स्वर्गारोहण पर्व
स्वर्गारोहण पर्व
युधिष्ठिर की स्वर्ग-यात्रा, नरक का वह अंतिम दर्शन-परीक्षण, तथा महाभारत के समस्त पात्रों का अपने-अपने दिव्य स्वरूप में पुनर्मिलन।
युधिष्ठिर का स्वर्गलोक में आगमन
युधिष्ठिर, अपने उस भौतिक शरीर सहित, इंद्र के उस दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर, अंततः स्वर्गलोक में प्रवेश किया, जहाँ उनका, देवताओं तथा अनेक दिव्य ऋषिगणों द्वारा, अत्यंत भव्य, स्वागत-सत्कार किया गया।
स्वर्गलोक का वह दृश्य, अपार सौंदर्य, दिव्य प्रकाश तथा अलौकिक शांति से परिपूर्ण था, तथा युधिष्ठिर, इस असाधारण वातावरण को देखकर, क्षणभर के लिए, गहन विस्मय और आनंद का अनुभव करने लगे।
किंतु इसी स्वर्गलोक में, युधिष्ठिर ने, अत्यंत आश्चर्य के साथ, दुर्योधन को भी, अत्यंत तेजस्वी, दिव्य रूप में, अन्य वीर योद्धाओं के साथ विराजमान देखा, यह दृश्य उन्हें अत्यंत असहज और चिंतित करने वाला सिद्ध हुआ।
युधिष्ठिर, इस दृश्य को देखकर, अत्यंत क्षुब्ध हो उठे, तथा उन्होंने देवताओं से यह पूछा कि जिस दुर्योधन ने इतने भीषण अधर्म और अनगिनत पाप किए, वह इस स्वर्गलोक में इस प्रकार सम्मानपूर्वक कैसे विराजमान हो सकता है।
देवताओं ने युधिष्ठिर को यह समझाया कि दुर्योधन ने, एक क्षत्रिय के रूप में, युद्धभूमि में वीरतापूर्वक प्राण त्यागे थे, तथा क्षत्रिय-धर्म के अनुसार, वीरगति प्राप्त योद्धाओं को, उनके व्यक्तिगत पापों से परे, स्वर्गलोक में उचित सम्मान प्राप्त होता है।
इस अध्याय की शिक्षा
स्वर्गलोक का न्याय, सांसारिक न्याय से भिन्न, कर्मों के गहनतम, समग्र सन्दर्भ पर आधारित होता है, जिसे साधारण मनुष्य पूर्णतः नहीं समझ सकता।
भाइयों की अनुपस्थिति पर व्यथा
युधिष्ठिर, दुर्योधन को इस प्रकार स्वर्गलोक में देखकर, अपने स्वयं के भाइयों — भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव — तथा अपनी पत्नी द्रौपदी को, इस स्वर्गलोक में कहीं भी न पाकर, गहन व्याकुलता और शोक से भर उठे।
युधिष्ठिर ने देवताओं से अत्यंत व्याकुल स्वर में पूछा कि उनके वे भाई तथा उनकी पत्नी, जिन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन में धर्म, त्याग तथा निष्ठा का पालन किया, वे आखिर इस स्वर्गलोक में कहाँ हैं, तथा उन्हें यहाँ क्यों नहीं देखा जा रहा।
युधिष्ठिर ने यह स्पष्ट घोषणा की कि यदि उनके भाई और पत्नी, इस स्वर्गलोक में उपस्थित नहीं हैं, तो वे स्वयं भी, इस स्वर्गलोक के किसी भी सुख अथवा सम्मान को स्वीकार नहीं करेंगे, तथा वे उन्हीं के पास जाना चाहेंगे, जहाँ भी वे हों।
देवताओं ने युधिष्ठिर को यह सूचित किया कि उनके भाई तथा द्रौपदी, अभी नरक-लोक में हैं, तथा उन्हें भी, अपने कुछ शेष कर्मों के फलस्वरूप, कुछ काल के लिए, वहाँ रहना अनिवार्य है, यह सुनकर युधिष्ठिर का हृदय गहन पीड़ा से भर उठा।
युधिष्ठिर, बिना क्षणभर भी विलम्ब किए, यह दृढ़ घोषणा की कि वे भी अपने भाइयों तथा पत्नी के साथ, नरक-लोक में ही जाना चाहते हैं, चाहे इसके लिए उन्हें, इस स्वर्गलोक के समस्त सुख-सम्मान का त्याग ही क्यों न करना पड़े।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्चा प्रेम, अपने प्रियजनों के साथ रहने के लिए, स्वर्ग के सर्वोच्च सुखों का भी निःसंकोच त्याग करने को सदैव तत्पर रहता है।
