सौप्तिक पर्व
सौप्तिक पर्व
अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा द्वारा रात्रि में सोए हुए पांडव-शिविर पर किया गया वह भीषण आक्रमण जिसमें द्रौपदी के पाँचों पुत्र मारे गए।
अश्वत्थामा की प्रतिशोध-प्रतिज्ञा
दुर्योधन को उस अत्यंत भीषण, दयनीय अवस्था में भूमि पर पड़ा छोड़कर, अश्वत्थामा, कृपाचार्य तथा कृतवर्मा, गहन शोक और असहनीय क्रोध से भरे हुए, वहाँ से दूर, एक निर्जन वन की ओर प्रस्थान कर गए, यह न जानते हुए कि आगे क्या करें।
अश्वत्थामा, अपने राजा और मित्र दुर्योधन की उस अंतिम, हृदयविदारक अवस्था को स्मरण करते हुए, तथा अपने पिता द्रोणाचार्य के उस छलपूर्ण अंत को भी पुनः स्मरण करते हुए, अत्यंत भीषण प्रतिशोध की अग्नि में जलने लगे।
तीनों योद्धा, दिनभर की इस भीषण थकान और शोक के पश्चात्, रात्रि होने पर, एक विशाल वटवृक्ष के नीचे कुछ काल विश्राम करने का निश्चय किया, यह सोचते हुए कि प्रातःकाल होने पर वे आगे की कोई ठोस योजना बनाएँगे।
कृपाचार्य और कृतवर्मा, अत्यंत थके हुए होने के कारण, शीघ्र ही गहन निद्रा में सो गए, किंतु अश्वत्थामा, अपने भीतर जल रही प्रतिशोध की उस अतृप्त अग्नि के कारण, नींद न आने से, जागृत अवस्था में ही उस वृक्ष के नीचे बैठे रहे।
इसी अवस्था में, अश्वत्थामा के मन में, पांडवों से इस पराजय का प्रतिशोध लेने की एक भीषण, अत्यंत असाधारण योजना का बीजारोपण होने लगा, जो आगे चलकर एक अत्यंत त्रासद, रात्रिकालीन घटना को जन्म देने वाली थी।
इस अध्याय की शिक्षा
अतृप्त प्रतिशोध की अग्नि, कभी-कभी मनुष्य को ऐसे मार्ग की ओर धकेल देती है जहाँ से लौटना असम्भव हो जाता है।
उल्लू से मिली प्रेरणा
अश्वत्थामा, उसी वटवृक्ष के नीचे बैठे हुए, अपने भीतर की उस असहनीय पीड़ा और क्रोध में डूबे हुए थे, तभी उन्होंने एक विचित्र, अत्यंत भयंकर दृश्य देखा — एक उल्लू, उसी वृक्ष पर सोए हुए अनेक कौओं पर आक्रमण कर, उन्हें एक-एक कर निर्दयतापूर्वक मार डाल रहा था।
अश्वत्थामा ने देखा कि वह उल्लू, दिन में उन कौओं का सामना करने में असमर्थ था, किंतु रात्रि के अंधकार में, जब वे सभी कौवे निश्चिंत होकर सो रहे थे, उसने अपनी सम्पूर्ण शक्ति का उपयोग कर, उन सबका सरलता से संहार कर डाला।
इस दृश्य ने अश्वत्थामा के मन में एक अत्यंत भीषण, विचारोत्तेजक विचार को जन्म दिया — कि जिस प्रकार यह उल्लू, दिन में असमर्थ होते हुए भी, रात्रि में सोए हुए शत्रुओं का संहार कर सकता है, उसी प्रकार वे भी, दिन के खुले युद्ध में परास्त होने के पश्चात्, रात्रि में सोए हुए पांडव-शिविर पर आक्रमण कर सकते हैं।
अश्वत्थामा, इस विचार से प्रारम्भ में स्वयं भी विचलित हुए, यह जानते हुए कि सोए हुए, निःशस्त्र शत्रुओं पर आक्रमण करना, क्षत्रिय धर्म के सर्वथा विपरीत, एक अत्यंत निंदनीय कृत्य माना जाता है।
किंतु अपने पिता की मृत्यु, दुर्योधन की उस दयनीय अवस्था, तथा अपने भीतर की उस असहनीय प्रतिशोध-अग्नि के समक्ष, अश्वत्थामा ने अंततः धर्म के इन समस्त विचारों को त्यागकर, इस भीषण, रात्रिकालीन आक्रमण की योजना बनाने का निश्चय कर लिया।
इस अध्याय की शिक्षा
