भीष्म पर्व

भीष्म पर्व

कुरुक्षेत्र युद्ध का आरम्भ, श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश, तथा दस दिनों तक चले भीष्म के सेनापतित्व एवं शिखंडी के माध्यम से उनके पतन की कथा।

अध्याय 1

धृतराष्ट्र की जिज्ञासा — संजय को दिव्य दृष्टि

कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाओं के अंतिम रूप से आमने-सामने खड़े होने के साथ ही, अंधे राजा धृतराष्ट्र, हस्तिनापुर के अपने राजमहल में बैठे, अत्यंत गहन चिंता और आतुरता से अपने सारथी संजय से यह प्रश्न पूछा कि धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में एकत्रित होकर, उनके पुत्रों तथा पांडु-पुत्रों ने युद्ध हेतु क्या किया।

इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण, ऐतिहासिक क्षण को प्रत्यक्ष रूप से देखने और वर्णन करने में सक्षम बनाने हेतु, स्वयं महर्षि वेदव्यास ने, अपनी असाधारण योगशक्ति से, संजय को एक दिव्य दृष्टि प्रदान की, जिसके माध्यम से वे कुरुक्षेत्र के मैदान में घटित होने वाली प्रत्येक घटना को, हस्तिनापुर में बैठे-बैठे ही, प्रत्यक्ष रूप से देख और सुन सकते थे।

व्यास जी ने धृतराष्ट्र को भी यह प्रस्ताव दिया कि यदि वे स्वयं यह भीषण, हृदयविदारक युद्ध प्रत्यक्ष रूप से देखना चाहें, तो वे भी उन्हें ऐसी ही दिव्य दृष्टि प्रदान कर सकते हैं, किंतु धृतराष्ट्र ने, अपने ही पुत्रों के इस विनाश को प्रत्यक्ष रूप से देखने की असहनीय पीड़ा से बचने हेतु, विनम्रतापूर्वक इस प्रस्ताव को अस्वीकार किया, तथा संजय के माध्यम से ही इस सम्पूर्ण कथा को सुनने का निश्चय किया।

इस प्रकार, संजय, इस असाधारण दिव्य दृष्टि के साथ, हस्तिनापुर में स्थित रहते हुए भी, कुरुक्षेत्र के मैदान में घटित होने वाले अठारह दिनों के इस भीषण महासंग्राम की प्रत्येक घटना, प्रत्येक संवाद, तथा प्रत्येक योद्धा के पराक्रम का, अत्यंत विस्तृत और सजीव वर्णन धृतराष्ट्र को सुनाने के लिए पूर्णतः तैयार हो गए।

यह दिव्य व्यवस्था स्वयं में इस बात का गहन प्रतीक है कि सत्य और धर्म की घटनाएँ, चाहे वे कितनी भी दूर घटित हों, अंततः उन तक अवश्य पहुँचती हैं जो सच्चे हृदय से उन्हें जानने और समझने की इच्छा रखते हैं, तथा जो भय या पलायन के बजाय, यथार्थ का सामना करने का साहस, यद्यपि दूर से ही सही, रखते हैं।

इस अध्याय की शिक्षा

सत्य का सामना करने से पलायन करना भी अंततः उस सत्य से बच नहीं सकता, यह केवल उसे प्रत्यक्ष अनुभव करने के बजाय, किसी और के माध्यम से जानने का मार्ग चुनना है।

अध्याय 2

दोनों सेनाओं का वर्णन एवं शंख-ध्वनि

संजय ने धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र के उस विस्तृत मैदान का सजीव वर्णन सुनाया, जहाँ दोनों ओर की विशाल सेनाएँ, अपने-अपने ध्वजों, रथों, गजराजों और अश्वारोहियों सहित, एक-दूसरे के सम्मुख पंक्तिबद्ध होकर खड़ी थीं, अठारह अक्षौहिणी की यह संयुक्त सेना इतनी विशाल थी कि उसके शस्त्रों की चमक से सूर्य का प्रकाश भी फीका प्रतीत होने लगा था।

दुर्योधन, अपनी विशाल सेना का अवलोकन करते हुए, अपने गुरु द्रोणाचार्य के समक्ष अपनी सेना के प्रमुख योद्धाओं — भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा तथा अन्य असंख्य महारथियों — का गर्वपूर्ण उल्लेख करता है, यह विश्वास व्यक्त करते हुए कि उसकी यह विशाल सेना, भीष्म के नेतृत्व में, अवश्य ही विजयी होगी।

इसी क्षण, वयोवृद्ध भीष्म पितामह ने, कौरव-सेना का मनोबल बढ़ाने हेतु, अपने विशाल शंख की गर्जना की, जिसके पश्चात् समस्त कौरव-पक्ष के शंख, नगाड़े और भेरियाँ एक साथ बज उठीं, जिनकी भीषण ध्वनि से सम्पूर्ण आकाश और पृथ्वी कंपायमान हो उठी।

पांडव-पक्ष से, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अपना पांचजन्य शंख, अर्जुन ने देवदत्त, भीमसेन ने पौंड्र, युधिष्ठिर ने अनंतविजय, नकुल ने सुघोष, तथा सहदेव ने मणिपुष्पक नामक अपने-अपने दिव्य शंखों की गर्जना की, इस समवेत ध्वनि ने कौरव-सेना के हृदयों को भी क्षण भर के लिए कंपा दिया।

इस प्रकार, दोनों पक्षों की इस भीषण, गगनभेदी शंख-ध्वनि के साथ, उस अठारह दिनों तक चलने वाले, विश्व-इतिहास के सबसे भीषण, सबसे निर्णायक महासंग्राम का, विधिवत् रूप से आरम्भ हुआ, यह ध्वनि स्वयं में इस बात की घोषणा थी कि अब कोई भी शांतिपूर्ण मार्ग शेष नहीं रहा, तथा केवल युद्ध ही इस विवाद का अंतिम निर्णायक बनेगा।

इस अध्याय की शिक्षा

जब समस्त वार्ता समाप्त हो जाती है, तब शंख की गर्जना ही यह घोषणा करती है कि अब केवल कर्म और पराक्रम ही शेष निर्णायक तत्त्व हैं।

अध्याय 3

अर्जुन का विषाद

युद्ध आरम्भ होने से ठीक पूर्व, अर्जुन ने श्रीकृष्ण से अनुरोध किया कि वे उनका रथ दोनों सेनाओं के मध्य ले चलें, ताकि वे यह देख सकें कि किन-किन योद्धाओं के साथ उन्हें युद्ध करना है, श्रीकृष्ण ने, अत्यंत सहजता से, अपने प्रिय सखा और शिष्य के इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए, रथ को दोनों सेनाओं के ठीक मध्य में स्थापित किया।

जब अर्जुन ने अपने समक्ष अपने ही पितामह भीष्म, अपने गुरु द्रोणाचार्य, अपने चाचा, भाई, तथा अनेक घनिष्ठ मित्रों और सम्बन्धियों को, शस्त्र-सज्जित होकर, अपने ही विरुद्ध युद्ध करने के लिए खड़ा देखा, उनका हृदय अचानक ही गहन करुणा, मोह और असहनीय वेदना से भर उठा।

अर्जुन के हाथ काँपने लगे, उनका गांडीव धनुष उनके हाथों से छूटने लगा, तथा उन्होंने श्रीकृष्ण से यह गहन, हृदयविदारक प्रश्न पूछा कि क्या अपने ही स्वजनों, गुरुजनों और सम्बन्धियों का अंत करके प्राप्त किया गया राज्य और विजय, वास्तव में किसी भी मूल्य पर उचित हो सकता है, वे स्वयं को इस युद्ध से पूर्णतः विरत होने की, तथा शस्त्र त्यागकर भिक्षा माँगने की भी इच्छा व्यक्त करने लगे।

यह गहन विषाद, जो अर्जुन जैसे असाधारण, अजेय योद्धा के हृदय में उत्पन्न हुआ, वास्तव में स्वयं मानवता के उस शाश्वत, गहन द्वंद्व का प्रतीक था जो कर्तव्य और स्नेह, धर्म और मोह के मध्य निरंतर चलता रहता है, यह क्षण, इतिहास के सबसे गहन, सबसे सार्वभौमिक आध्यात्मिक संकटों में से एक बन गया।

