवल पाँच शिखाएँ शेष रखते हुए, उसे इस अपमानजनक स्थिति में सम्पूर्ण सभा के समक्ष प्रस्तुत किया, यह उसके अहंकार को चूर-चूर कर देने वाला, किंतु प्राण-रहित दंड था।
अत्यंत अपमानित, लज्जित जयद्रथ को इसके पश्चात् मुक्त कर दिया गया, वह सीधे हस्तिनापुर की ओर नहीं गया, अपितु अपने इस असहनीय अपमान से आहत होकर, गंगा के तट पर जाकर भगवान शिव की कठोर तपस्या करने लगा, यह प्रतिशोध की एक नई अग्नि थी जो आगे चलकर द्रोण पर्व की उस भीषण घटना में प्रकट होगी जिसमें वह अभिमन्यु की मृत्यु का प्रमुख कारण बनेगा।
यह घटना पांडवों के लिए एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा सिद्ध हुई — कि करुणा और न्याय के मध्य संतुलन बनाए रखना कितना आवश्यक है, तथा किसी भी अपमान का बीज, चाहे कितना भी न्यायोचित क्यों न हो, भविष्य में एक नई शत्रुता का रूप ले सकता है।
इस अध्याय की शिक्षा
करुणा और न्याय के मध्य संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है, किंतु यह भी स्मरण रखना चाहिए कि आज का अपमानित शत्रु भविष्य में और भी गहन प्रतिशोध का कारण बन सकता है।
रामोपाख्यान — श्रीराम की कथा द्वारा सांत्वना
जयद्रथ की इस घटना से उत्पन्न मानसिक क्षोभ को शांत करने हेतु, तथा युधिष्ठिर को यह स्मरण कराने हेतु कि उनसे पूर्व भी अनेक महान, धर्मात्मा व्यक्तियों को असहनीय विपत्तियों का सामना करना पड़ा है, मार्कण्डेय ऋषि ने पांडवों को भगवान श्रीराम की सम्पूर्ण कथा, "रामोपाख्यान", के रूप में सुनाई।
उन्होंने विस्तार से वर्णन किया कि किस प्रकार राम को भी, अपने पिता के वचन का पालन करते हुए, चौदह वर्षों का वनवास स्वीकार करना पड़ा, तथा किस प्रकार रावण ने छल से माता सीता का अपहरण किया, यह सुनकर युधिष्ठिर ने द्रौपदी के अपहरण के प्रयास से इस समानता को गहराई से अनुभव किया।
मार्कण्डेय ने आगे बताया कि किस प्रकार राम ने, अपने भाई लक्ष्मण, तथा वानर-सेना, विशेष रूप से हनुमान जी की सहायता से, अंततः लंका पर विजय प्राप्त कर, सीता को सकुशल मुक्त कराया, यह कथा पांडवों के हृदय में यह दृढ़ विश्वास स्थापित करने के लिए सुनाई गई कि धैर्य और धर्म का मार्ग अंततः विजयी होता है, चाहे संघर्ष कितना भी दीर्घकालिक क्यों न हो।
इस कथा ने युधिष्ठिर को यह गहन सांत्वना दी कि उनकी अपनी विपत्तियाँ, चाहे कितनी भी असहनीय प्रतीत हों, इतिहास में अद्वितीय नहीं हैं, तथा स्वयं भगवान के अवतार को भी इसी प्रकार के कठिन वनवास और संघर्ष से गुजरना पड़ा था।
इस कथा को सुनकर, समस्त पांडव तथा द्रौपदी का मनोबल पुनः दृढ़ हुआ, तथा उन्होंने नए उत्साह और धैर्य के साथ अपने शेष वनवास-काल को पूर्ण करने का संकल्प लिया, यह इस बात का भी प्रमाण था कि कथा और स्मरण, स्वयं में एक असाधारण उपचार-शक्ति रखते हैं।
इस अध्याय की शिक्षा
अपनी विपत्तियों को इतिहास के महान, धर्मात्मा व्यक्तियों की गाथाओं के प्रकाश में देखना, हृदय को गहन सांत्वना और नवीन धैर्य प्रदान करता है।
