अश्वमेधिक पर्व

अश्वमेधिक पर्व

युधिष्ठिर का अश्वमेध यज्ञ, अर्जुन की विजय-यात्रा, तथा उत्तरा-गर्भ में परीक्षित की रक्षा — श्रीकृष्ण द्वारा अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से बालक की सुरक्षा।

अध्याय 1

उत्तरा का मृत शिशु-प्रसव

भीष्म पितामह के उस गरिमामय प्राण-त्याग के कुछ काल पश्चात्, हस्तिनापुर में एक अत्यंत हृदयविदारक समाचार पहुँचा — अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा ने, अश्वत्थामा के उस भीषण ब्रह्मास्त्र के अवशिष्ट प्रभाव से, एक मृत शिशु को जन्म दिया।

सम्पूर्ण राजमहल, इस अत्यंत करुण समाचार से गहन शोक में डूब गया, क्योंकि यह शिशु, अभिमन्यु की एकमात्र संतान तथा कुरुवंश की अंतिम, एकमात्र आशा थी, जिसके माध्यम से इस विशाल राजवंश की परम्परा आगे बढ़नी थी।

उत्तरा, अपने पति अभिमन्यु की उस भीषण वीरगति के पश्चात्, अब अपनी इस संतान के मृत जन्म से, दोहरे शोक में डूब गई, तथा सम्पूर्ण पांडव-परिवार, इस अप्रत्याशित, विनाशकारी समाचार से स्तब्ध रह गया।

युधिष्ठिर तथा शेष पांडव, तत्काल श्रीकृष्ण को इस संकट की सूचना भेजते हुए, उनसे तत्काल सहायता की गुहार लगाने लगे, यह जानते हुए कि केवल स्वयं भगवान ही, इस असाधारण संकट का कोई समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं।

श्रीकृष्ण, यह समाचार सुनते ही, बिना किसी विलम्ब के, हस्तिनापुर की ओर प्रस्थान किया, यह भलीभाँति जानते हुए कि उन्होंने स्वयं, अश्वत्थामा के उस ब्रह्मास्त्र से इस बालक की रक्षा करने का दिव्य वचन दिया था।

इस अध्याय की शिक्षा

गहनतम संकट के क्षण में भी, दिए गए वचन को पूर्ण करने का दृढ़ संकल्प, नियति के प्रतिकूल प्रवाह को भी पलटने की शक्ति रखता है।

अध्याय 2

श्रीकृष्ण द्वारा परीक्षित का पुनर्जीवन

श्रीकृष्ण, हस्तिनापुर पहुँचकर, तत्काल उस मृत शिशु के समक्ष उपस्थित हुए, तथा सम्पूर्ण राजपरिवार तथा उपस्थित ऋषिगण, अत्यंत आशा और श्रद्धा के साथ, उनकी ओर देखने लगे, यह विश्वास करते हुए कि यदि कोई इस असम्भव कार्य को कर सकता है, तो वह केवल स्वयं भगवान ही हैं।

श्रीकृष्ण ने, अत्यंत गम्भीर, दिव्य स्वर में यह घोषणा की कि यदि उन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन में सदैव सत्य ही बोला हो, तथा यदि उन्होंने कभी भी युद्धभूमि से पलायन न किया हो, तो इसी सत्य के प्रभाव से, यह मृत शिशु पुनः जीवित हो उठे।

श्रीकृष्ण के इस दिव्य, सत्य-प्रधान वचन के उच्चारण के साथ ही, एक अद्भुत, चमत्कारिक दृश्य घटित हुआ — वह मृत शिशु, धीरे-धीरे हलचल करते हुए, पुनः जीवन के लक्षण दिखाने लगा, तथा शीघ्र ही, वह पूर्णतः जीवित होकर, रोने लगा।

सम्पूर्ण राजमहल में, इस असाधारण, चमत्कारिक पुनर्जीवन पर, अपार हर्ष और उल्लास की एक लहर दौड़ गई, तथा युधिष्ठिर तथा शेष पांडव, श्रीकृष्ण के प्रति गहन कृतज्ञता से अभिभूत हो गए।

इस बालक का नाम "परीक्षित" रखा गया, क्योंकि वह अपनी माता के गर्भ में ही, उस भीषण ब्रह्मास्त्र की अग्नि की "परीक्षा" में उत्तीर्ण हुआ था, तथा यही परीक्षित, आगे चलकर, कुरुवंश की सम्पूर्ण परम्परा को आगे बढ़ाने वाला था।