क्रोध और प्रतिशोध के वशीभूत मनुष्य, कभी-कभी प्रकृति के सर्वाधिक क्रूर दृश्यों से भी विनाशकारी प्रेरणा ग्रहण कर लेता है।
भगवान शिव का दिव्य दर्शन
अश्वत्थामा, अपने साथियों को जगाकर, उन्हें अपनी इस भीषण योजना से अवगत कराया, तथा उनके साथ, पांडव-शिविर की ओर प्रस्थान करने से पूर्व, अपनी सफलता हेतु भगवान शिव की आराधना करने का निश्चय किया।
अश्वत्थामा ने, अत्यंत गहन एकाग्रता के साथ भगवान शिव का ध्यान करते हुए, उनसे यह प्रार्थना की कि वे उन्हें इस भीषण, निर्णायक कार्य में सफलता प्रदान करें, चाहे इसके लिए उन्हें अपने धर्म और मर्यादा का भी उल्लंघन क्यों न करना पड़े।
भगवान शिव, अश्वत्थामा की इस अत्यंत उग्र, प्रतिशोध से प्रेरित आराधना से प्रकट होकर, उन्हें एक दिव्य, अत्यंत शक्तिशाली तलवार प्रदान की, तथा उन्हें आगामी इस भीषण कार्य में आवश्यक शक्ति और साहस प्रदान किया।
यह घटना, अश्वत्थामा के मन में यह दृढ़ विश्वास स्थापित कर गई कि स्वयं महादेव भी उनके इस प्रतिशोध-कार्य से सहमत हैं, तथा उन्होंने अत्यंत दृढ़ संकल्प के साथ, अपने साथियों सहित, पांडव-शिविर की ओर प्रस्थान किया।
इस प्रकार, इस भीषण, त्रासद रात्रि की पृष्ठभूमि रची गई, जिसमें युद्धभूमि के स्थापित नियमों का पूर्ण उल्लंघन कर, एक ऐसा भीषण संहार होने वाला था, जो सम्पूर्ण महाभारत की सर्वाधिक करुण घटनाओं में से एक के रूप में सदा स्मरण किया जाएगा।
इस अध्याय की शिक्षा
जब मनुष्य अपने प्रतिशोध को ही सर्वोच्च लक्ष्य मान बैठता है, तो वह अपने ही धर्म और मर्यादा का उल्लंघन करने से भी नहीं हिचकिचाता।
पांडव-शिविर में गुप्त प्रवेश
अश्वत्थामा, कृपाचार्य तथा कृतवर्मा, रात्रि के गहन अंधकार में, अत्यंत सतर्कता और गोपनीयता के साथ, पांडव-शिविर की ओर बढ़े, जहाँ विजय के उपरांत की थकान से, समस्त सैनिक तथा योद्धा, निश्चिंत होकर गहन निद्रा में सो रहे थे।
यह पांडवों का सौभाग्य ही था कि उस रात्रि, स्वयं युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा श्रीकृष्ण एवं सात्यकि, शिविर से कुछ दूर, युद्धभूमि से बाहर स्थित एक अन्य स्थान पर विश्राम कर रहे थे, तथा शिविर के भीतर उपस्थित नहीं थे।
अश्वत्थामा ने, कृपाचार्य और कृतवर्मा को शिविर के प्रवेश-द्वारों की रक्षा करने तथा किसी को भी भागने से रोकने का आदेश देते हुए, स्वयं शिविर के भीतर, अत्यंत सतर्कता के साथ प्रवेश किया, तथा अपने प्रमुख शत्रु — धृष्टद्युम्न — की खोज आरम्भ की।
अश्वत्थामा, धृष्टद्युम्न के शयन-स्थान तक पहुँचकर, उन्हें गहन निद्रा में सोया हुआ पाकर, अपने पिता द्रोणाचार्य के उस छलपूर्ण अंत को स्मरण करते हुए, अत्यंत क्रूरतापूर्वक, उन्हें शस्त्र-रहित अवस्था में ही, अपने हाथों से गला घोंटकर मार डाला।
यह वह अत्यंत भीषण, हृदयविदारक क्षण था, जिसमें युद्ध के समस्त स्थापित नियमों और मर्यादाओं का, एक साथ ही पूर्ण उल्लंघन कर दिया गया, तथा एक ऐसी रात्रि का आरम्भ हुआ जो महाभारत की सर्वाधिक त्रासद घटनाओं में गिनी जाती है।
इस अध्याय की शिक्षा
प्रतिशोध की पराकाष्ठा में, मनुष्य कभी-कभी युद्ध और धर्म के समस्त स्थापित नियमों को भी विस्मृत कर बैठता है।
