द्रोण पर्व

द्रोण पर्व

आचार्य द्रोण का सेनापतित्व, अभिमन्यु का चक्रव्यूह में वीरगति, जयद्रथ वध की प्रतिज्ञा तथा अश्वत्थामा के मिथ्या समाचार से द्रोणाचार्य का अंत।

अध्याय 1

द्रोणाचार्य का सेनापति-पद ग्रहण

भीष्म पितामह के शरशय्या पर पतन के पश्चात्, कौरव-सेना में एक गहन शोक और अस्थिरता व्याप्त हो गई, दुर्योधन, अपने प्रथम सेनापति की इस असाधारण क्षति से गहराई से व्यथित होते हुए भी, तत्काल यह निश्चय करने को विवश हुआ कि आगे सेना का नेतृत्व अब किसे सौंपा जाए, ताकि युद्ध की गति और मनोबल किसी भी प्रकार क्षीण न हो।

दुर्योधन ने, अत्यंत विनम्रता और श्रद्धा के साथ, अपने आचार्य द्रोणाचार्य के समक्ष उपस्थित होकर, उनसे कौरव-सेना के द्वितीय सेनापति का पद ग्रहण करने का अनुरोध किया, यह जानते हुए कि द्रोण, अपने असाधारण अस्त्र-ज्ञान और युद्ध-कौशल के कारण, इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण दायित्व के सर्वाधिक योग्य पात्र हैं।

द्रोणाचार्य, यद्यपि अपने ही प्रिय शिष्यों — पांडवों, विशेष रूप से अर्जुन — के विरुद्ध युद्ध करने की इस असहनीय विवशता से गहन आंतरिक वेदना का अनुभव कर रहे थे, फिर भी अपने कर्तव्य और हस्तिनापुर के प्रति अपनी निष्ठा को सर्वोपरि मानते हुए, इस सेनापति-पद को स्वीकार किया।

द्रोण ने दुर्योधन को यह स्पष्ट आश्वासन दिया कि वे अपनी पूर्ण शक्ति और कौशल से युद्ध करेंगे, तथा उन्होंने एक असाधारण, महत्त्वाकांक्षी प्रतिज्ञा भी ली — कि वे युधिष्ठिर को जीवित बंदी बनाकर लाएँगे, यह विश्वास करते हुए कि यदि युधिष्ठिर को बंदी बना लिया जाए, तो सम्पूर्ण पांडव-सेना का मनोबल पूर्णतः टूट जाएगा, तथा युद्ध शीघ्र ही कौरवों के पक्ष में समाप्त हो सकता है।

इस प्रकार, द्रोणाचार्य, कौरव-सेना के द्वितीय सेनापति के रूप में, उस भीषण, अत्यंत घटनापूर्ण संघर्ष का नेतृत्व करने के लिए अग्रसर हुए, जो आगे चलकर, अभिमन्यु की हृदयविदारक वीरगति सहित, इस महासंग्राम के सबसे मार्मिक, सबसे निर्णायक अध्यायों में से एक बनने वाला था।

इस अध्याय की शिक्षा

कर्तव्य और स्नेह के मध्य फँसा हुआ व्यक्ति भी, यदि उसने अपना मार्ग चुन लिया है, तो उसे पूर्ण निष्ठा के साथ निभाने का प्रयास करता है, चाहे यह उसके हृदय पर कितना भी भारी क्यों न हो।

अध्याय 2

द्रोण की युधिष्ठिर को बंदी बनाने की प्रतिज्ञा

जब पांडव-शिविर में यह समाचार पहुँचा कि द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को जीवित बंदी बनाने की प्रतिज्ञा ली है, समस्त पांडव तथा उनके मित्र-राजा गहन चिंता में डूब गए, अर्जुन, विशेष रूप से, अपने ज्येष्ठ भ्राता की सुरक्षा के प्रति अत्यंत सजग और चिंतित हो उठे।

श्रीकृष्ण ने इस गंभीर संकट का समाधान सुझाते हुए कहा कि यदि अर्जुन सदैव युधिष्ठिर के निकट, उनकी प्रत्यक्ष सुरक्षा में उपस्थित रहें, तो द्रोण, चाहे कितने भी शक्तिशाली और कुशल क्यों न हों, युधिष्ठिर तक पहुँचने में कदापि सफल नहीं हो सकते, क्योंकि अर्जुन का पराक्रम स्वयं द्रोण से भी अधिक तीव्र और असाधारण था।

युधिष्ठिर ने भी अपनी सुरक्षा को सुदृढ़ करने हेतु, अपने चारों ओर अत्यंत कुशल, अनुभवी योद्धाओं की एक विशेष सुरक्षा-व्यवस्था स्थापित की, यह सुनिश्चित करते हुए कि द्रोण की यह महत्त्वाकांक्षी योजना किसी भी परिस्थिति में सफल न हो सके।

यह जानते हुए कि जब तक अर्जुन युधिष्ठिर के निकट रहेंगे, उनकी यह प्रतिज्ञा पूर्ण नहीं हो सकती, दुर्योधन तथा शकुनि ने एक अत्यंत कुटिल, चतुर योजना रची — त्रिगर्त देश के संशप्तक योद्धाओं के माध्यम से, अर्जुन को युद्धभूमि के किसी दूरस्थ भाग में, एक पृथक्, दीर्घकालिक संघर्ष में उलझाकर, युधिष्ठिर से दूर ले जाना।

यह योजना, अत्यंत सुनियोजित होते हुए भी, आगे चलकर सम्पूर्ण महासंग्राम के सबसे हृदयविदारक, सबसे मार्मिक घटनाक्रम की पृष्ठभूमि बनने वाली थी, क्योंकि अर्जुन की इस अनुपस्थिति में ही, उनके प्रिय पुत्र अभिमन्यु को द्रोण की उस दुर्भेद्य चक्रव्यूह-रचना का सामना करना पड़ने वाला था।

इस अध्याय की शिक्षा

किसी एक चुनौती से निपटने की सुदृढ़ योजना भी, यदि शत्रु अत्यंत कुटिल हो, किसी और, अप्रत्याशित दिशा से एक नए, अधिक गहन संकट को जन्म दे सकती है।

अध्याय 3

संशप्तकों का छल — अर्जुन को दूर ले जाना

त्रिगर्त-नरेश सुशर्मा तथा उसके भाइयों ने, दुर्योधन के इस अनुरोध पर, एक विशेष, अत्यंत गंभीर प्रतिज्ञा ली, जिसके कारण वे "संशप्तक" (मृत्यु-प्रतिज्ञ योद्धा) कहलाए — कि वे या तो अर्जुन का अंत करेंगे, अथवा स्वयं युद्धभूमि में अपने प्राणों की आहुति देंगे, वे कदापि युद्धभूमि से पलायन नहीं करेंगे।

इस अत्यंत गंभीर, आत्मघाती चुनौती को स्वीकार करना, अर्जुन के लिए, अपने क्षत्रिय-धर्म के अनुसार, अनिवार्य था, अतः जब संशप्तकों ने उन्हें युद्धभूमि के दक्षिणी भाग में द्वंद्व हेतु ललकारा, अर्जुन, श्रीकृष्ण के सारथ्य में, अपने भाई युधिष्ठिर की सुरक्षा को अन्य योद्धाओं पर छोड़कर, इस चुनौती का सामना करने वहाँ प्रस्थान करने को विवश हुए।