इस अध्याय की शिक्षा

सत्य की शक्ति, जब पूर्ण निष्ठा और विश्वास के साथ प्रयुक्त की जाए, तो वह मृत्यु के भी विरुद्ध, जीवन की विजय सुनिश्चित कर सकती है।

अध्याय 3

अश्वमेध यज्ञ का निश्चय

युधिष्ठिर, अपने इस विशाल साम्राज्य के पुनर्निर्माण तथा युद्ध में हुए उस भीषण नरसंहार के पापों के प्रायश्चित हेतु, महर्षि व्यास के परामर्श अनुसार, एक विशाल अश्वमेध यज्ञ के आयोजन का निश्चय किया, जो राजसूय के समान ही एक अत्यंत गरिमामय, महत्त्वपूर्ण यज्ञ माना जाता था।

व्यास जी ने युधिष्ठिर को यह समझाया कि यह यज्ञ, न केवल उनके राज्य की सार्वभौमिक सत्ता को पुनः स्थापित करेगा, अपितु यह युद्ध में हुए उस अपार रक्तपात के पापों का प्रायश्चित करने का भी एक अत्यंत प्रभावी, धार्मिक माध्यम सिद्ध होगा।

इस विशाल यज्ञ हेतु आवश्यक अपार धन-सम्पदा जुटाने के लिए, पांडवों ने, महर्षि व्यास के मार्गदर्शन में, हिमालय की उन गुफाओं की खोज की, जहाँ प्राचीन राजा मरुत्त का विशाल, संचित स्वर्ण-भंडार छिपा हुआ था।

यह अपार स्वर्ण-सम्पदा प्राप्त होने के पश्चात्, युधिष्ठिर ने, इस विशाल अश्वमेध यज्ञ की सम्पूर्ण तैयारियाँ आरम्भ करवाईं, तथा यज्ञ के नियमानुसार, एक श्वेत, दिव्य लक्षणों से युक्त अश्व को, स्वतंत्र रूप से भ्रमण हेतु छोड़ने का निश्चय किया।

अर्जुन को, इस पवित्र अश्व की रक्षा तथा उसके साथ सम्पूर्ण भारतवर्ष की विजय-यात्रा हेतु, प्रमुख सेनापति के रूप में नियुक्त किया गया, तथा वे अपनी विशाल सेना सहित, इस अश्व के पीछे-पीछे प्रस्थान कर गए।

इस अध्याय की शिक्षा

विजय के पश्चात् का सच्चा प्रायश्चित, केवल पश्चाताप में नहीं, अपितु धर्मपूर्ण, कल्याणकारी कर्मों द्वारा उस पाप के निवारण में निहित होता है।

अध्याय 4

अर्जुन की विजय-यात्रा का आरम्भ

वह दिव्य अश्व, स्वतंत्र रूप से सम्पूर्ण भारतवर्ष में भ्रमण करते हुए, अनेक राज्यों की सीमाओं में प्रवेश करने लगा, तथा अर्जुन, अपनी विशाल सेना के साथ, उसकी रक्षा करते हुए, उसके पीछे-पीछे चलते रहे।

यज्ञ के नियमानुसार, जो भी राजा इस अश्व को बिना किसी प्रतिरोध के अपने राज्य से गुजरने देता, वह युधिष्ठिर की सार्वभौमिक सत्ता को स्वीकार करता हुआ माना जाता, किंतु जो कोई भी इस अश्व को बंदी बना लेता, उसे अर्जुन के साथ युद्ध करना पड़ता।

अर्जुन ने, इस दीर्घकालिक यात्रा के दौरान, अनेक राज्यों तथा राजाओं का सामना किया, तथा अनेक स्थानों पर, उन्हें अत्यंत भीषण, कठिन युद्धों का भी सामना करना पड़ा, जिनमें से प्रत्येक ने उनके पराक्रम और कौशल की गहन परीक्षा ली।

त्रिगर्त, प्राग्ज्योतिष तथा अन्य अनेक राज्यों में, अर्जुन को कई बार अत्यंत कठिन प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, किंतु उन्होंने अपने असाधारण पराक्रम तथा दिव्य अस्त्रों के बल पर, प्रत्येक चुनौती पर विजय प्राप्त की।