सावित्री-सत्यवान की कथा
युधिष्ठिर ने, एक अवसर पर, यह देखकर कि द्रौपदी अपनी वर्तमान परिस्थिति में भी कितनी दृढ़ और पतिव्रता बनी हुई हैं, मार्कण्डेय ऋषि से यह पूछा कि क्या इतिहास में कोई अन्य स्त्री भी द्रौपदी के समान अटूट पातिव्रत्य और साहस का उदाहरण प्रस्तुत करती है।
इस पर मार्कण्डेय ने सावित्री की अमर कथा सुनाई — कि किस प्रकार राजकुमारी सावित्री ने, यह जानते हुए भी कि सत्यवान का जीवन-काल केवल एक वर्ष शेष है, स्वेच्छा से उनसे विवाह किया, तथा अपने अटूट प्रेम और सतीत्व के बल पर स्वयं यमराज से संवाद कर, अपने पति के प्राण वापस प्राप्त किए।
उन्होंने विस्तार से वर्णन किया कि किस प्रकार सावित्री ने यमराज का पीछा करते हुए, अपने गहन ज्ञान, विनम्रता और वाक्-चातुर्य से उन्हें इतना प्रसन्न किया कि यमराज ने उसे अनेक वरदान दिए, अंततः, बिना अपने पति के प्राण माँगे, केवल सौ पुत्रों की कामना करके, उसने चतुराई से यमराज को यह वरदान पूर्ण करने हेतु सत्यवान के प्राण लौटाने पर विवश कर दिया।
यह कथा विशेष रूप से द्रौपदी के हृदय को गहराई से स्पर्श कर गई, यह उसे यह विश्वास दिलाती थी कि एक स्त्री की दृढ़ता, बुद्धिमत्ता और अटूट प्रेम, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी असहनीय क्यों न हों, अंततः विजयी हो सकती है, यहाँ तक कि स्वयं मृत्यु के देवता के समक्ष भी।
इस कथा ने सम्पूर्ण पांडव-परिवार को गहन आध्यात्मिक बल प्रदान किया, तथा यह पुनः स्थापित किया कि सच्चा साहस केवल युद्धभूमि में शस्त्रों से ही नहीं, अपितु धैर्य, बुद्धि और अटूट निष्ठा से भी प्रकट होता है।
इस अध्याय की शिक्षा
एक स्त्री की दृढ़ता, बुद्धिमत्ता और अटूट प्रेम, स्वयं मृत्यु के देवता को भी प्रभावित कर सकती है, यही सच्ची शक्ति है जो शस्त्रों से भी अधिक प्रबल है।
इंद्र द्वारा कर्ण के कवच-कुंडल की याचना
इसी काल में, हस्तिनापुर में, स्वयं इंद्रदेव को यह गहन चिंता सताने लगी कि कर्ण, जो जन्म से ही सूर्यदेव से प्राप्त अभेद्य कवच और कुंडल धारण किए हुए है, आगामी महासंग्राम में अर्जुन के लिए एक असाधारण, संभवतः अजेय चुनौती सिद्ध हो सकता है।
इंद्र ने एक ब्राह्मण का छद्म वेश धारण कर, कर्ण के समक्ष उपस्थित होकर, दान में उसके वे ही जन्मजात कवच-कुंडल माँगे, यह जानते हुए कि कर्ण अपनी असाधारण उदारता के लिए विख्यात है, तथा किसी भी याचक को कभी निराश नहीं करता।
सूर्यदेव, अपने पुत्र कर्ण की रक्षा हेतु, स्वप्न में उसके समक्ष प्रकट होकर, उसे इंद्र की इस योजना से पूर्व ही सचेत कर चुके थे, तथा उसे यह सुझाव दिया था कि वह इस दान को अस्वीकार कर दे, अथवा कम से कम बदले में कोई समान रूप से शक्तिशाली अस्त्र अवश्य माँगे।