अर्जुन, अपने धनुष को रथ में रखकर, गहन शोक और असमंजस में डूबे हुए, रथ के पिछले भाग में बैठ गए, यह घोषित करते हुए कि वे इस युद्ध में युद्ध नहीं करेंगे, यही वह क्षण था जिसने स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को अपना वह असाधारण, अमर उपदेश आरम्भ करने के लिए प्रेरित किया, जो आगे "श्रीमद्भगवद्गीता" के नाम से विश्वभर में सदा के लिए अमर हो गया।

इस अध्याय की शिक्षा

कर्तव्य और स्नेह के मध्य उत्पन्न गहन द्वंद्व, चाहे कितना भी असहनीय प्रतीत हो, वास्तव में गहनतम आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति का प्रारंभिक द्वार भी बन सकता है।

अध्याय 4

श्रीकृष्ण का सांख्य-योग उपदेश

श्रीकृष्ण ने, अर्जुन के इस गहन मोह और विषाद को देखकर, सर्वप्रथम उन्हें अत्यंत स्नेहपूर्ण किंतु दृढ़ शब्दों में यह समझाया कि यह क्षणिक दुर्बलता एक क्षत्रिय योद्धा के लिए सर्वथा अनुचित है, तथा यह उनकी वास्तविक वीरता और कर्तव्य-बोध के सर्वथा विपरीत है।

उन्होंने आत्मा की शाश्वत, अविनाशी प्रकृति का गहन ज्ञान प्रदान करते हुए समझाया कि आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है, वह अजर-अमर है, तथा जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा भी एक शरीर त्यागकर दूसरा शरीर धारण करती है, अतः किसी के शरीर के नाश पर शोक करना, वास्तव में अज्ञान का ही परिणाम है।

श्रीकृष्ण ने यह भी स्पष्ट किया कि अर्जुन एक क्षत्रिय है, तथा धर्मयुद्ध में लड़ना उसका स्वाभाविक, अनिवार्य कर्तव्य है, यदि वह इस कर्तव्य से विमुख होता है, तो यह न केवल उसके अपने धर्म का उल्लंघन होगा, अपितु यह सम्पूर्ण संसार में उसे अपयश और कायरता का पात्र भी बनाएगा।

उन्होंने यह गहन सिद्धांत भी स्थापित किया कि सुख-दुःख, जय-पराजय, लाभ-हानि, ये सभी द्वंद्व अस्थायी और क्षणभंगुर हैं, तथा एक ज्ञानी व्यक्ति को इन सभी के प्रति समभाव रखते हुए, केवल अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, यह समभाव ही सांख्य-योग अर्थात् ज्ञान-मार्ग की मूल आधारशिला है।

इस प्रारंभिक, गहन उपदेश के माध्यम से, श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मन में उस आवश्यक बौद्धिक और आध्यात्मिक आधार की स्थापना की, जिस पर आगे के अध्यायों में वे कर्मयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग जैसे अन्य गहन, व्यावहारिक सिद्धांतों का विस्तृत निर्माण करने वाले थे।

इस अध्याय की शिक्षा

आत्मा की शाश्वत, अविनाशी प्रकृति का सच्चा ज्ञान ही मनुष्य को शोक, भय और मोह के उस बंधन से मुक्त कर सकता है जो उसे उसके स्वाभाविक कर्तव्य से विमुख करता है।

अध्याय 5

कर्मयोग का उपदेश

श्रीकृष्ण ने आगे अर्जुन को "कर्मयोग" का वह असाधारण, व्यावहारिक सिद्धांत समझाया, जो आगे चलकर सम्पूर्ण भारतीय दर्शन का एक आधारभूत स्तंभ बना — कि मनुष्य को अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन अवश्य करना चाहिए, किंतु उसे अपने कर्मों के फल के प्रति किसी भी प्रकार की आसक्ति नहीं रखनी चाहिए।

उन्होंने यह गहन सूत्र दिया कि "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" — अर्थात् मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल पर कदापि नहीं, तथा जो व्यक्ति फल की आसक्ति से मुक्त होकर, केवल कर्तव्य-भाव से कर्म करता है, वही वास्तव में सच्चा योगी और सच्चा त्यागी है, चाहे वह कर्म कितना भी सक्रिय और व्यस्त प्रतीत क्यों न हो।

श्रीकृष्ण ने यह भी समझाया कि पूर्ण निष्क्रियता कभी भी सच्चे त्याग का मार्ग नहीं हो सकती, क्योंकि प्रकृति के गुणों के अधीन, कोई भी प्राणी क्षण भर के लिए भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता, अतः सच्चा त्याग कर्म से पलायन में नहीं, अपितु कर्म को निष्काम, निःस्वार्थ भाव से करने में निहित है।

उन्होंने यज्ञ की गहन अवधारणा को भी विस्तारित करते हुए समझाया कि सम्पूर्ण सृष्टि यज्ञ-चक्र के माध्यम से ही संचालित होती है, तथा जो व्यक्ति केवल अपने स्वार्थ के लिए कर्म करता है, वह इस सार्वभौमिक चक्र का उल्लंघन करता है, जबकि जो निःस्वार्थ भाव से, सबके कल्याण हेतु कर्म करता है, वह इस यज्ञ-चक्र को ही आगे बढ़ाता है।

इस उपदेश ने अर्जुन को यह गहन स्पष्टता प्रदान की कि युद्ध करना, यदि यह उनके कर्तव्य के अनुरूप, बिना किसी व्यक्तिगत द्वेष या लालच के, केवल धर्म की रक्षा हेतु किया जाए, तो यह कदापि पाप नहीं, अपितु एक पवित्र, अनिवार्य कर्तव्य ही है।

इस अध्याय की शिक्षा

अपने कर्तव्य का पालन, फल की आसक्ति से पूर्णतः मुक्त होकर करना ही सच्चा योग है, कर्म से पलायन कभी भी वास्तविक त्याग नहीं हो सकता।

अध्याय 6

ज्ञान, ध्यान एवं विभिन्न मार्गों का उपदेश

श्रीकृष्ण ने आगे अर्जुन को ज्ञानयोग का गहन विवेचन प्रस्तुत किया, यह समझाते हुए कि सच्चा ज्ञान वह है जो मनुष्य को आत्मा और प्रकृति के मध्य के मूल भेद को स्पष्ट रूप से पहचानने में सक्षम बनाए, तथा जो व्यक्ति इस भेद को पूर्ण रूप से समझ लेता है, वह संसार के समस्त बंधनों से स्वतः ही मुक्त हो जाता है।

उन्होंने ध्यानयोग की विस्तृत विधि भी समझाई, एकांत स्थान में, स्थिर आसन में बैठकर, मन को इंद्रियों के विषयों से हटाकर, एकाग्रचित्त होकर परमात्मा में लीन होने की यह साधना, अत्यंत कठिन होते हुए भी, आत्म-साक्षात्कार का एक अत्यंत प्रभावी मार्ग है।

अर्जुन ने, इस उपदेश के मध्य, यह गहन प्रश्न पूछा कि यदि मन इतना चंचल और अस्थिर है कि उसे वायु के समान नियंत्रित करना असम्भव प्रतीत होता है, तो सामान्य मनुष्य इस ध्यान-मार्ग को कैसे सिद्ध कर सकता है, श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि निरंतर अभ्यास और वैराग्य से, यह चंचल मन भी क्रमिक रूप से वश में लाया जा सकता है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जो साधक इस मार्ग पर चलते हुए भी सिद्धि प्राप्त करने से पूर्व ही मृत्यु को प्राप्त हो जाए, वह व्यर्थ नहीं जाता, अपितु वह अगले जन्म में उसी साधना को उसी बिंदु से पुनः आरम्भ करने का दुर्लभ अवसर प्राप्त करता है, जो उसे क्रमिक रूप से पूर्ण सिद्धि की ओर ले जाता है।

इस प्रकार, ज्ञान और ध्यान के इन गहन मार्गों के माध्यम से, श्रीकृष्ण ने अर्जुन के समक्ष आत्म-साक्षात्कार की एक व्यापक, बहुआयामी पद्धति प्रस्तुत की, यह स्पष्ट करते हुए कि प्रत्येक मनुष्य अपनी प्रकृति और क्षमता के अनुरूप, इनमें से किसी भी मार्ग को चुनकर, अंततः उसी एक, परम सत्य तक पहुँच सकता है।