अर्जुन, यह भलीभाँति जानते हुए भी कि यह एक सुनियोजित, कूटनीतिक चाल है जिसका उद्देश्य उन्हें मुख्य युद्धभूमि से दूर ले जाना है, फिर भी अपने धर्म और वचन के अनुसार, इस द्वंद्व को स्वीकार किए बिना नहीं रह सके, उन्होंने संशप्तकों की विशाल सेना के विरुद्ध एक अत्यंत भीषण, दीर्घकालिक संघर्ष आरम्भ किया।

यह संघर्ष इतना तीव्र और व्यापक था कि अर्जुन को अपनी सम्पूर्ण शक्ति और असाधारण कौशल का उपयोग करना पड़ा, वे संशप्तकों की इस विशाल सेना को क्रमशः परास्त करते रहे, यद्यपि उनकी अटूट प्रतिज्ञा के कारण, वे बार-बार, नए उत्साह के साथ पुनः संघर्ष हेतु उठ खड़े होते रहे।

इसी दीर्घकालिक, अत्यंत माँग करने वाले संघर्ष के मध्य, मुख्य युद्धभूमि में, द्रोणाचार्य ने अपनी वह असाधारण, दुर्भेद्य चक्रव्यूह-रचना आरम्भ की, जिसका सामना करने के लिए, दुर्भाग्यवश, पांडव-सेना के पास, अर्जुन की अनुपस्थिति में, कोई भी पूर्णतः सक्षम योद्धा उपस्थित नहीं था, सिवाय एक अत्यंत युवा, साहसी राजकुमार के।

इस अध्याय की शिक्षा

अपने दिए गए वचन और धर्म का पालन करना, चाहे यह किसी सुनियोजित, कूटनीतिक चाल का ही हिस्सा क्यों न हो, एक सच्चे योद्धा के लिए सदैव अनिवार्य होता है।

अध्याय 4

चक्रव्यूह की रचना

द्रोणाचार्य ने, अपनी असाधारण सामरिक प्रतिभा का प्रयोग करते हुए, एक अत्यंत जटिल, बहुस्तरीय सैन्य-व्यूह रचा, जिसे "चक्रव्यूह" कहा जाता है, यह व्यूह एक चक्र के समान संकेंद्रित परतों में सुसज्जित था, जिसके मध्य में स्वयं दुर्योधन और अन्य प्रमुख कौरव-योद्धा सुरक्षित स्थित थे।

यह चक्रव्यूह इतना जटिल और दुर्भेद्य था कि इसे भेदकर मध्य तक पहुँचने की विधि, उस समय, पांडव-पक्ष में केवल अर्जुन तथा स्वयं श्रीकृष्ण ही जानते थे, तथा दुर्भाग्यवश, इस दिन, अर्जुन को संशप्तकों के साथ एक पृथक् संघर्ष में उलझाकर, मुख्य युद्धभूमि से दूर कर दिया गया था।

युधिष्ठिर तथा शेष पांडव, इस दुर्भेद्य चक्रव्यूह को देखकर गहन चिंता में डूब गए, तभी अभिमन्यु, अर्जुन तथा सुभद्रा के अत्यंत तेजस्वी, वीर पुत्र, ने आगे बढ़कर यह घोषणा की कि उसने अपनी माता के गर्भ में रहते हुए ही, अपने पिता से इस चक्रव्यूह में प्रवेश करने की विधि सुनी थी, अतः वह इसमें प्रवेश कर सकता है।

किंतु अभिमन्यु ने यह भी स्पष्ट किया कि उस समय, गर्भावस्था के दौरान, जब उसकी माता निद्रा में चली गई थीं, वह इस व्यूह से बाहर निकलने की विधि नहीं सुन सका था, अतः वह केवल प्रवेश कर सकता है, बाहर निकलने में असमर्थ रहेगा, यह एक अत्यंत गंभीर, जोखिमपूर्ण सीमा थी।

युधिष्ठिर तथा अन्य पांडवों ने, इस गंभीर सीमा को जानते हुए भी, अभिमन्यु को यह वचन दिया कि वे सभी उसके ठीक पीछे-पीछे इस व्यूह में प्रवेश करेंगे, तथा जैसे ही वह इसे भेदेगा, वे उसका अनुसरण कर, उसकी पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे, इस आश्वासन के साथ, अभिमन्यु ने इस असाधारण, साहसिक कार्य को स्वीकार किया।

इस अध्याय की शिक्षा

आधा-अधूरा ज्ञान भी, यदि साहस के साथ प्रयोग किया जाए, असाधारण वीरता का प्रदर्शन कर सकता है, किंतु उचित सुरक्षा-व्यवस्था के बिना, यह अत्यंत जोखिमपूर्ण भी सिद्ध हो सकता है।

अध्याय 5

अभिमन्यु का चक्रव्यूह-प्रवेश

अभिमन्यु, अपने पिता अर्जुन के समान ही असाधारण धनुर्विद्या-कौशल और साहस के साथ, उस दुर्भेद्य चक्रव्यूह में प्रवेश किया, तथा अपने असाधारण पराक्रम से, व्यूह की पहली परतों को भेदते हुए, अनेक शक्तिशाली कौरव-योद्धाओं को परास्त करना आरम्भ किया।

उसका यह पराक्रम इतना असाधारण था कि द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, अश्वत्थामा तथा अन्य महारथी भी, इस युवा राजकुमार के समक्ष क्षण भर के लिए स्तब्ध रह गए, वह इतनी तीव्रता और कुशलता से आगे बढ़ रहा था कि ऐसा प्रतीत होता था मानो स्वयं अर्जुन ही युद्ध कर रहे हों।

किंतु ठीक उसी क्षण, सिंधु-नरेश जयद्रथ, जिसे पूर्व में वन पर्व में द्रौपदी-हरण के प्रयास में पांडवों से घोर अपमान सहना पड़ा था, तथा जिसने इस अपमान का प्रतिशोध लेने हेतु शिव की कठोर तपस्या कर एक विशेष वरदान प्राप्त किया था, उस व्यूह के द्वार पर आ डटा।

जयद्रथ को शिव से यह वरदान प्राप्त था कि वह एक दिन के लिए, अर्जुन के अतिरिक्त, शेष चारों पांडवों को अकेले ही रोकने में सक्षम होगा, इस वरदान का प्रयोग करते हुए, जयद्रथ ने युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव को व्यूह के द्वार पर ही रोक दिया, उन्हें अभिमन्यु का अनुसरण करने से पूर्णतः वंचित करते हुए।

इस प्रकार, अभिमन्यु, अपने वचन के बावजूद अपने चाचाओं की सहायता से वंचित होकर, उस दुर्भेद्य चक्रव्यूह के भीतर, अकेला, समस्त कौरव-महारथियों के मध्य, पूर्णतः घिरा हुआ रह गया, यह वह अत्यंत गंभीर, हृदयविदारक स्थिति थी जो आगे इस महाकाव्य की सबसे मार्मिक गाथाओं में से एक की पृष्ठभूमि बनी।

इस अध्याय की शिक्षा

सबसे सुदृढ़ योजना भी, यदि किसी एक अप्रत्याशित बाधा के कारण असफल हो जाए, एक साहसी आत्मा को पूर्णतः अकेला, असाधारण संकट में छोड़ सकती है।

अध्याय 6

अभिमन्यु का असाधारण पराक्रम

अकेले होते हुए भी, अभिमन्यु ने तनिक भी भय या दुर्बलता प्रदर्शित नहीं की, अपितु उसने समस्त उपस्थित कौरव-महारथियों — द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कर्ण, दुःशासन तथा स्वयं दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण सहित अनेकों — का, एक साथ, अत्यंत असाधारण साहस और कौशल के साथ सामना किया।