कर्ण, अपने पिता की इस चेतावनी से भलीभाँति अवगत होते हुए भी, अपनी दानशीलता की प्रतिष्ठा तथा वचन-निष्ठा को सर्वोपरि मानते हुए, बिना एक क्षण की हिचकिचाहट के, अपने शरीर से उन अभेद्य कवच-कुंडलों को स्वयं ही काटकर, इंद्र को दान में अर्पित कर दिया, इस असाधारण त्याग को देखकर स्वयं इंद्र भी विस्मित रह गए।
अपने इस असाधारण त्याग से गहराई से प्रभावित होकर, इंद्र ने कर्ण को प्रतिदान स्वरूप "वासवी शक्ति" नामक एक अत्यंत शक्तिशाली, एक ही बार प्रयोग किए जाने योग्य अस्त्र प्रदान किया, जो किसी भी शत्रु का निश्चित वध कर सकता था, यह अस्त्र आगे चलकर कर्ण के जीवन के सर्वाधिक निर्णायक क्षणों में से एक की पृष्ठभूमि रचेगा।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्ची उदारता वह है जो अपने ही रक्षा-कवच का त्याग करते हुए भी, अपने वचन और प्रतिष्ठा को सर्वोपरि रखे, ऐसा त्याग अंततः किसी न किसी रूप में पुरस्कृत अवश्य होता है।
अगस्त्य-तीर्थ एवं अन्य ऋषियों की शिक्षाएँ
पांडवों की तीर्थयात्रा आगे बढ़ते हुए, वे महर्षि अगस्त्य से सम्बंधित अनेक पवित्र स्थलों पर पहुँचे, जहाँ उन्हें अगस्त्य ऋषि की उस असाधारण कथा का स्मरण कराया गया, जिन्होंने अपने पितरों की मुक्ति हेतु विंध्य पर्वत को झुकाकर स्वयं दक्षिण भारत में स्थापित किया था, तथा वातापि नामक राक्षस को अपने तपोबल से पचा लिया था।
इसी क्षेत्र में, ऋषि लोमश ने पांडवों को यह भी बताया कि यह वही स्थान है जहाँ महर्षि अगस्त्य ने असुरों के अत्याचार को समाप्त करने हेतु समुद्र का सम्पूर्ण जल पी लिया था, यह कथा पांडवों को यह गहन शिक्षा देती थी कि तपस्या और संकल्प की शक्ति भौतिक असम्भवताओं को भी सम्भव बना सकती है।
आगे बढ़ते हुए, उन्होंने ऋष्यशृंग ऋषि से सम्बंधित स्थलों की भी यात्रा की, जिनकी तपस्या इतनी उग्र थी कि उन्होंने बिना वर्षा के भी एक सम्पूर्ण राज्य को अकाल से बचाया था, इन समस्त कथाओं ने पांडवों के हृदय में तपस्या और संयम के प्रति गहन श्रद्धा को और भी सुदृढ़ किया।
युधिष्ठिर ने इन तीर्थ-स्थलों पर अनेक ब्राह्मणों तथा तपस्वियों को प्रचुर दान दिया, तथा प्रत्येक स्थान पर विधिवत् स्नान और पूजा-अर्चना की, यह उनकी अपनी आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में एक निरंतर, समर्पित यात्रा बन गई।
इन तीर्थयात्राओं के माध्यम से, पांडवों ने न केवल अपने वनवास-काल को धार्मिक दृष्टि से सार्थक बनाया, अपितु सम्पूर्ण भारतवर्ष के भूगोल, संस्कृति और आध्यात्मिक परम्पराओं की भी एक गहन, प्रत्यक्ष समझ प्राप्त की, जो आगे चलकर उनके शासन-काल में भी अत्यंत मूल्यवान सिद्ध हुई।
इस अध्याय की शिक्षा
तीर्थयात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं, अपितु प्रत्येक पवित्र स्थल से जुड़ी कथाओं और शिक्षाओं को आत्मसात् करने की एक सतत, समृद्ध यात्रा है।
नल-दमयंती की कथा — पासों से हुई पराजय की सांत्वना