नरक का वह भीषण दर्शन
देवताओं तथा इंद्र ने, युधिष्ठिर के इस अटल, अडिग निश्चय को देखकर, उन्हें नरक-लोक की ओर जाने की अनुमति प्रदान की, तथा युधिष्ठिर, अत्यंत दृढ़ संकल्प के साथ, उस अंधकारमय, भयावह मार्ग पर आगे बढ़ चले।
नरक-लोक का वह मार्ग, अत्यंत भयंकर, दुर्गंधयुक्त तथा त्रासद था, जिसमें चारों ओर, असंख्य प्राणियों की करुण चीत्कार तथा असहनीय पीड़ा की ध्वनियाँ गूँज रही थीं, यह दृश्य किसी भी हृदय को द्रवित कर देने वाला था।
इसी अंधकारमय मार्ग में, युधिष्ठिर ने, अचानक ही, अपने भाइयों — भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव — तथा अपनी पत्नी द्रौपदी की, अत्यंत करुण, पीड़ादायक चीत्कार सुनी, जो उन्हें सहायता हेतु पुकार रहे थे।
युधिष्ठिर, अपने इन प्रियजनों की इस असहनीय पीड़ा को सुनकर, गहन शोक और करुणा से अभिभूत होकर, यह दृढ़ घोषणा की कि वे अब स्वर्गलोक कदापि नहीं लौटेंगे, तथा वे अपने इन प्रियजनों के साथ, इसी नरक में सदैव रहना पसंद करेंगे।
युधिष्ठिर ने देवताओं से यह अनुरोध किया कि वे स्वर्गलोक को लौट जाएँ, तथा उन्हें, अपने इन प्रियजनों की पीड़ा को साझा करने हेतु, इसी नरक-लोक में स्थायी रूप से छोड़ दें, यह उनका अंतिम, अटल निर्णय था।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्ची करुणा, अपने प्रियजनों की पीड़ा में उनका साथ देने को, स्वयं के सुख से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण मानती है।
अंतिम परीक्षा का रहस्योद्घाटन
युधिष्ठिर के इस अंतिम, अटल निर्णय के साथ ही, वह सम्पूर्ण भयावह, नारकीय दृश्य, अचानक ही विलीन होने लगा, तथा स्वयं देवराज इंद्र तथा धर्मराज, अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक, युधिष्ठिर के समक्ष प्रकट हुए।
इंद्र ने युधिष्ठिर को यह गूढ़ रहस्य बताया कि वह सम्पूर्ण नारकीय दृश्य, वास्तव में एक माया मात्र थी, जो केवल युधिष्ठिर की अंतिम, सर्वोच्च धर्मनिष्ठा तथा उनके भाइयों के प्रति उनके अटूट प्रेम की परीक्षा लेने हेतु रची गई थी।
धर्मराज ने यह भी स्पष्ट किया कि युधिष्ठिर को, अपने जीवन में की गई उस एकमात्र, अल्प असत्य-सदृश घटना — अश्वत्थामा नामक हाथी के विषय में उस अर्धसत्य कथन — के अत्यंत सूक्ष्म प्रायश्चित हेतु, इस नरक के दृश्य का, अत्यंत संक्षिप्त क्षण हेतु, अनुभव कराना आवश्यक था।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि युधिष्ठिर के शेष समस्त भाई तथा द्रौपदी, वास्तव में, कभी भी नरक में नहीं थे, अपितु वे सभी, पहले से ही, स्वर्गलोक में, अपने-अपने दिव्य स्वरूपों में, अत्यंत सुखपूर्वक विराजमान थे।
युधिष्ठिर, इस असाधारण रहस्योद्घाटन से गहराई तक अभिभूत होकर, तथा अपनी इस अंतिम, कठिन परीक्षा में सफल होने पर, अत्यंत गहन संतोष और कृतज्ञता का अनुभव करने लगे, तथा वे अब पूर्ण रूप से, वास्तविक स्वर्गलोक में प्रवेश करने हेतु तत्पर हुए।
इस अध्याय की शिक्षा
जीवन की सबसे कठिन परीक्षा भी, यदि करुणा और सच्चे प्रेम के साथ स्वीकार की जाए, तो वह अंततः सबसे गहन, दिव्य सत्य का द्वार खोल देती है।