उसने अपने पराक्रम से द्रोणाचार्य के रथ को भी कई बार पीछे धकेला, तथा कर्ण के कवच को भी अपने बाणों से भेदने में सफलता प्राप्त की, यह देखकर स्वयं द्रोणाचार्य ने भी, इस युवा राजकुमार की असाधारण प्रतिभा की भूरि-भूरि प्रशंसा की, यह स्वीकार करते हुए कि वह वास्तव में अपने पिता अर्जुन के योग्य उत्तराधिकारी है।

किंतु समस्त कौरव-महारथी, अकेले, इस असाधारण किंतु अकेले युवा योद्धा के समक्ष अपनी बार-बार की पराजय से क्षुब्ध होकर, अंततः धर्मयुद्ध के समस्त स्थापित नियमों की खुली अवहेलना करते हुए, एक साथ, सामूहिक रूप से अभिमन्यु पर आक्रमण करने का अत्यंत अनुचित, अधर्मपूर्ण निर्णय लिया।

कर्ण ने, द्रोणाचार्य के परामर्श पर, पीछे से अभिमन्यु के धनुष की प्रत्यंचा को काट दिया, तथा अन्य योद्धाओं ने, एक साथ मिलकर, उसके रथ, अश्वों और सारथी को नष्ट कर दिया, अभिमन्यु, इस प्रकार निःशस्त्र होकर भी, रथ के एक पहिये को ही अपना शस्त्र बनाकर, अद्भुत साहस के साथ संघर्ष करता रहा।

यह दृश्य, एक अकेले, निःशस्त्र युवा योद्धा का, छह-सात महारथियों के विरुद्ध, एक साथ, अंतिम साँस तक संघर्ष करना, इस सम्पूर्ण महासंग्राम के सबसे वीरतापूर्ण, किंतु सबसे अन्यायपूर्ण क्षणों में से एक बनने वाला था, जिसे स्वयं देवताओं ने भी आकाश से गहन वेदना के साथ देखा।

इस अध्याय की शिक्षा

एक अकेला योद्धा भी, यदि उसका साहस असाधारण हो, कई महारथियों को भी चुनौती दे सकता है, किंतु जब न्याय के नियमों का ही उल्लंघन हो, तो साहस अकेला पर्याप्त नहीं होता।

अध्याय 7

अभिमन्यु की वीरगति

अंततः, दुःशासन के पुत्र ने, गदा-युद्ध में, निःशस्त्र और अत्यंत थके हुए अभिमन्यु पर पीछे से भीषण प्रहार किया, इस अन्यायपूर्ण, बहु-योद्धा आक्रमण के समक्ष, वह असाधारण, वीर युवा राजकुमार, अंततः अपने प्राणों की आहुति देते हुए, युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुआ।

अभिमन्यु की यह वीरगति, दोनों ही पक्षों के लिए एक असहनीय आघात सिद्ध हुई, कौरव-सेना में भी अनेक योद्धा, विशेष रूप से जिन्होंने उसके इस असाधारण साहस को प्रत्यक्ष देखा था, गहन शोक और अपने ही किए पर आत्म-ग्लानि अनुभव करने लगे, यह जानते हुए कि यह विजय किसी भी प्रकार सम्मानजनक नहीं थी।

जब सूर्यास्त के पश्चात्, युद्धविराम की घोषणा हुई, तथा अर्जुन, संशप्तकों के साथ अपने दीर्घकालिक संघर्ष को विजयी होकर समाप्त कर, अपने शिविर लौटे, उन्हें अपने प्रिय पुत्र की इस हृदयविदारक वीरगति का समाचार मिला, यह उनके जीवन का सबसे गहन, सबसे असहनीय शोक का क्षण बना।

अर्जुन, अपने पुत्र के इस अन्यायपूर्ण, बहु-योद्धा आक्रमण द्वारा हुए अंत को सुनकर, गहन क्रोध और असहनीय वेदना से भर उठे, उन्होंने विशेष रूप से यह जानकर कि जयद्रथ ने ही शेष पांडवों को अभिमन्यु की सहायता करने से रोका था, अपने हृदय में जयद्रथ के प्रति एक असाधारण, भीषण प्रतिशोध की भावना का अनुभव किया।

इसी रात्रि, अर्जुन ने, अपने पुत्र की चिता के समक्ष, अपने अश्रुपूरित नेत्रों से, अत्यंत गंभीर, अपरिवर्तनीय प्रतिज्ञा ली — कि वे अगले ही दिन, सूर्यास्त से पूर्व, जयद्रथ का अंत करेंगे, अन्यथा वे स्वयं जीवित अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राणों की आहुति देंगे, यह प्रतिज्ञा आगे इस पर्व के सर्वाधिक नाटकीय, तनावपूर्ण घटनाक्रम की पृष्ठभूमि बनी।

इस अध्याय की शिक्षा

एक निर्दोष, वीर आत्मा की अन्यायपूर्ण वीरगति, चाहे वह कितनी भी असहनीय क्यों न हो, अंततः न्याय की उस अटूट खोज को जन्म देती है जो कभी शांत नहीं होती जब तक न्याय पूर्ण न हो जाए।

अध्याय 8

जयद्रथ का भय एवं सुरक्षा-प्रयास

अर्जुन की इस भीषण, अत्यंत गंभीर प्रतिज्ञा का समाचार शीघ्र ही जयद्रथ तक पहुँचा, जो इसे सुनते ही अत्यंत भयभीत हो उठा, यह जानते हुए कि अर्जुन के पराक्रम और संकल्प के समक्ष, उसका अपना जीवन अब गंभीर संकट में है।

जयद्रथ, अपने प्राणों की रक्षा हेतु, तत्काल हस्तिनापुर की ओर पलायन करने का प्रयास करने लगा, किंतु दुर्योधन तथा द्रोणाचार्य ने उसे यह समझाते हुए रोका कि इस प्रकार पलायन करना, न केवल कायरतापूर्ण होगा, अपितु कौरव-सेना के मनोबल के लिए भी अत्यंत हानिकारक सिद्ध होगा।

द्रोणाचार्य ने जयद्रथ को यह आश्वासन दिया कि वे उसकी सुरक्षा हेतु एक अत्यंत सुदृढ़, बहुस्तरीय सैन्य-व्यूह की रचना करेंगे, जिसमें भीष्म-तुल्य अनुभवी योद्धा, कर्ण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य तथा अन्य महारथी, जयद्रथ को इस प्रकार घेरे रहेंगे कि अर्जुन उस तक पहुँचने में असमर्थ रहे।

इस प्रकार, अगले दिन के युद्ध हेतु, कौरव-सेना ने अपनी सम्पूर्ण रणनीति और सैन्य-व्यवस्था को केवल एक ही उद्देश्य के इर्द-गिर्द केंद्रित किया — किसी भी मूल्य पर, सूर्यास्त तक जयद्रथ को अर्जुन से सुरक्षित रखना, यह जानते हुए कि यदि वे इसमें सफल हो गए, तो अर्जुन को अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अग्नि में प्रवेश करना होगा, जो पांडव-पक्ष के लिए एक असाधारण, अकल्पनीय क्षति सिद्ध होगी।

श्रीकृष्ण, इस अत्यंत गंभीर, चुनौतीपूर्ण परिस्थिति को भलीभाँति समझते हुए, अर्जुन के साथ, अगले दिन की इस असाधारण, निर्णायक चुनौती का सामना करने हेतु, गहन रणनीतिक विचार-विमर्श में जुट गए।