इस अध्याय की शिक्षा

आत्म-साक्षात्कार के अनेक मार्ग हो सकते हैं, किंतु प्रत्येक मार्ग पर निरंतर अभ्यास और वैराग्य ही, अंततः उसी एक परम सत्य तक पहुँचाता है।

अध्याय 7

विभूति-योग — भगवान की विभूतियाँ

श्रीकृष्ण ने आगे अर्जुन को अपनी दिव्य विभूतियों — अर्थात् उन विशिष्ट, श्रेष्ठ अभिव्यक्तियों का वर्णन किया जिनमें वे अपनी परम शक्ति को विशेष रूप से प्रकट करते हैं, यह समझाते हुए कि संसार की प्रत्येक श्रेष्ठ, असाधारण वस्तु या व्यक्ति में, वे स्वयं ही किसी न किसी विशेष रूप में उपस्थित हैं।

उन्होंने कहा कि आदित्यों में वे विष्णु हैं, नक्षत्रों में चंद्रमा, वेदों में सामवेद, देवताओं में इंद्र, पर्वतों में हिमालय, नदियों में गंगा, तथा ऋषियों में भृगु और व्यास हैं, इस प्रकार, उन्होंने असंख्य उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि सम्पूर्ण सृष्टि की प्रत्येक उत्कृष्टता, वास्तव में उन्हीं की एक झलक मात्र है।

अर्जुन, इन असाधारण विभूतियों को सुनकर, गहन विस्मय और भक्ति से अभिभूत होकर, श्रीकृष्ण से यह अनुरोध किया कि वे उन्हें अपना वह वास्तविक, सम्पूर्ण, विराट स्वरूप दिखाएँ, जिसमें वे इन समस्त विभूतियों तथा सम्पूर्ण सृष्टि को धारण किए हुए हैं, यह एक ऐसी याचना थी जिसने आगे उस सम्पूर्ण महाकाव्य के सबसे अलौकिक, चरम दर्शन की पृष्ठभूमि रची।

श्रीकृष्ण, अर्जुन की इस गहन भक्ति और जिज्ञासा से प्रसन्न होकर, यह स्वीकार करते हुए कि सामान्य मानवीय नेत्रों से यह विराट रूप देखना असम्भव है, उन्होंने अर्जुन को एक विशेष, दिव्य दृष्टि प्रदान करने का वचन दिया, जिसके माध्यम से वह इस असाधारण, अलौकिक दर्शन को सहन और अनुभव कर सके।

यह क्षण, गीता के सम्पूर्ण उपदेश का सर्वाधिक नाटकीय, चरम बिंदु बनने वाला था, जिसमें भगवान अपने सबसे प्रिय भक्त और सखा को, उनके अनुरोध पर, अपना वह सम्पूर्ण, असीम, ब्रह्मांडीय स्वरूप प्रकट करने वाले थे जिसकी कल्पना भी सामान्य मानवीय बुद्धि के लिए असम्भव थी।

इस अध्याय की शिक्षा

संसार की प्रत्येक श्रेष्ठता और उत्कृष्टता में भगवान की उपस्थिति को पहचानना, सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति श्रद्धा और विस्मय का एक गहन स्रोत बन जाता है।

अध्याय 8

विश्वरूप दर्शन

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान की, तथा उसी क्षण, कुरुक्षेत्र के उस मैदान में, दोनों सेनाओं के ठीक मध्य, अपना वह असाधारण, अकल्पनीय विश्वरूप प्रकट किया, जिसमें असंख्य मुख, असंख्य नेत्र, असंख्य भुजाएँ, तथा असंख्य दिव्य अस्त्र-आभूषण एक साथ दृष्टिगोचर होने लगे, यह रूप सम्पूर्ण आकाश और पृथ्वी को अपने भीतर समाहित किए हुए था।

अर्जुन ने इस विराट रूप में समस्त देवताओं, ऋषियों, नागों, तथा सम्पूर्ण चराचर सृष्टि को एक साथ समाहित देखा, उन्होंने यह भी देखा कि युद्धभूमि में उपस्थित समस्त कौरव योद्धा — भीष्म, द्रोण, कर्ण, दुर्योधन सहित — इस विराट रूप के भीषण मुखों में स्वयं ही प्रवेश करते हुए, अपने अवश्यंभावी विनाश की ओर तीव्रता से अग्रसर हो रहे हैं।

यह दृश्य इतना भयंकर, इतना अकल्पनीय था कि अर्जुन का हृदय भय और विस्मय से काँप उठा, उन्होंने काँपते हुए हाथ जोड़कर, इस विराट रूप की गहन स्तुति की, तथा भयभीत होकर श्रीकृष्ण से क्षमा-याचना करने लगे कि उन्होंने अब तक उन्हें केवल एक साधारण मित्र और सखा समझकर, कभी-कभी अनौपचारिक व्यवहार भी किया था।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि यह विराट, भयंकर रूप स्वयं काल (समय) है, जो इस युद्धभूमि में उपस्थित समस्त योद्धाओं का पूर्व-निर्धारित संहार करने के लिए ही प्रकट हुआ है, तथा अर्जुन को केवल इस पूर्व-निर्धारित नियति के एक निमित्त-मात्र, एक साधन के रूप में कार्य करना है, इस विनाश का वास्तविक कर्ता वे स्वयं ही, अर्थात् स्वयं भगवान हैं।

अर्जुन, इस असाधारण दर्शन से गहराई से परिवर्तित होकर, तथा श्रीकृष्ण की करुणापूर्ण प्रार्थना पर, उन्होंने अपने उस सौम्य, चतुर्भुज रूप को पुनः धारण करने का अनुरोध किया, जिससे अर्जुन का भय शांत हो सके, यह असाधारण दर्शन, अर्जुन के हृदय में युद्ध के प्रति उनके अंतिम, शेष संदेह और मोह को भी सदा के लिए समाप्त कर गया।

इस अध्याय की शिक्षा

जब मनुष्य यह गहराई से पहचान लेता है कि वह स्वयं किसी विशाल, दैवीय योजना का केवल एक निमित्त-मात्र है, तो उसका व्यक्तिगत मोह और भय स्वतः ही विलीन होने लगता है।

अध्याय 9

भक्तियोग एवं गीता का समापन उपदेश

अपने विराट रूप से पुनः अपने प्रिय, सौम्य चतुर्भुज रूप में लौटकर, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भक्तियोग का वह गहन, सर्वसुलभ मार्ग समझाया, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि जो भक्त अपना सम्पूर्ण मन उन्हीं में स्थिर रखता है, तथा अनन्य, निश्छल भक्ति से उनकी उपासना करता है, वह उन्हें सर्वाधिक प्रिय है।

उन्होंने अर्जुन को क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के मध्य के गहन भेद को भी विस्तार से समझाया, तथा प्रकृति के तीन गुणों — सत्त्व, रजस और तमस — के प्रभाव से मुक्त होकर, गुणातीत अवस्था प्राप्त करने के मार्ग का भी विस्तृत वर्णन किया।

गीता के अंतिम अध्यायों में, श्रीकृष्ण ने दैवी और आसुरी सम्पदाओं के मध्य के भेद को स्पष्ट किया, तथा श्रद्धा के त्रिविध प्रकारों तथा त्याग के वास्तविक स्वरूप पर भी गहन प्रकाश डाला, यह सुनिश्चित करते हुए कि अर्जुन इस उपदेश के प्रत्येक पहलू को पूर्ण स्पष्टता के साथ समझ ले।

अंततः, श्रीकृष्ण ने इस सम्पूर्ण, विशाल उपदेश का सार प्रस्तुत करते हुए, अर्जुन को वह अंतिम, सर्वाधिक गहन सूत्र दिया — "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" — अर्थात् समस्त धर्मों और कर्तव्यों के भार को त्यागकर, केवल उन्हीं की शरण में आ जाओ, वे स्वयं ही उसे समस्त पापों से मुक्त कर देंगे, यह वचन अत्यंत करुणामय, सर्वोच्च आश्वासन का प्रतीक था।

