शांति पर्व
शांति पर्व
युद्ध के पश्चात् शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर को दिया गया राजधर्म, आपद्धर्म एवं मोक्षधर्म का विशाल, गहन उपदेश।
युधिष्ठिर का गहन शोक एवं राज्य से विरक्ति
इस भीषण महासंग्राम की समाप्ति तथा अपने समस्त गुरुजनों, स्वजनों और मित्रों की उस अपार क्षति के पश्चात्, युधिष्ठिर, इस असाधारण विजय के होते हुए भी, गहन शोक और आत्म-ग्लानि से पूर्णतः टूट गए, तथा उन्होंने राजसिंहासन ग्रहण करने से ही इनकार कर दिया।
युधिष्ठिर, अपने भीतर यह गहन प्रश्न लिए हुए थे कि इतने असंख्य निर्दोष प्राणों की क्षति, तथा स्वयं अपने ही गुरुजनों और भाई-बंधुओं के इस भीषण संहार के पश्चात्, प्राप्त हुआ यह राज्य, आखिर किस मूल्य पर प्राप्त किया गया है, तथा क्या यह वास्तव में सार्थक भी है।
उन्होंने अपने भाइयों तथा श्रीकृष्ण के समक्ष, वन जाकर तपस्या करने तथा राज्य का सम्पूर्ण त्याग कर देने की अपनी गहन इच्छा व्यक्त की, यह कहते हुए कि वे अब इस रक्त-रंजित सिंहासन पर बैठने योग्य स्वयं को नहीं समझते।
अर्जुन, भीम, नकुल तथा सहदेव, अपने ज्येष्ठ भ्राता के इस गहन शोक और विरक्ति को समझते हुए भी, उन्हें अत्यंत विनम्रता से यह स्मरण कराने लगे कि एक राजा का प्रथम कर्तव्य, अपनी प्रजा के प्रति है, तथा राज्य त्याग देना, इस कर्तव्य से पलायन ही सिद्ध होगा।
श्रीकृष्ण भी, युधिष्ठिर के इस गहन शोक को अत्यंत करुणा से समझते हुए, उन्हें यह परामर्श देने लगे कि अब उन्हें महर्षि व्यास तथा स्वयं भीष्म पितामह से, धर्म के इन गहनतम प्रश्नों का समुचित समाधान अवश्य प्राप्त करना चाहिए।
इस अध्याय की शिक्षा
विजय के पश्चात् उपजा गहन आत्म-मंथन, कभी-कभी नए, अधिक गहन ज्ञान और उत्तरदायित्व की ओर ले जाने वाला एक आवश्यक पड़ाव सिद्ध होता है।
महर्षि व्यास द्वारा सांत्वना
महर्षि व्यास, अपने प्रिय पौत्र युधिष्ठिर के इस असहनीय शोक और आत्म-ग्लानि को देखकर, स्वयं उनके समक्ष उपस्थित हुए, तथा उन्हें अत्यंत गहन, दार्शनिक उपदेश देते हुए, क्षत्रिय-धर्म तथा युद्ध की उस अनिवार्यता को पुनः समझाने का प्रयास किया।
व्यास जी ने युधिष्ठिर को यह स्मरण कराया कि यह युद्ध, उनके अपने किसी व्यक्तिगत लोभ के कारण नहीं, अपितु दुर्योधन के अनगिनत अधर्मपूर्ण कृत्यों तथा धर्म की रक्षा हेतु अनिवार्य हो चुका था, तथा इसमें प्राप्त हुई विजय, धर्म की ही विजय है।
उन्होंने युधिष्ठिर को यह भी समझाया कि राजा का सिंहासन त्यागना, वास्तव में उनकी प्रजा के प्रति एक बड़ा अधर्म सिद्ध होगा, क्योंकि अब सम्पूर्ण साम्राज्य, केवल उन्हीं के धर्मनिष्ठ नेतृत्व की प्रतीक्षा में है।
इसके साथ ही, व्यास जी ने युधिष्ठिर को यह गूढ़ परामर्श भी दिया कि उन्हें, अभी भी शरशय्या पर जीवित पड़े हुए, भीष्म पितामह के पास जाकर, राजधर्म, आपद्धर्म तथा मोक्षधर्म का वह विशाल, गहन ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिए, जो उनके अतिरिक्त अब अन्य कोई भी नहीं दे सकता।