इस अध्याय की शिक्षा

भय के समय में, कभी-कभी संगठित सुरक्षा और सामूहिक रणनीति ही एकमात्र आश्रय प्रतीत होती है, किंतु यह भी सत्य है कि नियति के लिखे को कोई भी सुरक्षा-व्यवस्था सदा के लिए टाल नहीं सकती।

अध्याय 9

जयद्रथ की खोज में अर्जुन का संघर्ष

अगले दिन, प्रातःकाल से ही, अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करने हेतु, अत्यंत तीव्रता और दृढ़ संकल्प के साथ, कौरव-सेना पर भीषण आक्रमण आरम्भ किया, वे जयद्रथ तक पहुँचने के अपने मार्ग में आने वाले प्रत्येक योद्धा और प्रत्येक सैन्य-व्यूह को क्रमिक रूप से भेदते हुए आगे बढ़ते रहे।

द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण तथा अन्य महारथियों ने, अपनी पूर्ण शक्ति से, अर्जुन के इस मार्ग को बार-बार अवरुद्ध करने का प्रयास किया, यह एक अत्यंत भीषण, निरंतर संघर्ष था, जिसमें अर्जुन को प्रत्येक क्षण, नए योद्धाओं और नई बाधाओं का सामना करना पड़ रहा था।

समय तीव्रता से व्यतीत होता गया, तथा सूर्य पश्चिम की ओर ढलने लगा, अर्जुन, अपनी असाधारण शक्ति और कौशल के होते हुए भी, इस सुनियोजित, बहुस्तरीय सुरक्षा-व्यवस्था के कारण, जयद्रथ तक पहुँचने में अभी भी असमर्थ थे, यह देखकर पांडव-सेना में गहन चिंता और निराशा व्याप्त होने लगी।

श्रीकृष्ण, अर्जुन के सारथी के रूप में, इस अत्यंत नाजुक, समय-संवेदनशील स्थिति का गहन अवलोकन करते हुए, यह अनुभव करने लगे कि यदि सूर्यास्त से पूर्व जयद्रथ तक पहुँचना असम्भव सिद्ध हुआ, तो अर्जुन को अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अग्नि में प्रवेश करना पड़ेगा, यह एक ऐसी स्थिति थी जिसे वे किसी भी मूल्य पर घटित नहीं होने देना चाहते थे।

इसी अत्यंत गंभीर, निर्णायक क्षण में, श्रीकृष्ण के मन में एक असाधारण, दिव्य युक्ति का उदय हुआ, जो न केवल अर्जुन की प्रतिज्ञा को पूर्ण करने में सहायक सिद्ध होगी, अपितु स्वयं जयद्रथ के अंतिम, अपरिहार्य अंत की भी पृष्ठभूमि रचेगी।

इस अध्याय की शिक्षा

जब मानवीय प्रयास किसी असाधारण बाधा के समक्ष असफल होते प्रतीत हों, तब गहन बुद्धिमत्ता और दिव्य युक्ति ही असम्भव को सम्भव बनाने का मार्ग खोज सकती है।

अध्याय 10

श्रीकृष्ण की युक्ति — सूर्य को ढकना

श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र की असाधारण, दिव्य शक्ति का प्रयोग करते हुए, सूर्य को अस्थायी रूप से पूर्णतः आच्छादित कर दिया, जिससे सम्पूर्ण कुरुक्षेत्र के मैदान में अचानक ही घोर अंधकार छा गया, यह दृश्य ऐसा प्रतीत हुआ मानो सूर्यास्त वास्तव में हो चुका हो।

कौरव-सेना, यह विश्वास करते हुए कि सूर्यास्त हो चुका है, तथा अर्जुन की प्रतिज्ञा अब असफल हो चुकी है, हर्षोल्लास में डूब गई, जयद्रथ भी, अपने प्राणों की रक्षा हो जाने के इस भ्रामक विश्वास से, अत्यंत प्रसन्न होकर, अपनी सुरक्षा से बाहर आकर, इस काल्पनिक विजय का उत्सव मनाने हेतु आगे बढ़ आया, अपनी सुरक्षा-व्यवस्था को क्षण भर के लिए शिथिल करते हुए।

ठीक इसी क्षण, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सचेत करते हुए, तत्काल अपना धनुष उठाने का संकेत दिया, तथा जैसे ही सुदर्शन चक्र का यह अस्थायी आवरण हटा, तथा वास्तविक सूर्य का प्रकाश पुनः प्रकट हुआ, जयद्रथ, अपनी सुरक्षा से पूर्णतः असावधान और असुरक्षित अवस्था में, अर्जुन के ठीक समक्ष खड़ा पाया गया।

अर्जुन, इस असाधारण, दिव्य अवसर का पूर्ण लाभ उठाते हुए, अपने गांडीव धनुष से एक अत्यंत शक्तिशाली, सटीक बाण का संधान किया, जिसने जयद्रथ के मस्तक को धड़ से पृथक् कर दिया, इस प्रकार, अर्जुन ने अपनी वह भीषण, अपरिवर्तनीय प्रतिज्ञा, ठीक सूर्यास्त से पूर्व, सफलतापूर्वक पूर्ण की।

श्रीकृष्ण ने यह भी सुनिश्चित किया कि जयद्रथ का यह मस्तक, अत्यंत विशिष्ट, गणनात्मक सटीकता के साथ, उड़कर सीधे उसके पिता के तपस्या-स्थल में जा गिरे, क्योंकि जयद्रथ के पिता को एक पूर्व-शाप प्राप्त था कि यदि उसके पुत्र का मस्तक भूमि पर गिरा, तो स्वयं उसका ही मस्तक फट जाएगा, इस असाधारण युक्ति ने जयद्रथ के पिता को भी इस अनजाने संकट से बचा लिया।

इस अध्याय की शिक्षा

गहनतम बुद्धिमत्ता और दिव्य युक्ति, कभी-कभी सबसे असम्भव प्रतीत होने वाली प्रतिज्ञा को भी, ठीक अंतिम, निर्णायक क्षण में, पूर्ण करने का मार्ग प्रशस्त कर देती है।

अध्याय 11

घटोत्कच का रात्रि-संग्राम

जयद्रथ के अंत के पश्चात्, दुर्योधन तथा कर्ण, अत्यंत क्रोधित और असंतुष्ट होकर, यह निश्चय किया कि युद्ध अब रात्रि में भी निरंतर जारी रखा जाए, ताकि पांडव-सेना को विश्राम का कोई अवसर न मिले, तथा उन्हें इस असाधारण क्षति का शीघ्र प्रतिशोध लिया जा सके।

इस रात्रि-युद्ध में, भीम-पुत्र घटोत्कच ने, अपनी असाधारण राक्षसी शक्तियों — जो रात्रि में और भी अधिक प्रबल हो जाती थीं — का पूर्ण प्रयोग करते हुए, कौरव-सेना पर एक भीषण, विनाशकारी आक्रमण किया, उनकी विशाल, भयंकर मायावी काया के समक्ष, अनेक कौरव योद्धा भय से पलायन करने लगे।

घटोत्कच का यह पराक्रम इतना असाधारण और विनाशकारी था कि स्वयं दुर्योधन का जीवन भी गंभीर संकट में पड़ गया, अत्यंत भयभीत होकर, दुर्योधन ने कर्ण से तत्काल हस्तक्षेप कर घटोत्कच को रोकने का आग्रह किया, यह जानते हुए कि इस रात्रि-युद्ध में कोई भी सामान्य योद्धा घटोत्कच का सामना करने में सक्षम नहीं था।