अर्जुन, इस सम्पूर्ण, अठारह अध्यायों के गहन उपदेश से पूर्णतः मोहमुक्त और ज्ञानसम्पन्न होकर, अपने मन में उठे समस्त संशयों और भ्रमों को त्यागकर, अंततः पूर्ण दृढ़ता और स्पष्टता के साथ यह घोषणा की कि वे अब श्रीकृष्ण के वचनों के अनुसार, युद्ध करने के लिए पूर्णतः तत्पर हैं, इस प्रकार, स्वयं गीता का यह असाधारण उपदेश, विश्व-इतिहास के सबसे भीषण युद्ध के आरम्भ की, सबसे गहन, सबसे शाश्वत पृष्ठभूमि बना।

इस अध्याय की शिक्षा

समस्त संशयों और भ्रमों के त्याग के पश्चात् प्राप्त हुई स्पष्टता ही सच्चे कर्तव्य-पालन की सबसे सुदृढ़ नींव है, यही श्रीमद्भगवद्गीता का शाश्वत, सार्वभौमिक संदेश है।

अध्याय 10

युद्ध का प्रथम दिन

गीता के इस असाधारण उपदेश के पश्चात्, अंततः वह ऐतिहासिक क्षण आ पहुँचा जब कुरुक्षेत्र के मैदान में, दोनों विशाल सेनाओं के मध्य वह भीषण, अठारह दिनों तक चलने वाला महासंग्राम विधिवत् रूप से आरम्भ हुआ, भीष्म पितामह, कौरव-सेना के सेनापति के रूप में, अपने विशाल रथ पर सवार होकर, सेना के अग्र भाग में स्थित हुए।

पांडव-पक्ष से, धृष्टद्युम्न, जो द्रोणाचार्य के वध हेतु ही अग्नि से प्रकट हुए थे, को प्रधान सेनापति नियुक्त किया गया, दोनों सेनाओं ने अत्यंत सुव्यवस्थित, सुनियोजित व्यूह-रचनाओं में स्वयं को संगठित किया, तथा भीषण युद्ध-घोष के साथ, एक-दूसरे की ओर तीव्रता से अग्रसर हुईं।

इस प्रथम दिन के युद्ध में, दोनों पक्षों के अनेक वीर योद्धाओं ने अपने असाधारण पराक्रम का प्रदर्शन किया, भीष्म पितामह ने स्वयं पांडव-सेना पर भीषण आक्रमण किया, अपने अजेय बाणों की वर्षा से अनेक योद्धाओं को घायल और मूर्च्छित करते हुए, यह स्पष्ट कर दिया कि उनका पराक्रम वृद्धावस्था के बावजूद तनिक भी क्षीण नहीं हुआ है।

अभिमन्यु, राजा उत्तर, तथा अन्य अनेक युवा पांडव-योद्धाओं ने भी अपनी असाधारण वीरता का प्रदर्शन किया, यद्यपि इस प्रथम दिन के भीषण संघर्ष में, कौरव-सेना के असाधारण अनुभव और भीष्म के नेतृत्व के कारण, पांडव-सेना को कुछ हद तक पीछे हटना पड़ा, यद्यपि उनका मनोबल तनिक भी नहीं टूटा।

सूर्यास्त के साथ, इस प्रथम दिन के युद्ध का अंत हुआ, दोनों पक्षों ने अपने-अपने घायल और मृत सैनिकों को एकत्रित किया, तथा रात्रि विश्राम के पश्चात्, अगले दिन की और भी अधिक भीषण रणनीति की तैयारी में जुट गए, यह केवल उस दीर्घकालिक, असहनीय संघर्ष की पहली झलक मात्र थी।

इस अध्याय की शिक्षा

एक दीर्घकालिक, भीषण संघर्ष का प्रथम दिन, चाहे उसका परिणाम कैसा भी हो, केवल आगे आने वाली और भी गहन चुनौतियों की एक झलक मात्र प्रस्तुत करता है।

अध्याय 11

भीष्म-अर्जुन का प्रथम संघर्ष

युद्ध के आरंभिक दिनों में, अर्जुन और भीष्म के मध्य कई बार प्रत्यक्ष संघर्ष हुआ, यद्यपि अर्जुन, अपने पितामह के प्रति अपने गहन स्नेह और सम्मान के कारण, अपनी पूर्ण शक्ति और गंभीरता के साथ उनसे युद्ध करने में स्वाभाविक रूप से हिचकिचाते रहे, वे अपने बाणों का प्रयोग करते तो थे, किंतु उनमें वह निर्णायक तीव्रता स्पष्ट रूप से अनुपस्थित थी।

भीष्म, अपनी असाधारण अनुभवशीलता से, अर्जुन की इस अनिच्छा को तुरन्त पहचान गए, तथा उन्होंने स्वयं अर्जुन को यह चुनौती भी दी कि वह अपनी पूर्ण शक्ति से युद्ध करे, क्योंकि आधे-अधूरे मन से किया गया युद्ध, न तो उचित है और न ही किसी काम का, यह उन्हीं का धर्म था कि वे अपने कर्तव्य के प्रति पूर्ण निष्ठा रखते हुए युद्ध करें।

इस अवधि में, भीष्म ने पांडव-सेना पर अपने असाधारण, अत्यंत भीषण आक्रमण जारी रखे, उनके बाणों की वर्षा इतनी सघन और अजेय थी कि पांडव-सेना के अनेक अनुभवी योद्धा भी उनके समक्ष टिक नहीं पाते थे, यह स्पष्ट होता जा रहा था कि जब तक भीष्म युद्धरत हैं, कौरव-सेना की पराजय लगभग असम्भव प्रतीत होती है।

श्रीकृष्ण, अर्जुन के इस संकोच और अनिर्णय को देखकर, बार-बार उन्हें यह स्मरण कराते रहे कि यह व्यक्तिगत भावनाओं का समय नहीं, अपितु धर्म-रक्षा हेतु पूर्ण कर्तव्य-निष्ठा का समय है, तथा भीष्म स्वयं, अपने कर्तव्य-बोध के कारण, इस युद्ध में अपनी पूर्ण शक्ति से लड़ रहे हैं, अतः अर्जुन को भी उसी निष्ठा से युद्ध करना चाहिए।

यह आंतरिक द्वंद्व, अर्जुन के हृदय में आगामी कई दिनों तक निरंतर बना रहा, यह इस बात का गहन प्रमाण था कि गीता का उपदेश सुन लेने मात्र से भी, व्यक्तिगत स्नेह और कर्तव्य के मध्य का यह द्वंद्व तत्काल पूर्णतः समाप्त नहीं होता, अपितु इसके लिए निरंतर, सजग प्रयास और अभ्यास आवश्यक होता है।

इस अध्याय की शिक्षा

गहनतम ज्ञान प्राप्त कर लेने के पश्चात् भी, व्यक्तिगत स्नेह और कर्तव्य के मध्य का द्वंद्व तत्काल समाप्त नहीं होता, इसके लिए निरंतर, सजग अभ्यास आवश्यक है।

अध्याय 12

उत्तर एवं अन्य वीरों की वीरगति

युद्ध के आरंभिक दिनों में ही, राजा विराट के पुत्र उत्तर, जिन्होंने अज्ञातवास के काल में अर्जुन के सारथी के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, अत्यंत साहसपूर्वक युद्धभूमि में उतरे, तथा मद्र-नरेश शल्य के विरुद्ध एक असाधारण, वीरतापूर्ण संघर्ष किया।

उत्तर ने प्रारम्भ में शल्य के रथ और अश्वों को नष्ट करते हुए, अपनी असाधारण वीरता का प्रदर्शन किया, किंतु अंततः, अनुभवी शल्य के समक्ष, वे अपने प्राणों की आहुति दे बैठे, यह मृत्यु सम्पूर्ण मत्स्य-सेना तथा पांडवों के लिए गहन शोक का कारण बनी, विशेष रूप से क्योंकि उत्तर का विवाह अभिमन्यु से हुई उत्तरा के भाई के रूप में, पांडवों से घनिष्ठ पारिवारिक सम्बन्ध भी था।