इस प्रकार, अर्जुन की यह विजय-यात्रा, धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारतवर्ष में युधिष्ठिर की सार्वभौमिक सत्ता को स्थापित करते हुए, आगे बढ़ती रही, यद्यपि इस यात्रा में, उन्हें अभी भी एक अत्यंत अप्रत्याशित, हृदयस्पर्शी चुनौती का सामना करना शेष था।

इस अध्याय की शिक्षा

किसी भी विजय-यात्रा में, सर्वाधिक कठिन परीक्षा, अक्सर उस स्थान पर प्रतीक्षा करती है जहाँ उसकी सबसे कम आशंका होती है।

अध्याय 5

मणिपुर में बभ्रुवाहन से भेंट

यह दिव्य अश्व, भ्रमण करते हुए, अंततः मणिपुर राज्य की सीमा में प्रवेश किया, जहाँ अर्जुन के अपने ही पुत्र — बभ्रुवाहन — जो चित्रांगदा के गर्भ से जन्मे थे, तथा जिन्हें अर्जुन ने अपने वनवास-काल में, वर्षों पूर्व जन्म दिया था, अब राजा के रूप में शासन कर रहे थे।

बभ्रुवाहन, अपने पिता अर्जुन के इस अचानक आगमन से अत्यंत हर्षित होकर, उन्हें भावभीने स्वागत के साथ अपने राज्य में आमंत्रित किया, तथा अत्यंत विनम्रता से उनके चरण स्पर्श कर, उन्हें प्रणाम किया।

किंतु अर्जुन, बभ्रुवाहन के इस अत्यंत सरल, विनम्र स्वागत से असंतुष्ट होकर, उन्हें यह कटु उलाहना दिया कि एक सच्चे क्षत्रिय को, अपने पिता का इस प्रकार सरलता से आदर करने के स्थान पर, यज्ञ के नियमानुसार, उस अश्व को रोककर, युद्ध की चुनौती देनी चाहिए थी।

अर्जुन के इस अप्रत्याशित उलाहने से आहत होकर, तथा नागकन्या उलूपी, जो अर्जुन की एक अन्य पत्नी थी और गुप्त रूप से वहाँ उपस्थित थी, के गुप्त उकसावे से, बभ्रुवाहन ने अंततः अपने ही पिता को युद्ध की चुनौती देने का अत्यंत कठिन, हृदयविदारक निर्णय लिया।

इस प्रकार, पिता और पुत्र के मध्य, एक ऐसे अत्यंत असाधारण, मार्मिक युद्ध की पृष्ठभूमि रची गई, जिसमें एक ओर पितृ-धर्म, तथा दूसरी ओर क्षत्रिय-धर्म, दोनों ही आपस में एक गहन द्वंद्व में उलझे हुए थे।

इस अध्याय की शिक्षा

कभी-कभी, धर्म का पालन करने की चाह में, मनुष्य को अपने ही सबसे प्रिय सम्बन्धों के विरुद्ध भी खड़ा होना पड़ सकता है।

अध्याय 6

पिता-पुत्र का भीषण युद्ध एवं अर्जुन की मृत्यु

अर्जुन और बभ्रुवाहन के मध्य आरम्भ हुआ यह द्वंद्व-युद्ध, अत्यंत भीषण तथा असाधारण कौशलपूर्ण सिद्ध हुआ, बभ्रुवाहन, जो अपने पिता से ही धनुर्विद्या में शिक्षित था, उतना ही असाधारण पराक्रम प्रदर्शित करने लगा जितना स्वयं अर्जुन।

इस अत्यंत आश्चर्यजनक, अप्रत्याशित युद्ध में, बभ्रुवाहन ने, अपने असाधारण कौशल का प्रदर्शन करते हुए, एक अत्यंत शक्तिशाली बाण से, स्वयं अपने ही पिता अर्जुन को मूर्च्छित कर, उन्हें युद्धभूमि में गिरा दिया, तथा अर्जुन के प्राण-पखेरू उड़ गए।

बभ्रुवाहन, अपने ही पिता को इस प्रकार अपने हाथों मृत देखकर, गहन शोक और असहनीय पश्चाताप से टूट पड़ा, तथा वह स्वयं भी अपने प्राण त्यागने का विचार करने लगा, यह मानते हुए कि उसने अपने ही पिता की हत्या का घोर पाप किया है।