कर्ण, अपने राजा और मित्र दुर्योधन की इस गंभीर विपत्ति को देखकर, अंततः यह निश्चय किया कि वे अपनी वह असाधारण, एक बार प्रयोग योग्य वासवी शक्ति, जो उन्हें स्वयं इंद्र से प्राप्त हुई थी, और जिसे उन्होंने विशेष रूप से अर्जुन के विरुद्ध सुरक्षित रखा था, अब घटोत्कच के विरुद्ध प्रयोग करने को विवश हुए।

इस असाधारण, अत्यंत शक्तिशाली अस्त्र के प्रयोग से, घटोत्कच का अंत हुआ, किंतु मरणासन्न अवस्था में भी, उन्होंने अपनी विशाल राक्षसी काया को इतना विस्तृत कर लिया कि उनके गिरने से ही, कौरव-सेना के असंख्य सैनिक कुचलकर वीरगति को प्राप्त हुए, यह उनका अंतिम, असाधारण योगदान सिद्ध हुआ।

इस अध्याय की शिक्षा

एक वीर योद्धा का अंतिम बलिदान भी, चाहे वह कितना भी करुण क्यों न हो, अपने साथ शत्रु के लिए एक अंतिम, गहन आघात अवश्य छोड़ जाता है।

अध्याय 12

श्रीकृष्ण का हर्ष एवं भीम का शोक

घटोत्कच की इस वीरगति का समाचार पाकर, समस्त पांडव, विशेष रूप से भीमसेन, अपने असाधारण, वीर पुत्र के इस अंत से गहन शोक में डूब गए, यह उनके लिए एक असहनीय, व्यक्तिगत क्षति थी, जिसने सम्पूर्ण पांडव-शिविर को गहन वेदना में डुबो दिया।

किंतु इसी शोक के मध्य, श्रीकृष्ण, अत्यंत असाधारण रूप से, हर्षित और संतुष्ट प्रतीत हुए, यह देखकर युधिष्ठिर सहित सभी पांडव अत्यंत विस्मित हुए, तथा उन्होंने श्रीकृष्ण से इस असामान्य प्रतिक्रिया का कारण पूछा।

श्रीकृष्ण ने समझाया कि कर्ण की वह वासवी शक्ति, जो एक बार ही प्रयोग की जा सकती थी, तथा जिसे उन्होंने विशेष रूप से अर्जुन के अंत हेतु सुरक्षित रखा था, अब घटोत्कच के विरुद्ध प्रयोग हो जाने के कारण, सदा के लिए समाप्त हो चुकी है, अतः अब कर्ण के पास अर्जुन के विरुद्ध वह सर्वोच्च, अजेय अस्त्र शेष नहीं रहा।

यह गहन रणनीतिक सत्य समझने पर, पांडवों को यह गहन सांत्वना मिली कि घटोत्कच का यह बलिदान, चाहे कितना भी हृदयविदारक क्यों न हो, व्यर्थ नहीं गया, अपितु इसने अर्जुन के जीवन को भविष्य में एक असाधारण, निश्चित संकट से सदा के लिए सुरक्षित कर दिया।

इस प्रकार, यह घटना पुनः इस गहन सत्य को प्रकट करती है कि युद्ध में प्रत्येक बलिदान, चाहे वह कितना भी शोकाकुल क्यों न प्रतीत हो, नियति की उस विशाल, जटिल योजना का ही एक सार्थक, आवश्यक अंग होता है, जिसकी पूर्ण समझ केवल दूरदर्शी, दिव्य ज्ञान ही प्रदान कर सकता है।

इस अध्याय की शिक्षा

एक गहन क्षति भी, यदि सही दृष्टि से देखी जाए, भविष्य की एक बड़ी विपत्ति से सुरक्षा का साधन सिद्ध हो सकती है, नियति की योजना प्रायः हमारी तात्कालिक समझ से कहीं अधिक गहन होती है।

अध्याय 13

द्रुपद एवं विराट की वीरगति

इसी पर्व के आगामी दिनों में, द्रोणाचार्य, अपनी युधिष्ठिर को बंदी बनाने की अधूरी प्रतिज्ञा तथा अपने पुत्र अश्वत्थामा और कौरव-सेना के प्रति अपनी निष्ठा से प्रेरित होकर, पांडव-सेना पर अत्यंत भीषण, निरंतर आक्रमण करते रहे, उनका पराक्रम, वृद्धावस्था के बावजूद, तनिक भी क्षीण नहीं हुआ था।

इसी भीषण संघर्ष के मध्य, पांचाल-नरेश द्रुपद, जो द्रौपदी और धृष्टद्युम्न के पिता थे, तथा जिनका द्रोणाचार्य के साथ दशकों पुराना, गहरा वैर था, स्वयं द्रोण के साथ एक अत्यंत भीषण द्वंद्व-युद्ध में उलझे, इस संघर्ष में, अंततः द्रुपद-नरेश वीरगति को प्राप्त हुए।

इसी दिन, मत्स्य-नरेश विराट, जिन्होंने पांडवों को अपने राज्य में अज्ञातवास हेतु आश्रय दिया था, तथा जो अभिमन्यु के श्वसुर भी थे, भी द्रोणाचार्य के साथ एक भीषण संघर्ष में, अपने प्राणों की आहुति देते हुए, वीरगति को प्राप्त हुए।

इन दोनों वयोवृद्ध, अत्यंत सम्मानित मित्र-राजाओं की इस दोहरी वीरगति ने, पांडव-सेना को गहन शोक में डुबो दिया, विशेष रूप से धृष्टद्युम्न, अपने पिता की इस मृत्यु से अत्यंत क्षुब्ध और क्रोधित हुए, यह प्रतिज्ञा दोहराते हुए कि वे अपने पिता की इस मृत्यु का अवश्य ही प्रतिशोध लेंगे।

यह गहन क्षति, पांडव-सेना के मनोबल के लिए एक और भीषण आघात सिद्ध हुई, किंतु इसने धृष्टद्युम्न के हृदय में द्रोणाचार्य के प्रति उस अटूट, अनिवार्य संकल्प को और भी अधिक दृढ़ किया, जिसकी पूर्ति ही उनके जन्म का मूल प्रयोजन थी।

इस अध्याय की शिक्षा

दीर्घकालिक वैर और अधूरे संकल्प, चाहे वे कितनी भी पीढ़ियों तक क्यों न चलें, अंततः किसी न किसी निर्णायक क्षण में अपनी पूर्णता की ओर अग्रसर होते ही हैं।

अध्याय 14

धृष्टद्युम्न का क्रोध एवं पांडवों की चिंता

द्रोणाचार्य का पराक्रम, अपने पुत्र-तुल्य शिष्यों के विरुद्ध युद्ध करने की गहन आंतरिक वेदना के होते हुए भी, दिन-प्रतिदिन और भी अधिक भीषण होता जा रहा था, वे अपनी युधिष्ठिर को बंदी बनाने की प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के अत्यंत निकट पहुँच चुके थे, यह देखकर पांडव-शिविर में गहन चिंता व्याप्त हो गई।

युधिष्ठिर तथा श्रीकृष्ण, इस गंभीर, बढ़ती हुई चुनौती का कोई ठोस, निर्णायक समाधान खोजने हेतु, गहन विचार-विमर्श करने लगे, यह स्पष्ट हो चुका था कि जब तक द्रोणाचार्य युद्धरत हैं, तथा उनका आत्मबल और संकल्प अटूट है, उन्हें प्रत्यक्ष युद्ध में परास्त करना लगभग असम्भव प्रतीत होता है।