युधिष्ठिर, महर्षि व्यास के इस गहन उपदेश और परामर्श से कुछ हद तक शांत होकर, अंततः श्रीकृष्ण तथा अपने भाइयों सहित, भीष्म पितामह के पास, उस शरशय्या तक जाने का निश्चय किया।
इस अध्याय की शिक्षा
गहन शोक के क्षण में, ज्ञानी गुरुजनों का उचित मार्गदर्शन, मनुष्य को पुनः उसके सच्चे कर्तव्य-पथ पर ले आता है।
भीष्म की शरशय्या पर उपस्थिति
युधिष्ठिर, अपने भाइयों, श्रीकृष्ण तथा अनेक ऋषियों सहित, कुरुक्षेत्र की उस रणभूमि में पहुँचे, जहाँ भीष्म पितामह, अपनी उस असाधारण इच्छा-मृत्यु की शक्ति के बल पर, बाणों की शय्या पर, सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करते हुए, अभी भी जीवित पड़े हुए थे।
भीष्म पितामह, अपने इस अत्यंत कष्टप्रद, असहनीय अवस्था में भी, युधिष्ठिर तथा शेष पांडवों को अपने समक्ष देखकर, अत्यंत स्नेह और प्रसन्नता का अनुभव करते हुए, उन्हें अपने पास आने का सस्नेह आमंत्रण दिया।
युधिष्ठिर, अपने पितामह की इस अत्यंत करुण, कष्टपूर्ण अवस्था को देखकर, गहन शोक और वेदना से भर उठे, तथा उन्होंने अत्यंत विनम्रता से भीष्म से यह अनुरोध किया कि वे अपने इस गहन, अपार ज्ञान का लाभ, अब उन्हें अवश्य प्रदान करें।
भीष्म पितामह, श्रीकृष्ण की उपस्थिति में, तथा स्वयं भगवान के इस विशेष संकेत और अनुमति से, अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक, युधिष्ठिर को राजधर्म, आपद्धर्म तथा मोक्षधर्म का वह विशाल, अद्वितीय उपदेश देने हेतु सहमत हुए।
इस प्रकार, इस अत्यंत असाधारण, ऐतिहासिक अवसर की पृष्ठभूमि रची गई, जिसमें एक मरणासन्न, किंतु ज्ञान से परिपूर्ण योद्धा, अपने अंतिम दिनों में, सम्पूर्ण संसार के कल्याण हेतु, धर्म के गहनतम रहस्यों को उजागर करने वाला था।
इस अध्याय की शिक्षा
जीवन के अंतिम क्षणों में भी, यदि ज्ञान और अनुभव को उदारतापूर्वक बाँटा जाए, तो वे आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि बन जाते हैं।
राजधर्म का उपदेश आरम्भ
भीष्म पितामह ने, अपने इस गहन उपदेश का आरम्भ करते हुए, युधिष्ठिर को सर्वप्रथम एक आदर्श राजा के कर्तव्यों तथा उसके आचरण के विषय में विस्तार से समझाना आरम्भ किया, यह स्पष्ट करते हुए कि राजधर्म ही समस्त अन्य धर्मों का आधार है।
उन्होंने युधिष्ठिर को यह समझाया कि एक सच्चे राजा को सदैव अपनी प्रजा के कल्याण को अपने व्यक्तिगत सुख-दुख से कहीं अधिक प्राथमिकता देनी चाहिए, तथा उसे न्याय, समता और करुणा के साथ, अपने राज्य का शासन करना चाहिए।
भीष्म ने दंड-नीति के महत्त्व पर भी विस्तार से प्रकाश डाला, यह स्पष्ट करते हुए कि उचित, न्यायसंगत दंड-व्यवस्था के बिना, कोई भी समाज अथवा राज्य, दीर्घकाल तक व्यवस्थित रूप से नहीं चल सकता, तथा अराजकता ही उसका अनिवार्य परिणाम होगा।