एक अवसर पर, जब युधिष्ठिर अपने द्यूत में हुई हार को पुनः स्मरण कर गहन विषाद में डूबे थे, ऋषि बृहदश्व ने उन्हें यह सांत्वना देने हेतु कि द्यूत की विपत्ति में फँसने वाले वे अकेले व्यक्ति नहीं हैं, राजा नल और उनकी पत्नी दमयंती की एक अत्यंत मार्मिक, प्राचीन कथा सुनाई।
उन्होंने बताया कि किस प्रकार निषध-नरेश नल, अपनी असाधारण पत्नी दमयंती के साथ अत्यंत सुखी जीवन व्यतीत कर रहे थे, किंतु कलियुग के प्रवेश तथा एक दुष्ट प्रभाव के कारण, उन्हें भी द्यूत-क्रीड़ा की एक असाधारण आसक्ति ने जकड़ लिया, जिसमें उन्होंने अपना सम्पूर्ण राज्य और वैभव अपने ही भाई पुष्कर से हार दिया।
राज्यविहीन होकर, नल और दमयंती को भी वन में अत्यंत कठिन जीवन व्यतीत करना पड़ा, एक रात्रि, अत्यंत विवशता में, नल ने अपनी सोई हुई पत्नी को वन में अकेला छोड़ दिया, यह विश्वास करते हुए कि उसके बिना वह किसी सुरक्षित राज्य में शरण पा सकेगी, यह पृथक्करण दोनों के लिए असहनीय वेदना का कारण बना।
दमयंती, अपने पति की खोज में वर्षों तक भटकती रही, तथा अंततः अपनी अटूट बुद्धिमत्ता और दृढ़ता से, एक चतुर योजना के माध्यम से, नल को पुनः खोज निकाला, इस दीर्घकालिक विछोह के पश्चात्, दोनों का पुनर्मिलन हुआ, तथा नल ने अंततः अपने भाई से पुनः द्यूत खेलकर, इस बार विजयी होकर, अपना सम्पूर्ण राज्य वापस प्राप्त किया।
यह कथा युधिष्ठिर के लिए विशेष रूप से सार्थक सिद्ध हुई, क्योंकि इसने उन्हें यह आश्वासन दिया कि द्यूत की विपत्ति और वनवास का दुःख, चाहे कितना भी असहनीय प्रतीत हो, अंततः धैर्य, प्रेम और दृढ़ता से पार किया जा सकता है, तथा खोया हुआ राज्य और सम्मान भी पुनः प्राप्त किया जा सकता है।
इस अध्याय की शिक्षा
जो विपत्ति द्यूत या भाग्य के आघात से आती है, वह भी धैर्य, अटूट प्रेम और दृढ़ संकल्प से अंततः पार की जा सकती है, तथा खोया हुआ सम्मान पुनः प्राप्त हो सकता है।
मृग-स्वप्न एवं यज्ञ-सामग्री की हानि
वनवास के अंतिम वर्षों में से एक में, एक ब्राह्मण, जिसके अरणी (यज्ञ हेतु अग्नि उत्पन्न करने की लकड़ी) पांडवों के शिविर के निकट वृक्षों पर सुखाने हेतु रखे गए थे, अत्यंत व्याकुल होकर पांडवों के पास पहुँचा, यह शिकायत करते हुए कि एक विशाल मृग ने अपने सींगों में उन अरणियों को फँसाकर वन की ओर भगा लिया है।
युधिष्ठिर, इस ब्राह्मण की सहायता करने के अपने धर्म को स्मरण करते हुए, अपने चारों भाइयों सहित, उस मृग का पीछा करने वन में गहराई तक चले गए, किंतु मृग, जो वास्तव में किसी दैवीय शक्ति द्वारा भेजा गया प्रतीत होता था, इतनी तीव्र गति से भागता रहा कि पांडव उसे पकड़ नहीं पाए, और अंततः वह उनकी आँखों से ओझल हो गया।
इस असफल, थकाने वाले पीछा करने के पश्चात्, पांडव अत्यंत प्यास और थकान से व्याकुल होकर, एक सरोवर की खोज में इधर-उधर भटकने लगे, अंततः नकुल को एक स्वच्छ, शांत सरोवर दिखाई दिया, जिसके निकट पहुँचते ही एक अदृश्य वाणी ने उसे चेतावनी दी कि वह पहले उसके प्रश्नों का उत्तर दिए बिना जल न पिए।