श्रीकृष्ण ने, अत्यंत गंभीर चिंतन के पश्चात्, यह गूढ़ रहस्य प्रकट किया कि द्रोणाचार्य, अपने पुत्र अश्वत्थामा के प्रति असाधारण स्नेह रखते हैं, तथा यदि उन्हें किसी प्रकार यह विश्वास दिलाया जा सके कि उनके पुत्र की मृत्यु हो चुकी है, तो वे इस गहन शोक में अपने शस्त्र त्याग सकते हैं, जिससे उनका अंत सम्भव हो सकेगा।

यह एक अत्यंत नैतिक रूप से जटिल, कठिनतम प्रस्ताव था, क्योंकि इसे सफल बनाने के लिए, किसी न किसी रूप में, एक असत्य अथवा अर्धसत्य कथन का सहारा लेना आवश्यक होता, युधिष्ठिर, जो अपने सम्पूर्ण जीवन में कभी भी असत्य नहीं बोले थे, इस प्रस्ताव पर गहन नैतिक द्वंद्व में पड़ गए।

अंततः, भीमसेन ने एक चतुर, आंशिक रूप से सत्य पर आधारित उपाय सुझाया — कि युद्धभूमि में उपस्थित "अश्वत्थामा" नामक एक गजराज का वध किया जाए, तथा फिर यह घोषित किया जाए कि "अश्वत्थामा मारा गया", बिना यह स्पष्ट किए कि यह गजराज है अथवा स्वयं द्रोण का पुत्र, इस योजना पर आगे विस्तृत विचार-विमर्श हुआ।

इस अध्याय की शिक्षा

जब कोई चुनौती पूर्णतः अजेय प्रतीत हो, तो कभी-कभी सबसे कठिन, नैतिक रूप से जटिल निर्णय ही एकमात्र व्यावहारिक मार्ग के रूप में शेष रह जाते हैं, चाहे वे हृदय पर कितना भी भार डालें।

अध्याय 15

अश्वत्थामा नामक गज का अंत

इस योजना को क्रियान्वित करने हेतु, पांडव-सेना ने युद्धभूमि में उपस्थित अपने ही एक गजराज को, जो संयोगवश "अश्वत्थामा" नाम से ही जाना जाता था, चुना, भीमसेन ने अपनी असाधारण गदा से, इस गजराज पर भीषण प्रहार कर, उसका अंत कर दिया।

इसके पश्चात्, भीमसेन ने युद्धभूमि में ऊँची आवाज़ में यह घोषणा की कि "अश्वत्थामा मारा गया", यह सुनते ही द्रोणाचार्य के हृदय में गहन शोक और अविश्वास की एक तीव्र लहर दौड़ गई, यद्यपि वे स्वयं भलीभाँति जानते थे कि उनका पुत्र अश्वत्थामा एक असाधारण, दुर्जेय योद्धा है, तथा इतनी सरलता से उसकी मृत्यु होना अत्यंत असम्भव प्रतीत होता है।

द्रोणाचार्य, इस गहन आशंका के मध्य भी, अपने पुत्र की सुरक्षा के प्रति पूर्ण निश्चय प्राप्त करने हेतु, स्वयं युधिष्ठिर के पास पहुँचे, यह विश्वास करते हुए कि युधिष्ठिर, अपने सम्पूर्ण जीवन में असत्य न बोलने की ख्याति के कारण, इस विषय में केवल सत्य ही प्रकट करेंगे।

युधिष्ठिर, अत्यंत गहन आंतरिक द्वंद्व और नैतिक वेदना के मध्य, अपने आचार्य के इस प्रत्यक्ष प्रश्न का सामना करने के लिए, अपने भाइयों तथा श्रीकृष्ण की योजना के अनुसार, एक अत्यंत कठिन, अभूतपूर्व उत्तर देने की तैयारी करने लगे, यह उनके सम्पूर्ण जीवन का सबसे कठिनतम, सबसे विवादास्पद क्षण बनने वाला था।

इसी क्षण, यह ध्यान रखा गया कि जब युधिष्ठिर यह उत्तर दें, स्वयं श्रीकृष्ण के निर्देश पर, सभी योद्धा अपने-अपने शंख और नगाड़े बजाना आरम्भ कर दें, ताकि द्रोणाचार्य युधिष्ठिर के वाक्य के अंतिम, महत्त्वपूर्ण शब्दों को स्पष्ट रूप से न सुन सकें।

इस अध्याय की शिक्षा

युद्ध की विषम परिस्थितियाँ कभी-कभी सबसे सत्यनिष्ठ आत्मा को भी ऐसे कठिनतम निर्णयों के समक्ष खड़ा कर देती हैं, जहाँ पूर्ण सत्य और आवश्यक रणनीति के मध्य संतुलन खोजना अत्यंत दुष्कर हो जाता है।

अध्याय 16

युधिष्ठिर का अर्धसत्य कथन

द्रोणाचार्य के प्रत्यक्ष, आतुर प्रश्न के उत्तर में, युधिष्ठिर ने अत्यंत गंभीर, किंतु काँपते स्वर में यह कहा — "अश्वत्थामा हतः, नरो वा कुंजरो वा" — अर्थात् "अश्वत्थामा मारा गया, चाहे वह मनुष्य हो अथवा गजराज", उन्होंने अंतिम शब्द, "नरो वा कुंजरो वा" को अत्यंत धीमे, अस्पष्ट स्वर में उच्चारित किया।

ठीक उसी क्षण, पूर्व-निर्धारित योजना के अनुसार, समस्त पांडव-सेना के शंख और नगाड़े एक साथ बज उठे, जिनकी भीषण ध्वनि ने युधिष्ठिर के इन अंतिम, महत्त्वपूर्ण शब्दों को द्रोणाचार्य तक स्पष्ट रूप से पहुँचने से रोक दिया, उन्होंने केवल यह सुना कि "अश्वत्थामा मारा गया"।

द्रोणाचार्य, युधिष्ठिर की उस विख्यात सत्यनिष्ठा पर अटूट विश्वास रखते हुए, यह मान बैठे कि उनका पुत्र वास्तव में युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हो चुका है, इस असहनीय, हृदयविदारक शोक से अभिभूत होकर, उनका सम्पूर्ण आत्मबल और युद्ध करने की इच्छा क्षण भर में ही टूट गई।

यह घटना, इस सम्पूर्ण महाकाव्य के सबसे नैतिक रूप से जटिल, सबसे विवादास्पद प्रसंगों में से एक बनी, यह गहन प्रश्न उठाती है कि क्या धर्मयुद्ध की विजय हेतु, कभी-कभी सत्य के इस प्रकार के सूक्ष्म, अर्ध-रूपांतरण को उचित ठहराया जा सकता है, स्वयं युधिष्ठिर ने भी, आगे के जीवन में, इस निर्णय पर गहन आत्म-मंथन किया।

व्यास जी ने बाद में युधिष्ठिर को समझाया कि यद्यपि यह कथन तकनीकी रूप से पूर्णतः असत्य नहीं था, फिर भी इसका आशय भ्रामक था, तथा इसी कारण, युद्ध के पश्चात्, युधिष्ठिर के रथ का वह चक्का, जो सामान्यतः भूमि से कुछ ऊपर ही तैरता रहता था, अंततः भूमि को स्पर्श करने लगा, यह उनकी इस एकमात्र, अल्प-सत्यता की एक सूक्ष्म, प्रतीकात्मक कीमत थी।