इसी अवधि में, राजा विराट के दूसरे पुत्र, श्वेत, भी अत्यंत वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए, स्वयं भीष्म पितामह के विरुद्ध संघर्ष में, अंततः वीरगति को प्राप्त हुए, यह दोहरी क्षति राजा विराट के लिए असहनीय पीड़ा का कारण बनी, किंतु उन्होंने अपने पुत्रों के इस बलिदान को धर्मयुद्ध की एक अनिवार्य, गौरवपूर्ण आहुति के रूप में स्वीकार किया।

इन आरंभिक क्षतियों के बावजूद, पांडव-सेना का मनोबल तनिक भी नहीं टूटा, अपितु प्रत्येक वीरगति ने शेष योद्धाओं में और भी अधिक दृढ़ संकल्प और प्रतिशोध की भावना को प्रज्वलित किया, यह स्पष्ट होता जा रहा था कि यह युद्ध किसी भी पक्ष के लिए सरल या शीघ्र समाप्त होने वाला नहीं है।

प्रत्येक दिन के साथ, युद्ध की भीषणता और भी अधिक तीव्र होती गई, दोनों पक्षों के असंख्य वीर योद्धा, अपने-अपने कर्तव्य और निष्ठा के अनुसार, इस विशाल, अपरिहार्य संघर्ष में अपने प्राणों की आहुति देते रहे, यह क्रम आगामी अनेक दिनों तक इसी प्रकार निरंतर चलता रहने वाला था।

इस अध्याय की शिक्षा

युद्ध की प्रत्येक वीरगति, चाहे कितनी भी शोकाकुल क्यों न हो, यदि धर्म और कर्तव्य के लिए दी गई हो, तो वह व्यर्थ नहीं जाती, अपितु शेष योद्धाओं के संकल्प को और भी दृढ़ करती है।

अध्याय 13

इरावान का बलिदान

अर्जुन के पुत्र इरावान, जो नाग-कन्या उलूपी से उत्पन्न हुए थे, तथा जो अपनी माता के नाग-लोक में पले-बढ़े थे, युद्ध के आरंभिक दिनों में, अपनी असाधारण नाग-शक्ति और युद्ध-कौशल के साथ, कुरुक्षेत्र के मैदान में अपने पिता की सहायता हेतु उपस्थित हुए, उनका पराक्रम शीघ्र ही सम्पूर्ण सेना में विख्यात हो गया।

शकुनि तथा दुर्योधन, इरावान के इस असाधारण पराक्रम से चिंतित होकर, उसे किसी भी मूल्य पर परास्त करने का निश्चय किया, उन्होंने राक्षस अलंबुष को, जो स्वयं मायावी शक्तियों से सम्पन्न था, इरावान के विरुद्ध युद्ध हेतु भेजा, यह एक अत्यंत असमान, कुटिल रणनीति थी।

अलंबुष, अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, इरावान के साथ एक भीषण, छलपूर्ण युद्ध में उलझा, यद्यपि इरावान ने अत्यंत वीरतापूर्वक संघर्ष किया, अंततः अलंबुष के छल और उसकी मायावी शक्ति के समक्ष, इरावान वीरगति को प्राप्त हुए, यह अर्जुन के लिए एक अत्यंत गहन, व्यक्तिगत शोक का कारण बना।

इरावान की इस वीरगति ने, आगे चलकर, घटोत्कच के हृदय में भी अपने ही भाई-तुल्य इरावान के प्रति गहन शोक और अलंबुष के प्रति प्रतिशोध की भावना को प्रज्वलित किया, जो युद्ध के आगामी दिनों में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली थी।

इरावान की यह कथा, इस बात का भी गहन प्रमाण है कि इस विशाल महासंग्राम में, केवल प्रमुख, सुविख्यात योद्धा ही नहीं, अपितु असंख्य अन्य वीर, चाहे वे किसी भी कुल या परिस्थिति से आए हों, अपने धर्म और कर्तव्य के प्रति अटूट निष्ठा के साथ, अपने प्राणों की आहुति देते रहे, प्रत्येक का बलिदान अपने आप में एक गहन, मार्मिक गाथा है।

इस अध्याय की शिक्षा

युद्ध की विशालता में, प्रत्येक योद्धा का बलिदान, चाहे वह कितना भी अल्प-चर्चित क्यों न हो, अपने आप में एक सम्पूर्ण, गहन गाथा और शिक्षा समेटे होता है।

अध्याय 14

घटोत्कच का राक्षसी युद्ध

भीम-पुत्र घटोत्कच, अपनी माता हिडिंबा से प्राप्त असाधारण राक्षसी शक्तियों — विशेष रूप से रात्रि के समय अपनी शक्ति के कई गुना बढ़ जाने की क्षमता — के साथ, युद्ध के आरंभिक दिनों में पांडव-सेना के लिए एक अत्यंत मूल्यवान, निर्णायक योद्धा सिद्ध हुए।

एक रात्रि-युद्ध में, जब भीषण अंधकार के मध्य दोनों सेनाएँ भी अपनी सामान्य दृष्टि-सीमा में संघर्षरत थीं, घटोत्कच ने अपनी मायावी, राक्षसी शक्तियों का पूर्ण प्रयोग करते हुए, कौरव-सेना में भीषण त्रास और विनाश मचाया, उनकी विशाल, भयंकर काया तथा अलौकिक युद्ध-कौशल के समक्ष अनेक कौरव योद्धा भयभीत होकर पलायन करने लगे।

इसी रात्रि-युद्ध में, घटोत्कच ने अलंबुष का भी सामना किया, जिसने पूर्व में उनके सहोदर इरावान का अंत किया था, दोनों के मध्य एक अत्यंत भीषण, मायावी युद्ध हुआ, जिसमें अंततः घटोत्कच ने अलंबुष का वध कर, अपने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध पूर्ण किया।

दुर्योधन तथा कौरव-सेना के अन्य प्रमुख योद्धा, घटोत्कच की इस असाधारण, विनाशकारी शक्ति से अत्यंत भयभीत हो उठे, तथा उन्होंने भीष्म से इस संकट का शीघ्र समाधान खोजने का अनुरोध किया, यह घटोत्कच का प्रभाव ही था जिसने आगे चलकर, कर्ण-पर्व में, कर्ण को अपनी सर्वाधिक शक्तिशाली, एक बार प्रयोग योग्य वासवी शक्ति का प्रयोग करने के लिए विवश किया।

घटोत्कच का यह असाधारण योगदान, इस बात का गहन प्रमाण है कि इस महासंग्राम में विजय केवल पारम्परिक धनुर्विद्या और शस्त्र-कौशल से नहीं, अपितु विविध प्रकार की शक्तियों, रणनीतियों तथा असाधारण योद्धाओं के समन्वित प्रयासों से ही सम्भव हुई।

इस अध्याय की शिक्षा

विजय अकेले पारम्परिक शक्ति से नहीं, अपितु विविध, असाधारण योद्धाओं और उनकी विशिष्ट क्षमताओं के समन्वित, बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग से प्राप्त होती है।

अध्याय 15

भीष्म का अजेय पराक्रम

युद्ध के प्रथम नौ दिनों तक, भीष्म पितामह ने अपनी उस प्रतिज्ञा को पूर्ण निष्ठा के साथ निभाया जो उन्होंने सेनापति-पद स्वीकार करते समय ली थी — प्रतिदिन दस सहस्र पांडव-योद्धाओं को परास्त करना, उनकी यह भीषण, अजेय पराक्रम-गाथा सम्पूर्ण कुरुक्षेत्र में विख्यात हो गई।

भीष्म का धनुर्विद्या-कौशल इतना असाधारण था कि उनके बाणों की गति और सटीकता के समक्ष, पांडव-सेना के अनेक अनुभवी योद्धा भी टिक नहीं पाते थे, वे एक साथ कई शत्रुओं का सामना करते हुए भी, अपने रथ की गति और अपने बाणों के लक्ष्य में तनिक भी चूक नहीं करते थे।

पांडव-सेना में, भीष्म के इस निरंतर, अजेय पराक्रम से गहन चिंता और निराशा व्याप्त होने लगी, अनेक योद्धा यह खुलकर स्वीकार करने लगे कि जब तक भीष्म युद्धरत हैं, कौरव-सेना की पराजय, और इस प्रकार पांडवों की अंतिम विजय, लगभग असम्भव प्रतीत होती है।