उन्होंने युधिष्ठिर को मंत्रियों, सलाहकारों तथा गुप्तचरों के उचित चयन एवं उनके सदुपयोग के विषय में भी अत्यंत व्यावहारिक, गहन परामर्श दिया, यह समझाते हुए कि एक राजा को कभी भी पूर्णतः अकेले निर्णय नहीं लेने चाहिए।
युधिष्ठिर, अपने पितामह के इस गहन, व्यावहारिक ज्ञान को अत्यंत एकाग्रता और श्रद्धा के साथ श्रवण करते हुए, राजधर्म की इन जटिल, सूक्ष्म बारीकियों को समझने का प्रयास करने लगे, यह अनुभव करते हुए कि एक आदर्श शासक बनना कितना दुष्कर कार्य है।
इस अध्याय की शिक्षा
एक आदर्श शासक का प्रथम धर्म, अपनी प्रजा के कल्याण को सदैव अपने व्यक्तिगत हित से ऊपर रखना है।
आपद्धर्म का उपदेश — विषम परिस्थितियों में धर्म
भीष्म पितामह ने, इसके पश्चात्, आपद्धर्म के उस अत्यंत सूक्ष्म, जटिल विषय पर उपदेश देना आरम्भ किया, अर्थात् वह धर्म जो अत्यंत विषम, संकटपूर्ण परिस्थितियों में, सामान्य नियमों से भिन्न होकर भी अपनाया जा सकता है।
उन्होंने युधिष्ठिर को यह समझाया कि धर्म कोई कठोर, अपरिवर्तनीय नियमों का समूह मात्र नहीं है, अपितु वह परिस्थिति, समय तथा उद्देश्य के अनुसार, अत्यंत सूक्ष्म बुद्धि और विवेक के साथ, न्यायसंगत ढंग से लागू किया जाना चाहिए।
इसी सन्दर्भ में, भीष्म ने एक ऐसे ऋषि की प्रसिद्ध कथा भी सुनाई, जिसने भीषण अकाल के समय, अपने तथा अपने परिवार के प्राणों की रक्षा हेतु, अत्यंत विवशता में, सामान्यतः वर्जित मांस ग्रहण किया, तथा यह स्पष्ट किया कि ऐसी अत्यंत विषम परिस्थिति में, यह कृत्य अधर्म नहीं माना गया।
भीष्म ने यह भी स्पष्ट किया कि आपद्धर्म का यह सिद्धांत, किसी भी अनुचित कृत्य को उचित ठहराने का साधारण बहाना नहीं बनना चाहिए, अपितु इसका प्रयोग केवल अत्यंत असाधारण, जीवन-मृत्यु के प्रश्न वाली परिस्थितियों में ही, अत्यंत सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए।
युधिष्ठिर, इस गहन, सूक्ष्म उपदेश से यह समझने लगे कि धर्म का सच्चा पालन, केवल शास्त्रों के शब्दों का अंधानुकरण नहीं, अपितु परिस्थिति के अनुसार, विवेकपूर्ण निर्णय लेने की एक निरंतर, गहन साधना है।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्चा धर्म, कठोर नियमों का अंधानुकरण नहीं, अपितु परिस्थिति के अनुसार विवेकपूर्ण, न्यायसंगत निर्णय लेने की गहन कला है।
दान-धर्म एवं यज्ञ का महत्त्व
भीष्म पितामह ने, इसके आगे, दान-धर्म के महत्त्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए, युधिष्ठिर को यह समझाया कि निःस्वार्थ भाव से, उचित पात्र को, उचित समय पर दिया गया दान, मनुष्य के जीवन का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण, पुण्यदायी कर्तव्य है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दान का वास्तविक महत्त्व, केवल दी गई वस्तु की मात्रा में नहीं, अपितु उसके पीछे छिपे हृदय की शुद्धता, तथा दान देने के उद्देश्य की निःस्वार्थता में निहित होता है।