इस अध्याय की शिक्षा

सत्य और असत्य के मध्य की वह सूक्ष्म रेखा, जिसे कभी-कभी विषम परिस्थितियों में लांघा जाता है, चाहे कितना भी आवश्यक क्यों प्रतीत हो, फिर भी अपने पीछे एक सूक्ष्म, स्थायी नैतिक मूल्य अवश्य छोड़ जाती है।

अध्याय 17

द्रोणाचार्य का शोक एवं शस्त्र-त्याग

अपने पुत्र की मृत्यु के इस असहनीय समाचार से गहराई से टूटे हुए, द्रोणाचार्य, अपनी सम्पूर्ण युद्ध करने की इच्छा और आत्मबल खो बैठे, उन्होंने अपने रथ पर बैठे-बैठे ही, अत्यंत गहन शोक और वैराग्य के साथ, अपने धनुष-बाण भूमि पर रख दिए, तथा योग-समाधि में प्रवेश करने का निश्चय किया।

यह देखकर, धृष्टद्युम्न, जो दीर्घकाल से द्रोणाचार्य के अंत हेतु ही अग्नि से प्रकट हुए थे, तथा जो अपने पिता द्रुपद की हाल ही में हुई वीरगति से भी अत्यंत क्षुब्ध थे, इस अवसर को अपने जन्म के मूल प्रयोजन को पूर्ण करने के एक निर्णायक, अंतिम अवसर के रूप में देखने लगे।

द्रोणाचार्य, अपने शस्त्र त्यागकर, अपने रथ पर बैठे, गहन ध्यान की मुद्रा में, अपनी आत्मा को शरीर से मुक्त करने के इस अंतिम, आध्यात्मिक प्रयास में लीन हो गए, यह एक अत्यंत शांत, गरिमापूर्ण दृश्य था, जो युद्धभूमि की उस भीषण अराजकता के मध्य भी, एक असाधारण आध्यात्मिक गहराई प्रकट करता था।

श्रीकृष्ण, जो इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को गहन गंभीरता से देख रहे थे, धृष्टद्युम्न को यह चेतावनी देने का प्रयास किया कि द्रोणाचार्य को इस निःशस्त्र, ध्यानमग्न अवस्था में मारना, धर्मयुद्ध के स्थापित नियमों के सर्वथा विपरीत होगा, तथा यह भविष्य में गहन आलोचना और अपयश का कारण बन सकता है।

किंतु धृष्टद्युम्न, अपने पिता की मृत्यु के शोक तथा अपने जन्म-प्रयोजन की तीव्रता में इतने अभिभूत थे कि वे इस चेतावनी की भी अनदेखी करते हुए, तत्काल अपने रथ से उतरकर, तलवार लिए, द्रोणाचार्य की ओर तीव्रता से आगे बढ़े।

इस अध्याय की शिक्षा

गहनतम शोक कभी-कभी सबसे उदात्त आत्मा को भी युद्ध की समस्त इच्छा से पूर्णतः विरत कर सकता है, यह मानवीय हृदय की सबसे गहन, सबसे मार्मिक दुर्बलता और शक्ति, दोनों का ही प्रमाण है।

अध्याय 18

धृष्टद्युम्न द्वारा द्रोण का अंत

धृष्टद्युम्न, अपने पिता की मृत्यु के शोक तथा अपने दीर्घकालिक, जन्म-निर्धारित प्रयोजन से प्रेरित होकर, ध्यानमग्न, निःशस्त्र द्रोणाचार्य के समीप पहुँचे, तथा अपनी तलवार से, उनका मस्तक धड़ से पृथक् कर दिया, यह क्रिया धर्मयुद्ध के स्थापित नियमों का स्पष्ट उल्लंघन थी, किंतु यह उस दीर्घकालिक नियति का ही अंतिम, अनिवार्य फल थी जो वर्षों पूर्व, द्रुपद के अपमान के समय ही निर्धारित हो चुकी थी।

द्रोणाचार्य का यह अंत, दोनों ही पक्षों के लिए, एक असाधारण, हृदयविदारक क्षण सिद्ध हुआ, अर्जुन, अपने आचार्य के प्रति गहन स्नेह और सम्मान के कारण, इस समाचार से अत्यंत व्यथित हुए, तथा उन्होंने खुलकर यह अफसोस भी व्यक्त किया कि उनके गुरु का अंत इस प्रकार, निःशस्त्र अवस्था में हुआ, जो एक सच्चे योद्धा के लिए अत्यंत अनुचित है।

कौरव-सेना में इस समाचार से गहन शोक और आतंक व्याप्त हो गया, यह स्पष्ट हो गया कि अब उनके दो सर्वाधिक अनुभवी, सर्वाधिक विश्वसनीय सेनापति — भीष्म और द्रोण — दोनों ही युद्धभूमि से सदा के लिए विदा हो चुके हैं, तथा सेना का नेतृत्व अब किसी और महारथी के हाथों में सौंपना अनिवार्य हो गया था।

श्रीकृष्ण ने, इस सम्पूर्ण घटनाक्रम पर, गहन दार्शनिक टिप्पणी करते हुए, यह स्पष्ट किया कि युद्ध में, कभी-कभी, विशेष परिस्थितियों में, धर्म की सूक्ष्म, जटिल परतें इस प्रकार परस्पर विरोधाभासी प्रतीत होती हैं कि उनका पूर्ण, निर्विवाद न्याय-निर्धारण अत्यंत कठिन हो जाता है, तथा यह इसी विशाल महासंग्राम की गहनतम, सबसे विवादास्पद शिक्षाओं में से एक है।

द्रोणाचार्य के इस अंत के साथ, कौरव-सेना का नेतृत्व अब कर्ण के हाथों में जाने की सम्भावना प्रबल हो गई, जो दीर्घकाल से इस पद की प्रतीक्षा में थे, यह आगामी कर्ण पर्व की उस भीषण, अंतिम कथा की पृष्ठभूमि बनी, जिसमें अंततः अर्जुन और कर्ण के मध्य वह नियति-निर्धारित, अंतिम द्वंद्व घटित होगा।

इस अध्याय की शिक्षा

एक दीर्घकालिक नियति, चाहे वह कितने भी वर्षों तक प्रतीक्षा करे, अंततः अपने निर्धारित, अपरिहार्य परिणाम तक अवश्य पहुँचती है, चाहे इसका मार्ग कितना भी विवादास्पद क्यों न हो।

अध्याय 19

अश्वत्थामा का क्रोध — नारायणास्त्र का आवाहन

अपने पिता की इस अत्यंत अनुचित, अधर्मपूर्ण मृत्यु का समाचार पाकर, अश्वत्थामा, जो स्वयं एक अत्यंत शक्तिशाली, तपस्वी योद्धा थे, गहन शोक और असीम क्रोध से भर उठे, उन्होंने यह भीषण प्रतिज्ञा ली कि वे अपने पिता की इस मृत्यु का, सम्पूर्ण पांडव-सेना से, अत्यंत भीषण प्रतिशोध लेंगे।

अपने असीम क्रोध और शोक में, अश्वत्थामा ने अपने पिता से प्राप्त एक अत्यंत गुप्त, सर्वनाशकारी दिव्यास्त्र, "नारायणास्त्र", का आवाहन किया, यह अस्त्र स्वयं भगवान नारायण से सम्बंधित था, तथा इसकी शक्ति इतनी असीम थी कि यह सम्पूर्ण सेना को क्षण भर में भस्म करने की क्षमता रखता था।