नकुल, अत्यंत प्यास से व्याकुल होने के कारण, इस चेतावनी की अनदेखी करते हुए, जल पीने लगा, और तत्काल वहीं मूर्च्छित होकर गिर पड़ा, एक-एक कर, सहदेव, अर्जुन तथा भीम भी अपने भाई की खोज में उसी सरोवर तक पहुँचे, और वही चेतावनी सुनकर भी, प्यास के वशीभूत होकर जल पी बैठे, तथा वे भी उसी प्रकार मूर्च्छित होकर गिर पड़े।
अंततः, जब बहुत विलंब होने पर भी कोई भाई नहीं लौटा, युधिष्ठिर स्वयं अत्यंत चिंतित होकर उस सरोवर की ओर गए, जहाँ उन्होंने अपने चारों भाइयों को निष्प्राण अवस्था में भूमि पर पड़ा देखा, इस हृदयविदारक दृश्य ने उन्हें गहन शोक में डुबो दिया, यह समझ न पाते हुए कि आखिर किस अदृश्य शक्ति ने उनके भाइयों के प्राण हर लिए।
इस अध्याय की शिक्षा
जब आवश्यकता और प्यास अत्यंत तीव्र हो, तब भी विवेक और सावधानी को त्यागना अत्यंत जोखिमपूर्ण सिद्ध हो सकता है, चाहे परिणाम कितने भी अप्रत्याशित क्यों न हों।
यक्ष-प्रश्न का आरम्भ
युधिष्ठिर, अपने भाइयों के इस असमय, रहस्यमय निधन से गहन शोक में डूबे हुए, फिर भी अपनी सहज बुद्धिमत्ता और सजगता को बनाए रखते हुए, यह अनुमान लगाया कि यह निश्चय ही किसी सामान्य विष या दुर्घटना का परिणाम नहीं, अपितु किसी असाधारण, दैवीय शक्ति का ही कार्य है।
जैसे ही उन्होंने सरोवर के जल को स्पर्श करने का प्रयास किया, वही रहस्यमय वाणी पुनः गूँजी, जो एक यक्ष की थी, जिसने युधिष्ठिर को स्पष्ट चेतावनी दी कि यह सरोवर उसी का है, तथा जो कोई भी बिना उसके प्रश्नों का सही उत्तर दिए इसका जल ग्रहण करेगा, वह भी अपने भाइयों की भाँति ही प्राणहीन हो जाएगा।
युधिष्ठिर ने, अपने गहन शोक और थकान के मध्य भी, अत्यंत विनम्रता और धैर्य के साथ, इस अदृश्य यक्ष के समक्ष स्वयं को प्रस्तुत किया, तथा उसके किसी भी प्रश्न का उत्तर देने की सहर्ष तत्परता व्यक्त की, यह पहचानते हुए कि यह कोई साधारण परीक्षा नहीं, अपितु किसी गहन आध्यात्मिक उद्देश्य से रची गई है।
यक्ष ने युधिष्ठिर से जीवन, मृत्यु, धर्म, सत्य तथा मानव-स्वभाव से सम्बंधित असंख्य, अत्यंत गहन और सूक्ष्म प्रश्नों की एक विस्तृत शृंखला पूछनी आरम्भ की, प्रत्येक प्रश्न मनुष्य के अस्तित्व की गहनतम पहेलियों को स्पर्श करता था।
युधिष्ठिर, अपनी सम्पूर्ण बुद्धिमत्ता, धैर्य और धर्मज्ञान का प्रयोग करते हुए, प्रत्येक प्रश्न का अत्यंत सटीक, गहन उत्तर देने लगे, यह परीक्षा उनके सम्पूर्ण जीवन की सबसे गहन, सबसे महत्त्वपूर्ण बौद्धिक और आध्यात्मिक परीक्षा सिद्ध होने वाली थी, जिस पर उनके भाइयों के प्राण भी निर्भर थे।
इस अध्याय की शिक्षा
गहनतम शोक और थकान के मध्य भी, यदि विवेक और धैर्य बनाए रखा जाए, तो सबसे कठिन परीक्षा भी सफलतापूर्वक पार की जा सकती है।
युधिष्ठिर के गहन, अमर उत्तर