द्रौपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या
धृष्टद्युम्न के इस भीषण अंत के पश्चात्, अश्वत्थामा, अपनी उस दिव्य तलवार के साथ, शिविर के भीतर आगे बढ़ते हुए, अंधकार में सोए हुए अन्य योद्धाओं का भी निर्ममतापूर्वक संहार करने लगे, यह न देखते हुए कि वे कौन हैं।
इसी क्रम में, अश्वत्थामा का सामना, द्रौपदी के पाँचों पुत्रों — प्रतिविंध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक तथा श्रुतसेन — से हुआ, जो एक साथ ही एक शिविर में सो रहे थे, तथा अश्वत्थामा ने, अंधकार के कारण, उन्हें पांडव समझ बैठा।
अश्वत्थामा, अपने भीतर की उस अंधी प्रतिशोध-अग्नि में, यह विचार भी न कर सके कि ये पाँचों तो अभी अत्यंत युवा, निर्दोष राजकुमार हैं, तथा उन्होंने अत्यंत निर्ममतापूर्वक, इन पाँचों का भी, सोते हुए ही, वध कर डाला।
यह वह अत्यंत त्रासद, हृदयविदारक कृत्य था, जिसने अश्वत्थामा के इस सम्पूर्ण प्रतिशोध-अभियान को, एक वीरतापूर्ण कृत्य से, एक अत्यंत घृणित, अक्षम्य नरसंहार में परिवर्तित कर दिया, जिसकी छाया सम्पूर्ण महाभारत में सदा बनी रही।
इसके पश्चात्, अश्वत्थामा, कृपाचार्य तथा कृतवर्मा ने, सम्पूर्ण शिविर में आग लगाकर, तथा शेष सोए हुए सैनिकों का भी अंधाधुंध संहार करते हुए, इस भीषण रात्रि में, पांडव-सेना का लगभग सम्पूर्ण विनाश कर डाला।
इस अध्याय की शिक्षा
अंधे प्रतिशोध में उठाया गया कदम, कभी-कभी निर्दोषों का भी संहार कर, अपने ही कर्ता को सदा के लिए कलंकित कर देता है।
प्रातःकाल का हृदयविदारक दृश्य
प्रातःकाल होते ही, जब युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा श्रीकृष्ण, अपने शिविर की ओर लौटे, तो उनके समक्ष एक अत्यंत भीषण, हृदयविदारक दृश्य प्रस्तुत हुआ — सम्पूर्ण शिविर, अपने ही सैनिकों और योद्धाओं के रक्त से लथपथ पड़ा था।
पांडव, अपनी इस असाधारण विजय के अगले ही प्रातः, अपने प्रिय सेनापति धृष्टद्युम्न तथा द्रौपदी के पाँचों पुत्रों के इस अत्यंत क्रूर, अप्रत्याशित संहार को देखकर, गहन शोक और असहनीय पीड़ा से टूट पड़े, यह विश्वास करना भी उनके लिए अत्यंत कठिन था।
द्रौपदी, जब यह भीषण समाचार सुनी, तो अपने पाँचों पुत्रों के इस अत्यंत क्रूर, नियम-विरुद्ध वध से, गहन शोक और असहनीय क्रोध में डूब गई, तथा वह अत्यंत करुण विलाप करने लगी, यह प्रश्न पूछते हुए कि आखिर उसके निर्दोष पुत्रों का क्या अपराध था।
युधिष्ठिर सहित सभी पांडव, इस असाधारण विजय के पश्चात् भी, अपने इस अत्यंत गहन, अपार शोक के मध्य, यह अनुभव करने लगे कि युद्ध की यह विजय, कितने भी अधिक मूल्य पर, कितनी भी अधिक क्षति सहकर प्राप्त हुई है।
द्रौपदी, अपने इस असहनीय शोक और क्रोध के मध्य, अंततः यह प्रतिज्ञा ले बैठी कि जब तक अश्वत्थामा के मस्तक पर स्थित उस दिव्य मणि को लाकर उसके समक्ष प्रस्तुत नहीं किया जाता, वह अन्न-जल ग्रहण नहीं करेगी।
इस अध्याय की शिक्षा
युद्ध की सबसे बड़ी विजय भी, जब असीम पारिवारिक क्षति के साथ आती है, तो वह विजय के स्थान पर गहन शोक ही प्रतीत होती है।
अश्वत्थामा का पीछा