जब यह भीषण, असंख्य अग्नि-बाणों की वर्षा करने वाला अस्त्र पांडव-सेना पर छोड़ा गया, सम्पूर्ण सेना में भय और आतंक व्याप्त हो गया, अधिकांश योद्धा, इस अस्त्र से बचने हेतु स्वयं ही शस्त्र उठाकर इसका प्रतिकार करने का प्रयास करने लगे, जिससे इसकी विनाशकारी शक्ति और भी अधिक तीव्र होती गई।

श्रीकृष्ण, इस अस्त्र की वास्तविक प्रकृति और इससे बचने की गूढ़ विधि से भलीभाँति परिचित थे, उन्होंने तत्काल समस्त पांडव-सेना को यह आदेश दिया कि वे अपने समस्त शस्त्र त्यागकर, भूमि पर लेट जाएँ, तथा इस अस्त्र के प्रति पूर्ण समर्पण और विनम्रता का भाव प्रदर्शित करें, क्योंकि यह अस्त्र केवल उन्हीं पर प्रहार करता है जो इसका शस्त्रों से प्रतिकार करने का प्रयास करते हैं।

युधिष्ठिर तथा शेष सभी योद्धाओं ने, श्रीकृष्ण के इस असाधारण, जीवनरक्षक निर्देश का तत्काल पालन किया, केवल भीमसेन, अपने स्वाभाविक क्रोध और साहस के कारण, इस अस्त्र का शस्त्रों से प्रतिकार करते रहे, जिससे इसकी शक्ति उन पर ही अधिक केंद्रित होने लगी, यह देखकर अर्जुन को स्वयं आगे बढ़कर, अपने भाई को शांत करना पड़ा।

इस अध्याय की शिक्षा

कभी-कभी सबसे विनाशकारी शक्ति का सामना, प्रतिरोध से नहीं, अपितु विनम्र समर्पण और अहिंसा से ही सफलतापूर्वक किया जा सकता है, यह विरोधाभासी किंतु गहन सत्य है।

अध्याय 20

नारायणास्त्र से रक्षा

श्रीकृष्ण के परामर्श पर, जब समस्त पांडव-सेना ने अपने शस्त्र त्यागकर, पूर्ण विनम्रता और समर्पण के साथ स्वयं को भूमि पर स्थिर कर लिया, वह भीषण नारायणास्त्र, धीरे-धीरे शांत होकर, बिना किसी को गंभीर हानि पहुँचाए, स्वतः ही निष्प्रभावी हो गया, इस प्रकार, सम्पूर्ण सेना इस असाधारण, विनाशकारी संकट से सुरक्षित बच निकली।

अश्वत्थामा, अपने इस सर्वोच्च, सर्वनाशकारी अस्त्र के भी असफल हो जाने पर, गहन निराशा और अपमान का अनुभव करते हुए, यह पहचानने को विवश हुए कि श्रीकृष्ण की उपस्थिति और उनका गहन ज्ञान, किसी भी भौतिक अस्त्र से कहीं अधिक शक्तिशाली और निर्णायक सिद्ध होता है।

इस घटना ने, पुनः एक बार, इस गहन सत्य को स्थापित किया कि युद्ध में विजय केवल भौतिक शक्ति और अस्त्रों से नहीं, अपितु गहन ज्ञान, विवेक और उचित रणनीति से ही सुनिश्चित होती है, तथा श्रीकृष्ण की उपस्थिति, पांडवों के लिए, किसी भी अस्त्र से कहीं अधिक मूल्यवान सुरक्षा-कवच सिद्ध हुई।

अश्वत्थामा, अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने में असफल होकर, तथा गहन शोक और अपमान से भरकर, युद्धभूमि से कुछ काल के लिए दूर चले गए, यद्यपि उनके हृदय में यह प्रतिशोध की अग्नि अभी भी सुलगती रही, जो आगे चलकर, युद्ध की समाप्ति के पश्चात्, एक अत्यंत भीषण, अंधकारमय रात्रि की पृष्ठभूमि रचेगी।

इस असाधारण, जीवनरक्षक घटना के पश्चात्, समस्त पांडव-सेना ने पुनः अपने शस्त्र उठाए, तथा गहन कृतज्ञता के साथ श्रीकृष्ण की इस असाधारण बुद्धिमत्ता और उनकी दिव्य सुरक्षा के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा व्यक्त की, जिसने उन्हें इस असाधारण संकट से सुरक्षित उबारा।

इस अध्याय की शिक्षा

गहन ज्ञान और विनम्र समर्पण, कभी-कभी सबसे विनाशकारी शक्ति को भी निष्प्रभावी कर सकते हैं, यह सच्ची, स्थायी सुरक्षा का सर्वोच्च रहस्य है।

अध्याय 21

द्रोण पर्व का समापन

द्रोणाचार्य के इस असाधारण, हृदयविदारक अंत के पश्चात्, तथा नारायणास्त्र के इस भीषण संकट से सुरक्षित उबरने के पश्चात्, दोनों ही पक्षों की सेनाएँ, कुछ काल के विश्राम और पुनर्संगठन के पश्चात्, इस भीषण महासंग्राम के अगले, और भी अधिक निर्णायक चरण की तैयारी में जुट गईं।

कौरव-सेना में, अब द्रोणाचार्य के पश्चात् सेनापति-पद हेतु, कर्ण को ही सर्वाधिक उपयुक्त और स्वाभाविक चयन माना गया, जो दीर्घकाल से इस असाधारण दायित्व की प्रतीक्षा में थे, तथा जो अब अंततः अपनी सम्पूर्ण शक्ति और कौशल के साथ, इस युद्ध की बागडोर सम्भालने वाले थे।

पांडव-सेना में, अभिमन्यु, घटोत्कच, द्रुपद और विराट जैसे असाधारण वीरों की क्षति ने गहन शोक तो उत्पन्न किया, किंतु साथ ही, जयद्रथ और द्रोणाचार्य जैसे प्रमुख कौरव-योद्धाओं के अंत ने, उनकी अंतिम विजय की सम्भावनाओं को भी और अधिक सुदृढ़ किया, यह एक अत्यंत जटिल, मिश्रित भावनाओं से भरा हुआ चरण था।

युधिष्ठिर, विशेष रूप से, अपने उस अर्धसत्य कथन के प्रभाव से, तथा अपने आचार्य के इस असाधारण अंत से, गहन आंतरिक वेदना और आत्म-मंथन का अनुभव करते रहे, यह प्रश्न उनके हृदय में दीर्घकाल तक बना रहा कि क्या विजय के लिए अपनाया गया यह मार्ग वास्तव में पूर्णतः धर्मसम्मत था।

इस प्रकार द्रोण पर्व, अभिमन्यु की उस असाधारण, हृदयविदारक वीरगति से आरम्भ होकर, अर्जुन की जयद्रथ-वध की प्रतिज्ञा-पूर्ति, घटोत्कच के बलिदान, तथा अंततः द्रोणाचार्य के उस अत्यंत जटिल, विवादास्पद अंत के साथ, अपने समापन पर पहुँचता है, अगले कर्ण पर्व में, अंततः अर्जुन और कर्ण के मध्य उस नियति-निर्धारित, अंतिम, सर्वाधिक प्रतीक्षित द्वंद्व की कथा वर्णित की जाएगी।

इस अध्याय की शिक्षा

युद्ध का प्रत्येक चरण, चाहे वह कितना भी विजयी या शोकाकुल क्यों न प्रतीत हो, अंततः उस विशाल, अपरिहार्य नियति की ओर ही अग्रसर होता है जिसकी पूर्ण समझ केवल समय के साथ ही प्रकट होती है।