यक्ष के पूछे गए असंख्य प्रश्नों में से एक अत्यंत प्रसिद्ध प्रश्न था कि संसार में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है, युधिष्ठिर ने अत्यंत गहन उत्तर दिया कि प्रतिदिन असंख्य प्राणी मृत्यु को प्राप्त होते देखकर भी, प्रत्येक जीवित मनुष्य यह मानता है कि वह स्वयं अमर है, और इसी भ्रम में जीवन व्यतीत करता है — यही संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य है।
यक्ष ने आगे पूछा कि मार्ग क्या है, युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि जिस मार्ग पर महान पूर्वज और ऋषि चले हों, वही सच्चा मार्ग है, क्योंकि शुष्क तर्क और शास्त्रों की परस्पर विरोधाभासी व्याख्याएँ अकेले किसी निश्चित सत्य तक नहीं पहुँचा सकतीं।
उन्होंने यह भी बताया कि सुख क्या है — यक्ष के इस प्रश्न पर युधिष्ठिर ने कहा कि सुख का मूल है सुख की स्वयं की परिभाषा को समझना, तथा वह व्यक्ति सुखी है जिसके पास इतना ही हो कि वह अपने घर में शांतिपूर्वक भोजन कर सके, तथा जो किसी के ऋणी न हो और न ही किसी परदेश में भटकने को विवश हो।
प्रत्येक प्रश्न के साथ, यक्ष की जिज्ञासा और गहरी होती गई, तथा युधिष्ठिर के उत्तर भी उतने ही गहन, विवेकपूर्ण और मानवीय स्वभाव की गहनतम समझ से परिपूर्ण होते गए, अंततः यक्ष, युधिष्ठिर की इस असाधारण बुद्धिमत्ता, धैर्य और धर्मनिष्ठा से अत्यंत प्रसन्न हुआ।
अंतिम प्रश्न के रूप में, यक्ष ने युधिष्ठिर से यह पूछा कि अपने चारों मृत भाइयों में से केवल एक को ही पुनर्जीवित करने का अवसर मिले, तो वे किसे चुनेंगे, युधिष्ठिर ने, अपनी असाधारण न्यायप्रियता का परिचय देते हुए, माद्री-पुत्र नकुल को चुना, यह तर्क देते हुए कि यदि उनकी दोनों माताओं में से एक-एक पुत्र जीवित रहे, तो यह अधिक न्यायपूर्ण होगा, अपने ही सगे भाई भीम या अर्जुन के बजाय।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्चा न्याय वह है जो व्यक्तिगत स्नेह या पक्षपात से ऊपर उठकर, समभाव और निष्पक्षता के सिद्धांत पर आधारित हो, चाहे यह कितना भी कठिन निर्णय क्यों न हो।
यक्ष द्वारा भाइयों का पुनर्जीवन एवं धर्मराज का प्रकटीकरण
युधिष्ठिर के इस असाधारण, निष्पक्ष उत्तर से अत्यंत प्रसन्न होकर, यक्ष ने प्रकट किया कि वह वास्तव में कोई साधारण यक्ष नहीं, अपितु स्वयं धर्मराज (यमराज) हैं, जो अपने ही पुत्र युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा, बुद्धिमत्ता और न्यायप्रियता की परीक्षा लेने हेतु इस रूप में प्रकट हुए थे।
धर्मराज ने युधिष्ठिर की इस परीक्षा में उनकी असाधारण सफलता की भूरि-भूरि प्रशंसा की, तथा उनके इस उत्तर से — कि उन्होंने केवल नकुल को ही नहीं चुना, अपितु न्याय और समभाव के सिद्धांत को चुना — विशेष रूप से प्रसन्न होकर, उन्होंने न केवल नकुल को, अपितु शेष तीनों भाइयों — भीम, अर्जुन और सहदेव — को भी पुनर्जीवित कर दिया।