स्वर्गलोक में पुनर्मिलन
युधिष्ठिर, इस अंतिम परीक्षा के पश्चात्, अंततः वास्तविक स्वर्गलोक में प्रवेश किया, जहाँ उनका, अपने समस्त प्रियजनों के साथ, एक अत्यंत भावुक, हृदयस्पर्शी पुनर्मिलन हुआ।
उन्होंने वहाँ, भीम, अर्जुन, नकुल तथा सहदेव को, अपने-अपने दिव्य, तेजोमय स्वरूपों में, अत्यंत शांत तथा आनंदित अवस्था में देखा, तथा द्रौपदी को भी, अपने वास्तविक, दिव्य स्वरूप में देखकर, युधिष्ठिर का हृदय अपार हर्ष से भर उठा।
युधिष्ठिर को यह भी ज्ञात हुआ कि द्रौपदी, वास्तव में, स्वयं देवी लक्ष्मी का ही एक अंश थी, जो पांचों पांडवों के जीवन में, धर्म और शक्ति की सहायता हेतु अवतरित हुई थीं, तथा अब वे अपने वास्तविक, दिव्य स्वरूप में लौट चुकी थीं।
इसी स्वर्गलोक में, युधिष्ठिर को कर्ण के भी दर्शन प्राप्त हुए, जो अब अपने पिता सूर्यदेव के समान ही तेजस्वी, दिव्य रूप में, समस्त सांसारिक शत्रुता से पूर्णतः मुक्त होकर, अत्यंत शांत अवस्था में विराजमान थे।
युधिष्ठिर, अपने इस ज्येष्ठ भ्राता कर्ण को, इस दिव्य रूप में देखकर, गहन भावुकता से अभिभूत हो गए, तथा उन्होंने, अंततः, कर्ण के प्रति अपने हृदय में शेष रह गई, उस अंतिम पीड़ा और आत्म-ग्लानि से भी, पूर्ण मुक्ति का अनुभव किया।
इस अध्याय की शिक्षा
मृत्यु के पश्चात्, सम्पूर्ण सांसारिक शत्रुताएँ और गलतफहमियाँ समाप्त हो जाती हैं, तथा आत्माएँ, अपने वास्तविक, शुद्ध स्वरूप में ही पुनर्मिलित होती हैं।
गुरुजनों एवं समस्त पात्रों का दिव्य पुनर्मिलन
इस स्वर्गलोक में, युधिष्ठिर ने, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा अन्य समस्त गुरुजनों के भी दर्शन प्राप्त किए, जो अब अपने-अपने दिव्य, तेजोमय स्वरूपों में, समस्त सांसारिक द्वेष और शत्रुता से पूर्णतः मुक्त होकर विराजमान थे।
अभिमन्यु, घटोत्कच, द्रुपद, विराट तथा अन्य असंख्य वीर योद्धा, जिन्होंने इस भीषण महासंग्राम में वीरगति प्राप्त की थी, वे सभी भी, इस दिव्य स्वर्गलोक में, अत्यंत शांत, आनंदित अवस्था में, एक साथ विराजमान दिखाई दिए।
यहाँ तक कि दुर्योधन तथा उसके भाई भी, इस दिव्य वातावरण में, अपने समस्त सांसारिक क्रोध और शत्रुता का त्याग कर, अत्यंत शांत, सौहार्दपूर्ण भाव से, अन्य समस्त पात्रों के साथ, एक ही दिव्य लोक में, सम्मानपूर्वक विराजमान थे।
युधिष्ठिर, इस अभूतपूर्व, हृदयस्पर्शी दृश्य को देखकर, यह गहन सत्य समझने लगे कि पृथ्वी पर हुआ वह सम्पूर्ण भीषण संघर्ष, तथा उसमें उत्पन्न हुई वह सम्पूर्ण शत्रुता, वास्तव में, केवल एक सांसारिक, अस्थायी लीला मात्र थी।
इस दिव्य स्वर्गलोक में, समस्त आत्माएँ, अपने वास्तविक, शाश्वत स्वरूप में, पूर्ण शांति और सौहार्द के साथ, एक साथ विराजमान थीं, यह दृश्य, सम्पूर्ण महाभारत की कथा का, सबसे गहन, सबसे शांतिपूर्ण, तथा सबसे मार्मिक समापन सिद्ध हुआ।
इस अध्याय की शिक्षा
पृथ्वी की समस्त शत्रुताएँ और संघर्ष, अंततः एक अस्थायी लीला मात्र हैं, तथा सभी आत्माएँ, अपने वास्तविक स्वरूप में, एक ही शाश्वत सत्य में विलीन हो जाती हैं।
संजय की दिव्य दृष्टि का समापन