भीष्म ने यज्ञों के महत्त्व तथा उनकी विधिवत विधि पर भी विस्तार से उपदेश दिया, यह समझाते हुए कि यज्ञ, केवल कर्मकांड मात्र नहीं, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण तथा प्रकृति के साथ मनुष्य के संतुलित सम्बन्ध की स्थापना का एक गहन, आध्यात्मिक माध्यम है।
उन्होंने कुछ अत्यंत मार्मिक कथाओं के माध्यम से यह भी स्पष्ट किया कि कभी-कभी, एक निर्धन व्यक्ति द्वारा अत्यंत श्रद्धा से दिया गया अल्प दान भी, किसी धनी व्यक्ति के विशाल, दिखावटी दान से कहीं अधिक पुण्यदायी सिद्ध होता है।
युधिष्ठिर, इन समस्त उपदेशों को अत्यंत गहनता से आत्मसात् करते हुए, यह समझने लगे कि एक आदर्श राजा तथा एक आदर्श मनुष्य का धर्म, केवल शक्ति और सम्पत्ति के संचय में नहीं, अपितु उसके उदार, निःस्वार्थ वितरण में ही निहित है।
इस अध्याय की शिक्षा
दान का सच्चा मूल्य, दी गई वस्तु के परिमाण में नहीं, अपितु उसके पीछे छिपे हृदय की शुद्धता और निःस्वार्थता में है।
मोक्षधर्म का उपदेश आरम्भ
राजधर्म तथा आपद्धर्म के इस विशाल, गहन उपदेश के पश्चात्, भीष्म पितामह ने, अब मोक्षधर्म के उस सर्वोच्च, सूक्ष्मतम विषय पर उपदेश देना आरम्भ किया, जो मनुष्य के जीवन के परम लक्ष्य — मुक्ति — से सम्बंधित था।
उन्होंने युधिष्ठिर को आत्मा की उस शाश्वत, अविनाशी प्रकृति के विषय में समझाया, यह स्पष्ट करते हुए कि यह शरीर नश्वर है, किंतु आत्मा, जन्म-मृत्यु के इस चक्र से परे, सदा अपरिवर्तित तथा शाश्वत बनी रहती है।
भीष्म ने ब्रह्म की उस परम, सर्वव्यापी सत्ता के विषय में भी गहन उपदेश दिया, यह समझाते हुए कि सम्पूर्ण सृष्टि, उसी एक परम सत्य का ही विस्तार है, तथा इस सत्य को समझ लेना ही सच्चे ज्ञान की प्राप्ति है।
उन्होंने योग, ध्यान तथा आत्म-अनुशासन के विभिन्न मार्गों की भी विस्तार से व्याख्या की, यह स्पष्ट करते हुए कि मुक्ति की प्राप्ति हेतु, मनुष्य को अपने मन और इंद्रियों पर, दीर्घकालिक साधना द्वारा, पूर्ण नियंत्रण प्राप्त करना आवश्यक है।
युधिष्ठिर, इस अत्यंत गहन, आध्यात्मिक ज्ञान को सुनते हुए, यह अनुभव करने लगे कि सांसारिक राजधर्म से परे, एक ऐसा भी गहन सत्य विद्यमान है, जो मनुष्य को इस संसार के समस्त बंधनों से मुक्त कर सकता है।
इस अध्याय की शिक्षा
सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए भी, आत्मा की उस शाश्वत, अविनाशी प्रकृति का ज्ञान ही, मनुष्य को सच्ची शांति प्रदान करता है।
अनेक मार्मिक कथाओं द्वारा उपदेश
भीष्म पितामह ने, इस विशाल उपदेश के दौरान, अपनी बात को अधिक सरलता और प्रभावशीलता से समझाने हेतु, अनेक प्राचीन, मार्मिक कथाओं और दृष्टांतों का भी उदारतापूर्वक प्रयोग किया, जिनमें से प्रत्येक, धर्म के किसी गहन सिद्धांत को स्पष्ट करती थी।