इसके अतिरिक्त, धर्मराज ने युधिष्ठिर को एक असाधारण वरदान भी प्रदान किया — कि आगामी अज्ञातवास के काल में, चाहे पांडव किसी भी वेश या स्थान पर क्यों न हों, कोई भी उन्हें उनकी वास्तविक पहचान से नहीं पहचान सकेगा, यह वरदान आगामी विराट पर्व की सफलता के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध होने वाला था।
युधिष्ठिर तथा उनके पुनर्जीवित भाई, अपने पिता-तुल्य इस दिव्य दर्शन तथा असाधारण वरदान से अभिभूत होकर, धर्मराज के प्रति गहन कृतज्ञता व्यक्त करते हुए, उन्हें साष्टांग प्रणाम किया, तथा धर्मराज, उन्हें अपना आशीर्वाद देकर, अंतर्ध्यान हो गए।
यह घटना, पांडवों के वनवास-काल की सबसे गहन, सबसे परिवर्तनकारी आध्यात्मिक घटनाओं में से एक सिद्ध हुई, जिसने न केवल उनके भाइयों के प्राण लौटाए, अपितु आगामी अज्ञातवास की सफलता के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण, दैवीय सुरक्षा-कवच भी प्रदान किया।
इस अध्याय की शिक्षा
जब न्याय और धर्म को व्यक्तिगत स्नेह से भी ऊपर रखा जाता है, तो स्वयं धर्मराज भी प्रसन्न होकर असाधारण, अकल्पनीय वरदान प्रदान करते हैं।
वन पर्व का समापन — अज्ञातवास की तैयारी
यक्ष-प्रश्न की इस असाधारण घटना के पश्चात्, पांडवों ने उस ब्राह्मण को उसकी अरणियाँ भी सकुशल वापस लौटा दीं, जो वास्तव में धर्मराज की ही एक और लीला थी, तथा वे अपने वनवास-काल के अंतिम चरण की ओर, नवीन आत्मविश्वास और आध्यात्मिक दृढ़ता के साथ अग्रसर हुए।
बारह वर्षों का यह दीर्घकालिक, कष्टप्रद वनवास अब अपनी समाप्ति की ओर था, इस काल में पांडवों ने अनेक राक्षसों का वध किया, अनेक दिव्य अस्त्रों तथा वरदानों की प्राप्ति की, असंख्य तीर्थ-स्थलों की यात्रा की, तथा अनेक गहन, जीवन-परिवर्तनकारी शिक्षाएँ प्राप्त कीं।
युधिष्ठिर, अपने भाइयों तथा द्रौपदी के साथ बैठकर, अब आगामी, अत्यंत चुनौतीपूर्ण तेरहवें वर्ष — अज्ञातवास — की सुव्यवस्थित योजना बनाने में जुट गए, यह वर्ष सम्भवतः वनवास से भी अधिक कठिन सिद्ध होने वाला था, क्योंकि इसमें उन्हें अपनी वास्तविक पहचान पूर्णतः छिपाकर, किसी अपरिचित राज्य में साधारण सेवकों के वेश में निवास करना था।
यह निश्चित हुआ कि वे मत्स्य देश के राजा विराट के राज्य में शरण लेंगे, जो पहले से ही पांडवों के प्रति मैत्रीपूर्ण दृष्टिकोण रखते थे, तथा युधिष्ठिर ने अपने प्रत्येक भाई तथा द्रौपदी के लिए उपयुक्त, विश्वसनीय छद्म-पहचान और भूमिका की योजना बनानी आरम्भ कर दी।
इस प्रकार वन पर्व, पांडवों के बारह वर्षों के इस दीर्घकालिक, घटनापूर्ण वनवास-काल की समाप्ति के साथ, तथा आगामी, अत्यंत चुनौतीपूर्ण अज्ञातवास की प्रतीक्षा में, अपने समापन पर पहुँचता है, अगले विराट पर्व में उनके इस साहसिक, रोमांचक छद्म-जीवन तथा उसकी अनेक कठिनाइयों और विजयों की कथा वर्णित की जाएगी।
इस अध्याय की शिक्षा
कठिनतम परीक्षाओं से गुजरकर प्राप्त की गई शिक्षा और आध्यात्मिक शक्ति ही किसी को आगामी, और भी अधिक चुनौतीपूर्ण परीक्षाओं के लिए सच्चे रूप से तैयार करती है।