इसी अत्यंत विकट, हृदयविदारक क्षण में, नागकन्या उलूपी, जो इस सम्पूर्ण घटनाक्रम की मूक साक्षी थी, अंततः वहाँ प्रकट हुई, तथा उसने बभ्रुवाहन को यह गूढ़ रहस्य बताया कि इस युद्ध का यह अंत, वास्तव में, अर्जुन के अतीत में किए गए एक विशेष पाप के प्रायश्चित हेतु ही पूर्वनिर्धारित था।

उलूपी ने बभ्रुवाहन को यह भी बताया कि नागलोक में स्थित एक विशेष, दिव्य मणि के प्रयोग से, अर्जुन को पुनः जीवित किया जा सकता है, तथा उसने स्वयं ही, अपनी दिव्य शक्ति से, वह मणि प्राप्त कर, अर्जुन के प्राणों को पुनः लौटाने की व्यवस्था की।

इस अध्याय की शिक्षा

अतीत के अनजाने पापों का प्रायश्चित, कभी-कभी नियति द्वारा, सबसे अप्रत्याशित तथा मार्मिक परिस्थितियों में करवाया जाता है।

अध्याय 7

अर्जुन का पुनर्जीवन

उलूपी, अपनी उस दिव्य नाग-मणि की असाधारण शक्ति का प्रयोग करते हुए, अर्जुन के निष्प्राण शरीर पर उसे स्पर्श कराया, तथा अत्यंत शीघ्रता से, अर्जुन के प्राण पुनः उनके शरीर में लौट आए, तथा वे धीरे-धीरे पुनः चेतन अवस्था में आने लगे।

बभ्रुवाहन तथा चित्रांगदा, अर्जुन के इस अद्भुत, चमत्कारिक पुनर्जीवन को देखकर, अपार हर्ष और राहत से अभिभूत हो गए, तथा बभ्रुवाहन ने, अपने पिता के चरणों में गिरकर, अपने इस अनजाने कृत्य के लिए बारम्बार क्षमा-याचना की।

अर्जुन, अपने पुत्र की इस असाधारण वीरता तथा उलूपी के इस गूढ़ रहस्योद्घाटन को समझते हुए, बभ्रुवाहन को स्नेहपूर्वक गले लगाकर, उसे इस पूर्वनिर्धारित घटनाक्रम के लिए पूर्णतः क्षमा प्रदान की, तथा उसकी असाधारण वीरता की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

यह घटना, अर्जुन को यह गहन शिक्षा दे गई कि जीवन में किए गए प्रत्येक कर्म का फल, चाहे वह कितने भी विलम्ब से क्यों न मिले, अंततः किसी न किसी रूप में अवश्य प्राप्त होता है, तथा नियति के इस विधान से बचना असम्भव है।

इसके पश्चात्, बभ्रुवाहन ने भी, यज्ञ के अश्व को सम्मानपूर्वक आगे बढ़ने देते हुए, युधिष्ठिर की सार्वभौमिक सत्ता को स्वीकार किया, तथा अर्जुन, अपनी इस असाधारण, मार्मिक यात्रा को आगे जारी रखते हुए, अन्य राज्यों की ओर प्रस्थान कर गए।

इस अध्याय की शिक्षा

जीवन में किए गए प्रत्येक कर्म का फल, चाहे वह कितने भी विलम्ब से क्यों न मिले, नियति के विधान से बचना असम्भव है।

अध्याय 8

यात्रा का समापन एवं हस्तिनापुर वापसी

अर्जुन, अपनी इस दीर्घकालिक, घटनापूर्ण विजय-यात्रा को आगे जारी रखते हुए, सम्पूर्ण भारतवर्ष के शेष अनेक राज्यों में भी, उस दिव्य अश्व के साथ भ्रमण करते रहे, तथा अधिकांश राजाओं ने, अर्जुन के असाधारण पराक्रम की ख्याति सुनकर, बिना किसी प्रतिरोध के ही, युधिष्ठिर की सत्ता स्वीकार कर ली।

इस दीर्घकालिक यात्रा के दौरान, अर्जुन ने अनेक नए, रोचक अनुभव प्राप्त किए, तथा अनेक राज्यों की समृद्ध संस्कृति और परम्पराओं से भी परिचित हुए, जिससे उनकी दृष्टि और भी अधिक व्यापक तथा प्रौढ़ हुई।