भीम तथा अर्जुन, द्रौपदी की इस अत्यंत मार्मिक प्रतिज्ञा को पूर्ण करने हेतु, तथा अपने पुत्रों की इस अत्यंत क्रूर हत्या का प्रतिशोध लेने हेतु, तत्काल अश्वत्थामा की खोज में, अपने रथों पर सवार होकर, वन की ओर प्रस्थान कर गए।
अश्वत्थामा, इस समय तक, अपने इस भीषण कृत्य से भयभीत होकर, वन के गहन अंधकार में, वेदव्यास तथा अन्य महर्षियों के एक आश्रम के निकट, अत्यंत भयभीत और असहाय अवस्था में छिपा हुआ था, अपने ही किए गए इस कृत्य के भार से आक्रांत।
अर्जुन तथा श्रीकृष्ण, अश्वत्थामा के उस छिपने के स्थान तक जा पहुँचे, तथा उसे इस अत्यंत जघन्य, नियम-विरुद्ध कृत्य के लिए, तत्काल दंडित करने हेतु उसका सामना करने के लिए तत्पर हुए।
अश्वत्थामा, स्वयं को इस प्रकार घिरा हुआ देखकर, तथा अपने प्राणों की रक्षा हेतु कोई अन्य उपाय न पाकर, अत्यंत हताश होकर, एक अत्यंत भीषण, सर्वनाशकारी दिव्य अस्त्र — ब्रह्मशिरास्त्र — का आवाहन कर, उसे पांडवों की ओर छोड़ दिया।
यह अस्त्र इतना भयंकर और सर्वनाशकारी था कि इसके प्रभाव से, सम्पूर्ण सृष्टि के विनाश की भी सम्भावना उत्पन्न हो सकती थी, तथा इस अत्यंत विकट, जीवन-मृत्यु के प्रश्न वाली परिस्थिति में, अर्जुन को भी तत्काल एक निर्णायक कदम उठाना पड़ा।
इस अध्याय की शिक्षा
अपने किए गए जघन्य कृत्य से भयभीत मनुष्य, कभी-कभी उससे बचने हेतु, और भी अधिक विनाशकारी मार्ग अपना बैठता है।
दो ब्रह्मास्त्रों का भीषण संघर्ष
अर्जुन, अश्वत्थामा द्वारा छोड़े गए इस भयंकर ब्रह्मशिरास्त्र को अपनी ओर आते देख, तथा इसके सम्भावित सर्वनाशकारी परिणाम को समझते हुए, महर्षि व्यास तथा श्रीकृष्ण के परामर्श अनुसार, अपने स्वयं के ब्रह्मास्त्र का भी आवाहन कर, उसे उस अस्त्र के प्रत्युत्तर में छोड़ दिया।
दोनों ही दिव्य, अत्यंत शक्तिशाली अस्त्र, आकाश में परस्पर टकराते हुए, एक ऐसा भीषण, प्रलयंकारी दृश्य उत्पन्न करने लगे, जिससे सम्पूर्ण त्रिलोक में भय और कम्पन व्याप्त हो गया, तथा स्वयं देवगण भी इस दृश्य से चिंतित हो उठे।
महर्षि व्यास तथा अन्य उपस्थित ऋषिगण, इस भीषण, सर्वनाशकारी संघर्ष के परिणाम से सम्पूर्ण सृष्टि की रक्षा हेतु, तत्काल वहाँ प्रकट हुए, तथा दोनों योद्धाओं — अर्जुन और अश्वत्थामा — को, अपने-अपने अस्त्रों को वापस लेने का आदेश दिया।
अर्जुन, अपने असाधारण अस्त्र-कौशल के कारण, अपने उस ब्रह्मास्त्र को वापस लेने में पूर्णतः सफल रहे, किंतु अश्वत्थामा, इस विद्या में उतने पारंगत न होने के कारण, अपने अस्त्र को वापस लेने में पूर्णतः असमर्थ रहे।
अश्वत्थामा, अपने उस अस्त्र को पूर्णतः निष्फल न होने देने की हठधर्मिता में, अत्यंत क्रूरतापूर्वक, उसकी दिशा, पांडवों के वंश को ही समूल नष्ट करने हेतु, उत्तरा के गर्भ की ओर मोड़ दी, जो उस समय अभिमन्यु की संतान को अपने गर्भ में धारण किए हुए थी।
इस अध्याय की शिक्षा
जिस विद्या का पूर्ण ज्ञान न हो, उसका दुरुपयोग, अंततः स्वयं के तथा असंख्य निर्दोषों के लिए भी विनाशकारी सिद्ध होता है।
श्रीकृष्ण द्वारा परीक्षित की रक्षा
अश्वत्थामा के इस अत्यंत क्रूर, निंदनीय कृत्य को देखकर, जिसमें उसने एक अजन्मे शिशु के प्राण लेने का प्रयास किया, स्वयं श्रीकृष्ण अत्यंत क्रोधित हो उठे, तथा उन्होंने तत्काल अपनी दिव्य शक्ति का प्रयोग करते हुए, उस ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से, उत्तरा के गर्भ की रक्षा करने का दृढ़ संकल्प लिया।