युधिष्ठिर, अपने पितामह के इस असाधारण, भीषण पराक्रम को देखकर, गहन वेदना और असमंजस में डूब गए, वे एक ओर अपने पितामह के प्रति अपने गहन स्नेह और सम्मान से बंधे थे, तथा दूसरी ओर, अपनी सेना की इस भीषण क्षति और आसन्न पराजय की आशंका से भी अत्यंत व्यथित थे।

श्रीकृष्ण, इस गंभीर, चिंताजनक स्थिति को भलीभाँति समझते हुए, यह अनुभव करने लगे कि यदि भीष्म के इस अजेय पराक्रम का कोई ठोस, निर्णायक समाधान शीघ्र न खोजा गया, तो सम्पूर्ण पांडव-सेना ही धीरे-धीरे नष्ट हो जाने के गंभीर संकट में पड़ सकती है, यह चिंता ही आगे की महत्त्वपूर्ण घटनाओं की पृष्ठभूमि बनी।

इस अध्याय की शिक्षा

एक असाधारण, अनुभवी योद्धा का अटूट संकल्प और कौशल, अकेले ही किसी विशाल सेना के मनोबल को गहराई से हिला सकता है, चाहे संख्या में वह कितनी भी अधिक क्यों न हो।

अध्याय 16

अर्जुन की शिथिलता एवं श्रीकृष्ण का क्रोध

युद्ध के नौवें दिन, भीष्म का पराक्रम अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया, तथा उन्होंने पांडव-सेना पर ऐसा भीषण आक्रमण किया कि स्वयं अर्जुन भी, अपने पितामह के प्रति अपने गहन स्नेह और संकोच के कारण, पूर्ण गंभीरता और तीव्रता से युद्ध करने में असमर्थ प्रतीत होने लगे।

श्रीकृष्ण, अपने सारथी के आसन से, अर्जुन के इस बार-बार के संकोच और शिथिलता को देखकर, तथा पांडव-सेना की बढ़ती क्षति से अत्यंत क्षुब्ध होकर, अंततः अपने संचित क्रोध को नियंत्रित नहीं रख सके, उन्होंने अपने रथ के पहिये को उखाड़कर, स्वयं भीष्म को रोकने हेतु, अत्यंत क्रोधित मुद्रा में उनकी ओर दौड़ पड़े, यद्यपि उन्होंने स्वयं युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा ली थी।

यह देखकर, अर्जुन तथा उपस्थित समस्त पांडव अत्यंत भयभीत हो उठे, अर्जुन तत्काल श्रीकृष्ण के पीछे दौड़े, तथा उन्हें रोकते हुए, अपनी इस असामान्य शिथिलता के लिए क्षमा-याचना की, तथा उन्हें यह वचन दिया कि वे अब पूर्ण, निर्णायक तीव्रता के साथ युद्ध करेंगे, तथा श्रीकृष्ण को अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने की कदापि आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

स्वयं भीष्म भी, अपने रथ से नीचे उतरकर, श्रीकृष्ण के इस अप्रत्याशित, क्रोधपूर्ण आगमन के समक्ष विनम्रतापूर्वक अपने अस्त्र त्यागकर, यह घोषित किया कि स्वयं भगवान के हाथों मृत्यु प्राप्त करना उनके लिए परम सौभाग्य और गौरव की बात होगी, यह दृश्य स्वयं में युद्धभूमि के मध्य भी भक्ति और श्रद्धा के एक असाधारण, मार्मिक क्षण का प्रतीक बना।

श्रीकृष्ण, अर्जुन के इस वचन तथा उनके संकल्प की दृढ़ता को देखकर, अंततः शांत हुए, तथा पुनः रथ पर आरूढ़ होकर, अर्जुन को यह गंभीर स्मरण कराया कि अब आगे किसी भी प्रकार की शिथिलता या दुर्बलता के लिए कोई स्थान शेष नहीं है, यह घटना अर्जुन के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण, निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई।

इस अध्याय की शिक्षा

कभी-कभी हमारे सबसे प्रिय मित्र और मार्गदर्शक का क्रोध भी, वास्तव में हमें हमारे कर्तव्य के प्रति पुनः जागृत करने की एक गहन, करुणामय अभिव्यक्ति होता है।

अध्याय 17

पांडवों की चिंता — भीष्म को विराम देने का उपाय

युद्ध की इस अत्यंत चिंताजनक स्थिति को देखते हुए, उस रात्रि, युधिष्ठिर ने अपने भाइयों तथा श्रीकृष्ण के साथ एक अत्यंत गंभीर, आवश्यक मंत्रणा की, यह विचार-विमर्श करते हुए कि भीष्म के इस अजेय, विनाशकारी पराक्रम का अंततः कोई ठोस, निर्णायक समाधान अवश्य खोजा जाना चाहिए, अन्यथा उनकी सेना का पूर्ण विनाश निश्चित प्रतीत होता है।

श्रीकृष्ण ने यह सुझाव दिया कि चूँकि भीष्म स्वयं अत्यंत धर्मपरायण और स्नेहिल हैं, अतः स्वयं युधिष्ठिर को, अपने पितामह के पास प्रत्यक्ष रूप से जाकर, अत्यंत विनम्रतापूर्वक उनसे स्वयं यह पूछना चाहिए कि उनके इस अजेय पराक्रम को किस विधि से विराम दिया जा सकता है, क्योंकि भीष्म कभी भी अपने प्रिय पौत्रों को असत्य या भ्रामक उत्तर नहीं देंगे।

युधिष्ठिर, यद्यपि इस अत्यंत विचित्र, भावनात्मक रूप से कष्टदायक अनुरोध से संकोच अनुभव कर रहे थे, फिर भी अपनी सेना की रक्षा हेतु, तथा धर्म की अंतिम विजय सुनिश्चित करने हेतु, इस मार्ग को अपनाने के लिए सहमत हुए, यह उनके लिए एक अत्यंत कठिन, हृदयविदारक निर्णय था।

उस रात्रि, युधिष्ठिर, अपने भाइयों तथा श्रीकृष्ण के साथ, निःशस्त्र होकर, अत्यंत विनम्रतापूर्वक भीष्म के शिविर में पहुँचे, यह देखकर भीष्म, अपने प्रिय पौत्रों को इस प्रकार रात्रि में, निःशस्त्र अवस्था में अपने समक्ष देखकर, गहन स्नेह और आश्चर्य से भर उठे, तथा उनका भावभीना स्वागत किया।

भीष्म ने, उनके इस असामान्य आगमन का कारण जानने पर, तनिक भी विचलित हुए बिना, अत्यंत करुणा और स्पष्टता के साथ, अपनी ही मृत्यु का वह गूढ़ रहस्य, जो उन्होंने पूर्व में केवल संकेतों में ही व्यक्त किया था, अब पूर्ण विस्तार से प्रकट करने का निश्चय किया, यह रहस्य आगामी अध्याय की कथा का केंद्र बिंदु बना।

इस अध्याय की शिक्षा

कभी-कभी सबसे कठिन, सबसे संकोचपूर्ण प्रश्न भी, यदि सच्चे स्नेह और विनम्रता के साथ पूछा जाए, सबसे गहन, सबसे आवश्यक समाधान का द्वार खोल सकता है।

अध्याय 18

भीष्म की रात्रि-भेंट — शिखंडी का रहस्य प्रकट

भीष्म ने अपने पौत्रों को अत्यंत स्नेहपूर्ण, किंतु स्पष्ट शब्दों में समझाया कि उन्हें युद्ध से विरत करने का केवल एक ही उपाय है — उन्हें शिखंडी के समक्ष लाना, क्योंकि उन्होंने आजीवन यह दृढ़ प्रतिज्ञा ली थी कि वे कभी भी किसी स्त्री पर, अथवा जो पूर्व में स्त्री रहा हो, उस पर शस्त्र नहीं उठाएँगे।

उन्होंने पुनः शिखंडी की वह सम्पूर्ण, गूढ़ कथा दोहराई — कि वह पूर्वजन्म में काशी-राजकुमारी अंबा थी, जिसने भीष्म से प्रतिशोध लेने हेतु शिव से यह वरदान प्राप्त किया था कि वह अगले जन्म में उनकी मृत्यु का कारण बनेगी, तथा अब, द्रुपद-पुत्र शिखंडी के रूप में, वह इस भीषण संग्राम में पांडव-सेना का ही एक अंग है।