अंततः, यह वर्षभर की दीर्घकालिक यात्रा पूर्ण होने पर, वह दिव्य अश्व, अपनी सम्पूर्ण भारतवर्ष की इस असाधारण परिक्रमा के पश्चात्, सकुशल हस्तिनापुर लौट आया, तथा अर्जुन भी, अपनी इस विजय-यात्रा की सफल समाप्ति के साथ, हस्तिनापुर पहुँचे।

युधिष्ठिर तथा सम्पूर्ण हस्तिनापुर, अर्जुन की इस असाधारण, ऐतिहासिक विजय-यात्रा की सफल समाप्ति पर, अपार हर्ष और उल्लास के साथ, उनका भव्य स्वागत करने लगे, तथा अब अश्वमेध यज्ञ की अंतिम, विधिवत तैयारियाँ आरम्भ हो गईं।

सम्पूर्ण भारतवर्ष के अनेक राजा, इस विशाल यज्ञ में सम्मिलित होने हेतु, हस्तिनापुर की ओर आमंत्रित किए गए, तथा सम्पूर्ण नगरी, इस भव्य, ऐतिहासिक आयोजन की तैयारियों में, अत्यंत उत्साह के साथ जुट गई।

इस अध्याय की शिक्षा

एक दीर्घकालिक, कठिन यात्रा की सच्ची सफलता, केवल उसके अंतिम गंतव्य में नहीं, अपितु उस मार्ग में प्राप्त हुए अनुभवों और ज्ञान में भी निहित होती है।

अध्याय 9

अश्वमेध यज्ञ का भव्य आयोजन

हस्तिनापुर में, अंततः वह भव्य, ऐतिहासिक अश्वमेध यज्ञ का आयोजन आरम्भ हुआ, जिसमें सम्पूर्ण भारतवर्ष के अनेक राजा, ऋषि-मुनि तथा असंख्य प्रजाजन, अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ सम्मिलित हुए।

युधिष्ठिर तथा द्रौपदी, इस विशाल यज्ञ के मुख्य यजमान के रूप में, विधिवत रीति से इस यज्ञ का संचालन करते रहे, तथा महर्षि व्यास सहित अनेक विद्वान ऋषिगण, इस यज्ञ की समुचित, शास्त्रोक्त विधि का पूर्ण निर्वहन करवाते रहे।

इस यज्ञ में, अपार मात्रा में स्वर्ण, वस्त्र, गौएँ तथा अन्य बहुमूल्य वस्तुएँ, ब्राह्मणों तथा निर्धनों को दान में दी गईं, तथा सम्पूर्ण हस्तिनापुर, इस भव्य, उदार आयोजन से, अत्यंत हर्षित और समृद्ध हुआ।

श्रीकृष्ण, इस सम्पूर्ण यज्ञ के दौरान, युधिष्ठिर तथा पांडवों के साथ उपस्थित रहे, तथा उन्होंने इस अवसर पर, धर्म तथा यज्ञ के महत्त्व के विषय में, कुछ गहन, मार्मिक उपदेश भी दिए।

यह अश्वमेध यज्ञ, युधिष्ठिर की सार्वभौमिक सत्ता तथा उनके धर्मनिष्ठ शासन की, सम्पूर्ण भारतवर्ष में एक भव्य, अंतिम घोषणा सिद्ध हुआ, जिसने युद्ध के पश्चात् की उस अशांति और शोक को, धीरे-धीरे शांति और समृद्धि में परिवर्तित करना आरम्भ किया।

इस अध्याय की शिक्षा

एक भव्य, उदार यज्ञ की सच्ची सफलता, उसमें सम्मिलित होने वाले असंख्य निर्धनों और प्रजाजनों के कल्याण में ही निहित होती है।

अध्याय 10

स्वर्णिम नेवले की कथा

इस भव्य यज्ञ के अंतिम, समापन दिवस पर, एक अत्यंत विचित्र, अद्भुत घटना घटित हुई — एक नेवला, जिसका आधा शरीर स्वर्णिम रंग का था, यज्ञ-स्थल पर अचानक प्रकट हुआ, तथा वह यज्ञ की उस पवित्र भूमि पर लोटने लगा।

उस नेवले ने, सम्पूर्ण उपस्थित जनसमूह को अत्यंत आश्चर्यचकित करते हुए, यह घोषणा की कि यह विशाल, अपार सम्पत्ति से युक्त अश्वमेध यज्ञ भी, एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण परिवार द्वारा, अकाल के समय, अपने स्वयं के अंतिम अन्न का त्याग कर किए गए, उस छोटे से दान के बराबर भी पुण्य अर्जित नहीं कर सका।