श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया द्वारा, उस भयंकर अस्त्र के प्रभाव को उत्तरा के गर्भस्थ शिशु तक पहुँचने से पूर्व ही निष्प्रभावी कर दिया, तथा उन्होंने यह दिव्य वचन दिया कि वे स्वयं, उस गर्भस्थ शिशु — परीक्षित — के प्राणों की सदैव रक्षा करेंगे।
महर्षि व्यास, इस सम्पूर्ण घटनाक्रम से अत्यंत क्षुब्ध होकर, अश्वत्थामा के इस अक्षम्य, जघन्य कृत्य के लिए, उसे एक अत्यंत कठोर, दीर्घकालिक शाप देते हुए घोषणा की कि वह तीन हजार वर्षों तक, अपने शरीर पर असाध्य घावों और असहनीय पीड़ा के साथ, निर्जन वनों में अकेला भटकता रहेगा।
इसके साथ ही, अर्जुन ने अश्वत्थामा के मस्तक पर स्थित उस दिव्य मणि को बलपूर्वक छीन लिया, जो जन्म से ही उसके मस्तक में जड़ी हुई थी, तथा जो उसे भूख, प्यास और भय से सुरक्षा प्रदान करती थी, तथा इस मणि को द्रौपदी के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
द्रौपदी, अपने पाँचों पुत्रों की मृत्यु के इस आंशिक प्रतिशोध से, तथा अश्वत्थामा को प्राण-दंड के स्थान पर इस दीर्घकालिक, कष्टप्रद शाप से दंडित होते देखकर, कुछ हद तक संतुष्ट होकर, अंततः अपनी वह प्रतिज्ञा पूर्ण करते हुए, अन्न-जल ग्रहण करने पर सहमत हुई।
इस अध्याय की शिक्षा
अन्याय करने वाले को प्राण-दंड देने की अपेक्षा, उसे अपने ही कर्मों के दीर्घकालिक परिणाम भोगने देना, कभी-कभी अधिक गहन न्याय सिद्ध होता है।
सौप्तिक पर्व का समापन
इस अत्यंत भीषण, त्रासद रात्रि की घटनाओं के पश्चात्, सम्पूर्ण पांडव-सेना, जो अठारह दिनों के भीषण युद्ध में विजयी हुई थी, अब लगभग पूर्णतः नष्ट हो चुकी थी, तथा इस विजय का उल्लास, गहन शोक और रिक्तता में परिवर्तित हो गया।
युधिष्ठिर, अपनी इस असाधारण विजय के पश्चात् भी, द्रौपदी के पाँचों पुत्रों, धृष्टद्युम्न तथा अपनी सम्पूर्ण सेना की इस अत्यंत क्रूर क्षति से, गहन शोक और आत्म-मंथन में डूब गए, यह प्रश्न उनके हृदय में बार-बार उठने लगा कि क्या यह विजय वास्तव में सार्थक थी।
अश्वत्थामा, अपने उस दीर्घकालिक शाप के साथ, अत्यंत पीड़ा और अपमान में डूबा हुआ, वन की ओर अकेला भटकने के लिए विवश हुआ, यह एक ऐसा अंत था जो उसके पिता द्रोणाचार्य के नाम को भी सदा के लिए कलंकित कर गया।
श्रीकृष्ण, इस सम्पूर्ण त्रासद घटनाक्रम के मध्य भी, परीक्षित की रक्षा करके, कुरुवंश की उस अंतिम, एकमात्र संतान की रक्षा सुनिश्चित कर, आगामी पीढ़ी के लिए आशा की एक नई किरण प्रज्वलित कर चुके थे।
इस प्रकार सौप्तिक पर्व, अश्वत्थामा के उस भीषण, रात्रिकालीन नरसंहार, द्रौपदी के पुत्रों की मृत्यु, तथा अंततः परीक्षित की रक्षा के साथ अपने समापन पर पहुँचता है, अगले स्त्री पर्व में, युद्धभूमि में स्त्रियों के उस करुण विलाप की कथा वर्णित की जाएगी।
इस अध्याय की शिक्षा
युद्ध की सबसे बड़ी विजय भी, जब अपने ही परिवार की सन्तानों की क्षति के साथ आती है, तो वह विजय, गहनतम शोक का ही एक रूप बन जाती है।