भीष्म ने यह स्पष्ट परामर्श दिया कि अर्जुन को चाहिए कि वह शिखंडी को अपने रथ के आगे रखकर युद्धभूमि में उतरे, वे स्वयं शिखंडी को पहचानकर, अपनी प्रतिज्ञा के कारण, उस पर कोई प्रत्याक्रमण नहीं करेंगे, तथा इसी अवसर का लाभ उठाकर, अर्जुन शिखंडी के पीछे से, उन पर निर्णायक बाण-वर्षा कर सकता है।

यह उपदेश, भीष्म ने अत्यंत शांत, गंभीर स्वर में दिया, बिना किसी शोक या भय के, अपितु इस गहन स्वीकृति के साथ कि उनकी नियति अब निश्चित हो चुकी है, तथा वे इसे धर्म और अपनी प्रतिज्ञा की पवित्रता की रक्षा हेतु सहर्ष स्वीकार करते हैं, यह उनकी असाधारण आत्मिक शक्ति और संयम का एक अंतिम, गहन प्रमाण था।

पांडव, अपने पितामह के इस असाधारण त्याग और मार्गदर्शन से गहराई से आर्द्र होकर, भारी हृदय के साथ उनसे विदा लेकर अपने शिविर लौटे, तथा अगले दिन, दसवें दिन के युद्ध हेतु, इसी गूढ़, हृदयविदारक रणनीति के साथ तैयारी करने लगे।

इस अध्याय की शिक्षा

जब कोई महान आत्मा अपनी ही मृत्यु का मार्ग प्रकट करती है, तो यह भय या पराजय का नहीं, अपितु धर्म और प्रतिज्ञा के प्रति उसकी अंतिम, सर्वोच्च निष्ठा का प्रमाण होता है।

अध्याय 19

दसवें दिन का युद्ध — शिखंडी का आगे आना

दसवें दिन के युद्ध में, भीष्म की उसी रात्रि-भेंट में दी गई सलाह के अनुसार, अर्जुन ने शिखंडी को अपने रथ के आगे स्थापित किया, तथा दोनों, अत्यंत सुनियोजित रणनीति के साथ, भीष्म की ओर आगे बढ़े, यह क्षण सम्पूर्ण महासंग्राम के सबसे भावनात्मक रूप से जटिल, सबसे गहन क्षणों में से एक बनने वाला था।

शिखंडी, अपनी पूर्वजन्म की स्मृति और गहन प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर, भीष्म पर निरंतर बाण-वर्षा करने लगा, भीष्म, अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार, यह पहचानते हुए कि शिखंडी पूर्वजन्म में एक स्त्री था, उस पर कोई भी प्रत्याक्रमण करने से पूर्णतः विरत रहे, उन्होंने अपने शस्त्र नीचे रख दिए, तथा स्वयं को इस आक्रमण के समक्ष पूर्णतः असुरक्षित छोड़ दिया।

इसी अवसर का लाभ उठाते हुए, अर्जुन ने, शिखंडी की आड़ में, अत्यंत सटीकता और तीव्रता के साथ, भीष्म पर बाणों की एक भीषण, अजेय वर्षा आरम्भ की, यह दृश्य युद्धभूमि में उपस्थित समस्त योद्धाओं के लिए अत्यंत मार्मिक और हृदयविदारक था, क्योंकि विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर, अपने ही पितामह पर, जो स्वेच्छा से निःशस्त्र खड़े थे, बाण चला रहा था।

भीष्म का सम्पूर्ण शरीर, अर्जुन के इन असंख्य, अजेय बाणों से इतनी गहनता से छिद गया कि उनके शरीर पर त्वचा के लिए भी कोई स्थान शेष नहीं रहा, प्रत्येक बाण दूसरे बाण से सटा हुआ था, यह दृश्य इतना असाधारण था कि युद्ध के दोनों पक्ष, क्षण भर के लिए, अपने-अपने संघर्ष को रोककर, इस ऐतिहासिक, हृदयविदारक क्षण को स्तब्ध होकर देखते रह गए।

अंततः, असंख्य बाणों से पूर्णतः बिंधे हुए, भीष्म पितामह अपने रथ से नीचे गिर पड़े, किंतु उनका शरीर भूमि को स्पर्श नहीं कर सका, क्योंकि उनके शरीर में गड़े असंख्य बाण ही, एक असाधारण, अद्वितीय शय्या के समान, उन्हें भूमि से ऊपर, वायु में ही सहारा दिए हुए थे, यह वह ऐतिहासिक "शरशय्या" थी जो आगे चलकर सम्पूर्ण महाभारत की सबसे प्रतीकात्मक, सबसे मार्मिक छवियों में से एक बनी।

इस अध्याय की शिक्षा

एक महान आत्मा का पतन भी, यदि वह अपनी प्रतिज्ञा और धर्म की रक्षा हेतु स्वेच्छा से स्वीकार किया गया हो, विनाश नहीं अपितु उसकी अंतिम, सर्वोच्च महानता का प्रतीक बन जाता है।

अध्याय 20

भीष्म का पतन — बाणों की शय्या

भीष्म का इस प्रकार बाणों की शय्या पर गिरना, दोनों ही सेनाओं के लिए एक असहनीय आघात सिद्ध हुआ, कौरव-सेना, अपने सर्वाधिक अनुभवी, सर्वाधिक विश्वसनीय सेनापति की इस दुर्दशा को देखकर, गहन शोक और भय में डूब गई, जबकि पांडव-सेना भी, अपने पितामह के प्रति गहन स्नेह के कारण, इस विजय में भी गहन वेदना अनुभव कर रही थी।

युद्धविराम की घोषणा हुई, तथा दोनों पक्षों के समस्त प्रमुख योद्धा — दुर्योधन, कर्ण, द्रोणाचार्य, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन सहित सभी — भीष्म के इस शरशय्या के समीप एकत्रित हुए, सभी ने अत्यंत श्रद्धा और गहन वेदना के साथ अपने इस असाधारण, वयोवृद्ध योद्धा को नमन किया।

भीष्म, इस अत्यंत पीड़ादायक अवस्था में भी, पूर्ण चेतना और गरिमा के साथ, उपस्थित समस्त जनों से यह अनुरोध किया कि उनके सिर के नीचे एक उपयुक्त, आरामदायक तकिया रखा जाए, दुर्योधन ने तत्काल एक मूल्यवान, मुलायम तकिया मँगवाया, किंतु भीष्म ने इसे अस्वीकार करते हुए, अर्जुन से एक उपयुक्त, योद्धा के अनुरूप तकिया माँगा।

अर्जुन ने तत्काल यह समझते हुए कि उनके पितामह किस प्रकार के तकिये की अपेक्षा कर रहे हैं, अपने तीन बाणों को भूमि में गाड़कर, भीष्म के मस्तक के नीचे एक अत्यंत उपयुक्त, तीक्ष्ण बाणों की शय्या प्रस्तुत की, भीष्म, इस "बाणों के तकिये" से अत्यंत संतुष्ट हुए, यह घोषित करते हुए कि यही एक सच्चे क्षत्रिय योद्धा के लिए सर्वाधिक उपयुक्त विश्राम-स्थल है।

भीष्म ने आगे यह भी प्रकट किया कि उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त है, तथा वे अपने प्राण तब तक त्यागने की प्रतीक्षा करेंगे जब तक सूर्य उत्तरायण की ओर अग्रसर नहीं होता, तब तक वे इसी शरशय्या पर लेटे रहकर, इस सम्पूर्ण युद्ध के शेष घटनाक्रम को प्रत्यक्ष रूप से देखते रहेंगे, यह वचन आगे की कथा में उनकी एक महत्त्वपूर्ण, निरंतर उपस्थिति की पृष्ठभूमि बना।

इस अध्याय की शिक्षा

एक सच्चा योद्धा, अपने अंतिम, सर्वाधिक कष्टपूर्ण क्षणों में भी, अपनी गरिमा और अपने मूल्यों के प्रति निष्ठा को तनिक भी नहीं त्यागता।