उस नेवले ने यह कथा सुनाई कि किस प्रकार, एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण परिवार ने, भीषण अकाल के समय, अपने स्वयं के प्राणों की चिंता किए बिना, अपना अंतिम, एकमात्र भोजन, एक भूखे अतिथि को दान कर दिया, तथा इस असाधारण त्याग के प्रभाव से, उस नेवले का आधा शरीर स्वर्णिम हो गया था।

उस नेवले ने यह भी बताया कि वह, तब से ही, सम्पूर्ण संसार में घूम-घूमकर, यह खोज रहा है कि क्या कोई भी अन्य यज्ञ अथवा दान, उस निर्धन परिवार के इस निःस्वार्थ त्याग के समतुल्य पुण्य अर्जित कर सकता है, किंतु अभी तक उसे ऐसा कोई भी यज्ञ नहीं मिला।

यह अद्भुत कथा सुनकर, युधिष्ठिर सहित सम्पूर्ण उपस्थित जनसमूह, गहन आश्चर्य और आत्म-मंथन में डूब गया, तथा इस घटना ने यह शाश्वत सत्य पुनः स्थापित किया कि सच्चे त्याग और निःस्वार्थ दान का मूल्य, किसी भी भव्य, विशाल आयोजन से कहीं अधिक श्रेष्ठ होता है।

इस अध्याय की शिक्षा

एक निर्धन व्यक्ति का निःस्वार्थ, प्राणपण त्याग, किसी भी धनी व्यक्ति के विशालतम, भव्यतम आयोजन से भी कहीं अधिक श्रेष्ठ पुण्य अर्जित करता है।

अध्याय 11

अश्वमेधिक पर्व का समापन

उस स्वर्णिम नेवले के इस अद्भुत, मार्मिक उपदेश के पश्चात्, वह नेवला, सम्पूर्ण उपस्थित जनसमूह को स्तब्ध छोड़ते हुए, वहाँ से अंतर्ध्यान हो गया, तथा यह घटना, इस भव्य यज्ञ की समाप्ति पर, एक अत्यंत गहन, विचारोत्तेजक स्मृति के रूप में सदा के लिए अंकित हो गई।

युधिष्ठिर, इस सम्पूर्ण घटनाक्रम से, विनम्रता की एक अत्यंत गहन शिक्षा प्राप्त करते हुए, यह अनुभव करने लगे कि चाहे कितने भी भव्य, विशाल यज्ञ और दान क्यों न किए जाएँ, सच्चे धर्म का मूल, सदैव हृदय की शुद्धता और निःस्वार्थता में ही निहित रहता है।

इस अश्वमेध यज्ञ की सफल समाप्ति के साथ, युधिष्ठिर की सार्वभौमिक सत्ता, सम्पूर्ण भारतवर्ष में सुदृढ़ रूप से स्थापित हो गई, तथा उनका राज्य, धीरे-धीरे शांति, समृद्धि तथा पुनर्निर्माण की ओर अग्रसर होने लगा।

परीक्षित, इस दौरान, अपने राजमहल में, कुरुवंश की भावी आशा के रूप में, धीरे-धीरे बड़े होते रहे, तथा सम्पूर्ण पांडव-परिवार, इस बालक में, अपने भविष्य की एक नई, उज्ज्वल किरण देखने लगा।

इस प्रकार अश्वमेधिक पर्व, परीक्षित के उस चमत्कारिक पुनर्जीवन, अर्जुन की उस विजय-यात्रा तथा बभ्रुवाहन के साथ हुए उस मार्मिक युद्ध, तथा अंततः उस भव्य अश्वमेध यज्ञ के साथ अपने समापन पर पहुँचता है, अगले आश्रमवासिक पर्व में, धृतराष्ट्र, गांधारी तथा कुंती के वानप्रस्थ-गमन की कथा वर्णित की जाएगी।

इस अध्याय की शिक्षा

सच्चा धर्म, भव्य आयोजनों के प्रदर्शन में नहीं, अपितु हृदय की उस शुद्ध, निःस्वार्थ विनम्रता में निहित होता है, जो प्रत्येक बड़ी उपलब्धि के पश्चात् भी बनी रहनी चाहिए।