इसी बीच, हस्तिनापुर में, महर्षि व्यास द्वारा जिस संजय को यह दिव्य दृष्टि प्रदान की गई थी, जिसके माध्यम से उन्होंने इस सम्पूर्ण महाभारत के युद्ध तथा उसके पश्चात् की समस्त घटनाओं का प्रत्यक्ष वर्णन किया, अब उस दिव्य दृष्टि से मुक्त हो गए।
महर्षि व्यास ने संजय को यह बताया कि उनका यह दायित्व अब पूर्ण हो चुका है, तथा उन्होंने इस सम्पूर्ण, महान गाथा को, अत्यंत निष्ठा और सत्यनिष्ठा के साथ, धृतराष्ट्र तथा सम्पूर्ण संसार के समक्ष प्रस्तुत किया है।
संजय, अपने इस असाधारण, दीर्घकालिक दायित्व से मुक्त होकर, अत्यंत श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ, महर्षि व्यास को प्रणाम करते हुए, अपने शेष जीवन को, आध्यात्मिक साधना में समर्पित करने के लिए, वन की ओर प्रस्थान कर गए।
महर्षि व्यास ने, इस सम्पूर्ण महाभारत की कथा को, अपनी इस अलौकिक, दिव्य दृष्टि तथा अपने असाधारण काव्य-कौशल के माध्यम से, आने वाली समस्त पीढ़ियों के लिए, एक शाश्वत, अमूल्य निधि के रूप में संरक्षित कर दिया।
यह महाभारत, तब से लेकर आज तक, सम्पूर्ण संसार में, धर्म, कर्तव्य, त्याग तथा सत्य के उन गहनतम सिद्धांतों का, एक अद्वितीय, अमर मार्गदर्शक ग्रंथ बना हुआ है, जिससे असंख्य पीढ़ियाँ, आज भी, जीवन के गहनतम प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करती हैं।
इस अध्याय की शिक्षा
सत्य और धर्म पर आधारित एक महान गाथा, समय की सीमाओं से परे, सदैव आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहती है।
स्वर्गारोहण पर्व एवं महाभारत का समापन
इस प्रकार, युधिष्ठिर की यह असाधारण स्वर्ग-यात्रा, अपनी उस अंतिम, गहनतम परीक्षा को उत्तीर्ण कर, अपने समस्त प्रियजनों तथा गुरुजनों के साथ, एक शांतिपूर्ण, दिव्य पुनर्मिलन के साथ पूर्ण हुई।
महाभारत की यह सम्पूर्ण गाथा, शांतनु और गंगा के उस प्रथम मिलन से आरम्भ होकर, भीष्म की उस अटल प्रतिज्ञा, पांडव-कौरवों के जन्म और शिक्षा, द्रौपदी-स्वयंवर, इंद्रप्रस्थ की स्थापना, चौसर के उस भीषण छल, वनवास और अज्ञातवास, कुरुक्षेत्र के उस अठारह दिवसीय महासंग्राम, तथा अंततः स्वर्गारोहण तक, धर्म की उस अंतिम, अटल विजय की कथा है।
यह महाकाव्य, हमें यह गहन शिक्षा देता है कि जीवन में, चाहे कितनी भी विषम, कठिन परिस्थितियाँ क्यों न आएँ, धर्म, सत्य, त्याग तथा करुणा का मार्ग ही, अंततः सच्ची, शाश्वत विजय की ओर ले जाता है।
इस अठारह पर्वों की इस सम्पूर्ण यात्रा में, हमने असंख्य पात्रों — भीष्म, कर्ण, द्रोणाचार्य, दुर्योधन, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी, कुंती, गांधारी तथा स्वयं श्रीकृष्ण — के जीवन, संघर्ष, बलिदान तथा अंतिम मुक्ति की गाथा देखी, जो आज भी, हमारे अपने जीवन के अनगिनत प्रश्नों को प्रतिबिम्बित करती है।
॥ इति श्रीमहाभारते स्वर्गारोहणपर्वणि सम्पूर्णम् ॥ — इस प्रकार, महर्षि वेदव्यास रचित यह अठारह पर्वों वाला महाभारत, अपनी इस सम्पूर्ण, गहन, अमर गाथा के साथ, अपने समापन पर पहुँचता है, तथा यह शाश्वत ज्ञान, सदा-सदा के लिए, सम्पूर्ण मानवता का मार्गदर्शन करता रहेगा।
इस अध्याय की शिक्षा
धर्म की विजय, चाहे उसका मार्ग कितना भी दीर्घ, कठिन अथवा त्रासद क्यों न हो, अंततः शाश्वत शांति और दिव्य मुक्ति में ही परिणत होती है।