अध्याय 21

भीष्म का शरशय्या पर अनुरोध — जल की याचना

शरशय्या पर लेटे हुए भीष्म ने, अत्यंत तीव्र प्यास से व्याकुल होकर, उपस्थित समस्त योद्धाओं से जल की याचना की, दुर्योधन तथा अन्य अनेकों ने तत्काल स्वर्ण-पात्रों में सुगंधित, शीतल जल मँगवाया, किंतु भीष्म ने इसे स्पष्ट रूप से अस्वीकार करते हुए, केवल अर्जुन से ही जल माँगा।

अर्जुन, अपने पितामह की इस विशेष याचना को समझते हुए, अपने धनुष पर एक विशेष मंत्र-सिद्ध बाण चढ़ाकर, भूमि में एक निश्चित बिंदु पर प्रहार किया, इस प्रहार से भूमि से एक शुद्ध, शीतल जल की धारा प्रस्फुटित हुई, जिसने सीधे भीष्म के मुख में प्रवेश कर उनकी प्यास को शांत किया, यह वास्तव में गंगा-जल की ही एक विशेष धारा थी, जो उनकी माता गंगा की कृपा का प्रतीक थी।

भीष्म, इस अद्भुत, दिव्य जल-प्राप्ति से अत्यंत संतुष्ट होकर, अर्जुन के इस असाधारण अस्त्र-कौशल और उनकी गहन समझ की भूरि-भूरि प्रशंसा की, यह घोषित करते हुए कि केवल अर्जुन ही, अपने असाधारण ज्ञान और कौशल के कारण, उनकी वास्तविक आवश्यकता को समझ सका।

इस घटना के पश्चात्, भीष्म ने उपस्थित समस्त योद्धाओं, विशेष रूप से दुर्योधन को, एक अंतिम, गहन उपदेश दिया कि वह अभी भी समय रहते पांडवों से संधि कर ले, तथा इस विनाशकारी युद्ध को समाप्त कर दे, किंतु दुर्योधन, अपने अटूट अहंकार में, इस अंतिम, करुणामय परामर्श को भी अनसुना करता रहा।

भीष्म, अपनी इस शरशय्या पर, कुरुक्षेत्र के इस भीषण महासंग्राम के शेष सम्पूर्ण घटनाक्रम को, अपनी दिव्य दृष्टि और अनुभव के साथ, मूक साक्षी बनकर देखते रहने के लिए, धैर्यपूर्वक स्थिर हो गए, यह उनकी असाधारण तपस्या और आत्म-संयम का ही एक और गहन प्रमाण था।

इस अध्याय की शिक्षा

सच्चा ज्ञान और समझ, केवल शब्दों में नहीं, अपितु दूसरे की वास्तविक आवश्यकता को बिना कहे भी समझने की गहन संवेदनशीलता में निहित होता है।

अध्याय 22

कर्ण की भीष्म से भेंट

भीष्म के इस पतन के पश्चात्, कर्ण, जो अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार, अब तक भीष्म के प्रति सम्मान में युद्ध से विरत रहा था, अत्यंत भारी, शोकाकुल हृदय के साथ, शरशय्या पर लेटे भीष्म के समक्ष उपस्थित हुआ, तथा उनसे अपनी अब तक की समस्त दूरी और मतभेदों के लिए क्षमा-याचना की।

भीष्म, कर्ण की इस विनम्र उपस्थिति से गहराई से प्रभावित होकर, तथा अपनी मृत्यु के इस निकटतम क्षण में समस्त पुरानी कटुताओं को त्यागते हुए, कर्ण को अत्यंत स्नेहपूर्वक अपने निकट बुलाया, तथा उससे यह गूढ़ सत्य भी साझा किया कि वे कर्ण की वास्तविक पहचान — कि वह कुंती का ज्येष्ठ पुत्र, तथा पांडवों का सबसे बड़ा भाई है — से पहले से ही भलीभाँति अवगत थे।

भीष्म ने कर्ण को अंतिम बार यह करुणामय परामर्श दिया कि वह अभी भी दुर्योधन का साथ त्यागकर, अपने वास्तविक भाइयों के पक्ष में आ जाए, यह अंतिम अवसर उसे अनावश्यक विनाश से बचा सकता है, तथा उसे उसकी सच्ची, गौरवपूर्ण पहचान की ओर वापस ले जा सकता है।

कर्ण, अपने पितामह-तुल्य भीष्म के इस अंतिम, स्नेहपूर्ण अनुरोध से गहराई से आर्द्र होकर, फिर भी अपनी उसी अटूट निष्ठा और कृतज्ञता को दोहराते हुए, यह स्पष्ट किया कि वह अब भी दुर्योधन के प्रति अपने वचन और मित्रता से पीछे नहीं हट सकता, चाहे इसके लिए उसे अपने ही भाइयों के विरुद्ध युद्ध करके अपने प्राणों की आहुति ही क्यों न देनी पड़े।

भीष्म, कर्ण के इस असाधारण, अटल त्याग और निष्ठा को देखकर, गहन श्रद्धा से भर उठे, तथा उन्होंने उसे अपना अंतिम आशीर्वाद प्रदान किया, यह मार्मिक भेंट, इस सम्पूर्ण महाकाव्य में निष्ठा, त्याग और नियति के मध्य के उस गहन, अपरिहार्य द्वंद्व का एक और हृदयस्पर्शी प्रमाण बनी।

इस अध्याय की शिक्षा

मृत्यु के निकटतम क्षण में भी, सच्ची श्रद्धा और करुणा, पुरानी समस्त कटुताओं और मतभेदों को त्यागकर, हृदयों को पुनः जोड़ने में सक्षम होती है।

अध्याय 23

भीष्म पर्व का समापन

भीष्म के इस असाधारण पतन के पश्चात्, कौरव-सेना, अपने प्रथम सेनापति के इस अभूतपूर्व, हृदयविदारक अंत से गहन शोक और अस्थिरता में डूब गई, दुर्योधन तथा अन्य कौरव-नेताओं को अब तत्काल यह निर्णय लेना था कि आगे सेना का नेतृत्व कौन सम्भालेगा, ताकि युद्ध की गति और मनोबल बनाए रखा जा सके।

पांडव-सेना में भी, यद्यपि यह उनकी एक निर्णायक, सामरिक विजय थी, फिर भी अपने पितामह के प्रति गहन स्नेह और श्रद्धा के कारण, एक मिश्रित भावना — विजय का संतोष तथा व्यक्तिगत शोक — व्याप्त थी, युधिष्ठिर, विशेष रूप से, इस विजय में भी गहन आंतरिक वेदना का अनुभव करते रहे।

श्रीकृष्ण, इस सम्पूर्ण घटनाक्रम के मध्य, सदैव यह गहन स्मरण कराते रहे कि यह युद्ध व्यक्तिगत स्नेह या शोक का नहीं, अपितु धर्म की स्थापना और अंतिम विजय का है, तथा भीष्म का यह बलिदान, स्वयं धर्म की इस विशाल यात्रा का ही एक अनिवार्य, अपरिहार्य अंग था।

भीष्म, अपनी शरशय्या पर, आगामी अनेक सप्ताहों तक स्थिर रहकर, इस सम्पूर्ण महासंग्राम के शेष घटनाक्रम को धैर्यपूर्वक देखते रहने वाले थे, उनकी यह असाधारण उपस्थिति, आगामी पर्वों में भी, समय-समय पर, दोनों पक्षों के लिए एक गहन, नैतिक संदर्भ-बिंदु बनी रहेगी।

इस प्रकार भीष्म पर्व, स्वयं श्रीमद्भगवद्गीता के उस अमर, शाश्वत उपदेश से आरम्भ होकर, तथा भीष्म पितामह के इस असाधारण, हृदयविदारक किंतु गौरवपूर्ण पतन के साथ, अपने समापन पर पहुँचता है, अगले द्रोण पर्व में, आचार्य द्रोणाचार्य के सेनापतित्व में, इस भीषण महासंग्राम के आगामी, और भी अधिक नाटकीय, चुनौतीपूर्ण चरण का वर्णन किया जाएगा।

इस अध्याय की शिक्षा

एक महान योद्धा का पतन, चाहे वह युद्ध की गति को कितना भी परिवर्तित करे, अंततः उस विशाल, धर्मपूर्ण यात्रा का ही एक अनिवार्य, सार्थक अंग सिद्ध होता है जिसकी ओर सम्पूर्ण कथा अग्रसर है।