उन्होंने एक व्याध और एक तपस्वी ब्राह्मण की कथा सुनाई, जिसमें उस व्याध ने, अपने कर्तव्य-निष्ठ, ईमानदार जीवन के माध्यम से ही, उस अहंकारी ब्राह्मण को यह सिखाया कि सच्चा धर्म, केवल जन्म अथवा वर्ण से नहीं, अपितु अपने कर्मों की शुद्धता से निर्धारित होता है।
भीष्म ने यह भी स्पष्ट किया कि सच्ची भक्ति और धर्मनिष्ठा, किसी भी वर्ण, जाति अथवा सामाजिक स्थिति तक सीमित नहीं है, अपितु यह प्रत्येक मनुष्य के हृदय की शुद्धता तथा उसके कर्मों की सच्चाई पर ही निर्भर करती है।
इन समस्त कथाओं के माध्यम से, भीष्म ने युधिष्ठिर के मन में उठ रहे अनेक गहन, जटिल प्रश्नों का, अत्यंत सरल किंतु गहन उदाहरणों द्वारा, संतोषजनक समाधान प्रस्तुत किया, जिससे युधिष्ठिर का मन धीरे-धीरे शांत होता गया।
यह उपदेश-सत्र, अनेक दिनों तक निरंतर चलता रहा, जिसमें युधिष्ठिर तथा अन्य उपस्थित ऋषिगण, अत्यंत एकाग्रता और श्रद्धा के साथ, भीष्म के इस अपार, विश्वकोशीय ज्ञान का लाभ उठाते रहे।
इस अध्याय की शिक्षा
गहनतम सत्य भी, यदि सरल, मार्मिक कथाओं के माध्यम से समझाए जाएँ, तो वे मनुष्य के हृदय तक कहीं अधिक सरलता से पहुँच पाते हैं।
युधिष्ठिर की शंकाओं का समाधान
युधिष्ठिर, इस विशाल उपदेश के दौरान, अपने मन में उठ रहे अनेक गहन, व्यक्तिगत प्रश्नों और शंकाओं को भी, अत्यंत विनम्रता से भीष्म पितामह के समक्ष प्रस्तुत करते रहे, विशेष रूप से इस युद्ध में हुए भीषण नरसंहार के औचित्य के विषय में।
युधिष्ठिर ने भीष्म से यह पूछा कि क्या राज्य और सत्ता की प्राप्ति के लिए, अपने ही गुरुजनों और स्वजनों का अंत करना, किसी भी परिस्थिति में उचित ठहराया जा सकता है, यह प्रश्न उनके हृदय को दीर्घकाल से कचोट रहा था।
भीष्म ने, अत्यंत धैर्य और करुणा के साथ, युधिष्ठिर को यह समझाया कि यह युद्ध, उनके व्यक्तिगत लोभ का परिणाम नहीं, अपितु धर्म की रक्षा तथा अधर्म के अंत हेतु, एक अनिवार्य, अपरिहार्य कर्तव्य था, तथा उन्होंने इसमें कोई भी अनुचित पाप नहीं किया।
इस उत्तर से, युधिष्ठिर के मन में व्याप्त वह गहन आत्म-ग्लानि और अपराध-बोध, धीरे-धीरे कम होने लगा, यद्यपि वह पूर्णतः कभी समाप्त नहीं हुआ, तथा यह एक ऐसी गहन वेदना बनी रही जो उन्हें जीवनभर सचेत रखती रही।
भीष्म के इस गहन, व्यक्तिगत मार्गदर्शन ने, युधिष्ठिर को अंततः यह स्वीकार करने में सहायता की कि अब उन्हें अपने इस विशाल साम्राज्य का उत्तरदायित्व, पूर्ण धर्मनिष्ठा और समर्पण के साथ स्वीकार करना ही चाहिए।
इस अध्याय की शिक्षा
गहन आत्म-ग्लानि के क्षण में, एक ज्ञानी गुरु का करुणापूर्ण मार्गदर्शन, मनुष्य को अपने कर्तव्य-पथ पर पुनः स्थापित कर सकता है।
भीष्म का आशीर्वाद एवं युधिष्ठिर का राज्याभिषेक
इस विशाल, दीर्घकालिक उपदेश-सत्र के समापन पर, भीष्म पितामह ने, युधिष्ठिर को अत्यंत स्नेह और गर्व के साथ, एक धर्मनिष्ठ, आदर्श राजा के रूप में शासन करने का अंतिम, हार्दिक आशीर्वाद प्रदान किया।
भीष्म ने युधिष्ठिर को यह अंतिम, महत्त्वपूर्ण परामर्श भी दिया कि वे अपने शासनकाल में, सदैव धर्म, न्याय और करुणा को ही अपना सर्वोच्च मार्गदर्शक सिद्धांत बनाए रखें, तथा कभी भी सत्ता के अहंकार में स्वयं को न खोएँ।
युधिष्ठिर, अपने पितामह के इस अपार ज्ञान, स्नेह और आशीर्वाद से गहराई तक आप्लावित होकर, अत्यंत विनम्रता से उन्हें प्रणाम करते हुए, हस्तिनापुर लौट गए, तथा अपने राज्याभिषेक की समुचित तैयारियाँ आरम्भ करवाईं।
सम्पूर्ण हस्तिनापुर तथा कुरु साम्राज्य में, युधिष्ठिर के इस राज्याभिषेक के अवसर पर, दीर्घकाल पश्चात्, एक नई आशा, उत्साह तथा शांति का संचार हुआ, तथा प्रजा ने अपने इस नए, धर्मनिष्ठ सम्राट का भव्य स्वागत किया।
युधिष्ठिर ने, अपने राज्याभिषेक के इस अवसर पर, भीष्म के उस विशाल उपदेश को सदैव स्मरण रखने तथा अपने सम्पूर्ण शासनकाल में उसका पूर्ण पालन करने का दृढ़ संकल्प लिया, यह जानते हुए कि यह ज्ञान उनके लिए अमूल्य निधि सिद्ध होगा।
इस अध्याय की शिक्षा
एक आदर्श शासक की सच्ची शक्ति, उसके गुरुजनों से प्राप्त ज्ञान को अपने सम्पूर्ण जीवन में धारण करने की क्षमता में निहित होती है।
शांति पर्व का समापन
भीष्म पितामह, अपने इस विशाल, ऐतिहासिक उपदेश को पूर्ण करने के पश्चात्, अब सूर्य के उत्तरायण होने की उस अंतिम, प्रतीक्षित घड़ी की ओर, अत्यंत शांत तथा संतुष्ट मनोदशा में, प्रतीक्षा करने लगे।
युधिष्ठिर, अपने इस राज्याभिषेक तथा भीष्म से प्राप्त इस अपार ज्ञान के साथ, अब अपने इस विशाल, युद्ध-क्षत साम्राज्य के पुनर्निर्माण तथा प्रजा-कल्याण के इस गुरुतर दायित्व को, पूर्ण समर्पण के साथ स्वीकार करने के लिए तत्पर हो गए।
श्रीकृष्ण, इस सम्पूर्ण घटनाक्रम में, युधिष्ठिर के इस आत्म-मंथन तथा भीष्म के इस उपदेश के मध्य, एक मार्गदर्शक तथा साक्षी की भूमिका निभाते हुए, अब द्वारका की ओर, अपनी अगली यात्रा की तैयारी में जुट गए।
सम्पूर्ण कुरु साम्राज्य, इस भीषण युद्ध के पश्चात्, धीरे-धीरे शांति, पुनर्निर्माण तथा एक नई शुरुआत की ओर अग्रसर होने लगा, यद्यपि भीष्म के प्राण अभी भी, उस अंतिम, प्रतीक्षित घड़ी की प्रतीक्षा में, शरशय्या पर ही टिके हुए थे।
इस प्रकार शांति पर्व, युधिष्ठिर के गहन शोक, भीष्म के उस विशाल राजधर्म, आपद्धर्म तथा मोक्षधर्म के उपदेश, तथा अंततः युधिष्ठिर के धर्मनिष्ठ राज्याभिषेक के साथ अपने समापन पर पहुँचता है, अगले अनुशासन पर्व में, भीष्म के उस आगे के गहन उपदेश की कथा वर्णित की जाएगी।
इस अध्याय की शिक्षा
युद्ध के पश्चात् की सच्ची विजय, केवल राज्य प्राप्त करने में नहीं, अपितु उससे प्राप्त ज्ञान के साथ, धर्मपूर्वक उसका पुनर्निर्माण करने में निहित होती है।
